विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ४८९
मानुष्यं मानुषे प्राप्तो यदेतन्मधुसूदनः ।
कुर्यान्निर्वन्धनीयं यद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन नारद ॥ ५५ ॥
नारद ! मनुष्यलोकमें मानवशरीरको प्राप्त हुए मधुसूदन यदि मुझ बड़े भाईके साथ दुराग्रहपूर्ण बर्ताव करें तो यह उनके लिये उचित नहीं है ॥ ५५ ॥
स्वर्गरत्नविलोपेन धर्षणा स्यान्ममानघ ।
ज्ञातितो धर्षणा चैव विशेषेणैव गर्हिता ॥ ५६ ॥
निष्पाप देवर्षे ! स्वर्गीय रत्नके विलोप होने—उसके लूटे जानेसे मेरा तिरस्कार होगा और अपने भाई-बन्धुसे तिरस्कार पाना तो बहुत ही निन्दित है ॥ ५६ ॥
धर्ममर्थं च कामं च क्रमेण मधुसूदनः ।
सेवत्वेष सतां धर्मान् स्थापितान् पद्मयोनिना ॥ ५७ ॥
ये मधुसूदन क्रमशः धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये हुए सत्पुरुषोंके धर्मोंका आश्रय लें ॥ ५७ ॥
महीतलं पारिजातमर्पयिष्याम्यहं यदि ।
पौलोमीमादितः कृत्वा को नु मां बहु मंस्यते ॥ ५८ ॥
यदि मैं पारिजातको भूतलपर भेज दूँगा तो शचीसे लेकर कौन ऐसा स्वर्गवासी होगा, जो मुझे अधिक आदरकी दृष्टि से देखेगा ॥ ५८ ॥
पारिजातं महीपृष्ठे दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च मानुषाः ।
स्वर्गार्थं नोद्यमिष्यन्ति दृष्ट्वा स्वर्गफलं क्षितौ ॥ ५९ ॥
भूतलपर पारिजातका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य पृथ्वीपर ही स्वर्गका फल उपलब्ध हुआ देख स्वर्गकी प्राप्ति-के लिये उद्यम हो नहीं करेंगे ॥ ५९ ॥
पारिजातगुणान् मर्त्या जुषन्ति यदि नारद ।
देवतानां मनुष्याणां न विशेषो भविष्यति ॥ ६० ॥
नारद ! यदि मनुष्य पारिजातके गुणो (और उससे मिलने-वाले लाभों)का सेवन करने लगेंगे तो देवताओं और मनुष्योंमें कोई अन्तर ही नहीं रह जायगा ॥ ६० ॥
तत्र यत् क्रियते कर्म इह तद् भुज्यते नरैः ।
स्वर्गार्थं न यतिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६१ ॥
मर्त्यलोकमें जो शुभकर्म किया जाता है, उसका फल मनुष्य यहाँ स्वर्गमें आकर भोगते हैं। जब उन्हे भूतलपर ही पारिजातके गुण (लाभ) प्राप्त होने लगेंगे, तब वे स्वर्गके लिये यत्न नहीं करेंगे ॥ ६१ ॥
सर्वरत्नवरः स्वर्गे पारिजातस्तपोधन ।
तुल्यं देवसमैर्मर्त्यैः सर्वदैव जगद् भवेत् ॥ ६२ ॥
तपोधन ! पारिजात स्वर्गके सब रत्नोंमे श्रेष्ठ है। यदि यह भूतल-पर चला गया तो मनुष्य देवताओके समान हो जायेंगे और (उनसे भरा हुआ) सारा जगत् सदा ही (स्वर्गके) तुल्य हो जायगा ॥
यज्ञैर्मर्त्या न यक्ष्यन्ति लब्धस्वर्गफला भुवि ।
न पूर्तानि प्रदास्यन्ति तुल्यत्वममरैर्गताः ॥ ६३ ॥
पृथ्वीपर स्वर्गका फल पाकर देवताओंकी समानताको प्राप्त हुए मनुष्य न तो यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करेंगे और न पूर्तकर्मोंमें ही धन लगायेंगे ॥ ६३ ॥
यज्ञैर्जप्यादिकैश्चैव नित्यमाप्याययन्ति नः ।
मानुषाः स्वर्गमिच्छन्तः श्रद्धानास्तपोधन ॥ ६४ ॥
तपोधन ! श्रद्धालु मनुष्य स्वर्गकी अभिलाषा रखकर यज्ञ, जप तथा नित्य कर्मोंके द्वारा सदा हमलोगोंको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं ॥ ६४ ॥
तत् सर्वं न करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ।
निस्तेजसो भविष्यम ते गतास्तद्विहीनताम् ॥ ६५ ॥
परंतु पारिजातका लाभ मिल जानेपर मनुष्य वह सब कुछ नहीं करेंगे; फिर तो उन यज्ञ आदिसे वञ्चित होकर हम सब देवता निस्तेज हो जायेंगे ॥ ६५ ॥
इतः सुवृष्ट्या सस्यैस्ते जीवन्ति पुरुषा भुवि ।
आप्यायन्तस्तेऽप्यस्मान् दानैर्यज्ञैस्तथैव च ॥ ६६ ॥
स्वर्गकी ओरसे जब अच्छी वर्षा की जाती है, तब उससे पैदा होनेवाले सस्यों (अनाजों) द्वारा भूतलके मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं और वे भी दान एवं यज्ञोंद्वारा हम देवताओं-का पोषण करते हैं॥ ६६ ॥
न बुभुक्षा पिपासा वा बाधते यदि मानुषान् ।
रोगो जरा वा मृत्युर्वा धर्मज्ञारतिरेव च ॥ ६७ ॥
दौर्गन्ध्यं वा सुघोरा वा ईतयः कर्मसम्भवाः ।
किमुद्योगं करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६८ ॥
धर्मज्ञ नारद ! पारिजातका लाभ मिल जानेपर यदि मनुष्योंको भूख-प्यास नहीं सतायेगी, रोग, बुढ़ापा, अरति (असंतोष या दुःख-शोक) अथवा मृत्युकी प्राप्ति नहीं होगी, उनमे दुर्गन्ध नहीं रहेगा और कर्मजनित भयंकर ईतियाँ १ उन्हे बाधा नहीं देंगी तो वे स्वर्गके लिये क्यों उद्योग करेंगे ॥
सर्वथा नयनं तत्र पारिजातस्य न क्षमम् ।
इति वाच्यस्त्वया विप्र विष्णुरक्लिष्टकर्मकृत् ॥ ६९ ॥
विप्रवर ! पारिजातका मर्त्यलोकमें ले जाया जाना सर्वथा अनुचित है। यह बात आप अनायास ही महान् कर्म करने-वाले भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) से कह दीजियेगा ॥ ६९ ॥
यथा यथा च मे भ्राता तुष्येत्तद् विचारयन् ।
तथा तथा त्वया कार्यं कार्यं मत्प्रीतिमिच्छता ॥ ७० ॥
१. खेतीको हानि पहुँचानेवाले उपद्रव ईति कहलाते हैं। ये छः प्रकारके हैं—१ अतिवृष्टि, २ अनावृष्टि, ३ टिड्डी पड़ना, ४ चूहे लगना, ५ पक्षियोंकी अधिकता और ६ दूसरे राजाकी चढ़ाई।
| ४९० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [हरिवंशे |
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मुने ! मेरी प्रसन्नताकी इच्छा रखकर आपको वहाँ वैसा ही कार्य या प्रयत्न करना चाहिये, जिससे मेरे इस कथनपर विचार करके मेरे भाई श्रीकृष्ण संतुष्ट हो जायँ ॥ ७० ॥
हारांश्च मणयश्चैव चन्दनान्यगुरूणि च।
वस्त्राणि च विचित्राणि बध्वास्त्वं द्वारकां नय ॥ ७१ ॥
देवर्षे ! आप बहू सत्यभामाके लिये यहाँसे हार, मणि, चन्दन, अगुरु और विचित्र वस्त्र द्वारकाको ले जाइये ॥
योग्यानि यानि मर्त्यानां यावदिच्छति केशवः।
न स्वर्गपरिमोपं तु कर्तुमर्हति साम्प्रतम् ॥ ७२ ॥
जो-जो वस्तुएँ मनुष्योंके योग्य हैं, उन्हें श्रीकृष्ण जितना चाहें ले सकते हैं; परंतु उन्हें इस समय स्वर्गलोकको लूटकर इसे कंगाल बना देना उचित नहीं है ॥ ७२ ॥
ददामि रत्नानि यथेप्सितान्यहं
बहूनि चित्राणि विभूषणानि च।
न पारिजातं च कथंचन द्रुमं
मुने प्रदास्यामि दिवौकसां प्रियम्॥ ७३॥
मुने ! मैं श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से रत्न और विचित्र आभूषण दे रहा हूँ, परंतु पारिजात वृक्षको मैं किसी प्रकार नहीं दूँगा; क्योंकि यह स्वर्गवासियोंको बहुत प्रिय है (इसे वे अन्यत्र जाने देना नहीं चाहते) ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे इन्द्रवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९ ॥
सप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णके द्वारा गदाप्रहारकी धमकी सुनकर कुपित हुए इन्द्रका नारदजीसे उनके बर्तावकी कटु आलोचना करना और युद्ध किये बिना पारिजात वृक्षको न देनेका ही निश्चय करना
वैशम्पायन उवाच
देवराजवचः श्रुत्वा नारदः कुरुनन्दन।
प्रोवाच वाक्यं वाक्यज्ञो धर्मात्मा धर्मवित्तमः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! देवराज इन्द्रकी बात सुनकर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा बातचीत करनेकी कला जाननेवाले धर्मात्मा नारदजीने यह बात कही—॥ १ ॥
अवश्यमेव वक्तव्यं हितं बलनिषूदन।
मया तव महाबाहो बहुमानोऽस्ति मे त्वयि ॥ २ ॥
'महाबाहु बलसूदन ! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति बहुत आदर है, इसलिये मुझे तुम्हारे हितकी बात अवश्य बतानी चाहिये ॥ २ ॥
उक्तो मया वासुदेवो जानता भवतो मतम्।
न दत्तः पारिजातोऽयं हरस्यापि त्वया पुरा ॥ ३ ॥
'मैं तुम्हारे इस विचारको जानता था; क्योंकि तुमने पहले महादेवजीके माँगनेपर भी यह पारिजात वृक्ष उन्हें नहीं दिया था; इसलिये मैंने तुम्हारी ओरसे श्रीकृष्णको सब कुछ बताया था ॥ ३ ॥
हेतवश्च मया तस्य दर्शितास्ते समासतः।
न चावगतवान् देवः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥
'तुमने पारिजात न देनेके विषयमें जो कारण बताये हैं, उन्हें भी मैंने संक्षेपसे उनको दर्शाया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें स्वीकार नहीं किया, यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
उपेन्द्रोऽहं महेन्द्रेण लालनीयः सदेति माम्।
उवाच पुण्डरीकाक्षो दत्तमुत्तरमेव च ॥ ५ ॥
'मेरी बातका उत्तर देते हुए कमलनयन श्रीकृष्ण कहने लगे, 'मैं उपेन्द्र (इन्द्रका छोटा भाई) हूँ; अतः महेन्द्रको सदा ही मेरा लाड़-प्यार करना चाहिये' ॥ ५ ॥
पुनः पुनर्मया चास्य हेतवो देव दर्शिताः।
ततो न बुद्धिव्यावृत्ता वृत्रनाशन तस्य वै ॥ ६ ॥
'वृत्रासुरविनाशन देव ! मैंने बारंबार उन्हें कारण दिखाये; परंतु उनका विचार नहीं बदला ॥ ६ ॥
अपि चाप्युक्तवान् देवो वाक्यान्ये मधुसूदनः।
प्रत्याह पुरुषश्रेष्ठः सरोषमिव वासव ॥ ७ ॥
'इन्द्र ! मेरी बातके अन्तमें पुरुषश्रेष्ठ भगवान् मधुसूदनने कुछ रुष्ट-से होकर उत्तर देते हुए कहा—॥ ७ ॥
न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा
न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः।
मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता
मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते ॥ ८ ॥
'मुने ! आपका कल्याण हो। यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायँ तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; नहीं हो सकते ॥ ८ ॥
स पारिजातं यदि न प्रदास्यति
प्रयाच्यमानो भवतामनेश्वरः।
[विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९१
ततः शचीव्यामृदितानुलेपने
गदां विमोक्ष्यामि पुरंदरोरसि ॥ ९ ॥
'यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्षःस्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा' ॥ ९ ॥
उपेन्द्रस्य महेन्द्रायं भ्रातुस्ते निश्चयः परः ।
यदत्र मन्यसे न्याय्यं सम्प्रधार्य कुरुष्व तत् ॥ १० ॥
'महेन्द्र ! तुम्हारे भाई उपेन्द्रका यही अन्तिम निश्चय है। अब यहाँ तुम जो न्यायोचित कार्य समझो, उसका विचार करके वही करो ॥ १० ॥
तत्त्वं हितं च देवेश श्रूयतां वदतो मम ।
नयनं पारिजातस्य द्वारकां मम रोचते ॥ ११ ॥
'देवेश्वर ! मैं तुम्हें तत्त्व और हितकी बात बताता हूँ, सुनो; मुझे पारिजातका द्वारकामें ले जाया जाना ही ठीक जँचता है' ॥ ११ ॥
नारदेनैवमुक्तस्तु सुव्यक्तं बलदेहभित् ।
रोषाविष्टः सहस्राक्षोऽब्रवीदेतन्नराधिप ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! जब नारदजीने इस प्रकार सुस्पष्ट बात कह दी, तब वलासुरका विनाश करनेवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्र रोषके आवेशमें आकर बोले—॥ १२ ॥
अनागसि मयि ज्येष्ठे सोदरे यदि केशवः ।
एवं प्रवृत्तः किं शक्यं कर्तुमद्य तपोधन ॥ १३ ॥
'तपोधन ! यदि श्रीकृष्ण अपने निरपराध एवं ज्येष्ठ सहोदर भाईके प्रति ऐसा अनुचित बर्ताव करनेके लिये उद्यत हैं तो अब क्या किया जा सकता है ? ॥ १३ ॥
बहूनि प्रतिलोमानि पुरा स कृतवान् मयि ।
कृष्णो नारद सोढानि भ्रातेति स्म मया सदा ॥ १४ ॥
'नारद ! श्रीकृष्णने पहले भी मेरे प्रतिकूल बहुत-से कार्य किये हैं; परंतु यह मेरा छोटा भाई है, ऐसा समझकर मैंने सदा उन बातोंको सहन किया है ॥ १४ ॥
खाण्डवे चार्जुनरथं पुरा वाहयता सता ।
मदीया वारिता मेघाः शमयन्तोऽग्निमुद्धतम् ॥ १५ ॥
'पहलेकी बात है, ये खाण्डव वनमें अर्जुनका रथ हाँक रहे थे; उस समय उस वनमे लगी हुई प्रचण्ड आगको बुझानेके लिये मैंने जो मेघ नियुक्त किये थे, मेरे उन सभी मेघोंका इन्होंने निवारण कर दिया था ॥ १५ ॥
गोवर्धनं धारयता विप्रियं च कृतं मम ।
तथा वृत्रवधे प्राप्ते साहाय्यार्थं वृतो मया ॥ १६ ॥
समोऽहमिति सर्वेषां भूतानामिति चोक्तवान् ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य वृत्रश्च निहतो मया ॥ १७ ॥
