भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
५१०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बाणों तथा बड़े-बड़े अस्त्रोंद्वारा गरुड़के सारे अङ्गोंमें चोट पहुँचाने लगे ॥ ८४ ॥

स तान् बाणानगणयन् वैनतेयः प्रतापवान्।
ससाराभिमुखो वीरः शक्रनागमरिन्दमः ॥ ८५॥
तब उनके उन बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रतापी वीर विनतानन्दन गरुड़ इन्द्रके हाथी ऐरावतकी ओर बढ़े ॥ ८५ ॥

उभौ तौ सहसा राजन् बलिनौ गजपक्षिणौ।
प्रयुद्धौ वीर्यसम्पन्नौ महाप्राणौ दुरासदौ ॥ ८६॥
राजन् ! वे बलवान् हाथी और पक्षी सहसा एक दूसरेके साथ जूझने लगे। वे दोनों ही बल-पराक्रमसे सम्पन्न, महान् प्राणशक्तिसे युक्त और दुर्जय थे ॥ ८६ ॥

रदनैः पन्नगरिपुं करेण शिरसा तथा।
ऐरावतो गजपतिराजघान नदंस्तथा ॥ ८७॥
उस समय गर्जते हुए गजराज ऐरावतने अपनी सूँड़, मस्तक और दाँतोंसे सर्पशत्रु गरुड़पर गहरा आघात किया ॥

तथा नखाङ्कुशैस्तीक्ष्णैर्वैनतेयो बलोत्कटः।
तथा पक्षनिपातैश्च शक्रनागं अघान ह ॥ ८८॥
इसी प्रकार उत्कट बलशाली विनतानन्दन गरुड़ने तीखे नखरूपी अंकुशों और पंखोंसे इन्द्रके हाथीपर चोट की ॥

मुहूर्तं सुमहानासीत् सम्पातो गजपक्षिणोः।
विस्मापनीयो जगतः प्रेक्षितॄणां भयावहः ॥ ८९॥
दो घड़ीतक हाथी और पक्षीमें महान् युद्ध होता रहा, जो जगत्‌के लिये आश्चर्यजनक और दर्शकोंके लिये भयावह था ॥

मूर्ध्न्यैरावतं तार्क्ष्यस्ताडयामास भारत।
नखाङ्कुशकरालेन चरणेन महाबलः ॥ ९०॥
भारत ! महाबली गरुड़ने नखरूपी अंकुशोंके द्वारा विकराल प्रतीत होनेवाले अपने पैरसे ऐरावतके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ९० ॥

सम्पहाराभिसंतप्तो निपपात त्रिविष्टपात्।
पारियात्रे गिरिश्रेष्ठे द्वीपेऽस्मिञ्जनमेजय ॥ ९१॥
जनमेजय ! उस प्रहारसे पीड़ित हो ऐरावत स्वर्गसे नीचे इस जम्बूद्वीपमें पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर गिर पड़ा ॥ ९१ ॥

पतन्तमपि तं शक्रो न मुमोच महाबलः।
कारुण्यादथ सौहार्दात् पूर्वाभ्युपगमादपि ॥ ९२॥
महाबली इन्द्र करुणा, सौहार्द तथा साथ न छोड़नेके लिये पहले की हुई प्रतिज्ञाके कारण भी उस गिरते हुए हाथीको छोड़ न सके ॥ ९२ ॥

कृष्णोऽप्यन्वगमच्चैनं पृष्ठतः प्रभवोऽव्ययः।
पारिजातवता धीमान् गरुडेन महाबलः ॥ ९३॥
जगत्‌की उत्पत्तिके कारणभूत अविनाशी महाबली बुद्धिमान् श्रीकृष्ण भी पारिजातयुक्त गरुड़के द्वारा इन्द्रके पीछे-पीछे वहाँतक गये ॥ ९३ ॥

स तस्यौ पर्वतश्रेष्ठे पारियात्रे तु वृत्रहा।
ऐरावते समाश्वस्ते संग्रामो ववृधे पुनः॥ ९४॥
शरैराशीविषप्रख्यै रत्नयुक्तैः सुतेजितैः।
अन्योन्यं कुरुशार्दूल शक्रकेशवयॉर्महान् ॥ ९५॥
वृत्रासुरविनाशक इन्द्र पर्वतश्रेष्ठ पारियात्रपर पहुँचकर खड़े हो गये। कुरुश्रेष्ठ ! ऐरावतके सुस्ता लेनेपर इन्द्र और श्रीकृष्णका यह महान् युद्ध पुनः बढ़ चला। दोनों ओरसे एक-दूसरेपर तेज किये हुए, रत्नयुक्त एवं विषधर सर्पोंके तुल्य भयंकर बाणोंके प्रहार होने लगे ॥ ९४-९५ ॥

ततो वज्रायुधो वज्रमशनिं च पुनः पुनः।
मुमोच गरुडे राजन्नैरावतरिपौ नृप ॥ ९६॥
राजन् ! नरेश्वर ! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्रने ऐरावतशत्रु गरुड़पर बारंबार वज्र तथा अशनिका प्रहार किया ॥ ९६ ॥

वज्राशनिनिपातांस्तान् सेहे शक्रस्य पक्षिराट् ।
अवध्यो बलिनां श्रेष्ठो निसर्गेण तपोबलात् ॥ ९७॥
अवध्य एवं बलवानोंमें श्रेष्ठ पक्षिराज गरुड़ने इन्द्रके उन वज्र और अशनिद्वारा किये गये प्रहारोंको नैसर्गिक शक्ति तथा तपस्याके बलसे सह लिया ॥ ९७ ॥

मुमोच पक्षमेकैकं मानयन्नशनिं सदा।
वज्रं च देवराजोऽथ भ्रातुः कश्यपसम्भवः ॥ ९८॥
उन कश्यपकुमार गरुड़ने अपने भाई देवराज इन्द्रके वज्र और अशनिका मान रखते हुए प्रत्येक प्रहारपर अपनी एक-एक पाँख तोड़कर गिरा दी ॥ ९८ ॥

आक्रम्यमाणस्तार्क्ष्येण न्यमज्जन्नृपते गिरिः।
विवेश धरणीं राजंश्छीर्यमाणः समन्ततः ॥ ९९॥
राजन् ! गरुड़के आक्रमण करनेपर वह पारियात्र पर्वत सब ओरसे बिखरकर धरतीमें धँस गया ॥ ९९ ॥

चुक्रूज बहुमानेन कृष्णस्य स तु पर्वतः।
तं चाद्राक्षीत्ततः कृष्णः किञ्चिच्छेषमधोक्षजः ॥१००॥
श्रीकृष्णके भारी भारसे वह पर्वत आर्तनाद-सा करने लगा। तब अधोक्षज श्रीकृष्णने उसकी ओर देखा। उस पर्वतका कुछ ही भाग धरतीके ऊपर शेष रह गया था ॥

तं मुक्त्वा गरुडेनाथ तस्थौ देवो विहायसि।
प्रद्युम्नं च तदोवाच सर्वलोकभावनः ॥१०१॥
यह देख सबके स्रष्टा लोकभावन भगवान् श्रीकृष्ण उस पर्वतको छोड़कर गरुड़के द्वारा आकाशमें खड़े हो गये और उस समय प्रद्युम्नसे बोले—॥ १०१ ॥

विष्णुपर्व ] चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ५११


इतो द्वारवतीं गत्वा रथमानय मा चिरम्।<br>सदारुकं महाबाहो मत्तेजोबलमाश्रितः ॥१०२॥<br>'महाबाहो ! यहाँसे द्वारका जाकर मेरे तेज और बलका आश्रय ले दारुकसहित मेरे रथको शीघ्र यहाँ ले आओ ॥<br>वक्तव्यो बलभद्रश्च राजा च कुकुराधिपः।<br>श्वो जित्वेन्द्रं त्वागमिष्ये द्वारकामिति मानद ॥१०३॥<br>'मानद ! वहाँ भैया बलभद्र तथा कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनसे कह देना कि कल इन्द्रको जीतकर मैं द्वारका-पुरीको आऊँगा' ॥ १०३ ॥तथेत्युक्त्वा तु धर्मात्मा प्रद्युम्नः पितरं विभुः।<br>गत्वा यथोक्तमुक्त्वा च यादवेन्द्रबलावुभौ ॥१०४॥<br>नाडिकान्तरमात्रेण पुनस्तं देशमाययौ।<br>दारुकेन समायुकं रथमास्थाय भारत ॥१०५॥<br>भारत ! तब अपने पितासे 'बहुत अच्छा' कहकर प्रभाव-शाली धर्मात्मा प्रद्युम्न द्वारकामें गये और यादवराज उग्रसेन तथा बलराम दोनोंसे उनका यथावत् संदेश कहकर वे दारुक-के द्वारा जोते गये रथपर आरूढ़ हो घड़ीभरमें फिर उस स्थान-पर लौट आये ॥ १०४-१०५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे श्रीकृष्णोन्द्रयुद्धे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें श्रीकृष्ण और इन्द्रका युद्धविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥


चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

रात्रिमें युद्ध स्थगित करके श्रीकृष्णका पारियात्र पर्वतको वरदान देना, गङ्गाका स्मरण करना, बिल्व और गङ्गाजलपर महादेवजीका आवाहन करके उन बिल्वोदकेश्वरकी पूजा और स्तुति करना, महादेवजीका उन्हें अभीष्ट वर देकर दैत्योंको मारनेका आदेश देना तथा पारियात्र-पर्वतपर भगवान्‌का निवास एवं उनकी प्रतिमाके पूजनकी महिमा

वैशम्पायन उवाच<br>तमारुह्य रथं कृष्णः पारियात्रं गिरिं ययौ।<br>यत्रैरावतमास्थाय स्थितः सुरपतिः प्रभुः ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हो पारियात्र पर्वतकी ओर चले, जहाँ प्रभावशाली देवराज इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ होकर खड़े थे ॥ १ ॥प्रद्युम्नः सात्यकिश्चापि गरुडस्थौ महाबलौ।<br>गतावुभौ रक्षणार्थे पारिजातमरिन्दमौ ॥ ५ ॥<br>गरुड़पर बैठे हुए महाबली प्रद्युम्न और सात्यकि ये दोनों शत्रुदमन वीर भी पारिजातकी रक्षाके लिये वहाँ गये ॥५॥
पारियात्रो गिरिश्रेष्ठो दृष्ट्वा यान्तं जनार्दनम्।<br>शाणपादसमो भूत्वा प्रविवेश वसुंधराम् ॥ २ ॥<br>भगवान् श्रीकृष्णको आते देख पर्वतश्रेष्ठ पारियात्र उड़द-के ढेर या सनके बीजकी राशिके समान शिथिल होकर धरती-में समा गया ॥ २ ॥ततस्त्वस्तं गतः सूर्यः प्रवृत्ता रजनी नृप।<br>उपस्थितं पुनर्युद्धं शक्रकेशवयोरिह ॥ ६ ॥<br>नरेश्वर ! तत्पश्चात् सूर्यदेव अस्त हो गये और सब ओर रात फैल गयी तो भी वहाँ इन्द्र और श्रीकृष्णका युद्ध पुनः उपस्थित हुआ ॥ ६ ॥
प्रियार्थं वासुदेवस्य प्रभावज्ञो महात्मनः।<br>तस्य प्रीतो हृषीकेशः पर्वतस्य जनाधिप ॥ ३ ॥<br>भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही उसने ऐसा किया था; क्योंकि वह महात्मा श्रीकृष्णके प्रभावको जानता था। नरेश्वर ! उस पर्वतके इस व्यवहारसे इन्द्रियोंके स्वामी श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३ ॥सुप्रहाराहतं दृष्ट्वा विष्णुस्तैरावतं गजम्।<br>नातिकल्पं महातेजा देवराजानमब्रवीत् ॥ ७ ॥<br>महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने ऐरावत हाथीको गरुड़के प्रहारोंसे अत्यन्त आहत और असमर्थ हुआ देख देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा—॥ ७ ॥
ततः प्रयातं युद्धार्थमच्युतं कुरुनन्दन।<br>सपारिजातो गरुडः पृष्ठतोऽनुययौ तदा ॥ ४ ॥<br>कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके लिये जाते हुए श्रीकृष्णके पीछे-पीछे पारिजातसहित गरुड़ भी गये ॥ ४ ॥गरुडाभिहतः पूर्वं नातिकल्पो गजोत्तमः।<br>ऐरावतो महाबाहो रात्रिश्च समुपोद्यते ॥ ८ ॥<br>श्वः प्रभाते यथाकामं प्रवर्तेथा यथेच्छसि।<br>एवमस्त्विति कृष्णं तु देवराजोऽब्रवीत् प्रभुः ॥ ९ ॥<br>'महाबाहो ! गरुड़द्वारा पहलेसे ही आहत होकर आपका यह उत्तम हाथी ऐरावत इस समय कुछ असमर्थ हो गया है। इधर रात भी आ पहुँची है; अतः अब कल सबेरे

