भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 530

विष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः [ ५०९


अथाष्टधारवाणेन पुनरिष्वासनं द्विधा।
विच्छेद प्रवरो वीरस्त्रिभिश्चैनमताडयत् ॥ ६८ ॥

इसी समय वीर प्रवरने एक आठ धारवाले बाणसे सात्यकिके धनुषके पुनः दो टुकड़े कर डाले तथा तीन बाणों-द्वारा उन्हें घायल कर दिया ॥ ६८ ॥

अन्यदिष्वासनं तं तु ग्रहीतुमनसं द्विजः।
गदया ताडयामास क्षेप्यया लघुहस्तवन् ॥ ६९ ॥

सात्यकि दूसरी धनुष लेना ही चाहते थे कि फुर्तीले हाथवाले ब्राह्मण प्रवरने फेंकने योग्य गदाके द्वारा उनपर प्रहार किया ॥ ६९ ॥

सोऽसिं चर्म च जग्राह सात्यकिः प्रहसन्निव।
न जग्राह धनुर्धीमान् गदयाभिहतो भृशम् ॥ ७० ॥

तब सात्यकिने हँसते हुए-से ढाल और तलवार हाथमें ले ली। वे गदासे अधिक आहत हो चुके थे; अतः उन बुद्धिमान् वीरने धनुष नहीं उठाया ॥ ७० ॥

ततः शरशतान्येव मुमोच प्रवरस्तदा।
विहस्तमिव विज्ञाय सात्यकिं यदुनन्दनम् ॥ ७१ ॥

इसके बाद यदुनन्दन सात्यकिको निहत्था-सा जानकर प्रवरने उनपर सैकड़ों बाण छोड़े ॥ ७१ ॥

प्रद्युम्नोऽस्य ददौ खड्गं निर्मलाकाशसंनिभम्।
तस्य चिच्छेद भल्लेन निस्त्रिंशं प्रवरस्तदा ॥ ७२ ॥

उस समय प्रद्युम्नने उन्हें निर्मल आकाशके समान एक खड्ग दिया, परंतु प्रवरने तत्काल एक भल्ल मारकर उनके खड्गको काट डाला ॥ ७२ ॥

त्स्रूद्देशेऽपातयच्च प्रवरः प्रहसन्निव।
व्यधमच्च तथा चर्म शितैर्बाणैरजिह्मगैः ॥ ७३ ॥

प्रवरने हँसते हुए-से उस खड्गको मूठ पकड़नेकी जगहसे काटकर गिरा दिया और सीधे जानेवाले पैने बाणोंसे उनकी ढालकी भी धजियाँ उड़ा दीं ॥ ७३ ॥

आजघान च शक्त्यैनं हृदि विप्रो ननाद च।
तं विक्लवमिव ज्ञात्वा पारिजातजिहीर्षया।
तार्क्ष्याभ्याशे रथेनैव स तस्थौ प्रवरस्तदा ॥ ७४ ॥

फिर उस ब्राह्मणने शक्तिके द्वारा उनकी छातीपर आघात किया। इसके बाद वह सिंहके समान गर्जना करने लगा। उन्हें व्याकुल-सा जानकर प्रवर पारिजात हड़प लेनेकी इच्छा-से रथके द्वारा ही गरुड़के निकट आकर खड़ा हो गया ॥७४॥

तं पक्षपुटवेगेन चिक्षेप गरुडस्तथा।
गव्यूतिमेकां सरथः स पपात मुमोह च ॥ ७५ ॥

उस समय गरुड़ने अपने पंखोंके वेगसे प्रवरको दो कोस दूर फेंक दिया। प्रवर रथसहित वहाँ गिरा और मूर्च्छित हो गया ॥ ७५ ॥

तं जयन्तो निपत्याथ पतितं ब्राह्मणं नृप।
समाश्वास्य रथं शीघ्रं समारोपितवांस्तदा ॥ ७६ ॥

नरेश्वर ! तब जयन्त दौड़कर वहाँ जा पहुँचा और गिरे हुए ब्राह्मणको सान्त्वना देकर उसे शीघ्र ही रथपर चढ़ा दिया ॥

शैनेयमपि मुह्यन्तं पतन्तं च मुहुर्मुहुः।
आश्वासयानः प्रद्युम्नः पितृव्यं परिषस्वजे ॥ ७७ ॥

सात्यकि भी बारंबार मूर्च्छित हो-होकर गिरने लगे। उस समय प्रद्युम्नने चाचा सात्यकिको आश्वासन देते हुए उन्हें हृदयसे लगा लिया ॥ ७७ ॥

तं हि पस्पर्श हस्तेन सव्येन मधुसूदनः।
विरुजः स्पर्शमात्रेण सात्यकिः समपद्यत ॥ ७८ ॥

उस समय मधुसूदन श्रीकृष्णने बायें हाथसे उनका स्पर्श किया। उनके स्पर्शमात्रसे सात्यकिकी सारी पीड़ा दूर हो गयी ॥

प्रद्युम्नो दक्षिणे पार्श्वे वामे तु शिनिपुङ्गवः।
तस्थतुः पारिजातस्य युद्धशौण्डतरावुभौ ॥ ७९ ॥

तदनन्तर पारिजातके दाहिने भागमें प्रद्युम्न और बायें पार्श्वमें सात्यकि खड़े हो गये। ये दोनों ही युद्धमें अत्यन्त कुशल थे ॥ ७९ ॥

जयन्तः प्रवरश्चैव रथेनैकेन भारत।
सम्पतन्तौ महेन्द्रेण प्रहस्योक्तौ महात्मना ॥ ८० ॥

भरतनन्दन ! इतनेमें ही जयन्त और प्रवर भी एक ही रथसे दौड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे। उस समय महात्मा महेन्द्रने उन दोनोंसे हँसकर कहा—॥ ८० ॥

नासन्नमभिगन्तव्यं गरुडस्य कथंचन।
बलवानेष पततां राजा च विनतासुतः ॥ ८१ ॥

'तुम दोनों किसी तरह गरुड़के निकट न जाना। यह पक्षियोंका राजा विनतानन्दन गरुड़ बड़ा बलवान् है ॥८१॥

दक्षिणे चैव सव्ये च पार्श्वे मम धृतायुधौ।
उभौ स्थितौ युद्ध्यमानं मामेव हि प्रपश्यतम् ॥ ८२ ॥

'तुम दोनों मेरे दायें और बायें भागमें धनुष धारण करके खड़े हो जाओ और युद्ध करते समय मेरी ही देख-भाल करो' ॥ ८२ ॥

एवमुक्तौ स्थितौ वीरौ ततः शक्रस्य पार्श्वयोः।
ददृशाते युद्ध्यमानौ देवराजजनार्दनौ ॥ ८३ ॥

इन्द्रके ऐसा कहनेपर वे दोनों वीर उनके दोनों बग़लमें खड़े हो गये और देवराज इन्द्र तथा श्रीकृष्णका युद्ध देखने लगे ॥ ८३ ॥

अथेन्द्रो गरुडं बाणैर्महाशनिसमस्वनैः।
विव्याध सर्वगात्रेषु महाहववरैस्तथा ॥ ८४ ॥

तदनन्तर इन्द्र महान् वज्रके समान शब्द करनेवाले