विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः [ ५०५
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
इन्द्र और श्रीकृष्ण, जयन्त और प्रद्युम्न, प्रवर और सात्यकि तथा ऐरावत और गरुड़का युद्ध
वैशम्पायन उवाच
अथ विष्णुर्महातेजा मुहूर्ताभ्युदिते रवौ।
मृगयान्यपदेशेन ययौ रैवतकं गिरिम्॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर सूर्योदयके बाद दो घड़ी बीत जानेपर महातेजस्वी श्रीकृष्ण हिंसक जन्तुओंका शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये ॥
आरोप्यैकरथे देवः सात्यकिं नरपुङ्गवम्।
प्रद्युम्नमनुगच्छेति प्रोक्त्वा कुरुकुलोद्वह ॥ २ ॥
रैवतं च गिरिं देवो गत्वा दारुकमब्रवीत्।
कुरुकुलभूषण ! भगवान् श्रीकृष्णने एक रथपर नरश्रेष्ठ सात्यकिको चढ़ाकर और प्रद्युम्नको भी अपने पीछे आनेकी आज्ञा देकर जब रैवतक पर्वतपर पहुँचे, तब अपने सारथि दारुकसे बोले—॥ २½ ॥
मदीयं रथमेनं त्वं ग्राहयित्व दारुक ॥ ३ ॥
प्रतिपालय मां सौम्य दिनार्द्धं वारयन् हरीन्।
रथेनैव प्रवेष्टाहं द्वारकां सूतसत्तम ॥ ४ ॥
'सौम्य दारुक ! तुम मेरे इस रथको लेकर यहीं आधे दिनतक इन घोड़ोंको काबूमें रखते हुए मेरी प्रतीक्षा करो। सूतशिरोमणे ! मैं रथके द्वारा ही द्वारकापुरीमें प्रवेश करूँगा'॥
इति संदिश्य भगवानानुरोह जयोद्यतः।
तार्क्ष्यं ससात्यको धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ ५ ॥
दारुकको यह संदेश देकर विजयके लिये उद्यत हुए अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ५ ॥
पृथग् रथेन कौरव्य प्रद्युम्नः शत्रुसूदनः।
आकाशगामिना राजन् पृष्ठतः कृष्णमन्वयात् ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन ! राजन् ! शत्रुसूदन प्रद्युम्न भी एक पृथक् आकाशचारी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गये ॥ ६ ॥
निमेषान्तरमात्रेण नन्दनं काननं हरिः।
देवोद्यानं ययौ धीमान् पारिजातजिहीर्षया ॥ ७ ॥
बुद्धिमान् श्रीकृष्ण पारिजातको हर लेनेकी इच्छासे पलक मारते-मारते देवताओंके उद्यान नन्दनवनमें जा पहुँचे ॥ ७ ॥
ददर्श तत्र भगवान् देवयोधान् दुरासदान्।
नानायुधधरान् वीरान् नन्दनस्थानधोक्षजः ॥ ८ ॥
तेषां सम्पश्यतामेव पारिजातं महाबलः।
उत्पाट्यारोपयामास पारिजातं सतां गतिः ॥ ९ ॥
गरुडं पक्षिराजानमयत्नेनैव भारत।
वहाँ भगवान् अधोक्षजने नन्दनवनमें स्थित हुए देवताओंके दुर्जय वीर योद्धाओंको देखा, जो नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे । भरतनन्दन ! सत्पुरुषोंके आश्रयदाता महाबली श्रीकृष्णने उन योद्धाओंके देखते-देखते विशेष प्रयत्नके बिना ही पारिजातको उखाड़कर पक्षिराज गरुड़की पीठपर रख लिया ॥ ८-९½ ॥
उपस्थितो विग्रहवान् पारिजातः स केशवम् ॥ १० ॥
सान्त्वितो वासुदेवेन पारिजातश्च भारत।
उक्तश्च वृक्ष मा भैस्त्वं केशवेन महात्मना ॥ ११ ॥
पारिजात वृक्ष मूर्तिमान् होकर श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ । भारत ! उस समय वसुदेवनन्दन महात्मा केशवने पारिजातको सान्त्वना देते हुए कहा—'वृक्ष ! तुम डरो मत' ॥ १०-११ ॥
तं प्रस्थितं तरुं दृष्ट्वा पारिजातमधोक्षजः।
अमरावतीं पुरीं श्रेष्ठां ततश्चक्रे प्रदक्षिणाम् ॥ १२ ॥
पारिजात वृक्षको अपने साथ प्रस्थान करते देख भगवान् अधोक्षजने श्रेष्ठ अमरावतीपुरीकी परिक्रमा की ॥ १२ ॥
ते तु नन्दनगोप्तारः पारिजातो द्रुमोत्तमः।
ह्रियतीति महेन्द्राय गत्वा नृप शशंसिरे ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! नन्दनवनके उन रक्षकोंने जाकर महेन्द्रसे कहा—'देवराज ! वृक्षोंमे उत्तम पारिजातका अपहरण हो रहा है' ॥
अथैरावतमारुह्य निर्ययौ पाकशासनः।
जयन्तेन रथस्थेन पृष्ठतोऽनुगतः प्रभुः ॥ १४ ॥
यह सुनकर प्रभावशाली पाकशासन इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ हो निकले। उनके पीछे-पीछे रथपर बैठा हुआ जयन्त भी आया ॥ १४ ॥
पूर्वमभ्यागतं द्वारं केशवं शत्रुनाशनम्।
दृष्ट्वोवाच प्रवृत्तं भोः किमिदं मधुसूदन ॥ १५ ॥
जब शत्रुनाशन केशव इन्द्रपुरीके पूर्वद्वारपर आये, तब उन्हें देखकर इन्द्रने कहा—'हे मधुसूदन ! यह तुमने क्या किया है ?' ॥ १५ ॥
प्रणम्य गरुडस्थोऽथ केशवः शक्रमब्रवीत्।
वध्वास्ते पुण्यकार्याय नीयतेऽयं वरद्रुमः ॥ १६ ॥
तब गरुड़पर बैठे हुए केशव इन्द्रको प्रणाम करके बोले—'देवराज ! आपकी बहूरानीके पुण्यकार्यका सम्पादन करनेके लिये यह श्रेष्ठ वृक्ष यहाँसे ले जाया जाता है' ॥ १६ ॥
तमुवाच ततः शक्रो मा मैवं पुष्करेक्षण।
अयोध्यित्वा न तरुर्नयितव्यस्त्वयाच्युत ॥ १७ ॥
तब इन्द्रने उनसे कहा—'कमलनयन अच्युत ! नहीं,