५१२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

आपकी जैसी इच्छा हो, उस तरह युद्ध कीजियेगा।' तब प्रभावशाली देवराजने श्रीकृष्णसे कहा, 'एवमस्तु (ऐसा ही हो)' ॥ ८-९ ॥

उवास पुष्कराभ्याशे देवराजः पुरंदरः । व्रजं गिरिमयं कृत्वा धर्मात्मा नृपसत्तम ॥ १० ॥

नृपश्रेष्ठ ! इसके बाद धर्मात्मा देवराज इन्द्र अपने लिये पर्वतमय आवरण बनाकर पुष्करके निकट ठहर गये ॥ १० ॥

ब्रह्मा ततो जगामाथ कश्यपश्च महानृषिः । अदितिश्चैव सर्वे च देवा मुनय एव च ॥ ११ ॥ साध्या विश्वे च कौरव्य नासत्यावश्विनौ तथा । आदित्याश्चैव रुद्राश्च वसवश्च जनेश्वर ॥ १२ ॥

कुरुनन्दन ! जनेश्वर ! तदनन्तर ब्रह्मा, महर्षि कश्यप, अदितिदेवी, समस्त देवता, मुनि, साध्य, विश्वेदेव, नासत्य नामसे प्रसिद्ध अश्विनीकुमार, आदित्य, रुद्र तथा वसुगण उस स्थानपर गये ॥ ११-१२ ॥

नारायणश्च पुत्रेण सात्यकेन च भारत । सहोवास गिरौ रम्ये पारियात्रे प्रहृष्टवत् ॥ १३ ॥

भारत ! इधर पुत्र प्रद्युम्न तथा भाई सात्यकिके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उस रातमें सुरम्य गिरि पारियात्रपर बड़े हर्षके साथ रहे ॥ १३ ॥

यत् स शाणप्रमाणोऽस्य भक्त्या समभवन्नृप । वरं प्रादात् ततस्तस्य पर्वतस्य महाद्युतिः ॥ १४ ॥

नरेश्वर ! वह पर्वत भगवान्‌के प्रति भक्तिभावसे नम्र हो जो शाण (उड़द या सनके बीजकी राशि) के बराबर हो गया था, इससे उस पर्वतपर प्रसन्न हो महातेजस्वी श्रीकृष्णने उस पर्वतको यह वर दिया— ॥ १४ ॥

शाणपाद इति ख्यातो भविष्यसि महागिरे । पुण्येनार्द्धेन तुल्यो हि पुण्यो हिमवतः शुभः ॥ १५ ॥

'महागिरे ! तुम शाणपादके नामसे विख्यात होओगे। जैसे हिमालय पर्वतके ऊपरी आधा भाग परम पवित्र होता है, उसीके समान तुम भी शुभ एवं पवित्र बने रहोगे ॥ १५ ॥

एवमेव च भूयिष्ठो भव पर्वतसत्तम । मेरुणा स्पर्धमानो हि बहुचित्रमृगैर्वृतः । रमे त्वां पश्यमानोऽहं बहुचित्रनगायुतम् ॥ १६ ॥

'पर्वतश्रेष्ठ ! तुम इसी प्रकार बहुसंख्यक विचित्र मृगोंसे युक्त हो मेरुके साथ स्पर्धा रखते हुए बहुत बड़े हो जाओ। तुम्हें अनेक विचित्र वृक्षोंसे सम्पन्न देखकर मैं आनन्दमग्न हो जाता हूँ' ॥ १६ ॥

तथा दत्त्वा वरं तस्य पर्वतस्य तु केशवः । दध्यौ गङ्गां सरिच्छ्रेष्ठां नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ॥ १७ ॥

इस प्रकार उस पर्वतको वर देकर भगवान् श्रीकृष्णने महादेवजीको नमस्कार करके सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका चिन्तन किया ॥ १७ ॥

अथाययौ विष्णुपदी स्मृता कृष्णेन भारत । सम्पूज्य तां ततः कृष्णः कृत्वा स्नानमथोक्षजः ॥ १८ ॥

भारत ! श्रीकृष्णके स्मरण करनेपर विष्णुपदी गङ्गा वहाँ आ गयीं। अधोक्षज श्रीकृष्णने उनकी पूजा करके उनके जलसे स्नान किया ॥ १८ ॥

उदकं च गृहायाथ विल्वं च हरिरव्ययः । देवमावाहयामास रुद्रं सर्वेश्वरेश्वरम् ॥ १९ ॥

फिर अविनाशी श्रीहरिने गङ्गाजल और बेलका फल लेकर उसीपर सर्वेश्वरेश्वर रुद्रदेवका आवाहन किया ॥ १९ ॥

ततः प्राप्तो महादेवः सोमः सप्रवरो विभुः । तस्यायुपरि विल्वस्य तथा गङ्गोदकस्य च ॥ २० ॥

तब पार्वतीसहित भगवान् महादेव प्रमथगणोंके साथ वहाँ आये और गङ्गाजल तथा बेलके ऊपर खड़े हो गये ॥ २० ॥

तं पारिजातकुसुमैरर्चयामास केशवः । तुष्टाव वाग्भिर्गीशेशं सर्वकर्तारमीश्वरम् ॥ २१ ॥

तब श्रीकृष्णने उनका पारिजातके फूलोंद्वारा पूजन किया और सबके कर्ता ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् शिवका वाणीद्वारा स्तवन किया ॥ २१ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

रुद्रो देव त्वं रुदनाद् रावणाच्च रोरुयमाणो द्रावणाच्चातिदेवः । भक्तं भक्तानां वत्सलं वत्सलानां कीर्त्या युक्तुकृच्छेशाय प्रपद्ये शरण्यम् ॥ २२ ॥

श्रीकृष्ण बोले—देव ! आप ही रोदन (रोना), रावण (रुलाना), अतिशय 'रव' तथा जन्म-मरणरूप संसारका द्रावण (निवारण) करनेके कारण 'रुद्र' कहे गये हैं। आप सब देवताओंसे बढ़कर हैं। ईश ! मैं आपके भक्तोंका भक्त तथा स्नेहियोंका स्नेही हूँ, आप मुझे विजय-कीर्तिका भागी बनाइये। मैं आज आप शरणागतवत्सल प्रभुकी शरण लेता हूँ ॥ २२ ॥

ग्राम्यारण्यानां त्वं पतिस्त्वं पशूनां ख्यातो देवः पशुपतिः सर्वकर्मा । नान्यस्त्वत्तः परमो देवदेव जगत्पतिः सुरवीरारिहन्ता ॥ २३ ॥

देवदेव ! आप ही ग्रामीण और वन्य पशुओं (जीवों) के पति (पालक) हैं; इसीलिये आप भगवान् पशुपतिके रूपमें विख्यात हैं। यह सारा जगत् आपका ही कर्म है।

विष्णुपर्व ] चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ५१३


आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। आप ही जगदीश्वर तथा देववीरोंके शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं॥ २३॥

यस्मादीशो महतामीश्वराणां
$\quad$ भवोनाद्यः प्रीतिदः प्राणदश्च।
तस्माद्धि त्वामीश्वरं प्राहुरीशं
$\quad$ संतो विद्वांसः सर्वशास्त्रार्थतज्ज्ञाः ॥ २४॥

आप बड़े-बड़े ईश्वर-कोटिके पुरुषोंके भी ईश्वर हैं। आप ही आदिपुरुष, प्रीतिदाता तथा प्राणदाता हैं; इसीलिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले विद्वान् साधुपुरुष आपको ही ईश्वर तथा ईश कहते हैं॥ २४॥

भूतं यस्माज्जगदत्यन्त धीर
$\quad$ त्वत्तोऽव्यक्तादक्षरादक्षरेश ।
तस्मात् त्वामाहुर्भव इत्येव भूतं
$\quad$ सर्वेश्वराणां महतामप्युदारम् ॥ २५॥

अत्यन्त ! धीर! अक्षरेश्वर ! अतः आप अव्यक्त अविनाशी परमेश्वरसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है, अतः विद्वान् पुरुष आपको 'भव' कहते हैं। वास्तवमें तो आप 'भूत' (नित्यसिद्ध) हैं। महान् सर्वेश्वरोंके लिये भी अत्यन्त उदार हैं (फिर दीन-दुखियोंके लिये तो बात ही क्या है?)॥२५॥

यस्माज्जितैरभिषिक्तोऽसि सर्वै-
$\quad$ र्देवासुरैः सर्वभूतैश्च देव।
महेश्वरं विश्वकर्माणमाहु-
$\quad$ स्त्वां वै सर्वे तेन देवातिदेवम् ॥ २६॥

देव ! अतः पराजित हुए समस्त देवताओं, असुरों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंने आपका 'महान् ईश्वर' के पदपर अभिषेक किया है; अतः सभी विद्वान् आप विश्वनिर्माता भगवान्‌को 'महेश्वर' तथा 'देवातिदेव' (देवताओंसे बढ़कर महादेव) कहते हैं॥ २६॥

पूज्यो देवैः पूज्यसे नित्यदा वै
$\quad$ शश्वच्छ्रेयःकाङ्क्षिभिर्वरदामेयवीर्य ।
तस्माद् विख्यातो भगवान् देवदेवः
$\quad$ सतामिष्टः सर्वभूतात्मभावी ॥ २७॥

अमेय बल-पराक्रमसे सम्पन्न वरदायक महेश्वर ! अतः सदा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले देवता आप पूजनीय परमेश्वरकी नित्य पूजा करते हैं; अतः आप 'भगवान् देवदेव' (देवताओंके भी देवता) के रूपमे विख्यात हैं। सत्पुरुषोंके इष्टदेव आप ही हैं। आप समस्त भूतोंको अपने भीतर ही उत्पन्न करनेवाले हैं॥ २७॥


भूमिस्त्रयाणां देव यस्मात् प्रतिष्ठा
$\quad$ पुनर्लोकानां भावनामेयकीर्तिः ।
त्र्यम्बकेति प्रथमं तेन नाम
$\quad$ तवाप्रमेय त्रिदशेशनाथ ॥ २८॥

ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंके भी स्वामी अप्रमेयस्वरूप देव! बारंबार लोकोंको उत्पन्न करनेवाले लोकभावन ! अतः आप भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—इन तीनों लोकोंकी भूमियोंके आश्रय हैं, अतः आपका प्रथम (प्रमुख) नाम त्र्यम्बक (त्रिलोकीके आश्रय) है, आपकी कीर्ति अमेय है।२८।

शर्वः शत्रूणां शासनादप्रमेय-
$\quad$ स्तथा भूयः शासनाच्चेश्वरेण।
सर्वव्यापित्वाच्छङ्करत्वाच्च सद्भिः
$\quad$ शब्दस्येशानः श्रीकराकर्ग्यतेजाः ॥ २९॥

आप संहारकारी होनेके कारण शर्व कहलाते हैं, समस्त शत्रुओंका शासन करनेके कारण अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न हैं; फिर ईश्वररूपसे समस्त जगत्‌का शासन करनेके कारण भी आप अप्रमेय हैं, सर्वव्यापी तथा सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी होनेसे भी आपको अप्रमेय कहा गया है, श्री (लक्ष्मी) की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर ! आप सम्पूर्ण शब्दोंके भी ईश्वर हैं अर्थात् समस्त शब्दोंद्वारा आपका ही प्रतिपादन होता है। आपका उत्तम तेज सूर्यसे भी बढ़कर है॥ २९॥

संसक्तानां नित्यदा यत् करोषि
$\quad$ शर्म भ्रातृव्यान यद्यनैषीः समस्तान् ।
तस्माद् देवः शङ्करोऽस्यप्रमेयः
$\quad$ सद्भिर्धर्मज्ञैः कथ्यसे सर्वनाथः ॥ ३०॥

आप भक्तजनोंको जो सदा सुख और शान्ति प्रदान करते हैं तथा शत्रुभाव रखनेवाले समस्त असुरोंको जो दण्ड देते हैं, उसके कारण आप अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न कल्याणकारी देवता शङ्कर कहे जाते हैं। धर्मज्ञ संत आपको सर्वनाथ (सबके स्वामी या संरक्षक) कहते हैं॥ ३०॥

दत्तः प्रहारः कुलिशेन पूर्वं
$\quad$ तवेशान सुरराज्ञातिवीर्य ।
कण्ठे नीलं तेन ते यत् प्रवृत्तं
$\quad$ तस्मात् ख्यातस्त्वं नीलकण्ठेति कल्पः ॥ ३१॥

अत्यन्त पराक्रमी ईशान ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने आपके कण्ठमें जो वज्रसे प्रहार किया था और उससे जो वहाँ नील चिह्न बन गया था, उसके कारण आप नीलकण्ठ नामसे विख्यात हुए। आप समर्थ होते हुए भी दयावश ऐसे अपराध सह लेते हैं॥ ३१॥

यल्लिङ्गं यच्च लोके भगाङ्गं
$\quad$ सर्वं सोम त्वं स्थावरं जङ्गमं च।


१. अन्न अर्थात् मृत्युको लाघनेवाले । २. बुद्धिके प्रेरक ।
३. अक्षरों—अविनाशी जीवोंके ईश्वर ।
म० द० १७ —

