भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 510

विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ४८९

मानुष्यं मानुषे प्राप्तो यदेतन्मधुसूदनः ।
कुर्यान्निर्वन्धनीयं यद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन नारद ॥ ५५ ॥

नारद ! मनुष्यलोकमें मानवशरीरको प्राप्त हुए मधुसूदन यदि मुझ बड़े भाईके साथ दुराग्रहपूर्ण बर्ताव करें तो यह उनके लिये उचित नहीं है ॥ ५५ ॥

स्वर्गरत्नविलोपेन धर्षणा स्यान्ममानघ ।
ज्ञातितो धर्षणा चैव विशेषेणैव गर्हिता ॥ ५६ ॥

निष्पाप देवर्षे ! स्वर्गीय रत्नके विलोप होने—उसके लूटे जानेसे मेरा तिरस्कार होगा और अपने भाई-बन्धुसे तिरस्कार पाना तो बहुत ही निन्दित है ॥ ५६ ॥

धर्ममर्थं च कामं च क्रमेण मधुसूदनः ।
सेवत्वेष सतां धर्मान् स्थापितान् पद्मयोनिना ॥ ५७ ॥

ये मधुसूदन क्रमशः धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये हुए सत्पुरुषोंके धर्मोंका आश्रय लें ॥ ५७ ॥

महीतलं पारिजातमर्पयिष्याम्यहं यदि ।
पौलोमीमादितः कृत्वा को नु मां बहु मंस्यते ॥ ५८ ॥

यदि मैं पारिजातको भूतलपर भेज दूँगा तो शचीसे लेकर कौन ऐसा स्वर्गवासी होगा, जो मुझे अधिक आदरकी दृष्टि से देखेगा ॥ ५८ ॥

पारिजातं महीपृष्ठे दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च मानुषाः ।
स्वर्गार्थं नोद्यमिष्यन्ति दृष्ट्वा स्वर्गफलं क्षितौ ॥ ५९ ॥

भूतलपर पारिजातका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य पृथ्वीपर ही स्वर्गका फल उपलब्ध हुआ देख स्वर्गकी प्राप्ति-के लिये उद्यम हो नहीं करेंगे ॥ ५९ ॥

पारिजातगुणान् मर्त्या जुषन्ति यदि नारद ।
देवतानां मनुष्याणां न विशेषो भविष्यति ॥ ६० ॥

नारद ! यदि मनुष्य पारिजातके गुणो (और उससे मिलने-वाले लाभों)का सेवन करने लगेंगे तो देवताओं और मनुष्योंमें कोई अन्तर ही नहीं रह जायगा ॥ ६० ॥

तत्र यत् क्रियते कर्म इह तद् भुज्यते नरैः ।
स्वर्गार्थं न यतिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६१ ॥

मर्त्यलोकमें जो शुभकर्म किया जाता है, उसका फल मनुष्य यहाँ स्वर्गमें आकर भोगते हैं। जब उन्हे भूतलपर ही पारिजातके गुण (लाभ) प्राप्त होने लगेंगे, तब वे स्वर्गके लिये यत्न नहीं करेंगे ॥ ६१ ॥

सर्वरत्नवरः स्वर्गे पारिजातस्तपोधन ।
तुल्यं देवसमैर्मर्त्यैः सर्वदैव जगद् भवेत् ॥ ६२ ॥

तपोधन ! पारिजात स्वर्गके सब रत्नोंमे श्रेष्ठ है। यदि यह भूतल-पर चला गया तो मनुष्य देवताओके समान हो जायेंगे और (उनसे भरा हुआ) सारा जगत् सदा ही (स्वर्गके) तुल्य हो जायगा ॥

यज्ञैर्मर्त्या न यक्ष्यन्ति लब्धस्वर्गफला भुवि ।
न पूर्तानि प्रदास्यन्ति तुल्यत्वममरैर्गताः ॥ ६३ ॥

पृथ्वीपर स्वर्गका फल पाकर देवताओंकी समानताको प्राप्त हुए मनुष्य न तो यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करेंगे और न पूर्तकर्मोंमें ही धन लगायेंगे ॥ ६३ ॥

यज्ञैर्जप्यादिकैश्चैव नित्यमाप्याययन्ति नः ।
मानुषाः स्वर्गमिच्छन्तः श्रद्धानास्तपोधन ॥ ६४ ॥

तपोधन ! श्रद्धालु मनुष्य स्वर्गकी अभिलाषा रखकर यज्ञ, जप तथा नित्य कर्मोंके द्वारा सदा हमलोगोंको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं ॥ ६४ ॥

तत् सर्वं न करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ।
निस्तेजसो भविष्यम ते गतास्तद्विहीनताम् ॥ ६५ ॥

परंतु पारिजातका लाभ मिल जानेपर मनुष्य वह सब कुछ नहीं करेंगे; फिर तो उन यज्ञ आदिसे वञ्चित होकर हम सब देवता निस्तेज हो जायेंगे ॥ ६५ ॥

इतः सुवृष्ट्या सस्यैस्ते जीवन्ति पुरुषा भुवि ।
आप्यायन्तस्तेऽप्यस्मान् दानैर्यज्ञैस्तथैव च ॥ ६६ ॥

स्वर्गकी ओरसे जब अच्छी वर्षा की जाती है, तब उससे पैदा होनेवाले सस्यों (अनाजों) द्वारा भूतलके मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं और वे भी दान एवं यज्ञोंद्वारा हम देवताओं-का पोषण करते हैं॥ ६६ ॥

न बुभुक्षा पिपासा वा बाधते यदि मानुषान् ।
रोगो जरा वा मृत्युर्वा धर्मज्ञारतिरेव च ॥ ६७ ॥
दौर्गन्ध्यं वा सुघोरा वा ईतयः कर्मसम्भवाः ।
किमुद्योगं करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६८ ॥

धर्मज्ञ नारद ! पारिजातका लाभ मिल जानेपर यदि मनुष्योंको भूख-प्यास नहीं सतायेगी, रोग, बुढ़ापा, अरति (असंतोष या दुःख-शोक) अथवा मृत्युकी प्राप्ति नहीं होगी, उनमे दुर्गन्ध नहीं रहेगा और कर्मजनित भयंकर ईतियाँ १ उन्हे बाधा नहीं देंगी तो वे स्वर्गके लिये क्यों उद्योग करेंगे ॥

सर्वथा नयनं तत्र पारिजातस्य न क्षमम् ।
इति वाच्यस्त्वया विप्र विष्णुरक्लिष्टकर्मकृत् ॥ ६९ ॥

विप्रवर ! पारिजातका मर्त्यलोकमें ले जाया जाना सर्वथा अनुचित है। यह बात आप अनायास ही महान् कर्म करने-वाले भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) से कह दीजियेगा ॥ ६९ ॥

यथा यथा च मे भ्राता तुष्येत्तद् विचारयन् ।
तथा तथा त्वया कार्यं कार्यं मत्प्रीतिमिच्छता ॥ ७० ॥


१. खेतीको हानि पहुँचानेवाले उपद्रव ईति कहलाते हैं। ये छः प्रकारके हैं—१ अतिवृष्टि, २ अनावृष्टि, ३ टिड्डी पड़ना, ४ चूहे लगना, ५ पक्षियोंकी अधिकता और ६ दूसरे राजाकी चढ़ाई।