भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

४९२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सभाको भी धिक्कार है, जहाँ स्त्रीके वशीभूत हुए श्रीकृष्णने मुझपर इस प्रकार आक्षेप किया है ॥ २३ ॥

न दृष्टं कश्यपकुले व्यपदेश्यं महामुने ।
नैव दक्षकुले दृष्टं मातुर्मे यत्र सम्भवः ॥ २४ ॥

'महामुने ! महर्षि कश्यपके कुलमें अबतक कोई निन्दनीय बात नहीं देखी गयी है तथा जहाँ मेरी माताका जन्म हुआ है, उस दक्षकुलमें भी ऐसी कोई बात देखनेमें नहीं आयी है ॥ २४ ॥

न ज्येष्ठता न राजत्वं देवानां प्रतिमानितम् ।
कामरागाभिभूतेन कृष्णेन खलु नारद ॥ २५ ॥

'नारद ! काम और रागसे आक्रान्त हुए श्रीकृष्णने न तो मेरे बड़प्पनका आदर किया है और न मेरे देवराज पदका ही सम्मान किया है ॥ २५ ॥

पुत्रदारसहस्रैर्हि भ्रातानघ विशिष्यते ।
सद्वृत्तो ज्ञानसम्पन्न इति ब्रह्मा पुराऽब्रवीत् ॥ २६ ॥

'निष्पाप देवर्षे ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने ऐसा कहा था कि सदाचारी और ज्ञानसम्पन्न भाई हजारों स्त्रियों और पुत्रोंसे बढ़कर है ॥ २६ ॥

नास्ति भ्रातृसमो बन्धुराहार्य इतरो जनः ।
इति मामब्रवीन्माता पिता चैव प्रजापतिः ॥ २७ ॥

'मेरी माता तथा मेरे पिता प्रजापति कश्यपजीने मुझसे कहा था कि भाईके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है; क्योंकि वह स्वाभाविक बन्धु है और दूसरे लोग भोजन आदि देकर बनाये हुए हैं ॥ २७ ॥

सोदरे तु विशेषं तु पिता मे कश्यपोऽब्रवीत् ।
दृप्ता मया विरुद्ध्यन्ते दानवाः पापनिश्चयाः ॥ २८ ॥

'मेरे पिता कश्यपने सहोदर भाईमें विशेष बन्धुत्व बताया है। यद्यपि दानव भी हमारे भाई ही हैं, तथापि वे घमंडी और पापपूर्ण विचार रखनेवाले हो गये हैं; इसलिये मैं उनका विरोध करता हूँ ॥ २८ ॥

काममेतन्न वक्तव्यं स्वयमात्मस्तवान्वितम् ।
प्राप्तस्त्ववसरो विप्र यदिहाद्योच्यते मया ॥ २९ ॥

'विप्रवर ! जो बात अपनी प्रशंसासे युक्त हो, उसे स्वयं ही नहीं कहना चाहिये, इसमें संशय नहीं है तथापि इस समय यहाँ मेरे द्वारा जो बात कही जाती है, उसके कहनेका अवसर आ गया है ॥ २९ ॥

धनुर्ज्यायां मुनिश्रेष्ठ छिन्नायां हि पुरानघ ।
धन्वीभिरमराणां च वरदानान्महामते ॥ ३० ॥
उत्कृत्तशिरसो विष्णोः पुरा देहो धृतो मया ।
सन्धितं च शिरो यत्नाच्छिन्नं रौद्रेण तेजसा ॥ ३१ ॥

'मुनिश्रेष्ठ ! महामते ! पूर्वकालमें (दक्षयज्ञ-विध्वंसके समय) जब भगवान् शंकरके धनुर्धर पार्षदोंने वरदानके प्रभावसे देवताओंके धनुषोंकी प्रत्यञ्चा काट डाली और यज्ञरूपी विष्णुका सिर काट लिया गया था, उस समय मैंने ही उनके धड़को धारण किया था तथा रुद्रके तेजसे कटे हुए उनके सिरको यत्नपूर्वक धड़से जोड़ा था ॥ ३०-३१ ॥

अहं विशिष्टो देवानामित्युक्त्वा पुनरच्युतः ।
धनुरारोप्य दर्पेण स्थितो नारद केशवः ॥ ३२ ॥

नारदजी ! जब उनका मस्तक जुड़ गया, तब वे अच्युत-स्वरूप केशव पुनः धनुष चढ़ाकर बड़े घमंडके साथ यह कहते हुए खड़े हो गये कि मैं इन देवताओंमें सबसे बढ़कर हूँ ॥ ३२ ॥

किं मां पिता वा माता वा वक्ष्यतीति मया मुने ।
स्नेहेन च स्थितं विष्णोः शरीरं मुनिसत्तम ॥ ३३ ॥

मुने ! ऋषिश्रेष्ठ ! मैंने उस समय यह सोचकर कि यदि मैं नहीं बचाता हूँ तो मेरे पिता-माता मुझे क्या कहेंगे, बड़े स्नेहके साथ विष्णुके शरीरको थाम लिया था ॥ ३३ ॥

ऐन्द्रं वैष्णवमस्यैव मुने भागमहं ददौ ।
यवीयांसमहं प्रेम्णा कृष्णं पश्यामि नारद ॥ ३४ ॥

'नारद मुने ! (वर्षा ऋतुमें जो सत्कर्म या पूजन किया जाता है, उसपर (मुझ) इन्द्रका ही आधिपत्य है; क्योंकि उस समय श्रीविष्णु शयन करते हैं) उस ऐन्द्रभागको ही वैष्णव भाग बनाकर मैंने इन्हें अर्पित किया है*। इस प्रकार मैं अपने छोटे भाई कृष्णको सदा प्रेमपूर्ण दृष्टिसे ही देखता हूँ ॥ ३४ ॥

संग्रामेषु प्रहर्तव्यं तेन पूर्वं तपोधन ।
राजा किलाहं समरे प्रहराम्यग्रतो ध्रुवम् ॥ ३५ ॥

'तपोधन ! संग्रामके अवसरोंपर (यदि कृष्ण मेरे विरोधमें खड़े हों तो) पहले उन्हींको मुझपर प्रहार करना चाहिये। अन्यत्र युद्धमें मैं अवश्य ही पहले प्रहार करता हूँ; क्योंकि मैं राजा हूँ ॥ ३५ ॥

प्रादुर्भावेषु सर्वेषु स्वशरीरमिवानघ ।
यत्नाद् रक्षामि धर्मज्ञ केशवं भक्तिमाश्रितम् ॥ ३६ ॥

'पापरहित धर्मज्ञ नारदजी ! सभी अवतारोंके समय मुझमें भक्ति रखनेवाले केशवकी मैं अपने शरीरके समान यत्नपूर्वक रक्षा करता आया हूँ ॥ ३६ ॥

इदं भङ्क्त्वा मदीयं च भुवनं विष्णुना कृतम् ।
उपर्युपरि लोकानामधिकं भुवनं मुने ॥ ३७ ॥


* हरिवंशपर्वके पचपनवें अध्यायके श्लोक २६ से भी इस बातका समर्थन होता है। देखिये पृष्ठ १८९।