५१४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


प्राहुर्विप्रास्त्वां गुणिनं तत्त्वविज्ञा-
स्तां ध्येयामम्बिकां लोकधात्रीम् ॥ ३२ ॥

उमासहित महेश्वर ! अतः संसारमें सब कुछ लिङ्ग और भगके चिह्नसे ही अङ्कित है, अतः यह समस्त चराचर जगत् आप दोनोंका ही स्वरूप है। तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपको गुणवान् और ध्येयस्वरूपा लोकजननी अम्बिकाको त्रिगुणरूपा कहते हैं ॥ ३२ ॥

वेदैर्गीर्णा सा हि तत् त्वं प्रसूता
यज्ञो दीक्षाणां योगिनां चातिरूपः।
नात्यद्भुतं त्वत्समं देव भूतं
भूतं भव्यं भवदेवाथ नास्ति ॥ ३३ ॥

वे अम्बिका ही वेदोंमें 'अजा' (माया) नामसे वर्णित हैं, वे ही महत्तत्त्वकी जननी हैं। आप यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले यजमानोंके द्रव्ययज्ञ तथा योगियोंके योगयज्ञ हैं। लौकिक रूपसे ऊपर उठे हुए दिव्य चिन्मय विग्रहधारी हैं। देव ! आपके समान अत्यन्त अद्भुत भूत (तत्त्व) भूत, वर्तमान और भविष्य कालमें भी दूसरा कोई नहीं है ॥ ३३ ॥

अहं ब्रह्मा कपिलो योऽप्यनन्तः
पुत्राः सर्वे ब्रह्मणश्चातिवीराः ।
त्वत्तः सर्वे देवदेव प्रसूता
एवं सर्वेशः कारणात्मा त्वमीड्यः ॥ ३४ ॥

देवदेव ! मैं, ब्रह्मा, कपिल, शेषनाग और आन्तरिक शत्रुओंपर विजय पानेके कारण अत्यन्त वीर (सनक आदि) सभी ब्रह्मपुत्र—ये सब-के-सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार आप सबके ईश्वर और कारणरूप होनेके कारण स्तुतिके योग्य हैं ॥ ३४ ॥

इति संस्तूयमानस्तु भगवान् गोवृषध्वजः।
प्रसार्य दक्षिणं हस्तं नारायणमथाब्रवीत् ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीकृष्णने जब स्तुति की, तब भगवान् वृषभध्वज शिवने अपना दाहिना हाथ फैलाकर भगवान् नारायणदेवसे इस प्रकार कहा— ॥ ३५ ॥

मनीषितानामर्थानां प्राप्तिस्ते सुरसत्तम ।
पारिजातं च हर्तासि मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥ ३६ ॥

'सुरश्रेष्ठ ! तुम्हें अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होगी। तुम पारिजातको अवश्य ले जाओगे। इसके लिये तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये ॥ ३६ ॥

यथा मैनाकमाश्रित्य तपस्त्वमकरोः प्रभो ।
तथा मम वरं कृष्ण संस्मृत्य स्थैर्यमाप्नुहि ॥ ३७ ॥

'प्रभो ! श्रीकृष्ण ! जैसे मैनाकका आश्रय लेकर तुमने तप किया, उसी तरह मेरी ओरसे तुम्हें वर भी मिला। उस वरको याद करके तुम स्थिरता (धैर्य) धारण करो ॥ ३७ ॥

अवध्यस्त्वमजेयश्च मत्तः शूरतरस्तथा ।
भवितासीत्यवोचं यत् तत् तथा न तदन्यथा ॥ ३८ ॥

'मैंने जो तुमसे कहा था कि तुम अवध्य, अजेय तथा मुझसे भी बढ़कर शूरवीर होओगे, वह बात उसी रूपमें सत्य होगी। उसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता ॥ ३८ ॥

यश्च स्तवेन मां भक्त्या स्तोष्यतेऽमरसत्तम ।
त्वया कृतेन धर्मज्ञ धर्मभाक् सम्भविष्यति ।
समरे च जयं धिष्ण्ये प्राप्य पूजां तथोत्तमाम् ॥ ३९ ॥

'धर्मज्ञ ! अमरश्रेष्ठ ! विष्णो ! जो भक्तिभावसे तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिके द्वारा मेरा स्तवन करेगा, वह समरभूमिमें विजय तथा उत्तम सम्मान पाकर धर्मका भागी होगा ॥ ३९ ॥

बिल्वोदकेश्वरो नाम भविताहमिहानघ ।
देवेश्वर त्वयास्यापि देव सिद्धोपयाचनः ॥ ४० ॥

'अनघ ! देवेश्वर ! देव ! तुमने जो मेरी यहाँ स्थापना की है, उसके अनुसार मैं बिल्वोदकेश्वर नामसे विख्यात होऊँगा। यहाँकी हुई याचना मेरे द्वारा अवश्य सफल होगी॥ ४० ॥

इहस्थोपोषितो विद्वान् भक्तिमान् मम केशव ।
त्रिरात्रमीप्सिताँल्लोकान् गमिष्यति जनार्दन ॥ ४१ ॥

'केशव ! जनार्दन ! जो विद्वान् पुरुष यहाँ उपवासपूर्वक रहकर मुझमें भक्तिभाव रखते हुए तीन रात उपवास करेगा, वह मनोवाञ्छित लोकोंमें जायगा ॥ ४१ ॥

अविन्ध्या नाम देशेऽस्मिन् गङ्गा चैव भविष्यति ।
गङ्गास्नानसमं स्नानं मन्त्रतो भविता तथा ॥ ४२ ॥

'इस प्रदेशमें अविन्ध्या नामसे प्रसिद्ध गङ्गा प्रवाहित होगी। उसमें गङ्गासम्बन्धी मन्त्रोच्चारणपूर्वक किया हुआ स्नान साक्षात् गङ्गा-स्नानके समान फलदायक होगा ॥ ४२ ॥

षट्पुरं नाम नगरं दानवानां जनार्दन ।
अन्तरन्तर्द्धरणीदेशे पराक्रम्य महाबलाः ॥ ४३ ॥

'जनार्दन ! यहाँ धरतीके भीतर दानवोंका 'षट्पुर' नामक नगर है, जहाँ पराक्रमपूर्वक महाबली दानव निवास करते हैं ॥ ४३ ॥

एते दैत्या दुरात्मानो जगतो देव कण्टकाः ।
छन्ना वसन्ति गोविन्द सानावस्य महागिरेः ॥ ४४ ॥

'देव ! ये दुरात्मा दैत्य जगत्के लिये कण्टकरूप हैं। गोविन्द ! ये इस महापर्वतके शिखरपर छिपे रहते हैं ॥ ४४ ॥

अवध्याः देवदेवानां वरेण ब्रह्मणोऽनघ ।
मानुषान्तरितस्तस्मात् त्वमेताञ्जहि केशव ॥ ४५ ॥

'अनघ ! ब्रह्माजीके दिये हुए वरके प्रभावसे ये दैत्य देवदेवोंके लिये अवध्य हैं; अतः केशव ! तुम मानव-शरीरकी आड़ लेकर इन सब दैत्योंको मार डालो' ॥ ४५ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः [ ५१५


एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ।
परिष्वज्य महात्मानं वासुदेवं जनाधिप ॥ ४६ ॥
जनेश्वर ! ऐसा कहकर महादेवजी महात्मा वासुदेवको हृदयसे लगाकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ४६ ॥

ततो याते महादेवे प्रभातायां नराधिप ।
तस्यां निशायां गोविन्दो भूयः पर्वतमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
नरेश्वर ! महादेवजीके चले जानेपर जब रात बीती और प्रभातकाल आया, तब भगवान् गोविन्दने पुनः उस पर्वतसे कहा—॥ ४७ ॥

तवाधः पर्वतश्रेष्ठ निवसन्ति महासुराः ।
अवध्या देवदेवानां वरेण ब्रह्मणः पुरा ॥ ४८ ॥
'पर्वतश्रेष्ठ ! तुम्हारे नीचे बड़े-बड़े असुर निवास करते हैं, जो पूर्वकालमें ब्रह्माजीका वर पानेके कारण देवाधिदेवोंके लिये भी अवध्य हैं ॥ ४८ ॥

निर्गमिष्यन्ति ते नैव मया रुद्धा महाबलाः ।
द्वारे निरुद्धे तत्रैव विनङ्क्ष्यन्ति ममाज्ञया ॥ ४९ ॥
'मैंने उन महाबली दैत्योंका द्वार बंद करके उन्हें अवरुद्ध कर दिया है। अब वे नहीं निकल सकेंगे। मेरी आज्ञासे द्वार अवरुद्ध हो जानेपर वहीं नष्ट हो जायेंगे ॥ ४९ ॥

त्वयि संनिहितश्चाहं भविष्यामि महागिरे ।
अधिष्ठाय महाघोरान् निवत्स्यामि च पर्वत ॥ ५० ॥
'महागिरे ! मैं सदा तुमपर निवास करूँगा। पर्वत ! उन महाभयानक असुरोंको दबाकर मैं यहीं रहूँगा ॥ ५० ॥

आरुह्य मूर्ध्नि मद्रूपं दृष्ट्वा पर्वतसत्तम ।
गोसहस्रप्रदानस्य फलं प्राप्स्यति शाश्वतम् ॥ ५१ ॥
'पर्वतप्रवर ! जो इस पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो मेरे अर्चाविग्रहका दर्शन करेगा, वह सहस्र गोदानका शाश्वत (अक्षय) फल प्राप्त करेगा ॥ ५१ ॥

त्वत्तोऽश्मभिश्च प्रतिमां कारयित्वा हि भक्तितः ।
शुश्रूषयन्ति ये नित्यं मम यास्यन्ति ते गतिम् ॥ ५२ ॥
'जो लोग तुम्हारे प्रस्तरोंसे मेरी प्रतिमा बनवाकर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करेंगे, वे मेरी गतिको प्राप्त होंगे' ॥ ५२ ॥

इति तं पर्वतं कृष्णो वरदोऽनुगृहीतवान् ।
तदाप्रभृति देवेशस्तत्र संनिहितोऽच्युतः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार वरदायक श्रीकृष्णने उस पर्वतपर अनुग्रह किया और तभीसे देवेश्वर अच्युत वहाँ निवास करने लगे ॥ ५३ ॥

पाषाणैः प्रतिमां तात कारयित्वा च कौरव ।
शुश्रूषन्ति कृतात्मानो विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ५४ ॥
तात कुरुनन्दन ! शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष विष्णुलोककी इच्छा रखते हुए पारियात्रके पत्थरोंसे भगवान्‌की प्रतिमा बनवाकर सदा उसकी सेवा करते हैं ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे श्रीकृष्णकृतशिवस्तुतिर्नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकृत शिवस्तुतिविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥


पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

इन्द्र और उपेन्द्रका पुनर्युद्ध, उत्पातोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिका बीचमें आकर दोनोंका युद्ध बंद कराना, फिर सबका स्वर्गमें गमन, अदितिकी आज्ञासे शचीद्वारा उपहार पाकर पारिजातसहित द्वारकागमन, पारिजातसे द्वारकावासियोंकी प्रसन्नता, सत्यभामाके पुण्यक व्रतमें प्रतिग्रहके लिये श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका वरण

वैशम्पायन उवाच
ततो रथवरं कृष्णः समारुह्य महामनाः ।
विल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य ययौ नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! तदनन्तर महामनस्वी श्रीकृष्ण विल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार करके अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले ॥ १ ॥

महेन्द्रमाह्वयामास रथस्थो मधुसूदनः ।
सत्कृतं पुष्कराभ्याशे सर्वैर्देवगणैः सह ॥ २ ॥
रथपर बैठे हुए मधुसूदनने पुष्करके निकट समस्त देवगणोंके साथ सत्कारपूर्वक खड़े हुए देवराज इन्द्रका युद्धके लिये आह्वान किया ॥ २ ॥

ततः शक्रो जयन्तोऽथ हरिभिर्युक्तमुत्तमम् ।
आरुरोह रथं देवः सर्वकामप्रदः सताम् ॥ ३ ॥
तब साधुओंको समस्त मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेवाले देवेन्द्र घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम रथपर जयन्तसहित आरूढ़ हुए ॥ ३ ॥

ततो रथस्थयोर्युद्धमभवत् कुरुनन्दन ।
देवयोर्देवयोगेन पारिजातकृते तदा ॥ ४ ॥

५१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


कुरुनन्दन ! तत्पश्चात् रथपर बैठे हुए उन दोनों देवताओंका दैववश पारिजातके लिये युद्ध आरम्भ हो गया ॥

ततोऽहन्दू रणे विष्णुर्बाणैः शत्रुबलार्दनः।
सैन्यानि देवराजस्य वाणजालैरजिह्मगैः ॥ ५ ॥

उस रणभूमिमें शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले श्रीकृष्णने अपने सीधे जानेवाले वाणसमूहोंद्वारा देवराज इन्द्रके सैनिकोंका संहार आरम्भ किया ॥ ५ ॥