'इसी तरह गोवर्धन पर्वतको धारण करके इन्होंने मेरा अप्रिय किया था। जब वृत्रासुरके वधका अवसर प्राप्त हुआ, उस समय मैंने इनसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी; परंतु इन्होंने यह कहकर मुझे कोरा जवाब दे दिया कि मैं तो समस्त प्राणियोंके लिये सम हूँ (मेरा किसीसे राग या द्वेष नहीं है)। तब मैंने अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर वृत्रासुरका वध किया था ॥ १६-१७ ॥
देवासुरेषु प्राप्तेषु संग्रामेषु च नारद ।
युध्यत्यात्मेच्छया कृष्णो मुने सुविदितं तव ॥ १८ ॥
'मुने ! नारद ! जब-जब देवासुर-संग्रामके अवसर आते हैं, तब-तब विष्णु अपनी इच्छासे ही युद्ध करते हैं (जीमें आया तो करते हैं और नहीं तो चल देते हैं)। यह बात आपको अच्छी तरह ज्ञात है ॥ १८ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन तस्माद् दिष्ट्या प्रवर्तताम् ।
ज्ञातिभेदो न नः कार्यः साक्षी त्वं मम नारद ॥ १९ ॥
'इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ (बात बढ़ानेसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है); अतः यदि प्रारब्धवश युद्ध ही होना है तो हो; परंतु नारदजी ! आप मेरी ओरसे इस बातके साक्षी हैं कि हमलोगोंको अपने भाईसे कलह करना अभीष्ट नहीं है ॥ १९ ॥
ममोरसि गदां मोक्तुमुद्यतो यदि केशवः ।
अनुश्लाघ्याथ पौलोमी गुणः क इह दृश्यते ॥ २० ॥
'यदि केशव मेरी छातीमें गदा मारनेको ही उद्यत हैं तो पुलोमकुमारी शचीका नामोल्लेख करके ऐसी बात कहनेमें यहाँ कौन-सा लाभ दिखायी देता है ? ॥ २० ॥
उद्वासगतो धीमान् पिता नः कश्यपः प्रभुः ।
अदित्या सह मे मात्रा तयोर्वाक्यमिदं भवेत् ॥ २१ ॥
'मेरे बुद्धिमान् पिता भगवान् कश्यप मेरी माता अदितिके साथ क्षीरसागरमें जलवास करनेके लिये गये हैं। वे दोनों मेरे प्रति ऐसी बात कह सकते थे (क्योंकि माता-पिताको यह अधिकार है कि वह पुत्रको राहपर लानेके लिये उसे ताड़ना दे) ॥ २१ ॥
अजितात्मा मम भ्राता रजसा तमसा वृतः ।
कामेन च स्त्रियो वाक्यादेवं मामुक्तवान् गुरुम् ॥ २२ ॥
'परंतु मेरे भाई श्रीकृष्ण अजितात्मा हैं, अपने मनपर काबू नहीं पा सके हैं; साथ ही रजोगुण और तमोगुणसे घिरे हुए हैं; अतः कामवश एक स्त्रीके कहनेमात्रसे मुझ अपने गुरुजनके प्रति उन्होंने ऐसी बात कह डाली है ॥ २२ ॥
धिक्स्त्रियः सर्वथा विप्र धिग् राजसमितिं तथा ।
यत्राधिक्षिप्तवान् विष्णुरेवं मां स्त्रीजितो द्विज ॥ २३ ॥
'विप्रवर ! स्त्रियोंको सर्वथा धिक्कार है तथा उस राज-
४९२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सभाको भी धिक्कार है, जहाँ स्त्रीके वशीभूत हुए श्रीकृष्णने मुझपर इस प्रकार आक्षेप किया है ॥ २३ ॥
न दृष्टं कश्यपकुले व्यपदेश्यं महामुने ।
नैव दक्षकुले दृष्टं मातुर्मे यत्र सम्भवः ॥ २४ ॥
'महामुने ! महर्षि कश्यपके कुलमें अबतक कोई निन्दनीय बात नहीं देखी गयी है तथा जहाँ मेरी माताका जन्म हुआ है, उस दक्षकुलमें भी ऐसी कोई बात देखनेमें नहीं आयी है ॥ २४ ॥
न ज्येष्ठता न राजत्वं देवानां प्रतिमानितम् ।
कामरागाभिभूतेन कृष्णेन खलु नारद ॥ २५ ॥
'नारद ! काम और रागसे आक्रान्त हुए श्रीकृष्णने न तो मेरे बड़प्पनका आदर किया है और न मेरे देवराज पदका ही सम्मान किया है ॥ २५ ॥
पुत्रदारसहस्रैर्हि भ्रातानघ विशिष्यते ।
सद्वृत्तो ज्ञानसम्पन्न इति ब्रह्मा पुराऽब्रवीत् ॥ २६ ॥
'निष्पाप देवर्षे ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने ऐसा कहा था कि सदाचारी और ज्ञानसम्पन्न भाई हजारों स्त्रियों और पुत्रोंसे बढ़कर है ॥ २६ ॥
नास्ति भ्रातृसमो बन्धुराहार्य इतरो जनः ।
इति मामब्रवीन्माता पिता चैव प्रजापतिः ॥ २७ ॥
'मेरी माता तथा मेरे पिता प्रजापति कश्यपजीने मुझसे कहा था कि भाईके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है; क्योंकि वह स्वाभाविक बन्धु है और दूसरे लोग भोजन आदि देकर बनाये हुए हैं ॥ २७ ॥
सोदरे तु विशेषं तु पिता मे कश्यपोऽब्रवीत् ।
दृप्ता मया विरुद्ध्यन्ते दानवाः पापनिश्चयाः ॥ २८ ॥
'मेरे पिता कश्यपने सहोदर भाईमें विशेष बन्धुत्व बताया है। यद्यपि दानव भी हमारे भाई ही हैं, तथापि वे घमंडी और पापपूर्ण विचार रखनेवाले हो गये हैं; इसलिये मैं उनका विरोध करता हूँ ॥ २८ ॥
काममेतन्न वक्तव्यं स्वयमात्मस्तवान्वितम् ।
प्राप्तस्त्ववसरो विप्र यदिहाद्योच्यते मया ॥ २९ ॥
'विप्रवर ! जो बात अपनी प्रशंसासे युक्त हो, उसे स्वयं ही नहीं कहना चाहिये, इसमें संशय नहीं है तथापि इस समय यहाँ मेरे द्वारा जो बात कही जाती है, उसके कहनेका अवसर आ गया है ॥ २९ ॥
धनुर्ज्यायां मुनिश्रेष्ठ छिन्नायां हि पुरानघ ।
धन्वीभिरमराणां च वरदानान्महामते ॥ ३० ॥
उत्कृत्तशिरसो विष्णोः पुरा देहो धृतो मया ।
सन्धितं च शिरो यत्नाच्छिन्नं रौद्रेण तेजसा ॥ ३१ ॥
'मुनिश्रेष्ठ ! महामते ! पूर्वकालमें (दक्षयज्ञ-विध्वंसके समय) जब भगवान् शंकरके धनुर्धर पार्षदोंने वरदानके प्रभावसे देवताओंके धनुषोंकी प्रत्यञ्चा काट डाली और यज्ञरूपी विष्णुका सिर काट लिया गया था, उस समय मैंने ही उनके धड़को धारण किया था तथा रुद्रके तेजसे कटे हुए उनके सिरको यत्नपूर्वक धड़से जोड़ा था ॥ ३०-३१ ॥
अहं विशिष्टो देवानामित्युक्त्वा पुनरच्युतः ।
धनुरारोप्य दर्पेण स्थितो नारद केशवः ॥ ३२ ॥
नारदजी ! जब उनका मस्तक जुड़ गया, तब वे अच्युत-स्वरूप केशव पुनः धनुष चढ़ाकर बड़े घमंडके साथ यह कहते हुए खड़े हो गये कि मैं इन देवताओंमें सबसे बढ़कर हूँ ॥ ३२ ॥
किं मां पिता वा माता वा वक्ष्यतीति मया मुने ।
स्नेहेन च स्थितं विष्णोः शरीरं मुनिसत्तम ॥ ३३ ॥
मुने ! ऋषिश्रेष्ठ ! मैंने उस समय यह सोचकर कि यदि मैं नहीं बचाता हूँ तो मेरे पिता-माता मुझे क्या कहेंगे, बड़े स्नेहके साथ विष्णुके शरीरको थाम लिया था ॥ ३३ ॥
ऐन्द्रं वैष्णवमस्यैव मुने भागमहं ददौ ।
यवीयांसमहं प्रेम्णा कृष्णं पश्यामि नारद ॥ ३४ ॥
'नारद मुने ! (वर्षा ऋतुमें जो सत्कर्म या पूजन किया जाता है, उसपर (मुझ) इन्द्रका ही आधिपत्य है; क्योंकि उस समय श्रीविष्णु शयन करते हैं) उस ऐन्द्रभागको ही वैष्णव भाग बनाकर मैंने इन्हें अर्पित किया है*। इस प्रकार मैं अपने छोटे भाई कृष्णको सदा प्रेमपूर्ण दृष्टिसे ही देखता हूँ ॥ ३४ ॥
संग्रामेषु प्रहर्तव्यं तेन पूर्वं तपोधन ।
राजा किलाहं समरे प्रहराम्यग्रतो ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
'तपोधन ! संग्रामके अवसरोंपर (यदि कृष्ण मेरे विरोधमें खड़े हों तो) पहले उन्हींको मुझपर प्रहार करना चाहिये। अन्यत्र युद्धमें मैं अवश्य ही पहले प्रहार करता हूँ; क्योंकि मैं राजा हूँ ॥ ३५ ॥
प्रादुर्भावेषु सर्वेषु स्वशरीरमिवानघ ।
यत्नाद् रक्षामि धर्मज्ञ केशवं भक्तिमाश्रितम् ॥ ३६ ॥
'पापरहित धर्मज्ञ नारदजी ! सभी अवतारोंके समय मुझमें भक्ति रखनेवाले केशवकी मैं अपने शरीरके समान यत्नपूर्वक रक्षा करता आया हूँ ॥ ३६ ॥
इदं भङ्क्त्वा मदीयं च भुवनं विष्णुना कृतम् ।
उपर्युपरि लोकानामधिकं भुवनं मुने ॥ ३७ ॥
* हरिवंशपर्वके पचपनवें अध्यायके श्लोक २६ से भी इस बातका समर्थन होता है। देखिये पृष्ठ १८९।
विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९३
'मुने ! विष्णुने मेरे इस भुवन ( स्वर्गलोक ) की मर्यादा भंग करके सब लोकोंसे ऊपर-ऊपर अपने भुवन ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्रतिष्ठित किया और उसे अन्य लोकोंसे बढ़कर महत्त्व दिया ॥ ३७ ॥
अवमानः स च मया पृष्ठतः क्रियते मुने ।
लालनीयो मया बाल इत्येवं भ्रातृगौरवात् ॥ ३८ ॥
'मुने ! वह अपमान मैंने पीछे कर दिया (भुला दिया)। बड़े भाईका जो गौरव है, उसपर ध्यान देकर मैंने सदा यही सोचा है कि यह बालक है। अतः मेरे द्वारा लाड़-प्यार पानेके योग्य है ॥ ३८ ॥
बालोऽयं मम पुत्रेति यवीयानिति नारद ।
पित्रा मात्रा च गोविन्दो मानी च परिभावितः ॥ ३९ ॥
'नारद ! श्रीकृष्णके विषयमें मेरा सदा यही भाव रहा है कि यह बालक है, मेरा छोटा भाई है; अतः मेरे द्वारा पुत्रके समान लाड़ लड़ानेके योग्य है, किंतु उनके विषयमें मेरे माता-पिताने भी अपना यही विचार व्यक्त किया है कि गोविन्द मानी है ॥ ३९ ॥
दृष्टस्तत्र जनानां च केशवः सुविशेषतः ।
वयं द्वेष्या न संदेहस्तत्र स्नेहोऽतिरिच्यते ॥ ४० ॥
'वहाँ ( मनुष्यलोक ) के लोगोंको श्रीकृष्ण विशेष प्रिय हैं और हमलोग उनके द्वेषके पात्र हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसका कारण यही है कि श्रीकृष्णका उन मनुष्योंके प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा है ॥ ४० ॥
सर्वज्ञो बलवाञ्छूरः पात्रं मानयिता तथा ।
केशवेत्येव च ध्यानं यत्तद्वितथतां गतम् ॥ ४१ ॥
'अबतक जो मेरा यह खयाल था कि केशव सर्वज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सुपात्र तथा दूसरोंको मान देनेवाले हैं, वह सब निष्फल हो गया ॥ ४१ ॥
गच्छ नारद वक्तव्यः केशवो वचनान्मम ।
आहूतो न निवर्तेयं समरं प्रति शत्रुभिः ॥ ४२ ॥
'नारदजी ! जाइये और मेरे शब्दोंमें श्रीकृष्णसे कह दीजिये कि 'मैं शत्रुओंके आह्वान करने या ललकारनेपर युद्ध-से पीछे नहीं हट सकता ॥ ४२ ॥
यदीच्छसि तदागच्छ सहां ते यत्त्वमिच्छसि ।
प्रहरस्व च पूर्वं त्वं भार्याजित यथेच्छसि ॥ ४३ ॥
'पत्नीके वशमें रहनेवाले श्रीकृष्ण ! यदि तुम मुझपर गदाका प्रहार करना चाहते हो तो आ जाओ। तुम जो चाहते हो, तुम्हारे उस प्रहारको सहन किया जायगा। जैसे तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार पहले तुम्हीं प्रहार करो ॥
रथाङ्गेनाथ शार्ङ्गेण गदया नन्दकेन च ।
प्रहरारुह्य गरुडं दृढो भूत्वा जनार्दन ॥ ४४ ॥
प्रहृते प्रहरिष्यामि यथाशक्त्या च केशव ।
अहो धिग् यदि मां स्नेहो विक्लवं न करिष्यति ॥ ४५ ॥
'जनार्दन ! तुम गरुड़पर चढ़कर सुदृढ़ होकर मेरे ऊपर सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष, कौमोदकी गदा और नन्दकनामक खड्गके द्वारा प्रहार करो। केशव ! यदि भ्रातृस्नेह मुझे व्याकुल नहीं कर देगा तो तुम्हारे प्रहार करनेपर मैं भी यथाशक्ति तुमपर प्रहार करूँगा। अहो, ऐसी परिस्थितिको धिक्कार है ! ॥ ४४-४५ ॥
यावन्न संग्रामगतो जितोऽहं चक्रपाणिना ।
पारिजातं न दास्यामि तावद् भो मुनिसत्तम ॥ ४६ ॥
'मुनिश्रेष्ठ ! जबतक मैं संग्रामभूमिमें उपस्थित होकर चक्रपाणि श्रीकृष्णके द्वारा पराजित नहीं हो जाऊँगा, तबतक उन्हें पारिजात नहीं दूँगा ॥ ४६ ॥
मां समाह्वयते ज्येष्ठं यवीयान् स तपोधन ।
अहो तं मर्षयिष्यामि किमर्थं स्त्रीजितं हरिम् ॥ ४७ ॥
'अहो तपोधन ! जब श्रीकृष्ण छोटे होकर मुझ बड़े भाईको युद्धके लिये ललकार रहे हैं, तब पत्नीके गुलाम बने हुए उन केशवके इस बर्तावको मैं किस लिये सहन करूँ ॥
अद्यैव गच्छ भगवन् द्वारकां कृष्णपालिताम् ।
विवादे संस्थितः सोऽज्ञ इति वाच्यस्त्वयाच्युतः ॥ ४८ ॥
'भगवन् ! आप आज ही श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारका-पुरीको चले जाइये और विवादके लिये तैयार खड़े हुए उस अज्ञानी अच्युतसे इस प्रकार मेरा उत्तर सुना दीजिये ॥४८॥
पलाशपत्रार्द्धमपि त्वयाजितो
न पारिजातस्य तव प्रदास्यति ।
इति प्रवाच्यो मधुसूदनस्त्वया
वचो मदीयं स्मरता तपोधन ॥ ४९ ॥
'जबतक तुम पराजित नहीं कर दोगे, तबतक पारिजात वृक्षकी तो बात ही क्या है, उसकी आधी पत्ती भी इन्द्र तुम्हें नहीं देगा। तपोधन ! मेरी इस बातको याद रखते हुए आपको मधुसूदन श्रीकृष्णसे इन्हीं शब्दोंमें यह बात कहनी चाहिये ॥ ४९ ॥
पुनः प्रवाच्यो भगवंस्त्वयाच्युतो
मम प्रियार्थं खलु निर्विशङ्कितम् ।
न मायया हर्तुमिहार्हसि द्रुमं
सुयुद्धमेवास्तु धिगस्तु जिह्मताम् ॥ ५० ॥
'भगवन् ! आपको मेरा प्रिय करनेके लिये अच्युतसे
४९४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
