भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९३


'मुने ! विष्णुने मेरे इस भुवन ( स्वर्गलोक ) की मर्यादा भंग करके सब लोकोंसे ऊपर-ऊपर अपने भुवन ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्रतिष्ठित किया और उसे अन्य लोकोंसे बढ़कर महत्त्व दिया ॥ ३७ ॥

अवमानः स च मया पृष्ठतः क्रियते मुने ।
लालनीयो मया बाल इत्येवं भ्रातृगौरवात् ॥ ३८ ॥

'मुने ! वह अपमान मैंने पीछे कर दिया (भुला दिया)। बड़े भाईका जो गौरव है, उसपर ध्यान देकर मैंने सदा यही सोचा है कि यह बालक है। अतः मेरे द्वारा लाड़-प्यार पानेके योग्य है ॥ ३८ ॥

बालोऽयं मम पुत्रेति यवीयानिति नारद ।
पित्रा मात्रा च गोविन्दो मानी च परिभावितः ॥ ३९ ॥

'नारद ! श्रीकृष्णके विषयमें मेरा सदा यही भाव रहा है कि यह बालक है, मेरा छोटा भाई है; अतः मेरे द्वारा पुत्रके समान लाड़ लड़ानेके योग्य है, किंतु उनके विषयमें मेरे माता-पिताने भी अपना यही विचार व्यक्त किया है कि गोविन्द मानी है ॥ ३९ ॥

दृष्टस्तत्र जनानां च केशवः सुविशेषतः ।
वयं द्वेष्या न संदेहस्तत्र स्नेहोऽतिरिच्यते ॥ ४० ॥

'वहाँ ( मनुष्यलोक ) के लोगोंको श्रीकृष्ण विशेष प्रिय हैं और हमलोग उनके द्वेषके पात्र हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसका कारण यही है कि श्रीकृष्णका उन मनुष्योंके प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा है ॥ ४० ॥

सर्वज्ञो बलवाञ्छूरः पात्रं मानयिता तथा ।
केशवेत्येव च ध्यानं यत्तद्वितथतां गतम् ॥ ४१ ॥

'अबतक जो मेरा यह खयाल था कि केशव सर्वज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सुपात्र तथा दूसरोंको मान देनेवाले हैं, वह सब निष्फल हो गया ॥ ४१ ॥

गच्छ नारद वक्तव्यः केशवो वचनान्मम ।
आहूतो न निवर्तेयं समरं प्रति शत्रुभिः ॥ ४२ ॥

'नारदजी ! जाइये और मेरे शब्दोंमें श्रीकृष्णसे कह दीजिये कि 'मैं शत्रुओंके आह्वान करने या ललकारनेपर युद्ध-से पीछे नहीं हट सकता ॥ ४२ ॥

यदीच्छसि तदागच्छ सहां ते यत्त्वमिच्छसि ।
प्रहरस्व च पूर्वं त्वं भार्याजित यथेच्छसि ॥ ४३ ॥

'पत्नीके वशमें रहनेवाले श्रीकृष्ण ! यदि तुम मुझपर गदाका प्रहार करना चाहते हो तो आ जाओ। तुम जो चाहते हो, तुम्हारे उस प्रहारको सहन किया जायगा। जैसे तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार पहले तुम्हीं प्रहार करो ॥


रथाङ्गेनाथ शार्ङ्गेण गदया नन्दकेन च ।
प्रहरारुह्य गरुडं दृढो भूत्वा जनार्दन ॥ ४४ ॥
प्रहृते प्रहरिष्यामि यथाशक्त्या च केशव ।
अहो धिग् यदि मां स्नेहो विक्लवं न करिष्यति ॥ ४५ ॥

'जनार्दन ! तुम गरुड़पर चढ़कर सुदृढ़ होकर मेरे ऊपर सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष, कौमोदकी गदा और नन्दकनामक खड्गके द्वारा प्रहार करो। केशव ! यदि भ्रातृस्नेह मुझे व्याकुल नहीं कर देगा तो तुम्हारे प्रहार करनेपर मैं भी यथाशक्ति तुमपर प्रहार करूँगा। अहो, ऐसी परिस्थितिको धिक्कार है ! ॥ ४४-४५ ॥

यावन्न संग्रामगतो जितोऽहं चक्रपाणिना ।
पारिजातं न दास्यामि तावद् भो मुनिसत्तम ॥ ४६ ॥

'मुनिश्रेष्ठ ! जबतक मैं संग्रामभूमिमें उपस्थित होकर चक्रपाणि श्रीकृष्णके द्वारा पराजित नहीं हो जाऊँगा, तबतक उन्हें पारिजात नहीं दूँगा ॥ ४६ ॥

मां समाह्वयते ज्येष्ठं यवीयान् स तपोधन ।
अहो तं मर्षयिष्यामि किमर्थं स्त्रीजितं हरिम् ॥ ४७ ॥

'अहो तपोधन ! जब श्रीकृष्ण छोटे होकर मुझ बड़े भाईको युद्धके लिये ललकार रहे हैं, तब पत्नीके गुलाम बने हुए उन केशवके इस बर्तावको मैं किस लिये सहन करूँ ॥

अद्यैव गच्छ भगवन् द्वारकां कृष्णपालिताम् ।
विवादे संस्थितः सोऽज्ञ इति वाच्यस्त्वयाच्युतः ॥ ४८ ॥

'भगवन् ! आप आज ही श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारका-पुरीको चले जाइये और विवादके लिये तैयार खड़े हुए उस अज्ञानी अच्युतसे इस प्रकार मेरा उत्तर सुना दीजिये ॥४८॥

पलाशपत्रार्द्धमपि त्वयाजितो
न पारिजातस्य तव प्रदास्यति ।
इति प्रवाच्यो मधुसूदनस्त्वया
वचो मदीयं स्मरता तपोधन ॥ ४९ ॥

'जबतक तुम पराजित नहीं कर दोगे, तबतक पारिजात वृक्षकी तो बात ही क्या है, उसकी आधी पत्ती भी इन्द्र तुम्हें नहीं देगा। तपोधन ! मेरी इस बातको याद रखते हुए आपको मधुसूदन श्रीकृष्णसे इन्हीं शब्दोंमें यह बात कहनी चाहिये ॥ ४९ ॥

पुनः प्रवाच्यो भगवंस्त्वयाच्युतो
मम प्रियार्थं खलु निर्विशङ्कितम् ।
न मायया हर्तुमिहार्हसि द्रुमं
सुयुद्धमेवास्तु धिगस्तु जिह्मताम् ॥ ५० ॥

'भगवन् ! आपको मेरा प्रिय करनेके लिये अच्युतसे