उपेन्द्रं न महेन्द्रोऽथ नैव विष्णुः सुरेश्वरम्।
ताडयामासतुर्वीरौ शस्त्रैः शक्तावपि प्रभो ॥ ६ ॥

प्रभो ! वे दोनों वीर शक्तिशाली थे तो भी महेन्द्रने उपेन्द्रपर और उपेन्द्र विष्णुने देवेश्वर इन्द्रपर शस्त्रोंद्वारा प्रहार नहीं किया ॥ ६ ॥

एकैकमश्वं दशभिर्महेन्द्रस्य जनार्दनः।
विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैरस्त्रयुक्तैर्जनेश्वर ॥ ७ ॥

जनेश्वर ! जनार्दनने महेन्द्रके एक-एक अश्वको दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित दस-दस तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ७ ॥

शैव्याद्यानपि देवेन्द्रः शरैरमरसत्तमः।
छादयामास राजेन्द्र घोरैरस्त्राभिमन्त्रितैः ॥ ८ ॥

राजेन्द्र ! अमरश्रेष्ठ देवेन्द्रने भी दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भयंकर बाणोंसे श्रीकृष्णके शैव्य आदि चारों घोड़ोंको आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥

स च वाणसहस्रैश्च कृष्णो गजमवाकिरत्।
गरुडं च महातेजा वलभिद्धरिवाहनम् ॥ ९ ॥

श्रीकृष्णने इन्द्रके ऐरावत हाथीपर सहस्रों बाण बरसाये तथा महातेजस्वी वलविनाशन इन्द्रने श्रीहरिके वाहन गरुड़पर हजारों बाणोंकी वर्षा की ॥ ९ ॥

भूयिष्ठाभ्यां रथाभ्यां तौ तदहः शत्रुदारणौ।
युयुधाते महात्मानौ नारायणसुराधिपौ ॥ १० ॥

शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले महात्मा नारायण और देवेन्द्र उस दिन बड़े-बड़े रथोंद्वारा युद्ध कर रहे थे ॥ १० ॥

चकम्पे वसुधा कृत्स्ना नौर्जलस्थेव भारत।
दिशां दाहेन दिग्देशाः संवृताश्च समन्ततः ॥ ११ ॥

भारत ! उस समय जलमें ठहरी हुई नौकाकी भाँति सारी पृथ्वी काँपने लगी । दिशाओंके प्रदेश सब ओरसे दिग्दाहजनित आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देते थे ॥ ११ ॥

चेलुर्गिरिवराश्चैव पेतुश्च शतशो द्रुमाः।
पेतुश्च धरणीपृष्ठे मर्त्या धर्मगुणान्विताः ॥ १२ ॥

बड़े-बड़े पर्वत हिल गये । सैकड़ों वृक्ष गिर गये और धर्मात्मा मनुष्य भी धराशायी होने लगे ॥ १२ ॥

निर्घाताः शतशश्चैव पेतुस्तत्र नगाधिप।
ऊहुश्च सरितः सर्वाः प्रतिस्रोतो विशाम्पते ॥ १३ ॥

नरेश्वर ! वहाँ सैकड़ों बार वज्रपात हुआ तथा प्रजानाथ ! समस्त सरिताएँ अपने प्रवाहके प्रतिकूल उलटी दिशामें बहने लगीं ॥ १३ ॥

विव्वग्वाता ववुश्चैव पेतुरुल्काश्च निष्प्रभाः।
मुहुर्मुहुर्भूतसंघा रथनादेन मोहिताः ॥ १४ ॥

चारों ओर आँधी चलने लगी, प्रभाशून्य उल्काएँ गिरने लगीं और प्राणियोंके समुदाय रथोंकी घर्घरराहटसे बारंबार मोहित होने लगे ॥ १४ ॥

प्रजज्वाल जले चैव वह्निर्जनपदेश्वर।
युयुधुश्च ग्रहैः सार्द्धं ग्रहा नभसि सर्वतः ॥ १५ ॥

जनपदेश्वर ! पानीमें भी आग जलने लगी । आकाशमें सब ओर ग्रह दूसरे ग्रहोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १५ ॥

ज्योतींषि शतशः पेतुः स्वर्गाच्च धरणीतले।
दिशां गजाः प्रकुपिता नागाश्च धरणीतले ॥ १६ ॥

सैकड़ों तारे टूटकर स्वर्गसे पृथ्वीपर गिर पड़े । दिग्गज और पातालनिवासी नाग अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १६ ॥

गर्दभारुणसंस्थानैश्छिन्नाग्रैश्चावृतं नभः।
विनद्भिर्महारावैरुल्काशोणितवर्षिभिः ॥ १७ ॥

गदहोंकी भाँति धूसर और अरुण वर्णवाले बादलोंके टुकड़े बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाशमें छा गये और उल्कापात तथा रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ १७ ॥

न भूर्न द्यौर्न गगनं नरेन्द्रवृषभाभवन्।
स्वस्थानि सुरवीरौ तु दृष्ट्वा युद्धगतौ तदा ॥ १८ ॥

नरेन्द्रशिरोमणे ! उस समय उन दोनों देववीरोंको युद्धमें उपस्थित हुआ देख भूमि, अन्तरिक्ष तथा आकाशके प्राणी स्वस्थ न रह सके ॥ १८ ॥

जेपुर्मुनिगणा मन्त्रान्जगतो हितकाम्यया।
ब्राह्मणाश्च महात्मानो ह्यतिष्ठंस्तेषु सत्वराः ॥ १९ ॥

मुनिगण जगत्के हितकी कामनासे मन्त्रोंका जप करने लगे और महात्मा ब्राह्मण भी बड़ी उतावलीके साथ उन्हीं मन्त्रोंके जपमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥

ततो ब्रह्मा महातेजाः कश्यपं वाक्यमब्रवीत्।
गच्छ वध्वा सहादित्या पुत्रौ वारय सुव्रत ॥ २० ॥

तब महातेजस्वी ब्रह्माजीने कश्यपसे कहा—'सुव्रत ! तुम बहू अदितिके साथ जाओ और दोनों पुत्रोंको मना करो' ॥

स तथेति तदा देवमुक्तवा पद्मभवं मुनिः।
जगाम रथमास्थाय तस्थौ नरवरान्तिके ॥ २१ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ५१७


नरश्रेष्ठ! तब ब्रह्माजीसे 'बहुत अच्छा' कहकर मुनिवर कश्यप रथपर बैठकर गये और दोनों पुत्रोंके निकट खड़े हो गये ॥ २१ ॥

स्थितं तु कश्यपं दृष्ट्वा सहादित्या तदन्तरा ।
उभौ रथाभ्यां धरणीमवतीर्णौ महाबलौ ॥ २२ ॥

बीचमें अदितिसहित कश्यपको खड़ा हुआ देख वे दोनों महाबली वीर रथोंसे पृथ्वीपर उतर गये ॥ २२ ॥

न्यस्तशस्त्रौ च तौ वीरौ ववन्दतुररिंदमौ ।
पितरौ धर्मतत्त्वज्ञौ सर्वभूतहिते रतौ ॥ २३ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले उन दोनों वीरोंने हथियार नीचे डालकर समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मतत्त्वके ज्ञाता माता-पिताको प्रणाम किया ॥ २३ ॥

उभौ गृहीत्वा हस्ताभ्यामदितिस्त्वब्रवीद् वचः ।
असोदराविवैवं किमन्योन्यं हन्तुमिच्छतः ॥ २४ ॥

उस समय अदितिने दोनोंको हाथोंसे पकड़कर कहा— 'जो एक माताकी कोखसे पैदा न हुए हों, ऐसे दो व्यक्तियोंकी भाँति तुम दोनों एक-दूसरेको मारनेकी इच्छा क्यों करते हो?॥

स्वल्पमर्थं पुरस्कृत्य प्रवृत्तमतिदारुणम् ।
सदृशं नेति पश्यामि सर्वथा मम पुत्रयोः ॥ २५ ॥

'छोटी-सी वस्तुको सामने रखकर यह अत्यन्त दारुण कर्म आरम्भ हो गया। मैं सब प्रकारसे विचार करके देखती हूँ तो यह काम मुझे अपने पुत्रोंके योग्य नहीं दिखायी देता ॥

श्रोतव्यं यदि मातुश्च पितुश्चैव प्रजापतेः ।
न्यस्तशस्त्रौ स्थितौ भूत्वा कुरुतं वचनं मम ॥ २६ ॥

'यदि तुम दोनोंको माताकी बात सुननी है और अपने पिता प्रजापतिकी आज्ञाका पालन करना है तो तुम दोनों नीचे हथियार डालकर सामने खड़े हो जाओ और मैं जो कहूँ, उसे मानो' ॥ २६ ॥

तथेत्युक्त्वा च तौ देवौ स्नातुकामौ महाबलौ ।
गङ्गां जग्मतुरेवाथ प्रजल्पन्तौ परस्परम् ॥ २७ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर दोनों महाबली देवता स्नान-की इच्छासे परस्पर बात करते हुए गङ्गातटपर गये ॥ २७ ॥

शक्र उवाच

त्वं प्रभुर्लोककृत् कृत्स्नराज्येऽहं स्थापितस्त्वया ।
स्थापयित्वा कथं नाम पुनर्मामवमन्यसे ॥ २८ ॥

इन्द्रने कहा—श्रीकृष्ण ! तुम समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले प्रभु हो ! तुमने ही सारी त्रिलोकीके राज्यपर मुझे स्थापित किया है । स्थापित करके फिर किसलिये मेरा अपमान करते हो ? ॥ २८ ॥

भ्रातृत्वमुपगम्यैव ज्येष्ठत्वं चाप्यपोह्य च ।
कथं कमलपत्राक्ष निर्वाणं कर्तुमिच्छसि ॥ २९ ॥

कमलनयन ! तुम मेरे भाई होकर भी मेरी ज्येष्ठताको दूर हटाकर उसका कुछ भी खयाल न करके कैसे मेरे जीवन-दीपको सदाके लिये बुझा देना चाहते हो ? ॥ २९ ॥

स्नातौ तु जाह्नवीतोये पुनरभ्यागतौ नृप ।
यत्रादितिः कश्यपश्च महात्मानौ दृढव्रतौ ॥ ३० ॥

नरेश्वर ! गङ्गाजीके जलमें नहाकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और इन्द्र जहाँ कश्यप और अदिति विद्यमान थे, वहाँ पुनः आ पहुँचे ॥

प्रियसंगमनं नाम तं देशं मुनयोऽवदन् ।
यत्र तौ संगतौ चोभौ पितृभ्यां कमलेक्षणौ ॥ ३१ ॥

मुनिलोग उस स्थानका नाम प्रियसङ्गमन बतलाते हैं, जहाँ वे दोनों कमलोचन बन्धु माता-पितासे मिले थे ॥ ३१ ॥

ततः शक्रस्य कौरव्य दत्त्वा वाचामभयं तदा ।
यत्र देवगणाः सर्वे समेता धर्मचारिणः ॥ ३२ ॥

कुरुनन्दन ! तदनन्तर श्रीकृष्णने इन्द्रको उस स्थानपर अपनी वाणीद्वारा अभयदान दिया, जहाँ समस्त धर्माचारी देवता एकत्र थे ॥ ३२ ॥

ततो ययुर्विमानैस्तु देवाः सर्वे त्रिविष्टपम् ।
श्रद्धया परमया युक्तास्तेषामेवानुरूपया ॥ ३३ ॥

तत्पश्चात् सब देवता उत्तम समृद्धिसे, जो उन्हींके अनुरूप थी, युक्त हो अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको गये ॥

कश्यपश्चादितिश्चैव तथा शक्रजनार्दनौ ।
विमानमेकमारुह्य गता राजंस्त्रिविष्टपम् ॥ ३४ ॥

राजन् ! कश्यप, अदिति, इन्द्र और श्रीकृष्ण—ये सब लोग एक विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको गये ॥ ३४ ॥

ते शक्रसदनं प्राप्ता रम्यं सर्वगुणान्वितम् ।
ऊषुरेकत्र कौरव्य मुदिता धर्मचारिणः ॥ ३५ ॥

कुरुनन्दन ! सर्वसद्गुण-सम्पन्न रमणीय इन्द्रभवनमें पहुँचकर वे समस्त धर्माचारी महात्मा बड़े आनन्दके साथ एक ही जगह ठहरे ॥ ३५ ॥

शची तु कश्यपं पत्न्या सहितं धर्मवत्सला ।
उपाचरन्महात्मानं सर्वभूतहिते रतम् ॥ ३६ ॥

धर्मवत्सला शचीने समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पत्नीसहित महात्मा कश्यपकी परिचर्या की ॥ ३६ ॥

ततस्तस्यां प्रभातायां रजन्यामब्रवीद्धरिम् ।
अदितिर्धर्मतत्त्वज्ञा सर्वभूतहितं वचः ॥ ३७ ॥

तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब धर्मके तत्त्वको जाननेवाली अदितिने श्रीकृष्णसे यह समस्त प्राणियोंके लिये हितकर वचन कहा— ॥ ३७ ॥