पुनः निःशङ्क होकर यह बात कह देनी चाहिये कि माया (छल-कपट) के द्वारा पारिजात वृक्षका अपहरण करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। विशुद्ध युद्ध ही होना चाहिये। कुटिलतापूर्ण बर्तावको धिक्कार है' ॥ ५० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे इन्द्रवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजात-हरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमोऽध्यायः
नारदजीके द्वारा श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनकर भी इन्द्रका उन्हें पारिजात देनेको उद्यत न होना
वैशम्पायन उवाच
महेन्द्रवचनं श्रुत्वा नारदो वदतां वरः।
विविक्ते देवराजानमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने एकान्तमें उनसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
कामं प्रियाणि राजानो वक्तव्या नात्र संशयः।
प्राप्तकालं तु वक्तव्यं हितमप्रियमप्युत ॥ २ ॥
'देवेश्वर ! अवश्य ही राजाओंसे वे ही बात कहनी चाहिये, जो उन्हें प्रिय लगें; इसमें संशय नहीं है तथापि जिसका अवसर प्राप्त हुआ हो, ऐसा हितकारक वचन तो अप्रिय होनेपर भी उनसे कह देना ही उचित है ॥ २ ॥
अनियुक्तपुरोभागो न स्यादिति वदन्ति हि।
सुलोकगतितत्त्वज्ञो नयविज्ञानकोविदः ॥ ३ ॥
'जो उत्तम लोकगतिके तत्त्वका ज्ञाता है और नीतिके विज्ञानमें भी कुशल है, ऐसा पुरुष बिना कहे-सुने कहीं अगुआ न बने, यह बुद्धिमान् पुरुषोंका कथन है ॥ ३ ॥
कार्याकार्ये समुत्पन्ने परिपृच्छसि मां भवान् ।
यतस्ततः प्रवक्ष्यामि गृह्यतां यदि रोचते ॥ ४ ॥
'कर्तव्याकर्तव्यकी समस्या खड़ी होनेपर प्रायः तुम मुझसे पूछते और सलाह लेते हो, इसलिये इस समय भी मैं तुमसे कुछ कहूँगा। यदि अच्छा लगे तो इसे काममें लाना ॥४॥
अनुक्तेनापि सुहृदा वक्तव्यं जानता हितम् ।
न्याय्यं च प्राप्तकालं च पराभवमनिच्छता ॥ ५ ॥
'जो राजाकी पराजय नहीं चाहता और किस बातमें उसका हित है, यह अच्छी तरह जानता है,—ऐसे सुहृद्को बिना कहे भी न्यायसंगत और समयोचित हितकर वचन अवश्य कहना चाहिये ॥ ५ ॥
वक्तव्यं सर्वथा सद्भिर्प्रिय चापि यद्धितम् ।
आनृण्यमेतत् स्नेहस्य सद्भिरेवादृतं पुरा ॥ ६ ॥
'सत्पुरुषोंको उचित है कि वे सर्वथा हितकी ही बात बतावें, भले ही वह सुननेमें अप्रिय हो। यही स्नेहसे उऋण होनेका उपाय है, जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने ही प्राचीन कालसे आदर किया है ॥ ६ ॥
अनृते धर्मभग्ने च न शुश्रूषति चाप्रिये ।
न प्रियं न हितं वाच्यं सद्भिरेवेति निन्दिताः ॥ ७ ॥
'जो असत्यवादी, धर्म-मर्यादाको भंग करनेवाले, किसीका उपदेश सुननेकी इच्छा न रखनेवाले और सबके अप्रिय (द्वेषपात्र) हैं, ऐसे लोगोंसे न तो प्रिय बात कहनी चाहिये और न हितकी ही। ऐसा कहकर सत्पुरुषोंने इन सबकी निन्दा की है ॥ ७ ॥
सर्वथा देव वक्तव्यं श्रूयतां शृण्वतां वर।
श्रुत्वा च कुरु सर्वज्ञ मम श्रेयस्करं वचः ॥ ८ ॥
'श्रोताओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ देव ! मुझे तुमको सर्वथा हितकी बात बतानी है, सुनो और सुनकर मेरे कल्याणकारी वचनका पालन करो ॥ ८ ॥
अन्योन्यभेदो भ्रातॄणां सुहृदां वा बलान्तक।
भवत्यानन्दकृद् देव द्विषतां नात्र संशयः ॥ ९ ॥
'बलासुरका विनाश करनेवाले देव ! भाइयों अथवा सुहृदोंमें यदि परस्पर भेद (वैरभाव) हो जाय तो वह शत्रुओंको आनन्द देनेवाला होता है, इसमें संशय नहीं है ॥९॥
हितानुबन्धसहितं कार्यं ज्ञेयं सुरेश्वर ।
विपरीतं च तद् बुद्ध्वा नित्यं बुद्धिमतां वर ॥ १० ॥
यत् स्यात् तापकरं पश्चादारब्धं कार्यमीदृशम्।
आरभेन्नैव तद् विद्वानेष बुद्धिमतां नयः ॥ ११ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सुरेश्वर ! अपने कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्यको जानना चाहिये तथा जो इसके विपरीत हो, उसको भी सदा समझ लेना चाहिये। समझ लेनेके बाद जो कार्य आरम्भ करनेपर पीछे संताप देनेवाला हो, ऐसे कार्यको विद्वान् पुरुष कदापि आरम्भ न करे—यही बुद्धिमानोंकी नीति है ॥ १०-११ ॥
विष्णुपर्व ] , एकसप्ततितमोऽध्यायः । ४९५
विपाकमस्य कार्यस्य नानु पश्यामि शोभनम् ।
यदत्र कारणं देव निबोध विबुधाधिप ॥ १२ ॥
'देव ! विबुधेश्वर ! मैं इस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं देखता हूँ। इसमें जो कारण है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ १२॥
य एको विश्वमध्यास्ते प्रधानं जगतो हरिः ।
प्रकृत्या यं परं सर्वं क्षेत्रज्ञं वै विदुबुर्धाः ॥ १३ ॥
'जो अकेले ही कार्यभूत जगत् और उसके कारणभूत प्रधानके भी अधिष्ठाता (संचालक) हैं, वे श्रीहरि ही श्रीकृष्ण हैं। जिन्हें समस्त विद्वान् प्रकृतिसे परे विराजमान क्षेत्रज्ञके रूपमें जानते हैं ॥ १३ ॥
तस्याव्यक्तस्य यो व्यक्तो भागः सर्वभवोद्भवः ।
तस्यात्मा परमो देवो विष्णुः सर्वस्य धीमतः ॥ १४ ॥
'उस अव्यक्त प्रकृतिके जो व्यक्तभाग (महत्तत्त्व या समष्टिबुद्धिके अभिमानी चेतन) ब्रह्मा हैं, वे ही समस्त संसारकी उत्पत्तिके कारण हैं। उनके तथा सम्पूर्ण चेतन जीवमात्रके आत्मा वे परमदेव श्रीविष्णु ही हैं ॥ १४ ॥
प्रकृत्याः प्रथमो भाग उमा देवी यशस्विनी ।
व्यक्तः सर्वमयो विश्वः स्त्रीसंज्ञो लोकभावनः ॥ १५ ॥
यशस्विनी उमादेवी प्रकृतिका मुख्य भाग (व्यक्त जगत्स्वरूप) हैं। अतः सर्वमय व्यक्त विश्व स्त्रीसंज्ञक (सम्पूर्ण भोग्य वस्तुरूप) है, जो चेतनमात्रको तृप्त करनेवाला है ॥ १५ ॥
रुक्मिण्याद्याः स्त्रियस्तस्या व्यक्तत्वं प्रथमो गुणः ।
अव्यया प्रकृतिर्देवी गुणी देवो महेश्वरः ॥ १६ ॥
'रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ भी प्रकृतिका मुख्य गुण (भाग) अर्थात् व्यक्तरूप हैं। अविनाशिनी प्रकृति उमादेवी है, जो गुणरूपा है और उनसे युक्त गुणी पुरुष भगवान् महेश्वर हैं। १६।
न विशेषोऽस्य रुद्रस्य विष्णोश्चामरसत्तम ।
गुणिनश्चाव्ययः शास्ता सदा च प्रथमोऽगुणः ॥ १७ ॥
नारायणो महातेजाः सर्वकृल्लोकभावनः ।
'देवश्रेष्ठ ! (इसी प्रकार लक्ष्मी या रुक्मिणी गुणमयी अविनाशिनी प्रकृति हैं और विष्णु या श्रीकृष्ण गुणी पुरुष हैं) इन गुणवान् मायावी रुद्र और विष्णुमें कोई अन्तर नहीं है। त्रिगुणात्मक जगत्के जो प्रथम अविनाशी शासक निर्गुण परमात्मा हैं, वे ही महातेजस्वी नारायण हैं। वे सबके स्रष्टा और समस्त जगत्के उत्पादक हैं ॥ १७३ ॥
भोक्ता महेश्वरो देवः कर्ता विष्णुरधोक्षजः ॥ १८ ॥
ब्रह्मा देवगणांश्चान्ये पश्चात् सृष्टा महात्मना ।
महादेवेन देवेश प्रजापतिगणास्तथा ॥ १९ ॥
'देवेश्वर ! इन परमात्मा परमदेव नारायणके द्वारा ही भोक्ता महेश्वरदेव, कर्ता अधोक्षज विष्णु, ब्रह्मा, अन्य देव-समुदाय तथा प्रजापतिगण—इन सबकी पीछे सृष्टि हुई है ॥ १८-१९ ॥
एवं पुराणपुरुषो विष्णुर्देवेषु पठ्यते ।
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च गुणेभ्यश्च परस्तथा ॥ २० ॥
'इस प्रकार पुराणपुरुष भगवान् विष्णु देवताओंमें अचिन्त्य, अप्रमेय और गुणातीत कहे जाते हैं ॥ २० ॥
अदित्या तपसा विष्णुर्महात्माऽऽराधितः पुरा ।
वरेण च्छन्दिता तेन परितुष्टेन चादितिः ॥ २१ ॥
'पूर्वकालमें देवमाता अदितिने तपस्याद्वारा परमात्मा विष्णुकी आराधना की। उससे संतुष्ट हो भगवान् विष्णुने भी अदितिको इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी ॥ २१ ॥
तयोक्तस्त्वत्समं पुत्रमिच्छामीति सुरोत्तम ।
प्रणिपत्य च विज्ञाय नारायणमधोक्षजम् ॥ २२ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! उस समय अदितिने अधोक्षज (इन्द्रियातीत) भगवान् नारायणको पहचानकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपके समान पुत्र चाहती हूँ' । २२।
तेनोक्तं भुवने नास्ति मत्समः पुरुषोऽपरः ।
अंशेन तु भविष्यामि पुत्रः खल्वहमेव ते ॥ २३ ॥
'तब उन्होंने कहा—'देवि ! समस्त भुवनोंमें मेरे समान दूसरा कोई पुरुष नहीं है। अतः मैं ही अपने अंशसे तुम्हारा पुत्र होऊँगा ॥ २३ ॥
स जातः सर्वकृद् देवो भ्राता तव सुरेश्वर ।
नारायणो महातेजा यमुपेन्द्रं प्रचक्षते ॥ २४ ॥
'सुरेश्वर ! (इस निश्चयके अनुसार) वे सबकी सृष्टि करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण तुम्हारे भाईके रूपमें अवतीर्ण हुए, जिन्हें उपेन्द्र कहते हैं ॥ २४ ॥
इच्छन्नेव हरिर्देव काश्यपत्वमुपागतः ।
तैस्तैर्भावैर्विंकुरुते भूतमभव्यभवाप्ययः ॥ २५ ॥
'देव ! भूत और भविष्यकी उत्पत्ति एवं संहारके अधिष्ठानभूत श्रीहरि स्वेच्छासे ही कश्यपजीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे तथा अपनी इच्छाके अनुसार ही वे विभिन्न रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं ॥ २५ ॥
प्रादुर्भावं गतो देवो जगतो हितकाम्यया ।
माथुरं जगतो नाथः कर्ता हर्ता च केशवः ॥ २६ ॥
'जगत्के संरक्षक, स्रष्टा और संहारक भगवान् केशव जगत्के हितकी कामनासे ही मथुरामे अवतीर्ण हुए हैं ॥ २६॥
यथा पललपिण्डः स्याद् व्याप्तः स्नेहेन मानद ।
तथा जगदिदं व्याप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! जैसे मांसपिण्ड स्नेह (चर्बी या चिकनाई) से व्याप्त होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् प्रभावशाली भगवान् विष्णुसे व्याप्त है ॥ २७ ॥
| ४९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ब्रह्मण्यदेवः सर्वात्मा तैस्तैर्भावैर्विकुर्वति ।
जगत्यतिगुणो देवो वैकुण्ठः सर्वभावनः ॥ २८ ॥
'वे भगवान् ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, सबके आत्मा हैं और जगत्में जैसा शरीर धारण करते हैं, उसके अनुसार ही विभिन्न भावों (सुख-दुःखादि धर्मों) द्वारा विकारको प्राप्त होते-से प्रतीत होते हैं। वास्तवमें तो सबकी उत्पत्ति करनेवाले वे भगवान् वैकुण्ठ गुणातीत हैं ॥ २८ ॥
अतः समस्तदेवानां पूज्य एव च केशवः ।
पद्मनाभश्च भगवान् प्रजासर्गकरो विभुः ॥ २९ ॥
'अतः प्रजाकी सृष्टि करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् पद्मनाभ-स्वरूप श्रीकृष्ण समस्त देवताओंके लिये भी पूज्य ही हैं ॥ २९ ॥
अनन्तो धारणार्थं च बिभर्ति च महद्यशः ।
यज्ञ इत्यपि सद्भिंश्च कथ्यते वेदवादिभिः ॥ ३० ॥
'वे ही पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करनेके लिये अनन्त (शेषनाग) के रूपमें प्रकट हुए हैं। वे महान् यश धारण करते हैं। वेदवादी साधु पुरुष उन्हींका 'यज्ञ' नामसे भी प्रतिपादन करते हैं ॥ ३० ॥
श्वेतः कृतयुगे देवो रक्तस्त्रेतायुगे तथा ।
द्वापरे च तथा पीतः कृष्णः कलियुगे विभुः ॥ ३१ ॥
'वे सर्वव्यापी भगवान् सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीत तथा कलियुगमें कृष्ण वर्णका स्वरूप धारण करते हैं* ॥ ३१ ॥
* श्रुतिमें कहा है—
कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन् ॥
इस श्रुतिके साथ उपर्युक्त श्लोककी सङ्गति लगाते हुए आचार्य नीलकण्ठ कहते हैं कि जो अविद्यारूपी निद्रामें सो रहा है अर्थात् जो अत्यन्त मूढ़ पुरुष है, वही कलि है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये इस जगत्में भगवान् श्रीहरि कृष्ण होते हैं (अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार ग्रहण करते हैं)। जो कुछ-कुछ कल्याणकी बातोंको देखता और समझता है, जो उस अज्ञान-निद्रासे आधा जग गया है, उस पुरुषको द्वापर कहते हैं। उसके लिये भगवान् पीतवर्ण होते हैं अर्थात् सुवर्णके समान मनोहर कान्ति धारण करते हैं। वह मनुष्य उनके उस दिव्य रूपपर आकृष्ट होकर कुछ भक्तिकी ओर उन्मुख होता है। जो कल्याणकी प्राप्तिके लिये सदा सजग रहकर प्रयत्न करता है, वह साधक त्रेता कहलाता है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् रक्त माताकी भाँति-अनुरक्त (वात्सल्यभावसे युक्त) होते हैं। जो युधिष्ठिर आदिकी भाँति भगवान्का अत्यन्त भक्त है, सदा भक्तिके पथपर ही चलता है, वह कृतकृत्य होनेके कारण कृतयुग अथवा सत्ययुग कहा गया है; उसके प्रति भगवान् शुक्लवर्ण होते हैं अथवा उसके समक्ष वे सदा अपने शुद्ध रूपको ही प्रकाशित करते हैं।
