भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 529
५०८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रद्युम्न आकाशमें धनुष लिये खड़े हो गये और जयन्तसे इस प्रकार बोले—॥ ५० ॥
महेन्द्रपुत्र दिव्यं त्वं यदस्त्रं मुक्तवानसि ।
नाहमीदृक्शरूपाणां शक्यो हन्तुं शतैरपि ॥ ५१ ॥
'महेन्द्रकुमार ! तुमने मेरे ऊपर जो दिव्यास्त्र छोड़ा है, ऐसे सैकड़ों दिव्यास्त्र मुझे मार नहीं सकते हैं ॥ ५१ ॥
प्रयत्नं कुरु शिक्षणां यत्नं मेऽद्य प्रदर्शय ।
नास्ति मेऽतिशयं कर्ता संग्रामेऽमरनन्दन ॥ ५२ ॥
'अमरनन्दन ! तुम अपनी शिक्षाके अनुसार प्रयत्न करो और सारा यत्न आज मुझे दिखाओ । संग्राममें मुझसे बढ़कर पराक्रम प्रकट करनेवाला कोई वीर नहीं है ॥ ५२ ॥
आसीन्मे साध्वसं दृष्ट्वा रथस्थं त्वां धृतायुधम् ।
विभेमि तव नेदानीं युद्धे दृष्टबलोऽस्यलम् ॥ ५३ ॥
'तुम रथपर बैठकर हाथमें आयुध लिये जब यहाँ आये थे, तब तुम्हें देखकर मुझे कुछ भय हुआ था; परंतु अब युद्धमें तुम्हारा सारा बल मैंने देख लिया है। तुममें बहुत थोड़ा बल है, अतः इस समय मैं तुमसे भय नहीं मानता हूँ ॥ ५३ ॥
मनसा स्मर्यतां सैष पारिजातस्त्वया तरुः ।
शक्यं न खलु हस्ताभ्यां स्प्रष्टव्यो यस्त्वया ह्यसौ ॥ ५४॥
'तुम इस पारिजात वृक्षका केवल मनसे स्मरण कर लो; क्योंकि इस समय दोनों हाथोंसे इसका स्पर्श करना तुम्हारे लिये निश्चय ही असम्भव है ॥ ५४ ॥
रथो मायामयो दग्धस्त्वया यो ह्यस्त्रतेजसा ।
ईदृशानां सहस्राणि स्रष्टुं शक्तोऽस्मि मायया ॥ ५५ ॥
'तुमने अपने अस्त्रके तेजसे मेरे जिस मायामय रथको जलाया है, ऐसे हजारों रथ मैं मायाद्वारा बना सकता हूँ' ॥
एवमुक्तो जयन्तश्च सुमोचास्त्रं महाबलः ।
तपसोपचितं तेन स्वयमेवातितेजसा ॥ ५६ ॥
प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर महाबली जयन्तने स्वयं ही अत्यन्त तेजस्वी तपसे पुष्ट हुए महान् अस्त्रको उनपर चलाया ॥
तत् प्रद्युम्नो महावेगं शरजालैरवारयत् ।
चत्वार्यस्त्राणि दिव्यानि मुमुचे चापराणि सः ॥ ५७ ॥
उस महान् वेगशाली अस्त्रको प्रद्युम्नने अपने बाण-समूहोंसे रोक दिया, तब जयन्तने चार दिव्यास्त्र और छोड़े ॥
दिक्षु सर्वासु रुन्धुस्तान्यस्त्राण्यथ भारत ।
रौक्मिणेयं महात्मानमन्तरिक्षे च पञ्चमम् ॥ ५८ ॥
भरतनन्दन ! उन अस्त्रोंने महात्मा रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नको सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे घेर लिया तथा पीछे चलाये हुए एक पाँचवें बाणने आकाशमें भी उनकी गति रोक दी ॥ ५८ ॥
महोल्कासदृशान् बाणानस्त्राण्यमरसत्तमः ।
सुमोच यानि घोराणि प्रद्युम्नं प्रति सर्वतः ॥ ५९ ॥
तानि सर्वाणि बाणौघैः कार्ष्णिस्त्राण्यवारयत् ।
जयन्तं चापरैर्बाणैर्विंध्याय निशितैस्तदा ॥ ६० ॥
अमरश्रेष्ठ जयन्तने बड़ी भारी उल्काके समान जो बाण और भयंकर अस्त्र प्रद्युम्नपर सब ओरसे छोड़े थे, उन सबका श्रीकृष्णकुमारने अपने बाणसमूहोंद्वारा निवारण कर दिया तथा दूसरे-दूसरे तीखे बाणोंके द्वारा जयन्तको घायल कर दिया ॥
ततो नादः समुत्सुष्टो ह्यमरैः पुण्यकर्मभिः ।
दृष्ट्वा स्थैर्यं च शौर्यं च प्रद्युम्नस्य महात्मनः ॥ ६१ ॥
उस समय महात्मा प्रद्युम्नकी स्थिरता और फुर्ती देखकर पुण्यकर्मा देवताओँने बड़े जोरसे हर्षध्वनि की ॥ ६१ ॥
प्रवरस्यापि बाणेन शितेन शितिनिपुञ्जवः ।
चिच्छेदेष्वासनं वीरो हस्तावापं च भारत ॥ ६२ ॥
भरतनन्दन ! शिनिवंशविभूषण वीर सात्यकिने एक पैने बाणसे प्रवरके भी धनुष और दस्तानेको काट दिया ॥ ६२ ॥
ततोऽन्यत् स तु जग्राह महत् तद्धनुरुत्तमम् ।
महेन्द्रदत्तं प्रवरो महाशनिसमस्वनम् ॥ ६३ ॥
तब प्रवरने महान् वज्रके समान टङ्कार ध्वनि करनेवाले एक दूसरे विशाल एवं उत्तम धनुषको हाथमें लिया, जिसे इन्द्रने दे रक्खा था ॥ ६३ ॥
स तेन वीरो महता धनुषा विप्रसत्तमः ।
शरान् सुमोच विविधानर्करश्मिनिभांस्तदा ॥ ६४ ॥
उस वीर ब्राह्मणशिरोमणिने उस विशाल धनुषके द्वारा उस समय ऐसे-ऐसे नाना प्रकारके बाण छोड़े, जो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी थे ॥ ६४ ॥
चकर्त च धनुश्चित्रं शैनेयस्यामितौजसः ।
विव्याध सर्वाङ्गेषु बाणैरपि च सात्यकिम् ॥ ६५ ॥
उसने अमित तेजस्वी सात्यकिके विचित्र धनुषको काट डाला और उनके सारे अङ्गोंमें बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥
धनुरादाय शैनेयस्ततोऽन्यद् कुरुनन्दन ।
दृढं भारसहं धीमान् विव्याध प्रवरं रणे ॥ ६६ ॥
कुरुनन्दन ! तब बुद्धिमान् सात्यकिने दूसरा भार सहन करनेमें समर्थ सुदृढ़ धनुष हाथमें लेकर रणभूमिमें प्रवरको बींधना आरम्भ किया ॥ ६६ ॥
उच्चकर्ततुरन्योन्यवर्मणी तौ शितैः शरैः ।
गात्रेभ्यश्चैव मांसानि मर्मभिद्भिः शरोत्तमैः ॥ ६७ ॥
उन दोनोंने तीखे बाणोंद्वारा परस्परके कवच काट डाले तथा मर्मभेदी उत्तम बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक वे एक दूसरेके शरीरोंसे मांस काटने लगे ॥ ६७ ॥