५१८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

उपेन्द्र द्वारकां गच्छ पारिजातं नयस्व च।
वध्वा सम्प्रापयस्वैश पुण्यकं हृदये स्थितम्॥ ३८॥
'उपेन्द्र ! द्वारकाको जाओ और पारिजात भी लेते जाओ। ईश ! बहू सत्यभामाके हृदयमें जो पुण्यक नामक व्रतका उत्सव करनेकी इच्छा है, उसे पूर्ण कराओ॥ ३८॥

पुण्यके सत्यया प्राप्ते पुनरेष त्वया तरुः।
नन्दने पुरुषश्रेष्ठ स्थाप्यः स्थाने यथोचिते॥ ३९॥
'पुरुषश्रेष्ठ ! सत्यभामाद्वारा पुण्यक-व्रतका अनुष्ठान पूर्ण हो जानेपर फिर तुम्हीं इस वृक्षको नन्दनवनमें यथोचित स्थानपर स्थापित कर देना'॥ ३९॥

एवमस्त्विति कृष्णेन देवमाता यशस्विनी।
उक्ता धर्मगुणैर्युक्ता नारदेन महात्मना॥ ४०॥
तब श्रीकृष्णने यशस्विनी देवमाता अदितिसे, जिन्हें महात्मा नारदजीने धार्मिक गुणोंसे सम्पन्न बताया था, कहा—'ऐसा ही होगा'॥ ४०॥

ततोऽभिवाद्य पितरं मातरं च जनार्दनः।
महेन्द्रं सह शच्याथ प्रतस्थे द्वारकां प्रति॥ ४१॥
तदनन्तर पिता-माताको तथा शचीसहित महेन्द्रको प्रणाम करके श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुए॥ ४१॥

ददौ कृष्णाय पौलोमी नियोगान् कुरुनन्दन।
सर्वासामेव कृष्णस्य भार्याणां धर्मचारिणी॥ ४२॥
कुरुनन्दन ! उस समय धर्मचारिणी शचीने श्रीकृष्णकी सभी पत्नियोंके लिये बहुत-से उपहार दिये॥ ४२॥

दिव्यानां सर्वरत्नानां वाससां च मनस्विनी।
नानारागविरक्तानां सदैवारजसामपि॥ ४३॥
भार्याणां च सहस्राणि यानि षोडश माधवे।
प्रतिगृह्य महातेजाः प्रययौ द्वारकां प्रति॥ ४४॥
मनस्विनी शचीने उनकी सोलह हजार पत्नियोंके लिये सब प्रकारके दिव्य रत्न तथा भाँति-भाँतिके रंगोंमें रँगे हुए और कभी मलिन न होनेवाले बहुत-से वस्त्र श्रीकृष्णको अर्पित किये। महातेजस्वी श्रीकृष्ण वह सब उपहार लेकर द्वारकाको चले॥ ४३-४४॥

सम्पूज्यमानो द्युतिमान् खेचरैः पुण्यकर्मभिः।
ससात्यकिः सपुत्रश्च प्राप्तो रैवतकं गिरिम्॥ ४५॥
पुण्यकर्मा आकाशचारी प्राणियोंसे पूजित होते हुए तेजस्वी श्रीकृष्ण सात्यकि और अपने पुत्र प्रद्युम्नसहित रैवतक पर्वतपर आ पहुँचे॥ ४५॥

स तत्र स्थापयित्वा च पारिजातं वरद्रुमम्।
सात्यकिं प्रेषयामास द्वारकां द्वारशालिनीम्॥ ४६॥
श्रेष्ठ वृक्ष पारिजातको वहीं स्थापित करके श्रीकृष्णने सात्यकिको द्वारशालिनी द्वारकापुरीको भेजा॥ ४६॥

श्रीकृष्ण उवाच
पारिजातमहानीतं महेन्द्रसदनान्मया।
निवेदय महाबाहो भैमानां भीमवर्द्धन॥ ४७॥
श्रीकृष्ण बोले—भीमवंशी यादवोंमें भीमकुलकी वृद्धि करनेवाले महाबाहो ! तुम द्वारकामें जाकर यह सूचना दे दो कि मैं इन्द्रभवनसे पारिजात वृक्षको यहाँ लाया हूँ॥ ४७॥

अद्य द्वारवतीं चैव पारिजातमहं द्रुमम्।
प्रवेशयिष्ये नगरे शोभा प्रक्रियतां शुभा॥ ४८॥
आज मैं द्वारवतीपुरीमें पारिजात वृक्षका प्रवेश कराऊँगा; अतः नगरमें सुन्दर ढंगसे सजावट की जाय॥ ४८॥

इत्युक्तः सात्यको गत्वा तथोक्त्वा पुनरागतः।
कुमारैर्नागरैः सार्द्धं साम्बप्रभृतिभिः प्रभो॥ ४९॥
प्रभो ! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि नगरमें गये और उनका संदेश सुनाकर साम्ब आदि कुमारों तथा नागरिकोंके साथ फिर वहीं लौट आये॥ ४९॥

ततोऽग्रतः पारिजातमारोप्य गरुडे तदा।
प्रद्युम्नो द्वारकां रम्यां विवेश रथिनां वरः॥ ५०॥
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने पारिजातको अपने आगे गरुडपर रखकर सबसे पहले रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश किया॥

शैव्यादियुक्तयुक्तेन रथेनानुययौ हरिः।
तस्याथ रथमुख्येन सात्यकः साम्ब एव च॥ ५१॥
फिर शैव्य आदि घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा श्रीकृष्णने पारिजातका अनुसरण किया। उन्हींके श्रेष्ठ रथद्वारा सात्यकि और साम्ब भी गये॥ ५१॥

ये त्वन्ये नृप वार्ष्णेया यानैर्बहुविधैस्तथा।
ययुः प्रहृष्टास्तत् कर्म पूजयन्तो महात्मनः॥ ५२॥
नरेश्वर ! जो अन्य वृष्णिवंशी थे, वे अनेक प्रकारके वाहनोंद्वारा महात्मा श्रीकृष्णके उस कर्मकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षके साथ पुरीमें प्रविष्ट हुए॥ ५२॥

सात्यकाद् विस्तरं श्रुत्वा यादवा नागरास्तथा।
विस्मयं परमं जग्मुरप्रमेयस्य कर्मणा॥ ५३॥
सात्यकिसे पारिजात-हरणका विस्तृत समाचार सुनकर यादव तथा नागरिक अप्रमेयस्वरूप श्रीकृष्णके उस कर्मसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए॥ ५३॥

तं दिव्यकुसुमं वृक्षं दृष्ट्वाऽऽनर्तनिवासिनः।
राजन् न ततृपुर्दृष्ट्या पश्यमाना महोदयम्॥ ५४॥
राजन् ! उस महान् अभ्युदयकारी दिव्य पुष्पवाले वृक्षको देखकर आनर्तनिवासी बड़े प्रसन्न हुए। वे बारंबार देखनेपर भी तृप्त नहीं होते थे॥ ५४॥

तमद्भुतमचिन्त्यं च मदकेलिकलाण्डजम्।
वृक्षोत्तमं पश्यतां वै वृद्धानामगमज्जरा॥ ५५॥

विष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ५१९


उस वृक्षपर बहुत-से पक्षी मदमत्त होकर केलिकलामें आसक्त हो रहे थे। उस अद्भुत, अचिन्त्य एवं उत्तम वृक्षका दर्शन करनेवाले वृद्धोंकी वृद्धावस्था तत्काल दूर हो गयी ॥

ये त्वन्धचक्षुषः सर्वे तेऽभवन् दिव्यचक्षुषः ।
विरोगा रोगिणश्चासन् घ्रात्वा गन्धं वनस्पतेः ॥ ५६ ॥

उस वनस्पतिकी गन्ध सूंघकर रोगी नीरोग हो गये और जिनकी आँखें पहले अंधी थीं, वे उस समय दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हो गये ॥ ५६ ॥

लपन्तः कोकिलाञ्श्वेताञ्छुत्वाऽऽनर्तनिवासिनः ।
बभूवुर्हृष्टमनसो ववन्दुश्च जनार्दनम् ॥ ५७ ॥

पारिजात वृक्षपर सफेद कोकिलोंको मधुर बोली बोलते सुनकर आनर्त देशके निवासी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् जनार्दनकी वन्दना करने लगे ॥ ५७ ॥

नानाविधानि तूर्याणि गेयानि मधुराणि च ।
शुश्रुवुस्तस्य वृक्षस्य नातिदूरं गता नराः ॥ ५८ ॥

उस वृक्षके समीप गये हुए मनुष्य नाना प्रकारके वाद्य और मीठे-मीठे गीत सुनते थे ॥ ५८ ॥

योऽयं संकल्पयामास गन्धं हृद्यं नरस्तथा ।
स तदैव तमाजघ्रे पारिजातसमुद्भवम् ॥ ५९ ॥

मनुष्य अपने मनमें जिस-जिस मनोरम सुगन्धके लिये संकल्प करते थे, वही तत्काल पारिजात वृक्षसे उनकी घ्राणेन्द्रियमें प्रकट हो जाती थी ॥ ५९ ॥

ततः प्रविश्य रम्यां तु द्वारकां यदुनन्दनः ।
वसुदेवं महात्मानं ददर्श देवकीं तथा ॥ ६० ॥

तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश करके महात्मा वसुदेव तथा माता देवकीका दर्शन किया॥

कुकुराधिपतिं चैव बलं भ्रातरमेव च ।
वृद्धांश्च यादवानां ये मानार्हानमरोपमान् ॥ ६१ ॥

फिर क्रमशः कुकुरवंशके अधिपति उग्रसेन, भैया बलराम तथा यादवोंमें जो बड़े-बूढ़े माननीय देवोपम पुरुष थे, उन सबसे वे मिले ॥ ६१ ॥

विसृज्य तान् वै भगवाननादिनिधनोऽच्युतः ।
सम्पूज्य च यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ॥ ६२ ॥

तत्पश्चात् उन सबका यथोचित पूजन करके उन्हें विदा करनेके पश्चात् आदि-अन्तसे रहित भगवान् अच्युत अपने ही भवनमें चले गये ॥ ६२ ॥

स सत्यभामया वासं विवेश मधुसूदनः ।
पारिजातं तरुश्रेष्ठं ग्राह्य गदपूर्वजः ॥ ६३ ॥

गदके बड़े भाई उन मधुसूदनने तरुश्रेष्ठ पारिजात-को लेकर सत्यभामाके भवनमें प्रवेश किया ॥ ६३ ॥

सा देवी पूजयामास प्रहृष्टा वासवानुजम् ।
प्रतिजग्राह तं चापि पारिजातं महाद्रुमम् ॥ ६४ ॥

देवी सत्यभामाने अत्यन्त प्रसन्न होकर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णका पूजन किया और उस विशाल वृक्ष पारिजात-को ले लिया ॥ ६४ ॥

मनीषितेन स तरुरल्पो भवति भारत ।
महांश्च वासुदेवस्य तदद्भुतमभून्महत् ॥ ६५ ॥

भारत ! वह वृक्ष वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार कभी छोटा हो जाता था और कभी बहुत बड़ा। यह उसके विषयमें बड़ी ही अद्भुत बात थी ॥ ६५ ॥

कदाचिद् द्वारकां सर्वां प्रच्छादयति भारत ।
कदाचिद्धस्तधार्यस्तु भवत्यङ्गुष्ठसंनिभः ॥ ६६ ॥

भरतनन्दन ! कभी तो वह वृक्ष इतना अधिक बढ़ जाता कि सारी द्वारकाको आच्छादित कर लेता था और कभी हाथपर रख लेने योग्य अङ्गूठेके बराबर हो जाता था ॥ ६६ ॥

ननन्द सत्या कौरव्य देवी प्राप्य मनोरथम् ।
पुण्यकार्थे तु सम्भारान् सम्भर्तुमुपचक्रमे ॥ ६७ ॥

कुरुनन्दन ! देवी सत्या उस मनोवाञ्छित वृक्षको पाकर बहुत प्रसन्न हुई । उन्होंने पुण्य-व्रतके लिये सामान जुटाना आरम्भ किया ॥ ६७ ॥

यानि द्रव्याणि कौरव्य जम्बूद्वीपे तु कानिचित् ।
योग्यानि तानि कृष्णेन सम्भृतानि महात्मना ॥ ६८ ॥

कुरुकुलभूषण ! जम्बूद्वीपमें जो कोई भी उपयुक्त द्रव्य थे, उन सबका महात्मा श्रीकृष्णने संग्रह कर लिया ॥ ६८ ॥

मुनिं तदा संस्मृतवान् स नारदं
जनार्दनः सर्वगुणोचितं वशी ।
प्रतिग्रहार्थं व्रतकस्य सत्यया
यथोपदिष्टस्य पुरंदरानुजः ॥ ६९ ॥

उस समय इन्द्रके छोटे भाई जितेन्द्रिय जनार्दनने सत्य-भामाको बताये और उनके द्वारा आचरणमें लाये गये पुण्यक-व्रतमें दिये जानेवाले दानको ग्रहण करनेके लिये सर्वगुणसम्पन्न नारद मुनिका स्मरण किया ॥ ६९ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे, हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातानयने पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातका आनयनविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

