भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 512

[विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९१


ततः शचीव्यामृदितानुलेपने
गदां विमोक्ष्यामि पुरंदरोरसि ॥ ९ ॥

'यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्षःस्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा' ॥ ९ ॥

उपेन्द्रस्य महेन्द्रायं भ्रातुस्ते निश्चयः परः ।
यदत्र मन्यसे न्याय्यं सम्प्रधार्य कुरुष्व तत् ॥ १० ॥

'महेन्द्र ! तुम्हारे भाई उपेन्द्रका यही अन्तिम निश्चय है। अब यहाँ तुम जो न्यायोचित कार्य समझो, उसका विचार करके वही करो ॥ १० ॥

तत्त्वं हितं च देवेश श्रूयतां वदतो मम ।
नयनं पारिजातस्य द्वारकां मम रोचते ॥ ११ ॥

'देवेश्वर ! मैं तुम्हें तत्त्व और हितकी बात बताता हूँ, सुनो; मुझे पारिजातका द्वारकामें ले जाया जाना ही ठीक जँचता है' ॥ ११ ॥

नारदेनैवमुक्तस्तु सुव्यक्तं बलदेहभित् ।
रोषाविष्टः सहस्राक्षोऽब्रवीदेतन्नराधिप ॥ १२ ॥

नरेश्वर ! जब नारदजीने इस प्रकार सुस्पष्ट बात कह दी, तब वलासुरका विनाश करनेवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्र रोषके आवेशमें आकर बोले—॥ १२ ॥

अनागसि मयि ज्येष्ठे सोदरे यदि केशवः ।
एवं प्रवृत्तः किं शक्यं कर्तुमद्य तपोधन ॥ १३ ॥

'तपोधन ! यदि श्रीकृष्ण अपने निरपराध एवं ज्येष्ठ सहोदर भाईके प्रति ऐसा अनुचित बर्ताव करनेके लिये उद्यत हैं तो अब क्या किया जा सकता है ? ॥ १३ ॥

बहूनि प्रतिलोमानि पुरा स कृतवान् मयि ।
कृष्णो नारद सोढानि भ्रातेति स्म मया सदा ॥ १४ ॥

'नारद ! श्रीकृष्णने पहले भी मेरे प्रतिकूल बहुत-से कार्य किये हैं; परंतु यह मेरा छोटा भाई है, ऐसा समझकर मैंने सदा उन बातोंको सहन किया है ॥ १४ ॥

खाण्डवे चार्जुनरथं पुरा वाहयता सता ।
मदीया वारिता मेघाः शमयन्तोऽग्निमुद्धतम् ॥ १५ ॥

'पहलेकी बात है, ये खाण्डव वनमें अर्जुनका रथ हाँक रहे थे; उस समय उस वनमे लगी हुई प्रचण्ड आगको बुझानेके लिये मैंने जो मेघ नियुक्त किये थे, मेरे उन सभी मेघोंका इन्होंने निवारण कर दिया था ॥ १५ ॥

गोवर्धनं धारयता विप्रियं च कृतं मम ।
तथा वृत्रवधे प्राप्ते साहाय्यार्थं वृतो मया ॥ १६ ॥
समोऽहमिति सर्वेषां भूतानामिति चोक्तवान् ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य वृत्रश्च निहतो मया ॥ १७ ॥

'इसी तरह गोवर्धन पर्वतको धारण करके इन्होंने मेरा अप्रिय किया था। जब वृत्रासुरके वधका अवसर प्राप्त हुआ, उस समय मैंने इनसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी; परंतु इन्होंने यह कहकर मुझे कोरा जवाब दे दिया कि मैं तो समस्त प्राणियोंके लिये सम हूँ (मेरा किसीसे राग या द्वेष नहीं है)। तब मैंने अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर वृत्रासुरका वध किया था ॥ १६-१७ ॥

देवासुरेषु प्राप्तेषु संग्रामेषु च नारद ।
युध्यत्यात्मेच्छया कृष्णो मुने सुविदितं तव ॥ १८ ॥

'मुने ! नारद ! जब-जब देवासुर-संग्रामके अवसर आते हैं, तब-तब विष्णु अपनी इच्छासे ही युद्ध करते हैं (जीमें आया तो करते हैं और नहीं तो चल देते हैं)। यह बात आपको अच्छी तरह ज्ञात है ॥ १८ ॥

बहुनात्र किमुक्तेन तस्माद् दिष्ट्या प्रवर्तताम् ।
ज्ञातिभेदो न नः कार्यः साक्षी त्वं मम नारद ॥ १९ ॥

'इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ (बात बढ़ानेसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है); अतः यदि प्रारब्धवश युद्ध ही होना है तो हो; परंतु नारदजी ! आप मेरी ओरसे इस बातके साक्षी हैं कि हमलोगोंको अपने भाईसे कलह करना अभीष्ट नहीं है ॥ १९ ॥

ममोरसि गदां मोक्तुमुद्यतो यदि केशवः ।
अनुश्लाघ्याथ पौलोमी गुणः क इह दृश्यते ॥ २० ॥

'यदि केशव मेरी छातीमें गदा मारनेको ही उद्यत हैं तो पुलोमकुमारी शचीका नामोल्लेख करके ऐसी बात कहनेमें यहाँ कौन-सा लाभ दिखायी देता है ? ॥ २० ॥

उद्वासगतो धीमान् पिता नः कश्यपः प्रभुः ।
अदित्या सह मे मात्रा तयोर्वाक्यमिदं भवेत् ॥ २१ ॥

'मेरे बुद्धिमान् पिता भगवान् कश्यप मेरी माता अदितिके साथ क्षीरसागरमें जलवास करनेके लिये गये हैं। वे दोनों मेरे प्रति ऐसी बात कह सकते थे (क्योंकि माता-पिताको यह अधिकार है कि वह पुत्रको राहपर लानेके लिये उसे ताड़ना दे) ॥ २१ ॥

अजितात्मा मम भ्राता रजसा तमसा वृतः ।
कामेन च स्त्रियो वाक्यादेवं मामुक्तवान् गुरुम् ॥ २२ ॥

'परंतु मेरे भाई श्रीकृष्ण अजितात्मा हैं, अपने मनपर काबू नहीं पा सके हैं; साथ ही रजोगुण और तमोगुणसे घिरे हुए हैं; अतः कामवश एक स्त्रीके कहनेमात्रसे मुझ अपने गुरुजनके प्रति उन्होंने ऐसी बात कह डाली है ॥ २२ ॥

धिक्स्त्रियः सर्वथा विप्र धिग् राजसमितिं तथा ।
यत्राधिक्षिप्तवान् विष्णुरेवं मां स्त्रीजितो द्विज ॥ २३ ॥

'विप्रवर ! स्त्रियोंको सर्वथा धिक्कार है तथा उस राज-