भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 511
४९०श्रीमद्भारते खिलभागे[हरिवंशे

मुने ! मेरी प्रसन्नताकी इच्छा रखकर आपको वहाँ वैसा ही कार्य या प्रयत्न करना चाहिये, जिससे मेरे इस कथनपर विचार करके मेरे भाई श्रीकृष्ण संतुष्ट हो जायँ ॥ ७० ॥

हारांश्च मणयश्चैव चन्दनान्यगुरूणि च।
वस्त्राणि च विचित्राणि बध्वास्त्वं द्वारकां नय ॥ ७१ ॥

देवर्षे ! आप बहू सत्यभामाके लिये यहाँसे हार, मणि, चन्दन, अगुरु और विचित्र वस्त्र द्वारकाको ले जाइये ॥

योग्यानि यानि मर्त्यानां यावदिच्छति केशवः।
न स्वर्गपरिमोपं तु कर्तुमर्हति साम्प्रतम् ॥ ७२ ॥

जो-जो वस्तुएँ मनुष्योंके योग्य हैं, उन्हें श्रीकृष्ण जितना चाहें ले सकते हैं; परंतु उन्हें इस समय स्वर्गलोकको लूटकर इसे कंगाल बना देना उचित नहीं है ॥ ७२ ॥

ददामि रत्नानि यथेप्सितान्यहं
बहूनि चित्राणि विभूषणानि च।
न पारिजातं च कथंचन द्रुमं
मुने प्रदास्यामि दिवौकसां प्रियम्॥ ७३॥

मुने ! मैं श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से रत्न और विचित्र आभूषण दे रहा हूँ, परंतु पारिजात वृक्षको मैं किसी प्रकार नहीं दूँगा; क्योंकि यह स्वर्गवासियोंको बहुत प्रिय है (इसे वे अन्यत्र जाने देना नहीं चाहते) ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे इन्द्रवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९ ॥


सप्ततितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णके द्वारा गदाप्रहारकी धमकी सुनकर कुपित हुए इन्द्रका नारदजीसे उनके बर्तावकी कटु आलोचना करना और युद्ध किये बिना पारिजात वृक्षको न देनेका ही निश्चय करना

वैशम्पायन उवाच

देवराजवचः श्रुत्वा नारदः कुरुनन्दन।
प्रोवाच वाक्यं वाक्यज्ञो धर्मात्मा धर्मवित्तमः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! देवराज इन्द्रकी बात सुनकर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा बातचीत करनेकी कला जाननेवाले धर्मात्मा नारदजीने यह बात कही—॥ १ ॥

अवश्यमेव वक्तव्यं हितं बलनिषूदन।
मया तव महाबाहो बहुमानोऽस्ति मे त्वयि ॥ २ ॥

'महाबाहु बलसूदन ! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति बहुत आदर है, इसलिये मुझे तुम्हारे हितकी बात अवश्य बतानी चाहिये ॥ २ ॥

उक्तो मया वासुदेवो जानता भवतो मतम्।
न दत्तः पारिजातोऽयं हरस्यापि त्वया पुरा ॥ ३ ॥

'मैं तुम्हारे इस विचारको जानता था; क्योंकि तुमने पहले महादेवजीके माँगनेपर भी यह पारिजात वृक्ष उन्हें नहीं दिया था; इसलिये मैंने तुम्हारी ओरसे श्रीकृष्णको सब कुछ बताया था ॥ ३ ॥

हेतवश्च मया तस्य दर्शितास्ते समासतः।
न चावगतवान् देवः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥

'तुमने पारिजात न देनेके विषयमें जो कारण बताये हैं, उन्हें भी मैंने संक्षेपसे उनको दर्शाया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें स्वीकार नहीं किया, यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

उपेन्द्रोऽहं महेन्द्रेण लालनीयः सदेति माम्।
उवाच पुण्डरीकाक्षो दत्तमुत्तरमेव च ॥ ५ ॥

'मेरी बातका उत्तर देते हुए कमलनयन श्रीकृष्ण कहने लगे, 'मैं उपेन्द्र (इन्द्रका छोटा भाई) हूँ; अतः महेन्द्रको सदा ही मेरा लाड़-प्यार करना चाहिये' ॥ ५ ॥

पुनः पुनर्मया चास्य हेतवो देव दर्शिताः।
ततो न बुद्धिव्यावृत्ता वृत्रनाशन तस्य वै ॥ ६ ॥

'वृत्रासुरविनाशन देव ! मैंने बारंबार उन्हें कारण दिखाये; परंतु उनका विचार नहीं बदला ॥ ६ ॥

अपि चाप्युक्तवान् देवो वाक्यान्ये मधुसूदनः।
प्रत्याह पुरुषश्रेष्ठः सरोषमिव वासव ॥ ७ ॥

'इन्द्र ! मेरी बातके अन्तमें पुरुषश्रेष्ठ भगवान् मधुसूदनने कुछ रुष्ट-से होकर उत्तर देते हुए कहा—॥ ७ ॥

न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा
न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः।
मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता
मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते ॥ ८ ॥

'मुने ! आपका कल्याण हो। यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायँ तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; नहीं हो सकते ॥ ८ ॥

स पारिजातं यदि न प्रदास्यति
प्रयाच्यमानो भवतामनेश्वरः।

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