५२० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

षट्सप्ततितमोऽध्यायः

सत्यभामाद्वारा पुण्यक-व्रतमें श्रीकृष्णका नारदजीको दान, नारदजीका निष्क्रय लेकर श्रीकृष्णको छोड़ना और उनसे वर पाना, श्रीकृष्णका सगे-सम्बन्धियोंको पारिजात दिखाकर पुनः उसे स्वर्गमें पहुँचाना

वैशम्पायन उवाच
अथ कृष्णस्य कौरव्य ध्यातमात्रस्तपोधनः।
आजगाम मुनिश्रेष्ठो नारदो वदतां वरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! श्रीकृष्णके चिन्तन करते ही तपस्याके धनी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥

सम्पूजयित्वा विधिवद् वासुदेवो विशाम्पते।
प्रतिग्रहार्थं विधिवच्छ्रीमान् भक्त्या न्यमन्त्रयत् ॥ २ ॥

प्रजानाथ ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने विधिपूर्वक नारदजीकी पूजा करके भक्तिभावसे प्रतिग्रह लेनेके लिये उन्हें सविधि निमन्त्रण दिया ॥ २ ॥

ततः काले च सम्प्राप्ते स्नातं देवो महामुनिम्।
सम्पूज्य माल्यैर्गन्धैश्च भोजयामास भारत ॥ ३ ॥
सार्वकामिकमन्नाद्यं सर्वभूतकृदव्ययः।
सत्यया प्रियया सार्द्धं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ४ ॥

भारत ! तदनन्तर भोजनका समय प्राप्त होनेपर स्नान किये हुए महामुनि नारदका गन्ध और माल्य आदिके द्वारा पूजन करके सर्वभूतस्रष्टा सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्यारी पत्नी सत्याके साथ अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन्हें सबकी रुचिके अनुकूल भोजन कराया ॥ ३-४ ॥

पुष्पदामावसज्याथ कण्ठे कृष्णस्य भामिनी।
बबन्ध कृष्णं सुभगा पारिजाते वनस्पती ॥ ५ ॥

सौभाग्यशालिनी भामिनी सत्यभामाने श्रीकृष्णके कण्ठमें फूलकी माला डालकर उन्हें पारिजात वृक्षमें बाँध दिया ॥ ५ ॥

अद्भिर्ददौ नारदाय ततोऽनुज्ञाप्य केशवम्।
देवी धेनुसहस्रं च काञ्चनस्य च पर्वतम् ॥ ६ ॥
हिरण्यरूप्यमिश्रं च मणिरत्नप्रभस्य च।
तिलमिश्रस्य च तथा धान्यैरन्यैर्युतस्य च ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर देवी सत्याने नारदजीको जलके द्वारा श्रीकृष्णका दान कर दिया। साथ ही एक सहस्र धेनु तथा सोनेका पर्वत भी दिया। वह पर्वत मणि एवं रत्नोंकी प्रभासे युक्त था। उसमें तिलका भी सम्मिश्रण किया गया था तथा अन्य प्रकारके धान्योंसे भी वह सम्पन्न था। उस काञ्चन पर्वतके साथ सोने और चाँदीका भी संयोग था ॥ ६-७ ॥

प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं नारदो मुनिसत्तमः।
स सम्प्रहृष्टो भुक्त्वाथ भूयः केशवमब्रवीत् ॥ ८ ॥

मुनिश्रेष्ठ नारद वह सारा दान ग्रहण करके बड़े प्रसन्न हुए और भोजन करके पुनः श्रीकृष्णसे बोले—॥ ८ ॥

भोः केशव मदीयस्त्वमद्भिर्दत्तोऽसि सत्यया।
स त्वं मामनुगच्छस्व कुरु यद्यद् ब्रवीम्यहम् ॥ ९ ॥

'हे केशव ! अब आप मेरे हो गये; क्योंकि सत्याने जलके साथ आपका दान कर दिया है; अतः आप मेरे पीछे-पीछे आइये और मैं जो आज्ञा दूँ, उसका पालन कीजिये' ॥ ९ ॥

प्रथमः पक्ष इत्येवमब्रवीन्मधुसूदनः।
व्रजन्तमनुवव्राज नारदं च जनार्दनः ॥ १० ॥

तब जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'यही मुख्य पक्ष है।' ऐसा कहकर वे जाते हुए नारदजीके पीछे-पीछे चले ॥ १० ॥

परिहासं बहुविधं कृत्वा मुनिवरस्तदा।
तिष्ठस्व गच्छामीत्युक्त्वा परिहासविचक्षणः ॥ ११ ॥
अपनीय ततः कण्ठात् पुष्पद्दामैनमब्रवीत्।
कपिलां गां सवत्सां भो निष्क्रयार्थं प्रयच्छ मे ॥ १२ ॥

तब परिहासमें कुशल मुनिवर नारदजीने नाना प्रकारका परिहास करके कहा—'अच्छा, अब आप रहिये। मैं जाता हूँ।' ऐसा कहकर उनके कण्ठसे फूलकी माला हटाकर उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—'मुझे निष्क्रयके लिये बछड़े-सहित कपिला गौका दान कीजिये ॥ ११-१२ ॥

कृष्णाजिनं तिलैः पूर्णं प्रयच्छ च सकाञ्चनम्।
एषोऽत्र निष्क्रयः कृष्ण विहितो वृषकेतुना ॥ १३ ॥

'श्रीकृष्ण ! तिलके साथ काला मृगचर्म और सुवर्ण भी दीजिये। भगवान् शङ्करने यहाँ यही निष्क्रय नियत किया है' ॥ १३ ॥

तथेत्युक्त्वा हृषीकेशस्तथा चक्रे जनाधिप।
स उवाच मुनिश्रेष्ठं हसित्वा मधुसूदनः ॥ १४ ॥

जनेश्वर ! तब 'तथास्तु' कहकर हृषीकेश मधुसूदनने वैसा ही किया। फिर हँसकर वे मुनिश्रेष्ठ नारदसे बोले—॥ १४ ॥

वरं वृणु धर्मज्ञ यस्ते नारद काङ्क्षितः।
तत्ते दातास्मि धर्मज्ञ परा प्रीतिर्हि मे त्वयि ॥ १५ ॥

सत्यभामाजीके द्वारा नारदजीको श्रीकृष्णका दान (पृष्ठ-संख्या ५२०)

विष्णुपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ५२१


'धर्मज्ञ नारद ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुम्हें वह वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा बहुत प्रेम है' ॥ १५ ॥

नारद उवाच
नित्यमेवास्तु मे प्रीतो भवान् विष्णो सनातन ।
त्वत्प्रसादात्तु सालोक्यं व्रजेयं ते महामते ॥ १६ ॥

**नारदजीने कहा—**सनातन विष्णो ! महामते ! आप मुझपर सदा ही प्रसन्न रहें और आपकी कृपासे मुझे आपही-का सालोक्य प्राप्त हो ॥ १६ ॥

अयोनिजो भवेयं ते नारायण सतां गते ।
भवेयं ब्राह्मणश्चैव पुनर्जात्यन्तरेष्वपि ॥ १७ ॥

सत्पुरुषोंके आश्रयभूत नारायण ! मैं आपकी कृपासे अयोनिज होऊँ और जन्मान्तरोंमें भी पुनः ब्राह्मण ही होऊँ ॥ १७ ॥

एवमस्त्विति तं देवो विष्णुः प्रोवाच भारत ।
तुतोष च ततो धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ १८ ॥

भारत ! तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'एवमस्तु (ऐसा ही हो) ।' यह वरदान पाकर बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारद बहुत संतुष्ट हुए ॥ १८ ॥

षोडश स्त्रीसहस्राणि विष्णोरतुलतेजसः ।
निमन्त्रितानि कौरव्य सत्यया हरिकान्तया ॥ १९ ॥

कुरुकुलनन्दन ! श्रीकृष्णप्रिया सत्याने अतुल तेजस्वी श्रीहरिकी सोलह हजार स्त्रियोंको अपने भवनमें निमन्त्रित किया ॥ १९ ॥

तासां ददौ संनियोगमेकैकं हरिवल्लभा ।
शच्या यो वासुदेवस्य पुरा दत्तो नराधिप ॥ २० ॥

नरेश्वर ! पहले शचीने भगवान् वासुदेवको जो भेंट-सामग्री दी थी, श्रीकृष्णवल्लभा सत्यभामाने उसमेंसे एक-एक वस्तुको लेकर उन सबको दिया ॥ २० ॥

पारिजातो वसंस्तत्र ततः प्रववृते तदा ।
आज्ञया वासुदेवस्य नारदेन महात्मना ॥ २१ ॥
निमन्त्रिता गणाः सर्वे केशवेन महात्मना ।
विभूतिं पारिजातस्य ददृशुः कुरुनन्दन ॥ २२ ॥

पारिजात वृक्ष वहाँ रहकर अपने गुणोंको प्रसिद्ध करने लगा । तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महात्मा नारदने उनके समस्त सुहृदोंको निमन्त्रित किया । कुरुनन्दन ! महात्मा केशवद्वारा निमन्त्रित हुए उन सब लोगोंने अपनी आँखोंसे पारिजात वृक्षका वैभव देखा ॥ २१-२२ ॥

पाण्डवांश्चानयामास सहैव पृ॑थया हरिः ।
द्रौपद्या च महातेजास्तथैव च सुभद्रया ॥ २३ ॥

महातेजस्वी श्रीहरिने कुन्ती, द्रौपदी और सुभद्राके साथ पाण्डवोंको भी द्वारकामें बुलवाया ॥ २३ ॥

श्रुतश्रवां च ससुतां भीष्मकं ससुतं तदा ।
अन्यानपि च कौरव्य मित्रसम्बन्धिबान्धवान् ॥ २४ ॥

कुरुनन्दन ! श्रुतश्रवा और उसके पुत्र शिशुपालको, भीष्मक और उसके पुत्र रुक्मीको तथा अन्यान्य मित्रों, सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंको श्रीकृष्णने वहाँ बुलवाया था २४

रेमे च सह पार्थेन फाल्गुनेन जनार्दनः ।
सान्तःपुरो महातेजाः परमर्द्धयावसन्नृप ॥ २५ ॥

नरेश्वर ! महातेजस्वी जनार्दन कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ रनवाससहित वहाँ क्रीड़ाविनोदपूर्वक बड़े आनन्दसे रहे । वे उच्चकोटिकी समृद्धिसे सम्पन्न होकर द्वारकामें निवास करते थे ॥ २५ ॥

संवत्सरे ततो याते केशिहामरसत्तमः ।
पारिजातं पुनः स्वर्गमानयत् सर्वभावनः ॥ २६ ॥

एक वर्ष बीत जानेपर सबको उत्पन्न करनेवाले अमर-शिरोमणि केशिहन्ता श्रीकृष्णने पारिजात वृक्षको पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ २६ ॥

तत्रादितिं कश्यपं च दृष्ट्वा स्वजननीं प्रभुः ।
शक्रेण सहितो धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २७ ॥

अप्रमेय पराक्रमशाली बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ इन्द्रसहित जाकर पिता कश्यप तथा अपनी माता अदितिका दर्शन किया ॥ २७ ॥

तमुवाचादितिर्माता प्रणतं मधुसूदनम् ।
सौभ्रात्रमस्तु वामेवं नित्यं चामरसत्तम ॥ २८ ॥
मनोरथं मम त्वं च पूरयस्व जनार्दन ।

उस समय अपने चरणोंमें पड़े हुए मधुसूदनसे माता अदितिने कहा—'अमरश्रेष्ठ ! तुम दोनोंमें सदा ही अच्छा भ्रातृभाव बना रहे । जनार्दन ! तुम मेरे इसी मनोरथको पूर्ण करो' ॥ २८½ ॥

तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णस्ततो मातरमात्मवान् ॥ २९ ॥
आमन्त्रयित्वा पितरौ देवराजानमब्रवीत् ।
वासुदेवो महातेजाः कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३० ॥

तब मनस्वी श्रीकृष्णने माता अदितिसे कहा—'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' तत्पश्चात् पिता-मातासे विदा ले महातेजस्वी वासुदेवने देवराज इन्द्रसे यह समयोचित बात कही—॥ २९-३० ॥

महादेवेन देवेश संदिष्टोऽस्मि महात्मना ।
अन्तर्भूमितलेऽबध्यान्सुरान् प्रति मामद ॥ ३१ ॥

५२२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! महात्मा महादेवजीने भूमिके भीतर निवास करनेवाले अवध्य असुरोंका वध करनेके लिये मुझे आदेश दिया है ॥ ३१ ॥

तदितो दशरात्रेण हन्ताहमसुरोत्तमान् ।
तत्रोपविष्टान् स्थातव्यं प्रवरेण महात्मना ॥ ३२ ॥
जयन्तेन च वीरेण दानवानां जिघांसया ।