अवधीत् स हिरण्याक्षं दिव्यरूपधरो हरिः ।
दधाराप्सु निमज्जन्तीमेष देवो वसुन्धराम् ॥ ३२ ॥
वाराहं वपुराश्रित्य जगतो हितकाम्यया ।
'उन श्रीहरिने अपने दिव्यरूप धारण करके हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध किया था। उन्होंने जगत्के हितकी कामनासे वाराहरूप धारण करके जलमें डूबती हुई पृथ्वीका उद्धार एवं जलके ऊपर इसका संस्थापन किया था ॥ ३२ ॥
जघ्ने हिरण्यकशिपुं नारसिंहवपुर्हरिः ॥ ३३ ॥
जिगाय जगतीं चैव विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
बबन्ध च बलिं देवः श्रीमान् पन्नगबन्धनैः ॥ ३४ ॥
'उन्हीं श्रीहरिने नरसिंह रूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया था और उन्हीं वामनरूपधारी श्रीमान् भगवान् विष्णुने इस पृथ्वीको जीता और बलिको नागपाशमें बाँध लिया ॥ ३३-३४ ॥
देवदानवसम्भूतानाकामयदपि श्रियम् ।
त्वय्यनन्तः पुरा विष्णुरुदारोऽमितविक्रमः ॥ ३५ ॥
'यद्यपि देवताओं और दानवोंके सम्मिलित प्रयत्नसे प्रकट हुई राजलक्ष्मी दोनोंके लिये साधारण थी, तो भी पूर्वकालमें अमितपराक्रमी, उदार हृदय, अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुने तुम्हारे लिये उसपर आक्रमण किया अर्थात् विराटरूपसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके त्रिलोकलक्ष्मी तुम्हें समर्पित कर दी ॥ ३५ ॥
सावशेषं तपो यस्य तन्निहन्ति जनार्दनः ।
अलीकेष्वपि वर्तन्तं व्रतमेतन्महात्मनः ॥ ३६ ॥
'जिसकी तपस्या शेष है, वह भी यदि अलीक—मायामय अर्थात् छल-कपट एवं अन्यायपूर्ण बर्ताव करता है तो भगवान् श्रीकृष्ण उसे मार डालते हैं; क्योंकि दुराचारियोंका यह विनाश इन महात्मा श्रीकृष्णका व्रत है ॥ ३६ ॥
जघ्ने च दानवान् मुख्यान् देवानां ये च शत्रवः।
तव प्रियार्थं गोविन्दो धर्मनित्यः सतां गतिः ॥ ३७ ॥
'सदा धर्मकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले सत्पुरुषोंके आश्रय-भूत भगवान् गोविन्दने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मुख्य-मुख्य दानवोंका तथा जो लोग देवताओंके शत्रु हुए हैं, उनका भी वध कर डाला है ॥ ३७ ॥
रामत्वमपि चावाप्य जघ्ने रावणमात्मवान् ।
भूत्वा कामगुणांश्चैव जघ्नान द्विरदं हरिः ॥ ३८ ॥
'इन मनस्वी प्रभुने ही श्रीरामचन्द्रका रूप धारण करके रावणको मारा था तथा दूसरे-दूसरे अवतार धारण करके इन श्रीहरिने इच्छानुसार शौर्य आदि गुणोंसे युक्त असुरोंका उसी तरह संहार कर डाला था, जैसे सिंह हाथीको नष्ट कर देता है ॥ ३८ ॥
विष्णुपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः ४९७
हिताय जगतोऽद्यापि लोके वसति मानुषे।
उपेन्द्रो जगतां नाथः सर्वभूतोत्तमोत्तमः ॥ ३९ ॥
‘समस्त भूतोंमें जो उत्तम हैं, उनसे भी उत्तम वे जगदीश्वर उपेन्द्र इस समय भी जगत्के हितके लिये मनुष्यके रूपमें निवास करते हैं ॥ ३९ ॥
जटी कृष्णाजिनी दण्डी दृष्टपूर्वो मया हरिः।
दैत्येषु चरन् देवस्तृणेष्वग्निरिवोद्धतः ॥ ४० ॥
‘जैसे तिनकोंमें प्रज्वलित हुई आग फैल रही हो, उसी प्रकार मैंने पूर्वकालमें दैत्य-समूहोंके बीच श्रीहरिको जटा, काला मृगचर्म एवं पलाश-दण्ड धारण किये वामन ब्रह्मचारी-के रूपमें विचरते देखा है ॥ ४० ॥
अद्राक्षमपि गोविन्दं दानवैकार्णवं जगत्।
कुर्वाणं दानवैर्हीनं जगतो हितकाम्यया ॥ ४१ ॥
‘जब सारा संसार दानवरूपी एकार्णवमें मग्न था, उस समय भी जगत्के हितकी कामनासे इस विश्वको दानवहीन करते हुए श्रीगोविन्दका मैंने दर्शन किया है ॥ ४१ ॥
अवश्यं पारिजातं ते नयिष्यति जनार्दनः।
द्वारकाममरश्रेष्ठ नानृतं च ब्रवीम्यहम् ॥ ४२ ॥
‘अमरश्रेष्ठ ! मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, जनार्दन श्रीकृष्ण तुम्हारे इस पारिजातको अवश्य द्वारकापुरीमें ले जायेंगे।’
भ्रातृस्नेहाभिभूतस्त्वं न कृष्णे प्रहरिष्यसि।
नापि कृष्णस्त्वयि ज्येष्ठे प्रहरिष्यति वासव ॥ ४३ ॥
‘वासव ! तुम भ्रातृ-स्नेहसे अभिभूत होकर श्रीकृष्णपर प्रहार नहीं करोगे और श्रीकृष्ण भी तुमपर बड़े भाईके नाते प्रहार नहीं करेंगे ॥ ४३ ॥
नैव चेच्छ्रोष्यसि प्रोक्तं मया देव कथञ्चन।
पृच्छ त्वं नयधर्मज्ञान् ये हितास्तव मन्त्रिणः ॥ ४४ ॥
‘देव ! यदि मेरी कही हुई बात तुम किसी तरह नहीं सुनोगे तो नीति-धर्मके जाननेवाले जो तुम्हारे हितैषी मन्त्री हों, उनसे जाकर पूछो’ ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु महेन्द्रो जनमेजय।
इदमूत्तरमीशोऽथ प्रत्युवाच जगद्गुरुम् ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय, ! नारदजीके ऐसा कहनेपर देवेश्वर इन्द्रने उन जगद्गुरु मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ४५ ॥
एवंविधप्रभावं त्वं कृष्णं वदसि यद् द्विज।
एवमेतत् सुबहुशः श्रुतं खलु मया मुने ॥ ४६ ॥
‘ब्रह्मन् ! आप श्रीकृष्णको जो ऐसे प्रभावशाली बता रहे हैं, वह ठीक है। मुने ! उनके ऐसे प्रभावकी चर्चा मैंने बहुत बार सुनी है ॥ ४६ ॥
यतश्चैवंविधः कृष्णस्ततोऽहं तस्य वै तरुम्।
न प्रदास्यामि दातव्यं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ४७ ॥
‘जब श्रीकृष्ण ऐसे महान् हैं, तब मैं सत्पुरुषोंके धर्मका स्मरण करते हुए निश्चय ही उन्हें देने योग्य होनेपर भी पारिजात वृक्ष नहीं दूँगा ॥ ४७ ॥
महाप्रभावो नाल्पार्थे रुष्येदिति विचिन्तयन्।
व्यवस्थितोऽहं भद्रं ते मुने सर्वगुणादिति ॥ ४८ ॥
‘मुने ! आपका कल्याण हो। जो महान् प्रभावशाली पुरुष हैं, वे इस छोटी-सी वस्तुके लिये मुझपर रुष्ट नहीं होंगे, ऐसा सोचकर उन सर्वगुणसम्पन्न श्रीकृष्णसे निर्भय होकर स्थित हूँ ॥ ४८ ॥
महाप्रभावाः सततं भवन्ति हि सहिष्णवः।
श्रोतारश्चैव सततं वृद्धानां ज्ञानचक्षुषाम् ॥ ४९ ॥
‘महान् प्रभावशाली महापुरुष सदा सहिष्णु होते हैं और ज्ञानदृष्टि रखनेवाले बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुनते हैं ॥ ४९ ॥
महात्मा कारणे नाल्पे कृष्णो धर्मभृतां वरः।
भ्रात्रा ज्येष्ठेन सर्वज्ञो विरोधं गन्तुमर्हति ॥ ५० ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ महात्मा श्रीकृष्ण इस छोटे-से कारणपर अपने बड़े भाईके साथ विरोध नहीं करेंगे ॥ ५० ॥
यथैवं मम मातुः स वरं प्रादादधोक्षजः।
तथैव तस्याः पुत्राणां ज्येष्ठानां सोढुमर्हति ॥ ५१ ॥
‘जैसे अधोक्षज भगवान् विष्णुने मेरी माताको इस प्रकार वरदान दिया है, वैसे ही उन्हें उसके ज्येष्ठ पुत्रोंके अपराधको भी सहन करना चाहिये ॥ ५१ ॥
यथैवोपेन्द्रतां यातः स्वयमिच्छञ्जनार्दनः।
तथैव भ्रातुरिन्द्रस्य सम्मानं कर्तुमर्हति ॥ ५२ ॥
‘जैसे स्वयं अपनी ही इच्छासे भगवान् विष्णु उपेन्द्र-भावको प्राप्त हुए (मेरे छोटे भाईके रूपमे अवतीर्ण हुए), उसी प्रकार उन्हे अपने बड़े भाई मुझ इन्द्रका सम्मान भी करना चाहिये ॥ ५२ ॥
ज्यैष्ठयमेतेन देवेन नारब्धं किं पुरातने।
अथेदानीमपीच्छेत् स ज्येष्ठोऽस्तु मधुसूदनः ॥ ५३ ॥
‘क्या पूर्वकालमें (वामन-अवतारके समय) इन विष्णु-देवने मेरी ज्येष्ठता नहीं स्वीकार की थी, उसी तरह इस समय भी यदि मधुसूदन चाहें तो स्वयं ही ज्येष्ठ हो जायँ’ ॥ ५३ ॥
सुनिश्चितं बलरिपुमीक्ष्य नारदो
विसर्जितस्त्रिदशवरेण धर्मभृत्।
ययौ पुरीं यदुवृषभाभिरक्षितां
कुशस्थलीं धृतिमतिमांस्तपोधनः ॥ ५४ ॥
| ४९८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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धृति और बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा तपोधन नारद बलविनाशन इन्द्रको अपने निश्चयपर अटल देख उन देवेश्वरसे विदा ले यदुपति श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुशस्थली (द्वारका) पुरीको चले गये॥ ५४॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदस्य स्वर्गात्पुनरागपने एकसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें नारदजीका स्वर्गलोकसे पुनरागमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका नारदजीको अमरावतीपर आक्रमण करनेका निश्चय बताकर इन्द्रके पास संदेश भेजना, इन्द्र और बृहस्पतिकी बातचीत, बृहस्पतिका कश्यपजीको यह समाचार बताना और कश्यपजीका युद्धकी शान्तिके लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना
वैशम्पायन उवाच
अथैत्य द्वारकां रम्यां नारदो मुनिसत्तमः।
ददर्श पुरुषश्रेष्ठं नारायणमरिंदमम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर रमणीय द्वारकापुरीमें जाकर मुनिवर नारदने शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषप्रवर नारायण (भगवान् श्रीकृष्ण) का दर्शन किया॥ १॥
स्ववेश्मनि सुखासीनं सहितं सत्यभामया।
विराजमानं वपुषा सर्वतेजोऽतिगामिना॥ २॥
वे अपने भवनमें सत्यभामाके साथ सुखपूर्वक बैठे थे और सम्पूर्ण तेजोंका अतिक्रमण करनेवाले अपने दिव्य विग्रहसे विराजमान हो रहे थे॥ २॥
तमेवार्थं महात्मानं चिन्तयन्तं दृढव्रतम्।
केवलं योजयन्तं च वाक्यमात्रेण भामिनीम्॥ ३॥
दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करनेवाले महात्मा श्रीकृष्ण उसी (पारिजात) के विषयमें सोच रहे थे और भामिनी सत्यभामाको केवल वाणीमात्रसे सान्त्वना दे रहे थे॥
दृष्ट्वैव नारदं देवः प्रत्युत्थाय अधोक्षजः।
पूजयामास च तथा विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ४॥
नारदजीको देखते ही भगवान् अधोक्षज उठकर खड़े हो गये तथा उन्होंने शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन किया॥
सुखोपविष्टं विश्रान्तं प्रहस्य मधुसूदनः।
वृत्तान्तं परिपप्रच्छ पारिजाततरुं प्रति॥ ५॥
जब वे सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये और विश्राम कर चुके, तब मधुसूदन श्रीकृष्णने हँसकर उनसे पारिजात-वृक्षके विषयमें समाचार पूछा॥ ५॥
अथाचष्ट मुनिः सर्वं विस्तरेण तपोधनः।
इन्द्रानुजायेन्दवाक्यं निखिलं जनमेजय॥ ६॥
जनमेजय! तब तपोधन मुनि नारदजीने सारा समाचार विस्तारपूर्वक बतलाया और इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णके लिये इन्द्रकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं॥ ६॥
श्रुत्वा कृष्णस्तु तत् सर्वं नारदं वाक्यमब्रवीत्।
अमरावतीं पुरीं यास्ये श्वोऽहं धर्मभृतां वर॥ ७॥
वह सब सुनकर श्रीकृष्णने नारदजीसे कहा—'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! मैं कल अमरावतीपुरीकी यात्रा करूँगा'॥ ७॥
इत्युक्त्वा नारदेनैव सहितः सागरं ययौ।
संदिदेश ततस्तत्र विविक्ते नारदं हरिः॥ ८॥
ऐसा कहकर श्रीहरि नारदजीके साथ ही समुद्र-तटपर गये और वहाँ एकान्तमें उन्होंने उन देवर्षिको यह संदेश दिया—॥ ८॥
महेन्द्रभवनं गत्वा अद्य ब्रूहि तपोधन।
अभिवाद्य महात्मानं मद्वाक्यममरोत्तमम्॥ ९॥
न युद्धे प्रमुखे शक्र स्थातुमर्हसि मे प्रभो।
पारिजातस्य नयने निश्चितं त्वमवेहि माम्॥ १०॥
'तपोधन! आप आज ही इन्द्र-भवनमें जाकर मेरी ओरसे अमरश्रेष्ठ महात्मा इन्द्रको प्रणाम करके उनसे मेरी यह बात बता दीजिये कि इन्द्र! प्रभो! आप युद्धमें मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे। आपको यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मैं पारिजातको वहाँसे ले आनेका दृढ़ निश्चय कर चुका हूँ'॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदस्त्रिदिवं गतः।
आचचक्षेऽथ कृष्णोक्तं देवेन्द्रस्यामितौजसः॥ ११॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर नारदजी स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ उन्होंने अमिततेजस्वी देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णकी कही हुई सारी बात बता दी॥ ११॥
ततो बृहस्पतेः शक्रः शशंस बलनाशनः।
श्रुत्वा बृहस्पतिर्देवमुवाच कुरुनन्दन॥ १२॥
विष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ४९९
