भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

विष्णुपर्व ] , एकसप्ततितमोऽध्यायः । ४९५


विपाकमस्य कार्यस्य नानु पश्यामि शोभनम् ।
यदत्र कारणं देव निबोध विबुधाधिप ॥ १२ ॥
'देव ! विबुधेश्वर ! मैं इस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं देखता हूँ। इसमें जो कारण है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ १२॥

य एको विश्वमध्यास्ते प्रधानं जगतो हरिः ।
प्रकृत्या यं परं सर्वं क्षेत्रज्ञं वै विदुबुर्धाः ॥ १३ ॥
'जो अकेले ही कार्यभूत जगत् और उसके कारणभूत प्रधानके भी अधिष्ठाता (संचालक) हैं, वे श्रीहरि ही श्रीकृष्ण हैं। जिन्हें समस्त विद्वान् प्रकृतिसे परे विराजमान क्षेत्रज्ञके रूपमें जानते हैं ॥ १३ ॥

तस्याव्यक्तस्य यो व्यक्तो भागः सर्वभवोद्भवः ।
तस्यात्मा परमो देवो विष्णुः सर्वस्य धीमतः ॥ १४ ॥
'उस अव्यक्त प्रकृतिके जो व्यक्तभाग (महत्तत्त्व या समष्टिबुद्धिके अभिमानी चेतन) ब्रह्मा हैं, वे ही समस्त संसारकी उत्पत्तिके कारण हैं। उनके तथा सम्पूर्ण चेतन जीवमात्रके आत्मा वे परमदेव श्रीविष्णु ही हैं ॥ १४ ॥

प्रकृत्याः प्रथमो भाग उमा देवी यशस्विनी ।
व्यक्तः सर्वमयो विश्वः स्त्रीसंज्ञो लोकभावनः ॥ १५ ॥
यशस्विनी उमादेवी प्रकृतिका मुख्य भाग (व्यक्त जगत्स्वरूप) हैं। अतः सर्वमय व्यक्त विश्व स्त्रीसंज्ञक (सम्पूर्ण भोग्य वस्तुरूप) है, जो चेतनमात्रको तृप्त करनेवाला है ॥ १५ ॥

रुक्मिण्याद्याः स्त्रियस्तस्या व्यक्तत्वं प्रथमो गुणः ।
अव्यया प्रकृतिर्देवी गुणी देवो महेश्वरः ॥ १६ ॥
'रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ भी प्रकृतिका मुख्य गुण (भाग) अर्थात् व्यक्तरूप हैं। अविनाशिनी प्रकृति उमादेवी है, जो गुणरूपा है और उनसे युक्त गुणी पुरुष भगवान् महेश्वर हैं। १६।

न विशेषोऽस्य रुद्रस्य विष्णोश्चामरसत्तम ।
गुणिनश्चाव्ययः शास्ता सदा च प्रथमोऽगुणः ॥ १७ ॥
नारायणो महातेजाः सर्वकृल्लोकभावनः ।
'देवश्रेष्ठ ! (इसी प्रकार लक्ष्मी या रुक्मिणी गुणमयी अविनाशिनी प्रकृति हैं और विष्णु या श्रीकृष्ण गुणी पुरुष हैं) इन गुणवान् मायावी रुद्र और विष्णुमें कोई अन्तर नहीं है। त्रिगुणात्मक जगत्के जो प्रथम अविनाशी शासक निर्गुण परमात्मा हैं, वे ही महातेजस्वी नारायण हैं। वे सबके स्रष्टा और समस्त जगत्के उत्पादक हैं ॥ १७३ ॥

भोक्ता महेश्वरो देवः कर्ता विष्णुरधोक्षजः ॥ १८ ॥
ब्रह्मा देवगणांश्चान्ये पश्चात् सृष्टा महात्मना ।
महादेवेन देवेश प्रजापतिगणास्तथा ॥ १९ ॥
'देवेश्वर ! इन परमात्मा परमदेव नारायणके द्वारा ही भोक्ता महेश्वरदेव, कर्ता अधोक्षज विष्णु, ब्रह्मा, अन्य देव-समुदाय तथा प्रजापतिगण—इन सबकी पीछे सृष्टि हुई है ॥ १८-१९ ॥

एवं पुराणपुरुषो विष्णुर्देवेषु पठ्यते ।
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च गुणेभ्यश्च परस्तथा ॥ २० ॥
'इस प्रकार पुराणपुरुष भगवान् विष्णु देवताओंमें अचिन्त्य, अप्रमेय और गुणातीत कहे जाते हैं ॥ २० ॥

अदित्या तपसा विष्णुर्महात्माऽऽराधितः पुरा ।
वरेण च्छन्दिता तेन परितुष्टेन चादितिः ॥ २१ ॥
'पूर्वकालमें देवमाता अदितिने तपस्याद्वारा परमात्मा विष्णुकी आराधना की। उससे संतुष्ट हो भगवान् विष्णुने भी अदितिको इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी ॥ २१ ॥

तयोक्तस्त्वत्समं पुत्रमिच्छामीति सुरोत्तम ।
प्रणिपत्य च विज्ञाय नारायणमधोक्षजम् ॥ २२ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! उस समय अदितिने अधोक्षज (इन्द्रियातीत) भगवान् नारायणको पहचानकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपके समान पुत्र चाहती हूँ' । २२।

तेनोक्तं भुवने नास्ति मत्समः पुरुषोऽपरः ।
अंशेन तु भविष्यामि पुत्रः खल्वहमेव ते ॥ २३ ॥
'तब उन्होंने कहा—'देवि ! समस्त भुवनोंमें मेरे समान दूसरा कोई पुरुष नहीं है। अतः मैं ही अपने अंशसे तुम्हारा पुत्र होऊँगा ॥ २३ ॥

स जातः सर्वकृद् देवो भ्राता तव सुरेश्वर ।
नारायणो महातेजा यमुपेन्द्रं प्रचक्षते ॥ २४ ॥
'सुरेश्वर ! (इस निश्चयके अनुसार) वे सबकी सृष्टि करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण तुम्हारे भाईके रूपमें अवतीर्ण हुए, जिन्हें उपेन्द्र कहते हैं ॥ २४ ॥

इच्छन्नेव हरिर्देव काश्यपत्वमुपागतः ।
तैस्तैर्भावैर्विंकुरुते भूतमभव्यभवाप्ययः ॥ २५ ॥
'देव ! भूत और भविष्यकी उत्पत्ति एवं संहारके अधिष्ठानभूत श्रीहरि स्वेच्छासे ही कश्यपजीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे तथा अपनी इच्छाके अनुसार ही वे विभिन्न रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं ॥ २५ ॥

प्रादुर्भावं गतो देवो जगतो हितकाम्यया ।
माथुरं जगतो नाथः कर्ता हर्ता च केशवः ॥ २६ ॥
'जगत्के संरक्षक, स्रष्टा और संहारक भगवान् केशव जगत्के हितकी कामनासे ही मथुरामे अवतीर्ण हुए हैं ॥ २६॥

यथा पललपिण्डः स्याद् व्याप्तः स्नेहेन मानद ।
तथा जगदिदं व्याप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! जैसे मांसपिण्ड स्नेह (चर्बी या चिकनाई) से व्याप्त होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् प्रभावशाली भगवान् विष्णुसे व्याप्त है ॥ २७ ॥