भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 527
५०६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ऐसा नहीं हो सकता। बिना युद्ध किये तुम्हें इस वृक्षको नहीं ले जाना चाहिये ॥ १७ ॥

प्रहरस्व महाबाहो प्रथमं मयि केशव।
प्रतिज्ञा सफला तेऽस्तु मुक्त्वा कौमोदकीं मयि ॥ १८॥

'महाबाहु केशव ! पहले मुझपर प्रहार करो। मेरे ऊपर कौमोदकी गदा छोड़कर तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल हो' ॥ १८ ॥

ततः कृष्णः शरैस्तीक्ष्णैर्देवराजगजोत्तमम् ।
बिभेदाशनिसंकाशैः प्रहसन्निव भारत ॥ १९॥

भरतनन्दन ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से अपने वज्र-सदृश तीखे बाणोंद्वारा देवराजके गजश्रेष्ठ ऐरावतको बींधना आरम्भ किया ॥ १९ ॥

विव्याध गरुडं वज्री दिव्यैः शरवरैस्तथा ।
बाणांश्चिच्छेद सहसा केशवस्य तरस्विनः ॥ २० ॥

फिर वज्रधारी इन्द्रने भी अपने दिव्य उत्तम बाणोंद्वारा गरुड़को घायल किया और वेगशाली केशवके बाणोंको सहसा काट डाला ॥ २० ॥

यान् यान् मुमोच देवेन्द्रस्तांस्तांश्चिच्छेद माधवः ।
माधवेन प्रयुक्तांश्च विच्छेद बलवृत्रहा ॥ २१ ॥

देवेन्द्रने जो-जो बाण छोड़े, उन्हें माधवने काट दिया और माधवके चलाये हुए बाणोंको बल-वृत्रविनाशक इन्द्रने खण्डित कर दिया ॥ २१ ॥

महेन्द्रस्य च शब्देन धनुषः कुरुनन्दन ।
शार्ङ्गस्य च निनादेन मुमुहुः खर्गवासिनः ॥ २२॥

कुरुनन्दन ! इन्द्रधनुष तथा शार्ङ्गधनुषकी टङ्कारोंसे सारे स्वर्गवासी मोहित-से हो गये ॥ २२ ॥

तयोर्वर्तति संग्रामे गरुडस्थं महाबलः ।
पारिजातं जयन्तोऽथ हर्तुमभ्युद्यतो बली ॥ २३ ॥

जब उन दोनोंका संग्राम चल रहा था, उसी समय महापराक्रमी एवं बलशाली जयन्त गरुड़की पीठपर रखे हुए पारिजातको हर ले जानेके लिये उद्यत हुआ ॥ २३ ॥

प्रद्युम्नमथ कंसघ्नो वारयेति तदाब्रवीत् ।
ततस्तं वारयामास रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ २४ ॥

तब कंसविनाशन श्रीकृष्णने प्रद्युम्नसे कहा—'रोको उसे।' आज्ञा पाकर प्रतापी रुक्मिणीकुमारने जयन्तको रोक दिया ॥

जयन्तो जयतां श्रेष्ठो रौक्मिणेयमथेषुभिः ।
सर्वगात्रेषु विहसन्नाजघान रथे स्थितः ॥ २५ ॥

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जयन्त उस समय रथपर बैठा था। उसने हँसते हुए बाण मारकर प्रद्युम्नके समस्त अङ्गोंमें चोट पहुँचायी ॥ २५ ॥

रथस्थ एव रथिनं कामस्तु कमलेक्षणः ।
ऐन्द्रिमभ्यर्दयामास बाणैराशीविषोपमैः ॥ २६ ॥

कामावतार कमलनयन प्रद्युम्न भी रथपर ही बैठे थे। उन्होंने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा रथारूढ़ इन्द्रकुमार जयन्तको पीड़ित कर दिया ॥ २६ ॥

स संनिपातस्तुमुलो बभूव कुरुनन्दन ।
जयन्तस्य च वीरस्य रौक्मिणेयस्य चोभयोः ॥ २७॥

कुरुनन्दन ! जयन्त तथा वीर रुक्मिणीकुमार उन दोनोंका वह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ ॥ २७ ॥

कृतप्रतिकृतं युद्धे चक्रतुस्तौ महाबलौ ।
महेन्द्रोपेन्द्रतनयौ जगत्क्षत्रभृतां वरौ ॥ २८ ॥

एक महेन्द्रका बेटा था तो दूसरा उपेन्द्रका। दोनों ही संसारके अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं महान् बलशाली थे। अतः दोनों एक-दूसरेके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण कर देते थे। २८।

देवाश्च मुनयश्चैव ददृशुर्विस्मयान्विताः ।
तं संग्रामं महाघोरं सिद्धाश्चैव सचारणाः ॥ २९ ॥

देवता, मुनि, सिद्ध और चारण सभी आश्चर्यचकित होकर उस महाभयंकर संग्रामको देखने लगे ॥ २९ ॥

ततस्तु प्रवरो नाम देवदूतो महाबलः ।
पारिजातं पुनर्हर्तुमियेष कुरुनन्दन ॥ ३० ॥

कुरुनन्दन ! तब प्रवर नामक महाबली देवदूतने पुनः पारिजात वृक्षको हर ले जानेकी इच्छा की ॥ ३० ॥

सखा स देवराजस्य महास्त्रविदरिंदमः ।
अवध्यो वरदानेन ब्रह्मणः कुरुनन्दन ॥ ३१ ॥

कुरुकुलनन्दन ! शत्रुओंका दमन करनेवाला प्रवर महान् अस्त्रवेत्ता तथा देवराज इन्द्रका सखा था। वह ब्रह्माजीके वरदानसे अवध्य हो गया था ॥ ३१ ॥

ब्राह्मणस्तपसा सिद्धो जम्बूद्वीपाद् दिवं गतः ।
स्वशक्त्या नृप संप्राप्तः सखित्वं बलघातिना ॥ ३२ ॥

नरेश्वर ! वह तपःसिद्ध ब्राह्मण जम्बूद्वीपसे स्वर्गमें गया था और अपनी शक्तिके प्रभावसे बलघाती इन्द्रका मित्र हो गया था ॥ ३२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कृष्णः सात्यकिमब्रवीत् ।
अत्रस्थ एव प्रवरं शरैर्वारय सात्यके ॥ ३३ ॥

उसे आते देख श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'सात्यके ! तुम यहीं बैठे-बैठे अपने बाणोंद्वारा इस प्रवरको रोको ॥ ३३॥

न त्वत्र निर्दयं बाणा मोक्तव्याः सात्यके त्वया ।
अस्य ब्राह्मणचापल्यं सोढव्यं खलु सर्वथा ॥ ३४ ॥

'सात्यके ! तुम्हें इसके ऊपर निर्दयतापूर्वक बाण नहीं छोड़ने चाहिये। इस ब्राह्मणकी चपलताको सर्वथा सह लेना ही उचित है' ॥ ३४ ॥

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 527, कुल 1169 में से · BharatKosha