कुरुनन्दन ! तब बलासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रने बृहस्पतिसे यह सब प्रसंग कह सुनाया। उसे सुनकर बृहस्पतिने देवेन्द्रसे कहा—॥ १२ ॥
अहो धिग् ब्रह्मसदनं मयि याते शतक्रतो।
दुर्नीतिमिदमारब्धमत्र भेदो हि दारुणः ॥ १३ ॥
‘अहो, धिक्कार है ! शतक्रतो ! मैं वहाँसे ब्रह्मलोकको चला गया था। इसी बीचमें तुमने यह दुर्नीति आरम्भ कर दी; क्योंकि तुम्हारे इस बर्तावके कारण यहाँ भयंकर भेद (कलह) का अवसर उपस्थित हो गया है ॥ १३ ॥
अनाख्यात्वा कथं नाम भवता भुवनेश्वर ।
ममैतत् कृत्यमारब्धं देव केनापि हेतुना ॥ १४ ॥
‘भुवनेश्वर ! देव ! क्या कारण था कि तुमने मुझसे बताये बिना ही यह दुष्कृत्य आरम्भ कर दिया ॥ १४ ॥
अथवा भवितव्येन कर्मजेन प्रयुज्यते ।
जगद् वृत्रघ्न न विधिः शक्यः समतिवर्तितुम् ॥ १५ ॥
‘अथवा वृत्रासुर-विनाशन इन्द्र ! यह सम्पूर्ण जगत् भावी कर्मफलसे प्रेरित होता रहता है। विधिके विधानका उल्लङ्घन करना असम्भव है ॥ १५ ॥
सहसैव तु कार्याणारम्भो न प्रशस्यते ।
तदेतत् सहसाऽऽरब्धं कार्यं दास्यति लाघवम् ॥ १६ ॥
‘सहसा किया हुआ कार्योंका आरम्भ अच्छा नहीं माना गया है। तुमने जो सहसा यह कार्य आरम्भ कर दिया है, यह अवश्य तुम्हें लघुता (पराजय) प्रदान करेगा’ ॥ १६ ॥
बृहस्पतिं महात्मानं महेन्द्रस्त्वब्रवीद् वचः ।
एवं गतेऽद्य यत् कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥
तब महेन्द्रने महात्मा बृहस्पतिसे कहा—‘गुरुदेव ! ऐसी परिस्थितिमें आज जो मेरा कर्तव्य हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें’ ॥ १७ ॥
तमुवाचाथ धर्मात्मा गतानागततत्त्ववित् ।
अधोमुखश्चिन्तयित्वा बृहस्पतिरुदारधीः ॥ १८ ॥
यह सुनकर भूत और भविष्यके तत्त्वको जाननेवाले उदारबुद्धि धर्मात्मा बृहस्पतिने नीचे मुँह करके कुछ देरतक सोच-विचारकर उनसे कहा--॥ १८ ॥
यतस्व सह पुत्रेण योधयस्व जनार्दनम् ।
तथा शक्र करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ॥ १९ ॥
‘देवेन्द्र ! अब तुम अपने पुत्र जयन्तके साथ युद्धभूमिमें उपस्थित हो श्रीकृष्णके साथ युद्ध और उसमें विजय पानेका प्रयत्न करो। तबतक मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे न्यायसंगत परिणाम प्रकट होगा’ ॥ १९ ॥
बृहस्पतिस्त्वेवमुक्त्वा क्षीरोदं सागरं गतः ।
आचष्ट मुनये सर्वं कश्यपाय महात्मने ॥ २० ॥
ऐसा कहकर बृहस्पतिजी क्षीरसागरके तटपर गये । वहाँ उन्होंने महात्मा कश्यप मुनिसे सब बातें कह सुनायीं ॥२०॥
तच्छ्रुत्वा कश्यपः क्रुद्धो बृहस्पतिमभाषत ।
अवश्यं भाव्यमेतद् भोः सर्वथा नात्र संशयः ॥ २१ ॥
वह सुनकर कश्यपजीने कुपित हो बृहस्पतिजीसे कहा—‘अजी, यह युद्ध अवश्य होगा । सर्वथा होकर रहेगा—इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
इच्छतः सदृशीं भार्यां महर्षेर्देवशर्मणः ।
अपध्यानकृतो दोषः पतत्येष शतक्रतोः ॥ २२ ॥
‘महर्षि देवशर्माकी पत्नी रुचि सर्वथा उन्हींके समान शुद्ध आचार-विचारवाली थी; परंतु इन्द्रने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। इससे मुनिने इन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन किया । वही यह दोष इस समय इन्द्रपर पड़ रहा है* ॥ २२ ॥
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थमारब्धञ्च मुने मया ।
उदवासः स दोषश्च प्राप्त एव सुदारुणः ॥ २३ ॥
‘मुने ! उस दोषकी शान्तिके लिये ही मैंने यह जलवास-रूप तप आरम्भ किया था तथापि वह अत्यन्त दारुण दोष प्राप्त हो ही गया ॥ २३ ॥
तद् गमिष्यामि मध्येऽस्य सहादित्या तपोधन ।
उभौ तौ वारयिष्यामि दैवं संवदते यदि ॥ २४ ॥
‘तपोधन ! अतः अब मैं अदितिके साथ इस युद्धके अवसरपर मध्यस्थ होकर जाऊँगा और यदि दैव अनुकूल रहा तो दोनोंको युद्धसे रोकूँगा’ ॥ २४ ॥
बृहस्पतिस्तु धर्मात्मा मारीचमिदमब्रवीत् ।
प्राप्तकालं त्वया तत्र भवितव्यं तपोधन ॥ २५ ॥
तब धर्मात्मा बृहस्पतिने मरीचिनन्दन कश्यपसे इस प्रकार कहा—‘तपोधन ! अब युद्धका अवसर प्राप्त हो गया । अतः आपको वहाँ अवश्य उपस्थित होना चाहिये’ ॥ २५ ॥
तथेति कश्यपश्चोक्त्वा सम्प्रस्थाप्य बृहस्पतिम् ।
जगामार्चयितुं देवं रुद्रं भूतगणेश्वरम् ॥ २६ ॥
कश्यपजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर बृहस्पतिको वहाँसे भेज दिया और स्वयं वे भूतगणोंके स्वामी रुद्रदेवकी आराधना करनेके लिये चले गये ॥ २६ ॥
तत्र सौम्यं महात्मानमानर्च वृषभध्वजम् ।
वरार्थी कश्यपो धीमानदित्या सहितः प्रभुः ॥ २७ ॥
वहाँ अदितिके साथ बुद्धिमान् भगवान् कश्यपने वर-प्राप्तिकी इच्छा रखकर सौम्यरूपधारी परमात्मा वृषभध्वज शिवकी पूजा की ॥ २७ ॥
* यह प्रसङ्ग महाभारत अनुशासनपर्वके चालीसवें अध्यायमें देख लेना चाहिये ।
| ५०० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तुष्टाव च तमीशानं मारीचः कश्यपस्तदा।
वेदोक्तैः स्वकृतैश्चैव स्तवैः स्तुत्यं जगद्गुरुम्॥ २८॥
उस समय मरीचिनन्दन कश्यपने स्तुति करनेके योग्य जगद्गुरु भगवान् शंकरका वेदोक्त मन्त्रों तथा स्वरचित स्तोत्रोंद्वारा स्तवन किया॥ २८॥
कश्यप उवाच
उरुक्रमं विश्वकर्माणमीशं
जगत्स्रष्टारं धर्मदृश्यं वरेशम्।
खं सर्वं त्वां धृतिमद्धाम दिव्यं
विश्वेश्वरं भगवन्तं नमस्ये॥ २९॥
कश्यपजी बोले—जो विष्णुरूपसे वामन-अवतारके समय महान् पग बढ़ाकर त्रिलोकीको नाप लेनेमें समर्थ हुए हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, जो सबके ईश्वर हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, धर्मके द्वारा जिनका साक्षात्कार होता है, जो अभीष्ट मनोरथोंके स्वामी तथा उनकी पूर्ति करनेवाले हैं, जो सर्वस्वरूप, सात्त्विकी धृतिवाले योगियोंके जो ये चिन्मय धामस्वरूप हैं, उन दिव्यस्वरूप आप भगवान् विश्वेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २९॥
यो देवानामधियः पापहर्ता
ततं विश्वं येन जगन्मयत्वात्।
आपो गर्भं यस्य शुभा धरिष्ये
विश्वेश्वरं तं शरणं प्रपद्ये॥ ३०॥
जो देवताओंके अधिपति और पापहर्ता हैं, जो जगत्-स्वरूप होनेके कारण सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं, शुभ जल (जलात्मक वीर्यसे प्रकट होनेवाले शरीर) जिनके गर्भ (अंशभूत चैतन्य) को धारण करते हैं, उन भगवान् विश्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३०॥
शालावृकान् यो यतिरूपो निजघ्ने
दत्तानिन्द्रेण प्रणुदो हितानाम्।
विरूपाक्षं सुदर्शनं पुण्ययोनिं
विश्वेश्वरं शरणं यामि मूर्ध्ना॥ ३१॥
जिन्होंने यतिरूप होकर—जितेन्द्रिय बनकर इन्द्रके भेजे हुए इन्द्रियरूपी भेड़ियोंको, जो शम-दम आदि हितैषी मित्रों-को दबा देनेवाले हैं, नष्ट कर दिया, जिनके नेत्र विरूप हैं, जो देखनेमें बड़े सुन्दर तथा पुण्यकी योनि हैं, उन भगवान् विश्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ और उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ॥ ३१॥
भुङ्क्ते य एको विभुर्जगतो विश्वमद्यं
धाम्नां धाम सुकृतित्वाच्च धृष्यः।<sup>१</sup>
पुष्यात् स मां महसा शाश्वतेन
सोमपानां मरीचिपानां वरिष्ठः॥ ३२॥
जो एकमात्र इस जगत्के स्वामी हैं तथा श्रेष्ठ विश्वका पालन करते (अथवा इसे अपने उपभोगमें लाते) हैं, जो धाम (नेत्र एवं सूर्य आदि) के भी धाम (आश्रय अथवा प्रकाश) हैं तथा सुकृति (पुण्यरूप अथवा सुकृतनामधारी ब्रह्मरूप) होनेके कारण सबके लिये अजेय हैं, सोमपान करनेवाले कर्मठों और चन्द्ररश्मियोंका पान करनेवाले महा-मुनियोंमें जिनका सबसे ऊँचा और गौरवपूर्ण स्थान है, वे भगवान् विश्वेश्वर अपने सनातन तेजसे मेरा पोषण करें॥
अथर्वाणं सुशिरसं भूतयोनिं
कृतिनं वीरं दानवानां च वाधम्।
यज्ञे हुतिं यज्ञियं संस्कृतं वै
विश्वेश्वरं शरणं यामि देवम्॥ ३३॥
जिनका अथर्ववेदके द्वारा प्रतिपादन किया गया है, जिनके पञ्चकोशरूप पाँच सुन्दर मस्तक हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंकी योनि अर्थात् समस्त जगत्के कारण हैं, जो विद्वान्, वीर तथा दानवोंके बाधक हैं, यज्ञमें जिनके लिये आहुति दी जाती है, यज्ञसम्बन्धी संस्कारयुक्त हविष्य जिनका स्वरूप है, उन विश्वेश्वरदेवकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३३॥
जगज्जालं विततं यत्र विश्वं
विश्वात्मानं प्रतिदेवं गतानाम्।
य ऊर्ध्वगं रथमास्थाय याति
विश्वेश्वरः स सुमना मेऽस्तु नित्यम्॥ ३४॥
जिनके ऊपर यह सारा जगत्रूपी इन्द्रजाल फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण विश्वके आत्मा हैं, शरणागतोंके लिये प्रीति एवं सुखको प्रकाशित करनेवाले हैं तथा जो ऊर्ध्वगामी (आकाशचारी) रथपर आरूढ हो यात्रा करते हैं, वे भगवान् विश्वेश्वर मुझपर सदा प्रसन्नचित्त रहे॥ ३४॥
अन्तश्चरं रोचनं चारुशाखं
महाबलं धर्मनेतारमीड्यम्।
सहस्रनेत्रं शतवर्त्मानमुग्रं
महादेवं विश्वसृजं नमस्ये॥ ३५॥
जो अन्तर्यामी आत्मारूपसे सबके भीतर विचरते हैं, प्रकाशमान (चिन्मय) हैं, वेदमयी मनोहर शाखाएँ जिनसे प्रकट हुई हैं, जो महान् बलशाली, धर्मके प्रवर्तक तथा स्तवन करने योग्य हैं। जिनके सहस्रों नेत्र हैं और जिन्हें पानेके लिये सैकड़ों मार्ग हैं (अथवा जो शतपथविहित कर्मफलके दाता हैं) उन उग्रस्वरूप विश्वस्रष्टा महादेवजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥
१. 'तस्मात्तत् सुकृतमुच्यते।' इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्मका नाम 'सुकृत' है।
विष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः [ ५०१
शुचिं योगं शंसनं शान्तपापं
शर्वं शम्भुं शंकरं भूतनाथम्।
धुरंधरं गोपतिं चन्द्रचिह्नं
हृषीकाणामयनं यामि मूर्ध्ना॥ ३६॥
जो शुचि (पवित्र एवं असङ्ग), योगसे प्राप्त होनेवाले, विभिन्न योगोंके प्रतिपादक, पापशून्य, संहारक, सुखके उत्पत्तिस्थान, कल्याणकारी और सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, जो अकेले ही सम्पूर्ण विश्वका भार वहन करते हैं, इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा चन्द्रमाको चिह्नके रूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं, ज्ञानेन्द्रियोंके आश्रयरूप उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता और उनकी शरणमें जाता हूँ ॥ ३६ ॥
आशुःशिशानं वृषभं रोरुवाणं
कृतं धर्मं वितथं चाशुशेषम्।
वसुंधरं समृजीकं समं त्वां
धृतव्रतं शूलधरं प्रपद्ये ॥ ३७॥
जो शीघ्र फल देनेवाला, राग आदि दोषोंको शान्त करनेवाला, अभीष्ट मनोरथोंका वर्षक (पूरक), प्रातः सवन आदिके क्रमसे शब्दायमान और अनुष्ठानमें लाया हुआ जो यज्ञादिरूप धर्म है, वह यदि सकामभावसे किया जाय तो नश्वर फल देनेके कारण व्यर्थ हो जाता है और फलभोगके द्वारा उसकी शीघ्र ही समाप्ति हो जाती है; किंतु वही धर्म यदि निष्काम भावसे किया जाय तो वह आत्मशुद्धि-सम्पादनके साथ ही पुण्यरूपी धनको सुस्थिर रखनेवाला होता है—यह दोनों प्रकारका धर्म आपका ही स्वरूप है। आप सभी अवस्थाओंमें सम हैं। उत्तम व्रतको धारण करनेवाले आप त्रिशूलधारी रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३७ ॥
अनन्तवीर्यं धृतकर्माणमाद्यं
यज्ञाशेशं यजतां चाभियाज्यम्।
हविर्भुजं भुवनानां सदैव
ज्येष्ठं द्विजं धर्मभृतां प्रपद्ये ॥ ३८ ॥
आपके बल-पराक्रमका कहीं अन्त नहीं है, आप ही समस्त कर्मोंको धारण करनेवाले आधार हैं अर्थात् आप ही समस्त कर्मों और उनके फलोंके साक्षी हैं। अन्य देवताओंकी भाँति आप यज्ञके अङ्ग नहीं हैं। आप ही सबके आदि कारण हैं। यजमान अपने यज्ञोंद्वारा जिन यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, उनके वे आराध्यदेव आप ही हैं। आप ही सदा समस्त जगत्के हविष्यभोक्ता अग्निरूप हैं और आप ही धर्मात्माओंमें ज्येष्ठ द्विज (ब्राह्मण) हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ ॥ ३८ ॥
परं गुणेभ्यः पृश्निगर्भस्वरूपं
यशः शृङ्गं व्यूहनं कान्तरूपम्।
शुद्धात्मानं पुरुषं सत्यधामं
सम्मोहनं दुष्कृतिनां नमस्ये ॥ ३९ ॥
