विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बाणों तथा बड़े-बड़े अस्त्रोंद्वारा गरुड़के सारे अङ्गोंमें चोट पहुँचाने लगे ॥ ८४ ॥
स तान् बाणानगणयन् वैनतेयः प्रतापवान्।
ससाराभिमुखो वीरः शक्रनागमरिन्दमः ॥ ८५॥
तब उनके उन बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रतापी वीर विनतानन्दन गरुड़ इन्द्रके हाथी ऐरावतकी ओर बढ़े ॥ ८५ ॥
उभौ तौ सहसा राजन् बलिनौ गजपक्षिणौ।
प्रयुद्धौ वीर्यसम्पन्नौ महाप्राणौ दुरासदौ ॥ ८६॥
राजन् ! वे बलवान् हाथी और पक्षी सहसा एक दूसरेके साथ जूझने लगे। वे दोनों ही बल-पराक्रमसे सम्पन्न, महान् प्राणशक्तिसे युक्त और दुर्जय थे ॥ ८६ ॥
रदनैः पन्नगरिपुं करेण शिरसा तथा।
ऐरावतो गजपतिराजघान नदंस्तथा ॥ ८७॥
उस समय गर्जते हुए गजराज ऐरावतने अपनी सूँड़, मस्तक और दाँतोंसे सर्पशत्रु गरुड़पर गहरा आघात किया ॥
तथा नखाङ्कुशैस्तीक्ष्णैर्वैनतेयो बलोत्कटः।
तथा पक्षनिपातैश्च शक्रनागं अघान ह ॥ ८८॥
इसी प्रकार उत्कट बलशाली विनतानन्दन गरुड़ने तीखे नखरूपी अंकुशों और पंखोंसे इन्द्रके हाथीपर चोट की ॥
मुहूर्तं सुमहानासीत् सम्पातो गजपक्षिणोः।
विस्मापनीयो जगतः प्रेक्षितॄणां भयावहः ॥ ८९॥
दो घड़ीतक हाथी और पक्षीमें महान् युद्ध होता रहा, जो जगत्के लिये आश्चर्यजनक और दर्शकोंके लिये भयावह था ॥
मूर्ध्न्यैरावतं तार्क्ष्यस्ताडयामास भारत।
नखाङ्कुशकरालेन चरणेन महाबलः ॥ ९०॥
भारत ! महाबली गरुड़ने नखरूपी अंकुशोंके द्वारा विकराल प्रतीत होनेवाले अपने पैरसे ऐरावतके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ९० ॥
सम्पहाराभिसंतप्तो निपपात त्रिविष्टपात्।
पारियात्रे गिरिश्रेष्ठे द्वीपेऽस्मिञ्जनमेजय ॥ ९१॥
जनमेजय ! उस प्रहारसे पीड़ित हो ऐरावत स्वर्गसे नीचे इस जम्बूद्वीपमें पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर गिर पड़ा ॥ ९१ ॥
पतन्तमपि तं शक्रो न मुमोच महाबलः।
कारुण्यादथ सौहार्दात् पूर्वाभ्युपगमादपि ॥ ९२॥
महाबली इन्द्र करुणा, सौहार्द तथा साथ न छोड़नेके लिये पहले की हुई प्रतिज्ञाके कारण भी उस गिरते हुए हाथीको छोड़ न सके ॥ ९२ ॥
कृष्णोऽप्यन्वगमच्चैनं पृष्ठतः प्रभवोऽव्ययः।
पारिजातवता धीमान् गरुडेन महाबलः ॥ ९३॥
जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत अविनाशी महाबली बुद्धिमान् श्रीकृष्ण भी पारिजातयुक्त गरुड़के द्वारा इन्द्रके पीछे-पीछे वहाँतक गये ॥ ९३ ॥
स तस्यौ पर्वतश्रेष्ठे पारियात्रे तु वृत्रहा।
ऐरावते समाश्वस्ते संग्रामो ववृधे पुनः॥ ९४॥
शरैराशीविषप्रख्यै रत्नयुक्तैः सुतेजितैः।
अन्योन्यं कुरुशार्दूल शक्रकेशवयॉर्महान् ॥ ९५॥
वृत्रासुरविनाशक इन्द्र पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर पहुँचकर खड़े हो गये। कुरुश्रेष्ठ ! ऐरावतके सुस्ता लेनेपर इन्द्र और श्रीकृष्णका यह महान् युद्ध पुनः बढ़ चला। दोनों ओरसे एक-दूसरेपर तेज किये हुए, रत्नयुक्त एवं विषधर सर्पोंके तुल्य भयंकर बाणोंके प्रहार होने लगे ॥ ९४-९५ ॥
ततो वज्रायुधो वज्रमशनिं च पुनः पुनः।
मुमोच गरुडे राजन्नैरावतरिपौ नृप ॥ ९६॥
राजन् ! नरेश्वर ! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्रने ऐरावतशत्रु गरुड़पर बारंबार वज्र तथा अशनिका प्रहार किया ॥ ९६ ॥
वज्राशनिनिपातांस्तान् सेहे शक्रस्य पक्षिराट् ।
अवध्यो बलिनां श्रेष्ठो निसर्गेण तपोबलात् ॥ ९७॥
अवध्य एवं बलवानोंमें श्रेष्ठ पक्षिराज गरुड़ने इन्द्रके उन वज्र और अशनिद्वारा किये गये प्रहारोंको नैसर्गिक शक्ति तथा तपस्याके बलसे सह लिया ॥ ९७ ॥
मुमोच पक्षमेकैकं मानयन्नशनिं सदा।
वज्रं च देवराजोऽथ भ्रातुः कश्यपसम्भवः ॥ ९८॥
उन कश्यपकुमार गरुड़ने अपने भाई देवराज इन्द्रके वज्र और अशनिका मान रखते हुए प्रत्येक प्रहारपर अपनी एक-एक पाँख तोड़कर गिरा दी ॥ ९८ ॥
आक्रम्यमाणस्तार्क्ष्येण न्यमज्जन्नृपते गिरिः।
विवेश धरणीं राजंश्छीर्यमाणः समन्ततः ॥ ९९॥
राजन् ! गरुड़के आक्रमण करनेपर वह पारियात्र पर्वत सब ओरसे बिखरकर धरतीमें धँस गया ॥ ९९ ॥
चुक्रूज बहुमानेन कृष्णस्य स तु पर्वतः।
तं चाद्राक्षीत्ततः कृष्णः किञ्चिच्छेषमधोक्षजः ॥१००॥
श्रीकृष्णके भारी भारसे वह पर्वत आर्तनाद-सा करने लगा। तब अधोक्षज श्रीकृष्णने उसकी ओर देखा। उस पर्वतका कुछ ही भाग धरतीके ऊपर शेष रह गया था ॥
तं मुक्त्वा गरुडेनाथ तस्थौ देवो विहायसि।
प्रद्युम्नं च तदोवाच सर्वलोकभावनः ॥१०१॥
यह देख सबके स्रष्टा लोकभावन भगवान् श्रीकृष्ण उस पर्वतको छोड़कर गरुड़के द्वारा आकाशमें खड़े हो गये और उस समय प्रद्युम्नसे बोले—॥ १०१ ॥