'अतः मैं आजसे लेकर दस रातके भीतर भूमिके भीतर बैठे हुए उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर डालूँगा। वहाँ दानवोंके वधकी इच्छासे महात्मा प्रवर तथा वीर जयन्तको भी मेरे साथ रहना चाहिये ॥ ३२½ ॥

एकोऽत्र मानुषो देवो देवपुत्रस्तथा परः ॥ ३३ ॥
अवध्याः किल ते देवैर्ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
अस्माभिः किल हन्तव्यां मानुषत्वमुपागतैः ॥ ३४ ॥

'इनमेंसे एक (प्रवर) तो मनुष्य देव है और दूसरा (जयन्त) देवपुत्र। ब्रह्माजीके वरसे मदमत्त हुए वे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं; परंतु मनुष्य-भावको प्राप्त हुए हमलोग उन्हें अवश्य मार डालेंगे' ॥ ३३-३४ ॥

तथेति कृष्णं स हरिः प्रीतरूपस्तथाब्रवीत् ।
सस्वजाते ततो देवावन्योन्यं जनमेजय ॥ ३५ ॥

जनमेजय ! तब इन्द्रने प्रसन्न होकर श्रीकृष्णसे कहा— 'ऐसा ही होगा।' फिर वे दोनों देवता एक-दूसरेसे गले मिले ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे स्वर्गे पारिजातस्थापने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें पारिजातकी पुनः स्वर्गलोकमें स्थापनाविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥


सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

पुण्यक-विधिके वर्णनका उपक्रम

जनमेजय उवाच
पुण्यकानां ममोत्पत्तिं कथयस्व द्विजोत्तम ।
द्वैपायनप्रसादेन सर्वं हि विदितं तव ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ ! पुण्यकोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है, यह मुझे बताइये; क्योंकि द्वैपायन व्यासकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
उमया पुण्यकविधिर्नरेन्द्रोत्पादितः पुरा ।
शृणु येन विधानेन लोके धर्मभृतां वर ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र ! पूर्वकालमें भगवती उमाने पुण्यकव्रतकी विधिक प्रतिपादन किया है। उसके अनुसार लोकमें जिस विधानसे व्रत किया जाता है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥

स्वर्गान्नीते पारिजाते कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
ययौ द्वारवतीं धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ ३ ॥

जब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण स्वर्गसे पारिजात वृक्षको द्वारकामें ले गये, उस समय बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ पधारे ॥ ३ ॥

देवासुरे नृपश्रेष्ठ संग्रामे समुपस्थिते ।
षट्‌पुरस्य वधे घोरे महादेवाज्ञयानघ ॥ ४ ॥

निष्पाप नृपश्रेष्ठ ! जब महादेवजीकी आज्ञासे देवासुर-संग्रामका अवसर उपस्थित था और षट्पुरवासी दानवोंका घोर वध होनेवाला था, उसी समयकी बात है ॥ ४ ॥

कृष्णेन सहितं विप्रं नारदं धर्मवित्तमम् ।
आसीनं परिपप्रच्छ रुक्मिणी भैष्मिकी नृप ॥ ५ ॥

नरेश्वर ! धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारदजी श्रीकृष्णके साथ बैठे थे। उस समय भीष्मककुमारी रुक्मिणीने उनसे पूछा ॥ ५ ॥

तत्र जाम्बवती देवी सत्यभामा च भामिनी ।
गान्धारराजपुत्री च योगयुक्ता नराधिप ॥ ६ ॥
देव्यश्च नृप कृष्णस्य वह्व्योऽन्या वै समागताः ।
कुलशीलगुणोपेता धर्मशीलाः पतिव्रताः ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! वहाँ रुक्मिणीके साथ जाम्बवती देवी, भामिनी सत्यभामा, गान्धारराजकुमारी योगयुक्ता शैव्या तथा श्रीकृष्णकी अन्य बहुत-सी कुलवती, सुशीला, गुणवती, धर्मशीला एवं पतिव्रता पत्नियाँ भी आयी हुई थीं ॥ ६-७ ॥

रुक्मिण्युवाच
मुने धर्मभृतां श्रेष्ठ धर्मज्ञानभृतां वर ।
उत्पत्तिं पुण्यकानां त्वं वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥ ८ ॥

रुक्मिणीने कहा—धर्मात्माओं और ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मुने ! आप मुझे पुण्यकोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥

विष्णुपर्व ] [ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ] ५२३

विधिं च फलयोंग च दानकालं तथैव च । कौतूहलं नस्तत्सिद्धिं वदस्व वदतां वर ॥ ९ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवर्षे ! उस पुण्यकव्रतकी विधि, फलयोंग और दानकाल क्या है ? उसकी सिद्धि कैसे होती है ? यह सब बताइये । हमें उसके विषयमें सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ९ ॥

नारद उवाच

शृणु वैदर्भि धर्मज्ञे सपत्नीभिः सहानघे । पुण्यकानां विधिः प्रोक्तो यथा देवि पुरोमया ॥ १० ॥

नारदजीने कहा—धर्मको जाननेवाली निष्पाप विदर्भनन्दिनि ! देवि ! पूर्वकालमें उमादेवीने पुण्यकोंकी जैसी विधि बतायी थी, उसे तुम अपनी सौतोंके साथ सुनो ॥ १०॥

चचारोमा व्रतं देवी पुण्यकानां शुचिव्रता । व्रतावसानेऽथ तथा सख्यो देवि निमन्त्रिताः ॥ ११ ॥

देवि ! पवित्र व्रत धारण करनेवाली उमादेवीने जब पुण्यकोंका व्रत किया था, उस समय व्रतके अन्तमें उन्होंने अपनी सखियोंको निमन्त्रित किया ॥ ११ ॥

अदित्याद्याः सुताः सर्वा दक्षस्याक्लिष्टकर्मणः । पौलोमी च शची देवी ख्याता लोके पतिव्रता ॥ १२ ॥ रोहिणी च महाभागा सोमस्य दयिता सती । फाल्गुनी च तथा पूर्वा रेवती च विशाम्पते ॥ १३ ॥ तथा शतभिषा चैव मघा च कुरुनन्दन । एताभिर्हि महादेवी पूर्वमाराधिता सती ॥ १४ ॥

प्रजानाथ ! कुरुनन्दन ! अनायास ही सृष्टिसम्बन्धी महान् कर्म करनेवाले प्रजापति दक्षकी अदिति आदि समस्त पुत्रियाँ, लोकविख्यात पतिव्रता पुलोमकुमारी शची देवी, सोमकी प्यारी पत्नी सती साध्वी महाभागा रोहिणी, पूर्वा फाल्गुनी, रेवती, शतभिषा और मघा—ये सब-की-सब निमन्त्रित होकर वहाँ आयी थीं । इन सबने पूर्वकालमें सती महादेवी उमाकी आराधना की थी ॥ १२-१४ ॥

गङ्गा सरस्वती चैव वेणी गोदा च निम्नगा । तथा वैतरणी चैव गण्डकी या च भारत ॥ १५ ॥ अन्याश्च सरितो रम्या लोपामुद्रा च भारत । सत्यश्चान्या जगद् देव्यो धारयन्ति हिताः शुभाः॥ १६ ॥

भारत ! गङ्गा, सरस्वती, वेणी, गोदावरी, वैतरणी और गण्डकी—ये तथा और भी बहुत सी रमणीय सरिताएँ वहाँ आयी थीं । लोपामुद्रा और अन्य शुभलक्षणा सती देवियाँ, जो अपने धर्मसे इस जगत्‌को धारण करती हैं, वहाँ उपस्थित थीं ॥ १५-१६ ॥

शुभाश्च गिरिनन्दिन्यो वह्निकन्याश्च सुव्रताः । स्वाहा वह्निप्रिया देवी सावित्री च यशस्विनी ॥ १७ ॥ ऋद्धिः कुबेरकान्ता च जलेशमहिषी तथा । भार्या पितृपतेश्चैव वसुपत्न्यस्तथा च याः ॥ १८ ॥

सुन्दरी गिरिकन्याएँ, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अग्नि-कन्याएँ, अग्निदेवकी प्यारी पत्नी स्वाहा देवी, यशस्विनी सावित्री देवी, कुबेरकान्ता ऋद्धि, जलके स्वामी वरुणकी रानी, यमराजकी भार्या तथा वसुओंकी पत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित हुई थीं ॥ १७-१८ ॥

ह्रीः श्रीर्धृतिस्तथा कीर्तिराशा मेधा च सुव्रताः । प्रीतिर्मतिश्च ख्यातिश्च संनीतिश्च तपोधनाः ॥ १९ ॥

ह्री, श्री, धृति, कीर्ति, आशा, मेधा, प्रीति, मति, ख्याति और संनीति—ये सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तपोधना नारियाँ भी वहाँ एकत्र हुई थीं ॥ १९ ॥

देव्यः सत्यस्तथैवान्याः सर्वभूतहिते रताः । तासां व्रतावसाने च पूजां चक्रेऽम्बिका तदा ॥ २० ॥

इनके सिवा और भी समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाली सती देवियाँ उपस्थित थीं । अम्बिकाने व्रतके अन्तमें उन सबका पूजन किया ॥ २० ॥

तिलरत्नमयं दत्त्वा पर्वतं सर्वधान्यवत् । वासोभिर्भूषणैर्मुख्यैर्नानारागैः सुमध्यमे ॥ २१ ॥

सुमध्यमे ! तिल और रत्नोंद्वारा निर्मित हुए सम्पूर्ण धान्योंसे युक्त पर्वतका दान करके उमाने अनेक रंगोंके अच्छे-अच्छे वस्त्रों और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनकी पूजा की ॥ २१ ॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां दत्तां देव्या तपोधनाः । उपविष्टाः कथाश्चित्राः कुर्वन्त्यो भर्तृदेवताः ॥ २२ ॥

उमादेवीद्वारा दी गयी उस पूजाको ग्रहण करके वे तपोधना एवं पतिव्रता देवियाँ वहाँ बैठकर आपसमें विचित्र कथावार्ता करने लगीं ॥ २२ ॥

पुण्यकार्थे कथास्तासामासन्न देवी शशंस याः । विधिं च पुण्यकस्याथ सतीनां भर्तृदेवते ॥ २३ ॥

पतिदेवते ! उन सब देवियोंकी चर्चाका विषय था पुण्यकव्रत—ये उसके विषयमें जिज्ञासा करती थीं । उस समय देवी उमाने उन सतियोंको पुण्यकव्रत और उसकी विधिका उपदेश दिया था ॥ २३ ॥

तासां मतेन साध्वीनां सर्वासां सोमनन्दिनी । पर्यपृच्छदुमां देवीं पुण्यकानां विधिं वरा ॥ २४ ॥

वहाँ जुटी हुई उन सभी साध्वी देवियोंके मतसे श्रेष्ठ पतिव्रता सोमनन्दिनी अरुन्धतीने उमादेवीसे पुण्यकोंकी विधि पूछी ॥ २४ ॥

उमा तासां प्रियार्थं तु पुण्यकान्यब्रवीत् तदा । समक्षं मम वैदर्भि सर्वभूतहिते रता ॥ २५ ॥

५२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विदर्भराजकुमारी ! समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उमादेवीने उन सतियोंका प्रिय करनेके लिये मेरे सामने ही उस समय उन्हें पुण्यकोंका उपदेश दिया ॥ २५ ॥

ममैव चोमया दत्तः स तदा रत्नपर्वतः ।
प्रतिगृह्य मया चैव कृतो ब्राह्मणसाच्छुभे ॥ २६ ॥

शुभे ! उमादेवीने उस दिन मुझे ही उस रत्नमय पर्वतका दान दिया था । वह दान लेकर मैंने ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया था ॥ २६ ॥

उमा त्वरुन्धतीं साध्वीमामन्त्र्य यदभाषत ।
शृणु कल्याणि वक्ष्यामि सर्वाभिः सहिता शुभे ॥ २७ ॥

शुभे ! कल्याणी ! उमादेवीने साध्वी अरुन्धतीको सम्बोधित करके जो भाषण दिया था, उसे मैं बता रहा हूँ । तुम इन सभी रानियोंके साथ उसे सुनो ॥ २७ ॥

पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं यथावदनुपूर्वशः ।
यथा चैव मया दृष्टस्तत एष विधिः शुभे ॥ २८ ॥

शुभे ! पुण्यकोंकी सम्पूर्ण विधिको जैसा मैंने वर्णन सुना है और जिस रूपमें उसे देखा है, उसी रूपमें मैं क्रमशः इसका यथावत् वर्णन करता हूँ, तुम सुनो ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पुण्यकविधिकथने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पुण्यकविधिको कथनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥


अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

उमाद्वारा सती स्त्रीके महत्त्वका वर्णन करते हुए पुण्यक-व्रतकी विधिका उपदेश

उमोवाच

सर्वज्ञाऽहं यदा भर्तुः प्रसादेन शुचिस्मिते ।
तदा पुरा ममादिष्टो दृष्टः पुण्यविधिः शुभः ॥ १ ॥