आप गुणोंसे परे तथा विष्णुस्वरूप हैं। आप यशके समान व्यापक हैं। सारे प्रपञ्चको व्याप्त करके भी सींगके समान उससे ऊपर उठे हुए हैं। आप ही समस्त प्राणियोंके अङ्ग-प्रत्यङ्गको सुगठित करनेवाले हैं। आपका रूप अत्यन्त कमनीय (मनोहर) है। आप विशुद्ध आत्मस्वरूप अन्तर्यामी तथा सत्यधाम (अबाधित चैतन्यस्वरूप अथवा वैकुण्ठादि नित्यधामस्वरूप) हैं। आप दुराचारियोंको मोह (महान् दुःख) मे डालनेवाले हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३९ ॥
युक्तोङ्कारं खशिरसं चारुकर्म
दृढव्रतं दृढधन्वानमाजम्।
शूरं वेत्तारं धनुषोऽस्त्रातिरेकं
पतिं पशूनां शमनं नमस्ये ॥ ४० ॥
आप योगियोंके लिये प्रणवरूप हैं। अपने स्वरूपभूत ओंकारके सिर अर्थात् उसकी अर्द्धमात्रा आप ही हैं। आपका कर्म हिंसाशून्य होनेके कारण बड़ा ही मनोहर है। आप दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं। आपका धनुष अत्यन्त सुदृढ़ है। आप बाणोंको दूरतक फेंकनेवाले, शूरवीर, धनुर्वेदके ज्ञाता और अस्त्र-विज्ञानमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। समस्त पशुओं (जीवों) के पति (पालक) तथा जगत्का संहार करनेवाले आप भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४० ॥
एको रतिश्चैव भूतं भविष्यं
सर्वातिथियो हि जुषत्यरिघ्नः।
अरिंतुदोऽनुत्तमः संविभागी
विभाजको मां भगवान् पातु देवः ॥ ४१ ॥
जो सबके एकमात्र मित्र हैं, भूत और भविष्य जिनका ही स्वरूप है, जो सबके अतिथि (अग्नि) रूपसे हविष्यका सेवन करते हैं, काम आदि शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं तथा शत्रुभाव रखनेवाले राक्षसोंको पीड़ा देते हैं, जिनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, जो यज्ञमें भाग पाते और स्वयं भी भागोंका विभाजन करते हैं, वे भगवान् महादेव मेरी रक्षा करें ॥ ४१ ॥
य एको याति जगतां विश्वमीशो
य एकोऽदान्मरुतां प्राणमग्र्यम्।
येनानुशंष्याच्छश्वतं साम जुष्टं
स मां जुष्यात्सुकृतिश्रेयसेऽद्य ॥ ४२ ॥
जो जगदीश्वर एक होकर भी सम्पूर्ण विश्वमें प्रविष्ट हैं तथा जिन अद्वितीय परमात्माने प्राणस्वरूप मरुद्गणोंको भी उत्तम प्राण प्रदान किया है अर्थात् जो प्राणके भी प्राण हैं, जिन्होंने दयालु होनेके कारण सबके साथ सनातन मैत्री जोड़
५०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रखी है, वे भगवान् शिव आज उत्तम कार्य और कल्याणके लिये मुझपर कृपादृष्टि करें ॥ ४२ ॥
ब्रह्मासृजद् यो भुवनोत्तमोत्तमं
वृत्तो विद्वान् ब्राह्मणः षड्गुणस्य ।
सृष्ट्वा रसं व्याहृतिस्थं समग्रं
स मां पायादिह बहुरूपोऽरिहाङ्गैः॥ ४३ ॥
जिन्होंने ब्रह्मा होकर समस्त भुवनोंमें उत्तमोत्तम दिव्यलोककी रचना की है, जो विद्वान् ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण छः गुणों ( ऐश्वर्य, ज्ञान, यश, श्री, वैराग्य और धर्म ) से परिपूर्ण हैं, व्याहृतियोंमें स्थित रस तथा उसकी तीन मात्राओंसे उपलक्षित समस्त प्रपञ्चकी सृष्टि करके जो इसके भीतर व्याप्त हैं, वे अनेक रूपधारी, कामादि शत्रुके नाशक, अपने अङ्गोंद्वारा मेरी रक्षा करें ॥ ४३ ॥
व्यञ्जनोऽजनोऽथ विद्वान् समग्रः
स्पृशिः शम्भुः प्राणदः कृत्तिवासाः ।
रसो ध्रुवः पवमानस्य भर्ता
सपत्नीशः शङ्करः सारधाता ॥ ४४ ॥
जो अतीन्द्रिय विषयोंका भी ज्ञान करानेवाले, अजन्मा, विद्वान् तथा सर्वस्वरूप हैं, व्यापक होनेके कारण जो सबका स्पर्श करनेवाले, कल्याणकारी तथा प्राणदाता हैं, जो अपने शरीरपर वस्त्रके स्थानमें गजचर्म धारण करते हैं, ध्रुव रस—अक्षय परमानन्द जिनका स्वरूप है, जो वायुके भी भरण-पोषण करनेवाले हैं, पत्नी और पति ( यजमान और उसकी पत्नी ) के साथ रहकर अर्थात् आत्मारूपसे उनके प्रेरक होकर यज्ञादि कर्मोंका सम्पादन करते हैं तथा सार तत्त्वको धारण करनेवाले हैं, वे भगवान् शंकर मेरी रक्षा करें ॥ ४४ ॥
त्र्यम्बकं पुष्टिदं विबुधाणं
धर्मं विप्राणां वरदं यज्यनां च ।
वराद् वरं रणजेतारमीशं
देवं देवानां शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४५ ॥
जो त्रिनेत्रधारी तथा सबको पुष्टि प्रदान करनेवाले हैं, विप्रों—विद्वानोंको भी धर्मका उपदेश करते हैं और यज्ञ करनेवाले यजमानोंको अभीष्ट वर देते हैं, जो श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, संग्रामविजयी, ईश्वर तथा देवताओंके भी देवता हैं, उन भगवान् रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४५ ॥
आस्यं देवानामान्तकं दुष्कृतीनां
त्रिवृत्स्तोमं वृक्षहं कर्मसाक्ष्यम्।
भूतायनं भूतपतिं गुणज्ञं
गुणाकारं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४६ ॥
जो अग्निरूपसे देवताओंके मुख, दुराचारियोंका अन्त करनेवाले, त्रिवृत आदि स्तोत्रोंसे युक्त सोमयागात्मकरूप, संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाले, कर्मोंके साक्षी, भूतोंके लय-स्थान, भूतनाथ, गुणज्ञ और गुणस्वरूप हैं, उन रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४६ ॥
अनुद्धतं यक्षकर्त्तारमन्तं
मध्यं चाद्यं यक्षकृतां साम्यरूपम्।
वेदव्रतेषु बहुधा गीतमीश-
मभित्रिविष्टपं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४७ ॥
जिन्हें कोई प्रबलसे भी प्रबल शत्रु उखाड़ नहीं सकता, जो यज्ञका सम्पादन करनेवाले तथा यजमानोंके आदि, मध्य और अन्त हैं, प्रकृतिकी साम्यावस्था जिनका स्वरूप है, वेदोक्त व्रतों ( यज्ञों ) में अनेकानेक देवताओंके रूपमें जिनका गान किया गया है तथा जो भूतलसे लेकर स्वर्गंतक तीनों लोकोंके ईश्वर हैं, उन भगवान् रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४७ ॥
महाजिनं व्रतिनं मेखलालं
सुतोषणं क्रोधधवं विपापम्।
भूतं क्षेत्रज्ञं गुणिनं वा कपर्दिनं
नतोऽस्मीशं वन्द्यनं वन्दनानाम् ॥ ४८ ॥
जो महान् गजचर्म धारण करनेवाले, उत्तम व्रतधारी, मेखलासे अलंकृत, अनायास ही संतुष्ट होनेवाले, क्रोधके स्वामी, पाप-तापसे रहित, नित्य सिद्ध, क्षेत्रज्ञ, गुणवान्, जटाजूटधारी तथा वन्दनीयोंके भी वन्दनीय हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४८ ॥
देवं देवानां पावनं पावनानां
कृतिं कृतीनां महतो महान्तम्।
शतात्मानं संस्तुतं गोपतीनां
पतिं देवं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४९ ॥
जो देवताओंके भी देवता, पावनोंके भी पावन, कृतियोंकी भी कृति, यज्ञोंके भी यज्ञ—अर्थात् यजनीयोंके भी यजनीय हैं, जो महान्से भी महान्, शान्तस्वरूप तथा इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवताओंके लिये भी स्तवनीय हैं, उन सबके पालक रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
अन्तश्चरं पुरुषं गुह्यसंज्ञं
प्रभासन्तं प्रण, विप्रदीपम्।
हेतुं परं परमस्याक्षरस्य
शुभं देवं गुणिनं संनतोऽस्मि ॥ ५० ॥
जो सबके अन्तःकरणमें विचरनेवाले अन्तर्यामी पुरुष, जिन्हें गुह्य कहा गया है, जो दूसरे प्रकाशसे रहित स्वयं प्रकाशरूप हैं, प्रणव ( ॐकार ) जिनका नाम है, जो परम अक्षर ( जीव ) के भी परम कारण हैं, उन मङ्गलकारी गुणवान् देवता भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥५०॥
विष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ५०३
प्रसूतिरुभयोर्न प्रसूतश्च सूक्ष्मः
पृथग्भूतेभ्यो न पृथक्चैकभूतः ।
स्वयं भूतः पातु मां सर्वसादः
प्रदः स्वादः सम्मदः पातु रत्नम् ॥ ५१ ॥
जो जगत् और जीव दोनोंकी योनि हैं, फिर भी समस्त कारणोंसे अतीत होनेके कारण जो उनकी योनि नहीं हैं, अतएव सूक्ष्म (कठिनतासे समझमें आनेवाले) हैं; सम्पूर्ण भूतोंसे पृथक् हैं और उन सबसे एकभूत अभिन्न होनेके कारण पृथक् नहीं भी हैं, जो स्वयं ही समस्त जगत्के रूपमें प्रकट हुए हैं और सबके लयस्थान भी हैं तथा जो उत्तम दाता, स्वाद (रुचि), हर्ष तथा रमणीय रत्नरूप हैं, वे भगवान् शंकर मेरी रक्षा करें ॥ ५१ ॥
आसन्नः संनतरः साधनानां
श्रद्धावतां भाववृत्तिप्रणेता ।
पतिर्गणानां महतां सत्कृतीनां
पायान्मेषः पूरणः षड्गुणानाम् ॥ ५२ ॥
जो अन्तर्यामी होनेके कारण सबके निकट हैं तथा साधनशील पुरुषोंके लिये संनतर—अनावृत अर्थात् अपरोक्ष हैं, श्रद्धालु मनुष्योंको उनकी श्रद्धाके अनुरूप वृत्ति (ज्ञान एवं भक्ति) प्रदान करनेवाले हैं तथा जो महान् पुण्यात्मा प्रमथगणोंके अधिपति और अभीष्ट मनोरथों एवं सर्वज्ञता आदि छः गुणोंकी पूर्ति करनेवाले हैं, वे भगवान् शिव मेरी रक्षा करें ॥ ५२ ॥
अन्तर्बहिर्वृजिनानां निहन्ता
स्वयं कर्ता भूतभावी विकुर्वन् ।
धृतायुधः सुकृतिनामुत्तमौजाः
प्रणुद्यान्मे वृजिनं देवदेवः ॥ ५३ ॥
जो बाहर-भीतरके पाप-तापोंका नाश करनेवाले तथा स्वयं ही जगत्के कर्ता (निमित्त कारण) हैं, पञ्च भूतोंके आकारमें अपने-आपको प्रकट करना जिनका स्वभाव है अर्थात् जो स्वयं ही जगत्का उपादान कारण बनते हैं और आयुध धारण करके क्रोधादि विकारोंको प्रकट करते हैं, जिनका ओज (बल-पराक्रम) सबसे उत्तम है तथा जो देवताओंके भी देवता हैं, वे परमेश्वर शिव पुण्यात्मा पुरुषोंका तथा मेरा भी पाप-ताप दूर करें ॥ ५३ ॥
येनोद्धतास्त्रैः पुरा मायिनो वै
दग्धा घोरेण वितथान्ताः शरेण ।
महत्कुर्वन्तो वृजिनं देवतानां
ज्यायानीशः पातु विश्वोद्घाता ॥ ५४ ॥
काँटोंकी भाँति उखाड़ फेंका था, अपने भयानक बाणसे उनके तीनों पुरोंको जलाकर उन्हें भी भस्म कर दिया और इस प्रकार शस्त्रोंद्वारा न मारे जानेके कारण उन असुरोंकी मृत्यु व्यर्थ हो गयी थी—यह सब जिनके प्रभावसे सम्भव हुआ तथा जो सबके कारणभूत प्रकृति या प्रधानके भी आश्रय हैं, वे सबसे ज्येष्ठ परमेश्वर शिव मेरी रक्षा करें ॥ ५४ ॥
भागीथसां भागमतोऽन्तमिच्छन्
मखो दाक्षो येन कृत्तोऽन्वधावत् ।
विद्वान् यज्ञस्यादिरथान्तः स देवः
पायादीशो मां दक्षयज्ञान्तहेतुः ॥ ५५ ॥
दक्षके यज्ञमें अधिक भाग ग्रहण करनेवाले देवताओंके भागको जिन्होंने नष्ट करनेकी इच्छा की थी, जिनके द्वारा विच्छिन्न हुआ दक्षका यज्ञ वहीं यज्ञेश्वरकी शरणमें गया था, जो यज्ञके ज्ञाता, आदि और अन्त हैं तथा दक्षयज्ञके विनाशमें हेतु बने हुए हैं, वे सर्वेश्वर महादेवजी मेरी रक्षा करें ॥ ५५ ॥
अन्यो धन्यः संस्कृतश्चोत्तमश्च
जगत् स्रष्टा योऽत्ति सर्वातिगुह्यः।
स मां मुखप्रमुखे पातु नित्यं
विचिन्वानः प्रथमः षड्गुणानाम् ॥ ५६॥
जो ब्रह्मारूपसे जगत्की सृष्टि करके रुद्ररूपसे उसका संहार करते हैं, जो सबकी अपेक्षा अत्यन्त गोपनीय हैं, जड जगत्से भिन्न (विलक्षण) हैं, शम आदि संस्कारोंसे सम्पन्न होनेके कारण धन्य हैं, सबसे उत्तम हैं, जो इन्द्र और अग्निकी प्रधानतावाले यज्ञमें सदा यजमानोंकी पुण्यराशिका संचय करते हैं और ऐश्वर्य आदि छः गुणोंके मुख्य आश्रय हैं, वे परमेश्वर मेरी तथा मेरी संततिकी प्रतिदिन रक्षा करें ॥
गुणत्रैकाल्यं यस्य देवस्य नित्यं
सत्त्वोद्रेको यस्य भावात् प्रसूतः।
गोप्ता गोप्तॄणां सन्मदो दुष्कृतीना-
माद्यो विश्वस्याद्यमानस्य क्रुद्धः ॥ ५७ ॥
जिन परमात्माके गुण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें सदा बने रहते हैं अथवा जिनमें सृष्टि, पालन और संहार कालसम्बन्धी गुण प्रवाहरूपसे नित्य बने रहते हैं; जिनमें सत्त्वगुणकी अधिकता है अर्थात् जो विष्णुरूपसे स्थित हैं, जिनके स्वरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्ण, इन्द्र आदि रक्षकोंके भी रक्षक हैं, जो काल रुद्र बनकर दुराचारियोंको विनाशका कष्ट प्रदान करनेवाले हैं और विश्वके आदिकारण (एवं माता-पिताके समान पालक) होकर भी जो इस जगत्को पीड़ा देनेवाले लोगोंपर कुपित हो उनका विनाश कर डालते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ॥ ५७ ॥
| ५०४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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धाम्नो यस्य हरिरग्र्योऽथ विश्वो
ब्रह्मा पुत्रैः सहितश्च द्विजाग्र्यै ।
