विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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धाम्नो यस्य हरिरग्र्योऽथ विश्वो
ब्रह्मा पुत्रैः सहितश्च द्विजाग्र्यै ।
पराभूता भवने यस्य सोमो
जुषन्त्वेष श्रेयसे साधुगोप्ता ॥ ५८ ॥
भगवान् विष्णु जिनके तेजःपुञ्जके प्रमुख भाग हैं तथा विश्व (विराट्) रूप ब्रह्मा, साथ ही उनके पुत्र सनकादि और मरीचि आदि अन्य ब्रह्मर्षि जिनसे प्रकट हुए हैं तथापि वे जिनके भवनमें पराभूत होकर प्रवेश नहीं करने पाते हैं, वे सत्पुरुषोंके रक्षक उमासहित महादेवजी हमारा कल्याण करनेके लिये हमपर प्रसन्न हों ॥ ५८ ॥
यस्माद् भूतानां भूतिरन्तोऽथ मध्यं
धृतिर्भूतिर्यंञ्च गुहाश्रुतिश्च ।
गुहाभिभूतस्य पुरुषेश्वरस्य
महात्मनः सम्मृडवेद्यस्य तस्य ॥ ५९ ॥
जिनसे आकाश आदि पाँचों भूतोंकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त होते हैं (वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों)। जो किसीके द्वारा हार्दिक तिरस्कारसे पीड़ित हो एकमात्र सुखदायक भगवान् शिवको ही महान् आश्रय जानकर उनकी शरण लेता है, वह पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं महात्मा है, उसे उन्हीं भगवान् शङ्करसे धृति (धैर्य) और भूति (ऐश्वर्य) आदि अनुग्रहकी उपलब्धि होती है तथा उसे उन्हींसे गुह्य वस्तुका श्रवण (उपदेश) प्राप्त होता है। (अतः संकटके समयमें अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकका कष्ट वे अवश्य दूर करेंगे—ऐसा मेरा विश्वास है) ॥ ५९ ॥
यल्लिङ्गाङ्कं त्र्यम्बकः सर्वमीशो
भगलिङ्गाङ्कं यच्छ्रुमा सर्वधात्री ।
नान्यत् तृतीयं जगतीहास्ति किंचि-
न्महादेवात् सर्वसर्वेश्वरोऽसौ ॥ ६० ॥
संसारमें लिङ्ग (पुरुषत्वसूचक चिह्न) से अङ्कित जो भी शरीर-समुदाय है, वह सब त्रिनेत्रधारी भगवान् शङ्करका स्वरूप है और भग (स्त्रीत्वसूचक) चिह्नसे चिह्नित जो शरीर-समूह है, वह सब सर्वजननी भगवती उमाका प्रतीक है। इस जगत्में इन दोके सिवा तीसरी कोई वस्तु नहीं है। महादेवजी (और उमा) से भिन्न कुछ नहीं है; वे ही सर्वसर्वेश्वर हैं। (वे हमारी रक्षा करें) ॥ ६० ॥
इति संस्तूयमानस्तु भगवान् वृषभध्वजः ।
दर्शयामास धर्मात्मा कश्यपं धर्मभृद्वरम् ॥ ६१ ॥
इस प्रकार जिनकी स्तुति की जा रही थी, उन धर्मात्मा भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महर्षि कश्यपको दर्शन दिया ॥ ६१ ॥
उवाच चैनं देवेशः प्रसन्नेनान्तरात्मना ।
येन संस्तौषि कार्येण त्वं तज्जाने प्रजापते ॥ ६२ ॥
दर्शन देकर देवेश्वर महादेवजीने उनसे प्रसन्न-चित्तसे कहा—'प्रजापते ! तुम जिस कार्यसे मेरी स्तुति कर रहे हो, उसे मैं जानता हूँ ॥ ६२ ॥
इन्द्रोपेन्द्रौ महात्मानौ देवौ प्रकृतिमेष्यतः ।
पारिजातं तु धर्मात्मा नयिष्यति जनार्दनः ॥ ६३ ॥
'इन्द्र और उपेन्द्र दोनों महामनस्वी देवता स्वाभाविक स्थितिमें आ जायेंगे; परंतु धर्मात्मा जनार्दन पारिजात वृक्षको अवश्य ले जायेंगे ॥ ६३ ॥
अपध्यातो महेन्द्रो हि मुनिना देवशर्मणा ।
अस्याकाङ्क्षत् पुरा भार्यां तपोदीप्तस्य कश्यप ॥ ६४ ॥
'कश्यप ! पूर्वकालमें मुनिवर देवशर्माने महेन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन किया था; क्योंकि तपस्यासे उद्दीप्त तेजवाले उन महर्षिकी पत्नीको इन्द्रने प्राप्त करनेकी अभिलाषा की थी। यही उनकी वर्तमान पराजयका कारण है ॥ ६४ ॥
गम्यतां तत्र धर्मज्ञ दाक्षायण्या सह त्वया ।
अदित्या शक्रसदनं श्रेयस्ते पुत्रयोर्ध्रुवम् ॥ ६५ ॥
'धर्मज्ञ ! तुम दक्षकन्या अदितिके साथ वहाँ इन्द्रभवनमें जाओ। तुम्हारे दोनों पुत्रोंका अवश्य कल्याण होगा' ॥६५॥
इति हरवचनं निशम्य विद्वान्
कमलभवात्मजसूनुरप्रमेयः ।
त्रिदशगणगुरुं प्रणम्य रुद्रं
मुदितमनाः सुमनौकसं जगाम ॥ ६६ ॥
इस प्रकार भगवान् शङ्करका कथन सुनकर ब्रह्मकुमार मरीचिके पुत्र अप्रतिम शक्तिशाली विद्वान् महर्षि कश्यप उन देवगुरु भगवान् रुद्रको प्रणाम करके प्रसन्न-चित्त हो देव-लोकको चले गये ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे कश्यपकृतरुद्रस्तोत्रे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें कश्यपकृत रुद्रस्तोत्रविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