भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 515

४९४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


पुनः निःशङ्क होकर यह बात कह देनी चाहिये कि माया (छल-कपट) के द्वारा पारिजात वृक्षका अपहरण करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। विशुद्ध युद्ध ही होना चाहिये। कुटिलतापूर्ण बर्तावको धिक्कार है' ॥ ५० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे इन्द्रवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजात-हरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥


एकसप्ततितमोऽध्यायः

नारदजीके द्वारा श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनकर भी इन्द्रका उन्हें पारिजात देनेको उद्यत न होना

वैशम्पायन उवाच
महेन्द्रवचनं श्रुत्वा नारदो वदतां वरः।
विविक्ते देवराजानमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने एकान्तमें उनसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

कामं प्रियाणि राजानो वक्तव्या नात्र संशयः।
प्राप्तकालं तु वक्तव्यं हितमप्रियमप्युत ॥ २ ॥

'देवेश्वर ! अवश्य ही राजाओंसे वे ही बात कहनी चाहिये, जो उन्हें प्रिय लगें; इसमें संशय नहीं है तथापि जिसका अवसर प्राप्त हुआ हो, ऐसा हितकारक वचन तो अप्रिय होनेपर भी उनसे कह देना ही उचित है ॥ २ ॥

अनियुक्तपुरोभागो न स्यादिति वदन्ति हि।
सुलोकगतितत्त्वज्ञो नयविज्ञानकोविदः ॥ ३ ॥

'जो उत्तम लोकगतिके तत्त्वका ज्ञाता है और नीतिके विज्ञानमें भी कुशल है, ऐसा पुरुष बिना कहे-सुने कहीं अगुआ न बने, यह बुद्धिमान् पुरुषोंका कथन है ॥ ३ ॥

कार्याकार्ये समुत्पन्ने परिपृच्छसि मां भवान् ।
यतस्ततः प्रवक्ष्यामि गृह्यतां यदि रोचते ॥ ४ ॥

'कर्तव्याकर्तव्यकी समस्या खड़ी होनेपर प्रायः तुम मुझसे पूछते और सलाह लेते हो, इसलिये इस समय भी मैं तुमसे कुछ कहूँगा। यदि अच्छा लगे तो इसे काममें लाना ॥४॥

अनुक्तेनापि सुहृदा वक्तव्यं जानता हितम् ।
न्याय्यं च प्राप्तकालं च पराभवमनिच्छता ॥ ५ ॥

'जो राजाकी पराजय नहीं चाहता और किस बातमें उसका हित है, यह अच्छी तरह जानता है,—ऐसे सुहृद्को बिना कहे भी न्यायसंगत और समयोचित हितकर वचन अवश्य कहना चाहिये ॥ ५ ॥

वक्तव्यं सर्वथा सद्भिर्प्रिय चापि यद्धितम् ।
आनृण्यमेतत् स्नेहस्य सद्भिरेवादृतं पुरा ॥ ६ ॥

'सत्पुरुषोंको उचित है कि वे सर्वथा हितकी ही बात बतावें, भले ही वह सुननेमें अप्रिय हो। यही स्नेहसे उऋण होनेका उपाय है, जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने ही प्राचीन कालसे आदर किया है ॥ ६ ॥

अनृते धर्मभग्ने च न शुश्रूषति चाप्रिये ।
न प्रियं न हितं वाच्यं सद्भिरेवेति निन्दिताः ॥ ७ ॥

'जो असत्यवादी, धर्म-मर्यादाको भंग करनेवाले, किसीका उपदेश सुननेकी इच्छा न रखनेवाले और सबके अप्रिय (द्वेषपात्र) हैं, ऐसे लोगोंसे न तो प्रिय बात कहनी चाहिये और न हितकी ही। ऐसा कहकर सत्पुरुषोंने इन सबकी निन्दा की है ॥ ७ ॥

सर्वथा देव वक्तव्यं श्रूयतां शृण्वतां वर।
श्रुत्वा च कुरु सर्वज्ञ मम श्रेयस्करं वचः ॥ ८ ॥

'श्रोताओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ देव ! मुझे तुमको सर्वथा हितकी बात बतानी है, सुनो और सुनकर मेरे कल्याणकारी वचनका पालन करो ॥ ८ ॥

अन्योन्यभेदो भ्रातॄणां सुहृदां वा बलान्तक।
भवत्यानन्दकृद् देव द्विषतां नात्र संशयः ॥ ९ ॥

'बलासुरका विनाश करनेवाले देव ! भाइयों अथवा सुहृदोंमें यदि परस्पर भेद (वैरभाव) हो जाय तो वह शत्रुओंको आनन्द देनेवाला होता है, इसमें संशय नहीं है ॥९॥

हितानुबन्धसहितं कार्यं ज्ञेयं सुरेश्वर ।
विपरीतं च तद् बुद्ध्वा नित्यं बुद्धिमतां वर ॥ १० ॥
यत् स्यात् तापकरं पश्चादारब्धं कार्यमीदृशम्।
आरभेन्नैव तद् विद्वानेष बुद्धिमतां नयः ॥ ११ ॥

'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सुरेश्वर ! अपने कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्यको जानना चाहिये तथा जो इसके विपरीत हो, उसको भी सदा समझ लेना चाहिये। समझ लेनेके बाद जो कार्य आरम्भ करनेपर पीछे संताप देनेवाला हो, ऐसे कार्यको विद्वान् पुरुष कदापि आरम्भ न करे—यही बुद्धिमानोंकी नीति है ॥ १०-११ ॥