पराभूता भवने यस्य सोमो
जुषन्त्वेष श्रेयसे साधुगोप्ता ॥ ५८ ॥
भगवान् विष्णु जिनके तेजःपुञ्जके प्रमुख भाग हैं तथा विश्व (विराट्) रूप ब्रह्मा, साथ ही उनके पुत्र सनकादि और मरीचि आदि अन्य ब्रह्मर्षि जिनसे प्रकट हुए हैं तथापि वे जिनके भवनमें पराभूत होकर प्रवेश नहीं करने पाते हैं, वे सत्पुरुषोंके रक्षक उमासहित महादेवजी हमारा कल्याण करनेके लिये हमपर प्रसन्न हों ॥ ५८ ॥
यस्माद् भूतानां भूतिरन्तोऽथ मध्यं
धृतिर्भूतिर्यंञ्च गुहाश्रुतिश्च ।
गुहाभिभूतस्य पुरुषेश्वरस्य
महात्मनः सम्मृडवेद्यस्य तस्य ॥ ५९ ॥
जिनसे आकाश आदि पाँचों भूतोंकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त होते हैं (वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों)। जो किसीके द्वारा हार्दिक तिरस्कारसे पीड़ित हो एकमात्र सुखदायक भगवान् शिवको ही महान् आश्रय जानकर उनकी शरण लेता है, वह पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं महात्मा है, उसे उन्हीं भगवान् शङ्करसे धृति (धैर्य) और भूति (ऐश्वर्य) आदि अनुग्रहकी उपलब्धि होती है तथा उसे उन्हींसे गुह्य वस्तुका श्रवण (उपदेश) प्राप्त होता है। (अतः संकटके समयमें अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकका कष्ट वे अवश्य दूर करेंगे—ऐसा मेरा विश्वास है) ॥ ५९ ॥
यल्लिङ्गाङ्कं त्र्यम्बकः सर्वमीशो
भगलिङ्गाङ्कं यच्छ्रुमा सर्वधात्री ।
नान्यत् तृतीयं जगतीहास्ति किंचि-
न्महादेवात् सर्वसर्वेश्वरोऽसौ ॥ ६० ॥
संसारमें लिङ्ग (पुरुषत्वसूचक चिह्न) से अङ्कित जो भी शरीर-समुदाय है, वह सब त्रिनेत्रधारी भगवान् शङ्करका स्वरूप है और भग (स्त्रीत्वसूचक) चिह्नसे चिह्नित जो शरीर-समूह है, वह सब सर्वजननी भगवती उमाका प्रतीक है। इस जगत्में इन दोके सिवा तीसरी कोई वस्तु नहीं है। महादेवजी (और उमा) से भिन्न कुछ नहीं है; वे ही सर्वसर्वेश्वर हैं। (वे हमारी रक्षा करें) ॥ ६० ॥
इति संस्तूयमानस्तु भगवान् वृषभध्वजः ।
दर्शयामास धर्मात्मा कश्यपं धर्मभृद्वरम् ॥ ६१ ॥
इस प्रकार जिनकी स्तुति की जा रही थी, उन धर्मात्मा भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महर्षि कश्यपको दर्शन दिया ॥ ६१ ॥
उवाच चैनं देवेशः प्रसन्नेनान्तरात्मना ।
येन संस्तौषि कार्येण त्वं तज्जाने प्रजापते ॥ ६२ ॥
दर्शन देकर देवेश्वर महादेवजीने उनसे प्रसन्न-चित्तसे कहा—'प्रजापते ! तुम जिस कार्यसे मेरी स्तुति कर रहे हो, उसे मैं जानता हूँ ॥ ६२ ॥
इन्द्रोपेन्द्रौ महात्मानौ देवौ प्रकृतिमेष्यतः ।
पारिजातं तु धर्मात्मा नयिष्यति जनार्दनः ॥ ६३ ॥
'इन्द्र और उपेन्द्र दोनों महामनस्वी देवता स्वाभाविक स्थितिमें आ जायेंगे; परंतु धर्मात्मा जनार्दन पारिजात वृक्षको अवश्य ले जायेंगे ॥ ६३ ॥
अपध्यातो महेन्द्रो हि मुनिना देवशर्मणा ।
अस्याकाङ्क्षत् पुरा भार्यां तपोदीप्तस्य कश्यप ॥ ६४ ॥
'कश्यप ! पूर्वकालमें मुनिवर देवशर्माने महेन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन किया था; क्योंकि तपस्यासे उद्दीप्त तेजवाले उन महर्षिकी पत्नीको इन्द्रने प्राप्त करनेकी अभिलाषा की थी। यही उनकी वर्तमान पराजयका कारण है ॥ ६४ ॥
गम्यतां तत्र धर्मज्ञ दाक्षायण्या सह त्वया ।
अदित्या शक्रसदनं श्रेयस्ते पुत्रयोर्ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
'धर्मज्ञ ! तुम दक्षकन्या अदितिके साथ वहाँ इन्द्रभवनमें जाओ। तुम्हारे दोनों पुत्रोंका अवश्य कल्याण होगा' ॥६५॥
इति हरवचनं निशम्य विद्वान्
कमलभवात्मजसूनुरप्रमेयः ।
त्रिदशगणगुरुं प्रणम्य रुद्रं
मुदितमनाः सुमनौकसं जगाम ॥ ६६ ॥
इस प्रकार भगवान् शङ्करका कथन सुनकर ब्रह्मकुमार मरीचिके पुत्र अप्रतिम शक्तिशाली विद्वान् महर्षि कश्यप उन देवगुरु भगवान् रुद्रको प्रणाम करके प्रसन्न-चित्त हो देव-लोकको चले गये ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे कश्यपकृतरुद्रस्तोत्रे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें कश्यपकृत रुद्रस्तोत्रविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
विष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः [ ५०५
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
इन्द्र और श्रीकृष्ण, जयन्त और प्रद्युम्न, प्रवर और सात्यकि तथा ऐरावत और गरुड़का युद्ध
वैशम्पायन उवाच
अथ विष्णुर्महातेजा मुहूर्ताभ्युदिते रवौ।
मृगयान्यपदेशेन ययौ रैवतकं गिरिम्॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर सूर्योदयके बाद दो घड़ी बीत जानेपर महातेजस्वी श्रीकृष्ण हिंसक जन्तुओंका शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये ॥
आरोप्यैकरथे देवः सात्यकिं नरपुङ्गवम्।
प्रद्युम्नमनुगच्छेति प्रोक्त्वा कुरुकुलोद्वह ॥ २ ॥
रैवतं च गिरिं देवो गत्वा दारुकमब्रवीत्।
कुरुकुलभूषण ! भगवान् श्रीकृष्णने एक रथपर नरश्रेष्ठ सात्यकिको चढ़ाकर और प्रद्युम्नको भी अपने पीछे आनेकी आज्ञा देकर जब रैवतक पर्वतपर पहुँचे, तब अपने सारथि दारुकसे बोले—॥ २½ ॥
मदीयं रथमेनं त्वं ग्राहयित्व दारुक ॥ ३ ॥
प्रतिपालय मां सौम्य दिनार्द्धं वारयन् हरीन्।
रथेनैव प्रवेष्टाहं द्वारकां सूतसत्तम ॥ ४ ॥
'सौम्य दारुक ! तुम मेरे इस रथको लेकर यहीं आधे दिनतक इन घोड़ोंको काबूमें रखते हुए मेरी प्रतीक्षा करो। सूतशिरोमणे ! मैं रथके द्वारा ही द्वारकापुरीमें प्रवेश करूँगा'॥
इति संदिश्य भगवानानुरोह जयोद्यतः।
तार्क्ष्यं ससात्यको धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ ५ ॥
दारुकको यह संदेश देकर विजयके लिये उद्यत हुए अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ५ ॥
पृथग् रथेन कौरव्य प्रद्युम्नः शत्रुसूदनः।
आकाशगामिना राजन् पृष्ठतः कृष्णमन्वयात् ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन ! राजन् ! शत्रुसूदन प्रद्युम्न भी एक पृथक् आकाशचारी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गये ॥ ६ ॥
निमेषान्तरमात्रेण नन्दनं काननं हरिः।
देवोद्यानं ययौ धीमान् पारिजातजिहीर्षया ॥ ७ ॥
बुद्धिमान् श्रीकृष्ण पारिजातको हर लेनेकी इच्छासे पलक मारते-मारते देवताओंके उद्यान नन्दनवनमें जा पहुँचे ॥ ७ ॥
ददर्श तत्र भगवान् देवयोधान् दुरासदान्।
नानायुधधरान् वीरान् नन्दनस्थानधोक्षजः ॥ ८ ॥
तेषां सम्पश्यतामेव पारिजातं महाबलः।
उत्पाट्यारोपयामास पारिजातं सतां गतिः ॥ ९ ॥
गरुडं पक्षिराजानमयत्नेनैव भारत।
वहाँ भगवान् अधोक्षजने नन्दनवनमें स्थित हुए देवताओंके दुर्जय वीर योद्धाओंको देखा, जो नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे । भरतनन्दन ! सत्पुरुषोंके आश्रयदाता महाबली श्रीकृष्णने उन योद्धाओंके देखते-देखते विशेष प्रयत्नके बिना ही पारिजातको उखाड़कर पक्षिराज गरुड़की पीठपर रख लिया ॥ ८-९½ ॥
उपस्थितो विग्रहवान् पारिजातः स केशवम् ॥ १० ॥
सान्त्वितो वासुदेवेन पारिजातश्च भारत।
उक्तश्च वृक्ष मा भैस्त्वं केशवेन महात्मना ॥ ११ ॥
पारिजात वृक्ष मूर्तिमान् होकर श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ । भारत ! उस समय वसुदेवनन्दन महात्मा केशवने पारिजातको सान्त्वना देते हुए कहा—'वृक्ष ! तुम डरो मत' ॥ १०-११ ॥
तं प्रस्थितं तरुं दृष्ट्वा पारिजातमधोक्षजः।
अमरावतीं पुरीं श्रेष्ठां ततश्चक्रे प्रदक्षिणाम् ॥ १२ ॥
पारिजात वृक्षको अपने साथ प्रस्थान करते देख भगवान् अधोक्षजने श्रेष्ठ अमरावतीपुरीकी परिक्रमा की ॥ १२ ॥
ते तु नन्दनगोप्तारः पारिजातो द्रुमोत्तमः।
ह्रियतीति महेन्द्राय गत्वा नृप शशंसिरे ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! नन्दनवनके उन रक्षकोंने जाकर महेन्द्रसे कहा—'देवराज ! वृक्षोंमे उत्तम पारिजातका अपहरण हो रहा है' ॥
अथैरावतमारुह्य निर्ययौ पाकशासनः।
जयन्तेन रथस्थेन पृष्ठतोऽनुगतः प्रभुः ॥ १४ ॥
यह सुनकर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हो निकले। उनके पीछे-पीछे रथपर बैठा हुआ जयन्त भी आया ॥ १४ ॥
पूर्वमभ्यागतं द्वारं केशवं शत्रुनाशनम्।
दृष्ट्वोवाच प्रवृत्तं भोः किमिदं मधुसूदन ॥ १५ ॥
जब शत्रुनाशन केशव इन्द्रपुरीके पूर्वद्वारपर आये, तब उन्हें देखकर इन्द्रने कहा—'हे मधुसूदन ! यह तुमने क्या किया है ?' ॥ १५ ॥
प्रणम्य गरुडस्थोऽथ केशवः शक्रमब्रवीत्।
वध्वास्ते पुण्यकार्याय नीयतेऽयं वरद्रुमः ॥ १६ ॥
तब गरुड़पर बैठे हुए केशव इन्द्रको प्रणाम करके बोले—'देवराज ! आपकी बहूरानीके पुण्यकार्यका सम्पादन करनेके लिये यह श्रेष्ठ वृक्ष यहाँसे ले जाया जाता है' ॥ १६ ॥
तमुवाच ततः शक्रो मा मैवं पुष्करेक्षण।
अयोध्यित्वा न तरुर्नयितव्यस्त्वयाच्युत ॥ १७ ॥
तब इन्द्रने उनसे कहा—'कमलनयन अच्युत ! नहीं,
| ५०६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ऐसा नहीं हो सकता। बिना युद्ध किये तुम्हें इस वृक्षको नहीं ले जाना चाहिये ॥ १७ ॥
प्रहरस्व महाबाहो प्रथमं मयि केशव।
प्रतिज्ञा सफला तेऽस्तु मुक्त्वा कौमोदकीं मयि ॥ १८॥
'महाबाहु केशव ! पहले मुझपर प्रहार करो। मेरे ऊपर कौमोदकी गदा छोड़कर तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल हो' ॥ १८ ॥
ततः कृष्णः शरैस्तीक्ष्णैर्देवराजगजोत्तमम् ।
बिभेदाशनिसंकाशैः प्रहसन्निव भारत ॥ १९॥
भरतनन्दन ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से अपने वज्र-सदृश तीखे बाणोंद्वारा देवराजके गजश्रेष्ठ ऐरावतको बींधना आरम्भ किया ॥ १९ ॥
विव्याध गरुडं वज्री दिव्यैः शरवरैस्तथा ।
बाणांश्चिच्छेद सहसा केशवस्य तरस्विनः ॥ २० ॥
फिर वज्रधारी इन्द्रने भी अपने दिव्य उत्तम बाणोंद्वारा गरुड़को घायल किया और वेगशाली केशवके बाणोंको सहसा काट डाला ॥ २० ॥
यान् यान् मुमोच देवेन्द्रस्तांस्तांश्चिच्छेद माधवः ।
माधवेन प्रयुक्तांश्च विच्छेद बलवृत्रहा ॥ २१ ॥
देवेन्द्रने जो-जो बाण छोड़े, उन्हें माधवने काट दिया और माधवके चलाये हुए बाणोंको बल-वृत्रविनाशक इन्द्रने खण्डित कर दिया ॥ २१ ॥
महेन्द्रस्य च शब्देन धनुषः कुरुनन्दन ।
शार्ङ्गस्य च निनादेन मुमुहुः खर्गवासिनः ॥ २२॥
कुरुनन्दन ! इन्द्रधनुष तथा शार्ङ्गधनुषकी टङ्कारोंसे सारे स्वर्गवासी मोहित-से हो गये ॥ २२ ॥
तयोर्वर्तति संग्रामे गरुडस्थं महाबलः ।
पारिजातं जयन्तोऽथ हर्तुमभ्युद्यतो बली ॥ २३ ॥
जब उन दोनोंका संग्राम चल रहा था, उसी समय महापराक्रमी एवं बलशाली जयन्त गरुड़की पीठपर रखे हुए पारिजातको हर ले जानेके लिये उद्यत हुआ ॥ २३ ॥
प्रद्युम्नमथ कंसघ्नो वारयेति तदाब्रवीत् ।
ततस्तं वारयामास रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ २४ ॥
तब कंसविनाशन श्रीकृष्णने प्रद्युम्नसे कहा—'रोको उसे।' आज्ञा पाकर प्रतापी रुक्मिणीकुमारने जयन्तको रोक दिया ॥
जयन्तो जयतां श्रेष्ठो रौक्मिणेयमथेषुभिः ।
सर्वगात्रेषु विहसन्नाजघान रथे स्थितः ॥ २५ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जयन्त उस समय रथपर बैठा था। उसने हँसते हुए बाण मारकर प्रद्युम्नके समस्त अङ्गोंमें चोट पहुँचायी ॥ २५ ॥
रथस्थ एव रथिनं कामस्तु कमलेक्षणः ।
ऐन्द्रिमभ्यर्दयामास बाणैराशीविषोपमैः ॥ २६ ॥
कामावतार कमलनयन प्रद्युम्न भी रथपर ही बैठे थे। उन्होंने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा रथारूढ़ इन्द्रकुमार जयन्तको पीड़ित कर दिया ॥ २६ ॥
स संनिपातस्तुमुलो बभूव कुरुनन्दन ।
जयन्तस्य च वीरस्य रौक्मिणेयस्य चोभयोः ॥ २७॥
कुरुनन्दन ! जयन्त तथा वीर रुक्मिणीकुमार उन दोनोंका वह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ ॥ २७ ॥
कृतप्रतिकृतं युद्धे चक्रतुस्तौ महाबलौ ।
महेन्द्रोपेन्द्रतनयौ जगत्क्षत्रभृतां वरौ ॥ २८ ॥
एक महेन्द्रका बेटा था तो दूसरा उपेन्द्रका। दोनों ही संसारके अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं महान् बलशाली थे। अतः दोनों एक-दूसरेके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण कर देते थे। २८।
