विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | त्रिसप्ततितमोऽध्यायः | ५०७ |
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ततः षष्ट्या रथेष्षूणां गरुडस्थं द्विजस्तदा ।
आजघान महाबाहो सात्यकिं प्रवरो भृशम् ॥ ३५ ॥
महाबाहो ! तदनन्तर प्रवर नामक ब्राह्मणने साठ बाणोंद्वारा गरुड़पर बैठे हुए सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३५ ॥
शिनेर्नप्ता धनुस्तस्य क्षिपतः सायकान् नृप ।
चिच्छेद पुरुषव्याघ्रो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३६ ॥
नरेश्वर ! तब पुरुषसिंह शिनि-पौत्र सात्यकिने बाण चलाते हुए ब्राह्मणके धनुष और बाणोंको भी काट डाला और इस प्रकार कहा—॥ ३६ ॥
ब्राह्मणो नाभिहन्तव्यस्तिष्ठ तिष्ठ स्ववर्त्मनि ।
अवध्या यादवानां हि स्वापराधेऽपि हि द्विजाः ॥ ३७ ॥
'प्रवर ! ब्राह्मण मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं है; अतः तुम अपने मार्गपर डटे रहो, डटे रहो। अपना अपराध करनेपर भी ब्राह्मणोंको यदुवंशी वीर अवध्य ही मानते हैं' ॥ ३७॥
प्रवरस्तु प्रहस्यैनमुवाच कुरुनन्दन ।
अलं क्षान्त्या नृणां शूर युध्यस्व सर्वात्मना रणे ॥ ३८ ॥
कुरुनन्दन ! तब प्रवरने हँसकर सात्यकिसे कहा— 'मनुष्योंमें शूर सात्यके ! क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम रणभूमिमें सारी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥ ३८ ॥
जामदग्न्यस्य रामस्य शिष्योऽहमपि यादव ।
नामतः प्रवरो नाम सखा शक्रस्य धीमतः ॥ ३९ ॥
'यादववीर ! मैं भी जमदग्निनन्दन परशुरामका शिष्य हूँ। मेरा नाम प्रवर है और मैं बुद्धिमान् इन्द्रका सखा हूँ ॥ ३९ ॥
न देवा योद्धुमिच्छन्ति मन्यन्तो मधुसूदनम् ।
आनृण्यं सौहृदस्याहमधिगन्तास्मि माधव ॥ ४० ॥
'मधुवंशी वीर ! देवतालोग मधुसूदनका सम्मान करते हैं; अतः उनसे युद्ध करना नहीं चाहते हैं; इसलिये मैं आज इन्द्रके सौहार्दका ऋण चुकानेके लिये आया हूँ' ॥ ४० ॥
ततस्तयोस्तदा रौद्रः संग्रामो ववृधे नृप ।
अस्त्रैर्दिव्यैर्नरव्याघ्र शैनेयद्विजमुख्ययोः ॥ ४१ ॥
नरेश्वर ! पुरुषसिंह ! तदनन्तर सात्यकि और उस श्रेष्ठ ब्राह्मणमें उस समय दिव्य अस्त्रोंद्वारा बड़ा भयंकर संग्राम हुआ, जो बढ़ता ही चला गया ॥ ४१ ॥
द्यौश्चचाल तदा राजन् द्युचराश्च सहस्रशः ।
तस्मिन् वर्तति संग्रामे तेषामतिमहात्मनाम् ॥ ४२ ॥
राजन् ! उन अत्यन्त महात्मा वीरोंका वह संग्राम चालू होनेपर उस समय स्वर्गलोक विचलित हो उठा। सहस्रों आकाशचारी प्राणी कम्पित हो उठे ॥ ४२ ॥
नातिशिष्ये रणे कार्ष्णिरेन्द्रिमस्त्रभृतां वरम् ।
ऐन्द्रिः कार्ष्णिं महात्मानं मायिनं शूरसत्तमम् ॥ ४३ ॥
रणभूमिमें श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जयन्तसे आगे न बढ़ सके। इसी प्रकार इन्द्रकुमार जयन्त भी शूरशिरोमणि मायाविशारद श्रीकृष्णकुमार महात्मा प्रद्युम्नसे अधिक पराक्रम न दिखा सका ॥ ४३ ॥
हन्त गृह्ण प्रतीच्छेति तावुभौ योधसत्तमौ ।
युयुधाते नरश्रेष्ठ परस्परजयैषिणौ ॥ ४४ ॥
नरश्रेष्ठ ! परस्पर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले वे दोनों श्रेष्ठ योद्धा 'अरे, यह लो, दो मेरे इस प्रहारका उत्तर' आदि बातें कहते हुए युद्ध करने लगे ॥ ४४ ॥
अथ शार्ङ्गायुधसुतं शचीपुत्रः प्रतापवान् ।
विभाष्याभ्यहनद्राजन् दिव्येनारत्रेण सत्वरः ॥ ४५ ॥
राजन् ! तदनन्तर प्रतापी शचीपुत्र जयन्तने श्रीकृष्णकुमारको सम्बोधित करके उनपर बड़ी उतावलीके साथ दिव्यास्त्रद्वारा आघात किया ॥ ४५ ॥
सोऽस्त्रं तदभिदीप्यन्तमापतन्तं शितैः शरैः ।
तस्तम्भे बाणजालेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४६ ॥
अपनी ओर आते हुए उस तेजस्वी अस्त्रको पैने बाणोंका जाल-सा फैलाकर प्रद्युम्नने बीचमें ही रोक दिया। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ४६ ॥
ततस्तद् दीप्यमानं तु पपात रणमूर्द्धनि ।
रौक्मिणेयस्य कौरव्य घोरं दानवमर्दनम् ॥ ४७ ॥
कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके मुहानेपर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके लिये भी दुःसह प्रतीत होनेवाला, वह दीप्तिमान् दानव-मर्दन दिव्यास्त्र उनके रथपर गिरा ॥ ४७ ॥
तेनास्त्रेण रथो दग्धः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
नादहत् तत् सुघोरं तं रौक्मिणेयं नराधिप ॥ ४८ ॥
नरेश्वर ! उस अस्त्रके द्वारा महात्मा प्रद्युम्नका रथ जलकर भस्म हो गया तो भी वह भयंकर अस्त्र रुक्मिणी-कुमार प्रद्युम्नको दग्ध न कर सका ॥ ४८ ॥
दहत्यग्निं न खल्वग्निरुद्धतोऽपि विशाम्पते ।
दग्धाद् रथान्महाबाहु रौक्मिणेयः प्रचक्रमे ॥ ४९ ॥
प्रजानाथ ! अग्नि कितना ही प्रचण्ड रूप क्यों न धारण करे, वह दूसरी अग्निको नहीं जला सकती (उसी तरह उस अस्त्रकी अग्निसे अग्नितुल्य तेजस्वी रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नके शरीरको कोई हानि नहीं पहुँची)। महाबाहु रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उस जले हुए रथको छोड़कर अलग हो गये ॥ ४९ ॥
अथ नारायणसुतो विरथो रथिनां वरः ।
स्थितो धनुष्मानाकाशे जयन्तमिदमब्रवीत् ॥ ५० ॥
तदनन्तर रथहीन हुए रथियोंमें श्रेष्ठ नारायणकुमार