देवाश्च मुनयश्चैव ददृशुर्विस्मयान्विताः ।
तं संग्रामं महाघोरं सिद्धाश्चैव सचारणाः ॥ २९ ॥
देवता, मुनि, सिद्ध और चारण सभी आश्चर्यचकित होकर उस महाभयंकर संग्रामको देखने लगे ॥ २९ ॥
ततस्तु प्रवरो नाम देवदूतो महाबलः ।
पारिजातं पुनर्हर्तुमियेष कुरुनन्दन ॥ ३० ॥
कुरुनन्दन ! तब प्रवर नामक महाबली देवदूतने पुनः पारिजात वृक्षको हर ले जानेकी इच्छा की ॥ ३० ॥
सखा स देवराजस्य महास्त्रविदरिंदमः ।
अवध्यो वरदानेन ब्रह्मणः कुरुनन्दन ॥ ३१ ॥
कुरुकुलनन्दन ! शत्रुओंका दमन करनेवाला प्रवर महान् अस्त्रवेत्ता तथा देवराज इन्द्रका सखा था। वह ब्रह्माजीके वरदानसे अवध्य हो गया था ॥ ३१ ॥
ब्राह्मणस्तपसा सिद्धो जम्बूद्वीपाद् दिवं गतः ।
स्वशक्त्या नृप संप्राप्तः सखित्वं बलघातिना ॥ ३२ ॥
नरेश्वर ! वह तपःसिद्ध ब्राह्मण जम्बूद्वीपसे स्वर्गमें गया था और अपनी शक्तिके प्रभावसे बलघाती इन्द्रका मित्र हो गया था ॥ ३२ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कृष्णः सात्यकिमब्रवीत् ।
अत्रस्थ एव प्रवरं शरैर्वारय सात्यके ॥ ३३ ॥
उसे आते देख श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'सात्यके ! तुम यहीं बैठे-बैठे अपने बाणोंद्वारा इस प्रवरको रोको ॥ ३३॥
न त्वत्र निर्दयं बाणा मोक्तव्याः सात्यके त्वया ।
अस्य ब्राह्मणचापल्यं सोढव्यं खलु सर्वथा ॥ ३४ ॥
'सात्यके ! तुम्हें इसके ऊपर निर्दयतापूर्वक बाण नहीं छोड़ने चाहिये। इस ब्राह्मणकी चपलताको सर्वथा सह लेना ही उचित है' ॥ ३४ ॥
| विष्णुपर्व ] | त्रिसप्ततितमोऽध्यायः | ५०७ |
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ततः षष्ट्या रथेष्षूणां गरुडस्थं द्विजस्तदा ।
आजघान महाबाहो सात्यकिं प्रवरो भृशम् ॥ ३५ ॥
महाबाहो ! तदनन्तर प्रवर नामक ब्राह्मणने साठ बाणोंद्वारा गरुड़पर बैठे हुए सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३५ ॥
शिनेर्नप्ता धनुस्तस्य क्षिपतः सायकान् नृप ।
चिच्छेद पुरुषव्याघ्रो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३६ ॥
नरेश्वर ! तब पुरुषसिंह शिनि-पौत्र सात्यकिने बाण चलाते हुए ब्राह्मणके धनुष और बाणोंको भी काट डाला और इस प्रकार कहा—॥ ३६ ॥
ब्राह्मणो नाभिहन्तव्यस्तिष्ठ तिष्ठ स्ववर्त्मनि ।
अवध्या यादवानां हि स्वापराधेऽपि हि द्विजाः ॥ ३७ ॥
'प्रवर ! ब्राह्मण मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं है; अतः तुम अपने मार्गपर डटे रहो, डटे रहो। अपना अपराध करनेपर भी ब्राह्मणोंको यदुवंशी वीर अवध्य ही मानते हैं' ॥ ३७॥
प्रवरस्तु प्रहस्यैनमुवाच कुरुनन्दन ।
अलं क्षान्त्या नृणां शूर युध्यस्व सर्वात्मना रणे ॥ ३८ ॥
कुरुनन्दन ! तब प्रवरने हँसकर सात्यकिसे कहा— 'मनुष्योंमें शूर सात्यके ! क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम रणभूमिमें सारी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥ ३८ ॥
जामदग्न्यस्य रामस्य शिष्योऽहमपि यादव ।
नामतः प्रवरो नाम सखा शक्रस्य धीमतः ॥ ३९ ॥
'यादववीर ! मैं भी जमदग्निनन्दन परशुरामका शिष्य हूँ। मेरा नाम प्रवर है और मैं बुद्धिमान् इन्द्रका सखा हूँ ॥ ३९ ॥
न देवा योद्धुमिच्छन्ति मन्यन्तो मधुसूदनम् ।
आनृण्यं सौहृदस्याहमधिगन्तास्मि माधव ॥ ४० ॥
'मधुवंशी वीर ! देवतालोग मधुसूदनका सम्मान करते हैं; अतः उनसे युद्ध करना नहीं चाहते हैं; इसलिये मैं आज इन्द्रके सौहार्दका ऋण चुकानेके लिये आया हूँ' ॥ ४० ॥
ततस्तयोस्तदा रौद्रः संग्रामो ववृधे नृप ।
अस्त्रैर्दिव्यैर्नरव्याघ्र शैनेयद्विजमुख्ययोः ॥ ४१ ॥
नरेश्वर ! पुरुषसिंह ! तदनन्तर सात्यकि और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणमें उस समय दिव्य अस्त्रोंद्वारा बड़ा भयंकर संग्राम हुआ, जो बढ़ता ही चला गया ॥ ४१ ॥
द्यौश्चचाल तदा राजन् द्युचराश्च सहस्रशः ।
तस्मिन् वर्तति संग्रामे तेषामतिमहात्मनाम् ॥ ४२ ॥
राजन् ! उन अत्यन्त महात्मा वीरोंका वह संग्राम चालू होनेपर उस समय स्वर्गलोक विचलित हो उठा। सहस्रों आकाशचारी प्राणी कम्पित हो उठे ॥ ४२ ॥
नातिशिष्ये रणे कार्ष्णिरेन्द्रिमस्त्रभृतां वरम् ।
ऐन्द्रिः कार्ष्णिं महात्मानं मायिनं शूरसत्तमम् ॥ ४३ ॥
रणभूमिमें श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जयन्तसे आगे न बढ़ सके। इसी प्रकार इन्द्रकुमार जयन्त भी शूरशिरोमणि मायाविशारद श्रीकृष्णकुमार महात्मा प्रद्युम्नसे अधिक पराक्रम न दिखा सका ॥ ४३ ॥
हन्त गृह्ण प्रतीच्छेति तावुभौ योधसत्तमौ ।
युयुधाते नरश्रेष्ठ परस्परजयैषिणौ ॥ ४४ ॥
नरश्रेष्ठ ! परस्पर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले वे दोनों श्रेष्ठ योद्धा 'अरे, यह लो, दो मेरे इस प्रहारका उत्तर' आदि बातें कहते हुए युद्ध करने लगे ॥ ४४ ॥
अथ शार्ङ्गायुधसुतं शचीपुत्रः प्रतापवान् ।
विभाष्याभ्यहनद्राजन् दिव्येनारत्रेण सत्वरः ॥ ४५ ॥
राजन् ! तदनन्तर प्रतापी शचीपुत्र जयन्तने श्रीकृष्णकुमारको सम्बोधित करके उनपर बड़ी उतावलीके साथ दिव्यास्त्रद्वारा आघात किया ॥ ४५ ॥
सोऽस्त्रं तदभिदीप्यन्तमापतन्तं शितैः शरैः ।
तस्तम्भे बाणजालेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४६ ॥
अपनी ओर आते हुए उस तेजस्वी अस्त्रको पैने बाणोंका जाल-सा फैलाकर प्रद्युम्नने बीचमें ही रोक दिया। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ४६ ॥
ततस्तद् दीप्यमानं तु पपात रणमूर्द्धनि ।
रौक्मिणेयस्य कौरव्य घोरं दानवमर्दनम् ॥ ४७ ॥
कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके मुहानेपर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके लिये भी दुःसह प्रतीत होनेवाला, वह दीप्तिमान् दानव-मर्दन दिव्यास्त्र उनके रथपर गिरा ॥ ४७ ॥
तेनास्त्रेण रथो दग्धः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
नादहत् तत् सुघोरं तं रौक्मिणेयं नराधिप ॥ ४८ ॥
नरेश्वर ! उस अस्त्रके द्वारा महात्मा प्रद्युम्नका रथ जलकर भस्म हो गया तो भी वह भयंकर अस्त्र रुक्मिणी-कुमार प्रद्युम्नको दग्ध न कर सका ॥ ४८ ॥
दहत्यग्निं न खल्वग्निरुद्धतोऽपि विशाम्पते ।
दग्धाद् रथान्महाबाहु रौक्मिणेयः प्रचक्रमे ॥ ४९ ॥
प्रजानाथ ! अग्नि कितना ही प्रचण्ड रूप क्यों न धारण करे, वह दूसरी अग्निको नहीं जला सकती (उसी तरह उस अस्त्रकी अग्निसे अग्नितुल्य तेजस्वी रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नके शरीरको कोई हानि नहीं पहुँची)। महाबाहु रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उस जले हुए रथको छोड़कर अलग हो गये ॥ ४९ ॥
अथ नारायणसुतो विरथो रथिनां वरः ।
स्थितो धनुष्मानाकाशे जयन्तमिदमब्रवीत् ॥ ५० ॥
तदनन्तर रथहीन हुए रथियोंमें श्रेष्ठ नारायणकुमार
| ५०८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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प्रद्युम्न आकाशमें धनुष लिये खड़े हो गये और जयन्तसे इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥
महेन्द्रपुत्र दिव्यं त्वं यदस्त्रं मुक्तवानसि ।
नाहमीदृक्शरूपाणां शक्यो हन्तुं शतैरपि ॥ ५१ ॥
'महेन्द्रकुमार ! तुमने मेरे ऊपर जो दिव्यास्त्र छोड़ा है, ऐसे सैकड़ों दिव्यास्त्र मुझे मार नहीं सकते हैं ॥ ५१ ॥
प्रयत्नं कुरु शिक्षणां यत्नं मेऽद्य प्रदर्शय ।
नास्ति मेऽतिशयं कर्ता संग्रामेऽमरनन्दन ॥ ५२ ॥
'अमरनन्दन ! तुम अपनी शिक्षाके अनुसार प्रयत्न करो और सारा यत्न आज मुझे दिखाओ । संग्राममें मुझसे बढ़कर पराक्रम प्रकट करनेवाला कोई वीर नहीं है ॥ ५२ ॥
आसीन्मे साध्वसं दृष्ट्वा रथस्थं त्वां धृतायुधम् ।
विभेमि तव नेदानीं युद्धे दृष्टबलोऽस्यलम् ॥ ५३ ॥
'तुम रथपर बैठकर हाथमें आयुध लिये जब यहाँ आये थे, तब तुम्हें देखकर मुझे कुछ भय हुआ था; परंतु अब युद्धमें तुम्हारा सारा बल मैंने देख लिया है। तुममें बहुत थोड़ा बल है, अतः इस समय मैं तुमसे भय नहीं मानता हूँ ॥ ५३ ॥
मनसा स्मर्यतां सैष पारिजातस्त्वया तरुः ।
शक्यं न खलु हस्ताभ्यां स्प्रष्टव्यो यस्त्वया ह्यसौ ॥ ५४॥
'तुम इस पारिजात वृक्षका केवल मनसे स्मरण कर लो; क्योंकि इस समय दोनों हाथोंसे इसका स्पर्श करना तुम्हारे लिये निश्चय ही असम्भव है ॥ ५४ ॥
रथो मायामयो दग्धस्त्वया यो ह्यस्त्रतेजसा ।
ईदृशानां सहस्राणि स्रष्टुं शक्तोऽस्मि मायया ॥ ५५ ॥
'तुमने अपने अस्त्रके तेजसे मेरे जिस मायामय रथको जलाया है, ऐसे हजारों रथ मैं मायाद्वारा बना सकता हूँ' ॥
एवमुक्तो जयन्तश्च सुमोचास्त्रं महाबलः ।
तपसोपचितं तेन स्वयमेवातितेजसा ॥ ५६ ॥
प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर महाबली जयन्तने स्वयं ही अत्यन्त तेजस्वी तपसे पुष्ट हुए महान् अस्त्रको उनपर चलाया ॥
तत् प्रद्युम्नो महावेगं शरजालैरवारयत् ।
चत्वार्यस्त्राणि दिव्यानि मुमुचे चापराणि सः ॥ ५७ ॥
उस महान् वेगशाली अस्त्रको प्रद्युम्नने अपने बाण-समूहोंसे रोक दिया, तब जयन्तने चार दिव्यास्त्र और छोड़े ॥
दिक्षु सर्वासु रुन्धुस्तान्यस्त्राण्यथ भारत ।
रौक्मिणेयं महात्मानमन्तरिक्षे च पञ्चमम् ॥ ५८ ॥
भरतनन्दन ! उन अस्त्रोंने महात्मा रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नको सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे घेर लिया तथा पीछे चलाये हुए एक पाँचवें बाणने आकाशमें भी उनकी गति रोक दी ॥ ५८ ॥
महोल्कासदृशान् बाणानस्त्राण्यमरसत्तमः ।
सुमोच यानि घोराणि प्रद्युम्नं प्रति सर्वतः ॥ ५९ ॥
तानि सर्वाणि बाणौघैः कार्ष्णिस्त्राण्यवारयत् ।
जयन्तं चापरैर्बाणैर्विंध्याय निशितैस्तदा ॥ ६० ॥
अमरश्रेष्ठ जयन्तने बड़ी भारी उल्काके समान जो बाण और भयंकर अस्त्र प्रद्युम्नपर सब ओरसे छोड़े थे, उन सबका श्रीकृष्णकुमारने अपने बाणसमूहोंद्वारा निवारण कर दिया तथा दूसरे-दूसरे तीखे बाणोंके द्वारा जयन्तको घायल कर दिया ॥
ततो नादः समुत्सुष्टो ह्यमरैः पुण्यकर्मभिः ।
दृष्ट्वा स्थैर्यं च शौर्यं च प्रद्युम्नस्य महात्मनः ॥ ६१ ॥
उस समय महात्मा प्रद्युम्नकी स्थिरता और फुर्ती देखकर पुण्यकर्मा देवताओँने बड़े जोरसे हर्षध्वनि की ॥ ६१ ॥
प्रवरस्यापि बाणेन शितेन शितिनिपुञ्जवः ।
चिच्छेदेष्वासनं वीरो हस्तावापं च भारत ॥ ६२ ॥
भरतनन्दन ! शिनिवंशविभूषण वीर सात्यकिने एक पैने बाणसे प्रवरके भी धनुष और दस्तानेको काट दिया ॥ ६२ ॥
ततोऽन्यत् स तु जग्राह महत् तद्धनुरुत्तमम् ।
महेन्द्रदत्तं प्रवरो महाशनिसमस्वनम् ॥ ६३ ॥
तब प्रवरने महान् वज्रके समान टङ्कार ध्वनि करनेवाले एक दूसरे विशाल एवं उत्तम धनुषको हाथमें लिया, जिसे इन्द्रने दे रक्खा था ॥ ६३ ॥
स तेन वीरो महता धनुषा विप्रसत्तमः ।
शरान् सुमोच विविधानर्करश्मिनिभांस्तदा ॥ ६४ ॥
उस वीर ब्राह्मणशिरोमणिने उस विशाल धनुषके द्वारा उस समय ऐसे-ऐसे नाना प्रकारके बाण छोड़े, जो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी थे ॥ ६४ ॥
चकर्त च धनुश्चित्रं शैनेयस्यामितौजसः ।
विव्याध सर्वाङ्गेषु बाणैरपि च सात्यकिम् ॥ ६५ ॥
उसने अमित तेजस्वी सात्यकिके विचित्र धनुषको काट डाला और उनके सारे अङ्गोंमें बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥
धनुरादाय शैनेयस्ततोऽन्यद् कुरुनन्दन ।
दृढं भारसहं धीमान् विव्याध प्रवरं रणे ॥ ६६ ॥
कुरुनन्दन ! तब बुद्धिमान् सात्यकिने दूसरा भार सहन करनेमें समर्थ सुदृढ़ धनुष हाथमें लेकर रणभूमिमें प्रवरको बींधना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥
उच्चकर्ततुरन्योन्यवर्मणी तौ शितैः शरैः ।
गात्रेभ्यश्चैव मांसानि मर्मभिद्भिः शरोत्तमैः ॥ ६७ ॥
उन दोनोंने तीखे बाणोंद्वारा परस्परके कवच काट डाले तथा मर्मभेदी उत्तम बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक वे एक दूसरेके शरीरोंसे मांस काटने लगे ॥ ६७ ॥