उमा बोलीं—पवित्र मुसकानवाली देवि ! मैं अपने पतिदेवकी कृपासे सर्वज्ञ हूँ तो भी पूर्वकालमें पतिदेवने मुझे इसका उपदेश दिया था । तभी मुझे इस शुभ पुण्यक-विधिका साक्षात्कार हुआ ॥ १ ॥

सनातनः पुण्यविधिरिति बुद्ध्यावगम्यताम् ।
महादेवप्रसादेन मया दृष्टस्त्वरुन्धति ॥ २ ॥

अरुन्धती ! तुम्हें अपनी बुद्धिसे इस बातको निश्चित रूपसे समझ लेना चाहिये कि पुण्यक-व्रतकी विधि सनातन है। मुझे महादेवजीकी कृपासे उसका दर्शन (ज्ञान) हुआ है ॥ २ ॥

पुण्यकानि च सर्वाणि चीर्णवत्यस्म्यनिन्दिते ।
अनुज्ञया भगवतो भर्तुः शर्वस्य धीमतः ॥ ३ ॥

अनिन्दिते ! मैंने अपने पति बुद्धिमान् भगवान् शिवकी आज्ञासे समस्त पुण्यकोंका आचरण किया है ॥ ३ ॥

सतीत्वं धर्मचरणं यस्या नित्यमखण्डितम् ।
पुण्यकानां विधिस्तस्याः पुराणैः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥

जिस नारीको सतीत्व और धर्माचरणका अखण्डित रूपसे निर्वाह सदा अभीष्ट होता है, उसीके लिये पुरातन महर्षियोंने पुण्यकोंकी विधिका प्रतिपादन किया है ॥ ४ ॥

दानोपवासपुण्यानि सुकृतान्यप्यरुन्धति ।
निष्फलान्यसतीनां हि पुण्यकानि तथा शुभे ॥ ५ ॥

शुभे ! अरुन्धति ! असती नारियोंके द्वारा भलीभाँति किये जानेपर भी दान और उपवासके पुण्य तथा पुण्यक निष्फल हो जाते हैं ॥ ५ ॥

या वञ्चयन्ति भर्तारं योनिदुष्टाश्च याः स्त्रियः ।
योनिदोषात् पुण्यफलं नाश्नन्ति निरयङ्गमाः ॥ ६ ॥

जो स्त्रियाँ अपने पतिको ठगती हैं, उन्हें धोखा देती हैं, जिनकी योनि जारसंगसे दूषित हो गयी है, वे उस योनि-दोषके कारण पुण्यका फल नहीं भोगने पातीं; नरकमें ही गिरती हैं ॥ ६ ॥

साध्व्यो जगद् धारयन्ति सुशीलाः पतिदेवताः ।
अनन्या धर्मनित्याश्च सतीपन्थानमाश्रिताः ॥ ७ ॥

जिनके आचार-विचार शुद्ध हैं, जो पतिको ही आराध्यदेव मानती हैं, उनमें अनन्य भावसे अनुरक्त होती हैं, सदा धर्मके अनुष्ठानमें लगी रहती हैं और सतियोंके पथपर ही चलती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ ही इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ७ ॥

अवाग्दुष्टाः शौचयुक्ता धृतिमत्यः शुभव्रताः ।
सततं साधुवादिन्यो धारयन्ति जगत् खलु ॥ ८ ॥

जिनकी वाणी परनिन्दा और असत्य आदि दोषसे दूषित नहीं है, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध रहनेवाली हैं, जो धैर्यशालिनी तथा शुभ व्रतका पालन करनेवाली हैं, जो सदा अच्छी ही बातें बोला करती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ८ ॥

व्याधितः पतितो वापि दीनो वापि कथञ्चन ।
न त्यक्तव्यः स्त्रिया भर्ता धर्म एष सनातनः ॥ ९ ॥

अपना पति रोगी हो, पतित हो अथवा दीन हो, नारीको

विष्णुपूर्व ] अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ५२५ किती तरह भी उसका त्याग नहीं करना चाहिते। यह सनातन धर्म है ॥ ९ ॥ अकार्यकारिणं वापि पतितं वापि निर्गुणम् । स्त्री पतिं तारयत्येव तथाऽऽत्मानं शुभानने ॥ १० ॥ शुभानने ! पतिव्रता स्त्री अपना तथा न करनेयोग्य काम करनेवाले पतित और गुणहीन पनिका भी उद्धार कर ही देती है ॥ १० ॥ योनिदुष्टस्त्रियो नास्ति प्रायश्चित्तं हतैव सा । वाग्दुष्टे विहितं सद्भिः प्रायश्चित्तं पुरातने ॥ ११ ॥ जिस स्त्रीकी योनि दूषित है, उसकी शुद्धिके लिये कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है। वह तो अपने पापके द्वारा मारी ही गयी। जो केवल वाणीके दोषसे दूषित है, उसकी शुद्धिके लिये सत्पुरुषोंने वेदमें प्रायश्चित्त बताया है ॥ ११ ॥ भर्तुश्छन्देन कर्तव्यं व्रतकं सर्वदा स्त्रिया । उपवासोऽपि वा सत्ये काङ्क्षन्त्या सुकृतां गतिम् ॥ १२॥ सत्यपरायणा अरुन्धती ! जो पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाली गतिकी अभिलाषा रखती हो, उस स्त्रीको अपने पतिकी आज्ञाके अधीन होकर ही सदा व्रतका पालन अथवा उपवास करना चाहिये ॥ १२ ॥ कल्पान्तरसहस्रेषु न स्त्री सा लभते गतिम् । तिर्यग्योनिसहस्रेषु पच्यते योनिविप्लवात् ॥ १३ ॥ योनि दूषित करनेसे नारी पशु-पक्षी आदिकी सहस्रों योनियोंमें जन्म लेकर कष्ट भोगती है। वह स्त्री सहस्रों कल्पोंमें भी सद्गति नहीं पाती ॥ १३ ॥ यदि सा नाम मानुष्यं स्त्री लभेदसती सती । चण्डालयोनौ दुर्मेधा जायते कुक्कुराशना ॥ १४ ॥ यदि असती होकर रहनेवाली नारी मरनेके बाद कभी मनुष्य-योनिमें जन्म लेती है तो चाण्डाल-योनिमें ही उसकी उत्पत्ति होती है और वह खोटी बुद्धिवाली स्त्री कुत्तोंका मांस खानेवाली चाण्डाली होती है ॥ १४ ॥ भर्ता देवः सदा स्त्रीणां सद्भिर्दृष्टस्तपोधने । यस्या हि तुष्यते भर्ता सा सती धर्मचारिणी ॥ १५ ॥ तपोधने ! स्त्रियोंके लिये सदा पति ही देवता है। सत्पुरुषोंने इस सत्यका साक्षात्कार किया है। जिस स्त्रीपर उसका पति संतुष्ट रहता है, वह सती एवं धर्मचारिणी है ॥ कौतूहलहतानां तु स्त्रीणां लोको न शोभनः । भर्तर्येव मनो यासां सद्भावेन व्यवस्थितम् ॥ १६ ॥ जो कौतूहलवश परपुरुषोंका सङ्ग करके मारी गयी हैं, उन स्त्रियोंको कभी उत्तम लोककी प्राप्ति नहीं होती। जिनका मन सद्भावपूर्वक केवल पतिमें ही लगा रहता है, उन्हींको सती समझना चाहिये ॥ १६ ॥ कर्मणा मनसा वाचा पतिं नातिचरन्ति याः । तासां पुण्यफलं सौम्ये पुण्यकैः समुदाहृतम् ॥ १७ ॥ सौम्य स्वभाववाली अरुन्धती ! जो नारियाँ मन, वाणी और क्रियाद्वारा पतिका उल्लङ्घन नहीं करती हैं, उन्हींको पुण्यक-व्रतोंद्वारा पुण्यफलकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥ १७ ॥ पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं स्वर्लोकप्रतिशोभने । निबोध सह सर्वाभिर्हृष्टो यस्तपसा मया ॥ १८ ॥ स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाली देवि ! मैंने तपस्याद्वारा जिसका साक्षात्कार किया है, पुण्यकोंकी वह सम्पूर्ण विधि बतायी जाती है। तुम इन सारी स्त्रियोंके साथ उसे ध्यान देकर सुनो ॥ १८ ॥ स्नात्वा स्त्री प्रातरुत्थाय पतिं विज्ञापयेत् सती । उपवासार्थमथ वा व्रतकार्थे धृतव्रते ॥ १९ ॥ व्रत धारण करनेवाली देवि ! साध्वी स्त्रीको चाहिये कि वह प्रातःकाल उठकर स्नान करनेके पश्चात् पतिको यह सूचित करे कि आज मुझे उपवास अथवा व्रत करना है ॥ १९ ॥ श्वशुराभ्यां च चरणौ सततं सत्तमस्य च । प्रहायौदुम्बरं पात्रं सकुशं साक्षतं तथा ॥ २० ॥ गोशृङ्गं दक्षिणं सिञ्च्य प्रतिगृह्णीत तज्जलम् । ततो भर्तुः सती दद्यात् स्नातस्य प्रयतस्य च ॥ २१ ॥ आत्मनोऽपि निषेक्तव्यं ततःशिरसि तज्जलम् । त्रैलोक्यसर्वतीर्थेषु स्नानमेतदुदाहृतम् ॥ २२ ॥ वह सास-ससुर तथा साधु-महात्माके चरणोंमें सदा प्रणाम करे; फिर कुश और अक्षतसे युक्त ताम्रपात्र लेकर गायके दाहिने सींगको नहलाकर उस जलको ग्रहण कर ले। इसके बाद सती स्त्री स्नान करके एकाग्र चित्त हुए पतिके मस्तकपर उस जलको छिड़के। तदनन्तर अपने मस्तकपर भी उस जलके छींटे डाले। यह त्रिलोकीके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान बताया गया है ॥ उपवासेषु कर्तव्यमेतद्धि व्रतकेषु च। स्नानमेतद्धि सामान्यं स्त्रीणां पुंसां च भामिनि ॥ २३ ॥ भामिनि ! उपवास और व्रतके अवसरोंपर यह स्नान अवश्य करना चाहिये। यह स्त्रियों और पुरुषोंके लिये सामान्य स्नान है ॥ २३ ॥ अरुन्धति मया दृष्टं तपसा हरतेजसा । अशल्यविद्धं शयनमासनं च तथाविधम् ॥ २४ ॥ अरुन्धती ! मैंने महादेवजीके तेज और अपनी तपस्यासे देखा है कि इस व्रतमें नारीके लिये ऐसी शय्या होनी चाहिये, जो कण्टकविद्ध न हो। आसन भी वैसा ही होना चाहिये ॥ स्वयं प्रक्षालनं चापि पादयोरनुशब्दितम् । अश्रुप्रपातो रोषश्च कलहश्च कृतः सति । उपवासाद् व्रताद् वापि सद्यो भ्रंशयति स्त्रियः ॥२५॥

५२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उसके लिये अपने पैरोंको स्वयं ही धोनेका विधान है। साध्वी अरुन्धती ! यदि आँसू गिराया गया, रोष और कलह किया गया तो वह स्त्रियोंको तत्काल ही उपवास और व्रतके पुण्यसे भ्रष्ट कर देता है ॥ २५ ॥

शुक्लमेव सदा वासः प्रशस्तं चन्द्रसम्भवे ।
अन्तर्वासोऽपरं चैव उपवासे व्रते तथा ॥ २६ ॥

चन्द्रकुमारी ! उपवास तथा व्रतमें सदा श्वेत वस्त्र धारण करना ही उत्तम माना गया है। साड़ीके भीतर एक दूसरा वस्त्र (पेटीकोट आदि) भी डाल लेना चाहिये ॥ २६ ॥

पादुकार्थं तृणैः कार्यं सर्वदा व्रतके सति ।
उपवासेऽपि च विधिरेष एव प्रवर्तितः ॥ २७ ॥

साध्वी अरुन्धती ! व्रतके अवसरपर उपयोगमें लानेके लिये सदा बेंत आदि तृणोंकी ही पादुका बनवा लेनी चाहिये (चमड़ेकी पादुका नहीं धारण करनी चाहिये)। उपवासमें भी यही विधि चलायी गयी है ॥ २७ ॥

अञ्जनं रोचनं चापि गन्धान् सुमनसस्तथा ।
व्रतके चोपवासे च नित्यमेव विवर्जयेत् ॥ २८ ॥

सती नारीको चाहिये कि वह व्रत तथा उपवासके अवसरपर अञ्जन, गोरोचन, भाँति-भाँतिके गन्ध और फूलोंका सदा ही परित्याग करे ॥ २८ ॥

दन्तकाष्ठं शिरःस्नानमुद्वर्तनमथापि वा ।
विवर्जितं मृदा सर्वं शौचार्थं तु विधीयते ॥ २९ ॥

इस व्रतमें नारीके लिये काठका दातौन करना, सिरके ऊपरसे नहाना अथवा अङ्गोंमें उबटन लगवाना वर्जित है। सब प्रकारकी शुद्धिके लिये मृत्तिकाके ही उपयोगका विधान है॥

बिल्वामृतफलैर्नित्यं श्रीफलैश्च समाचरेत् ।
प्रक्षालनं वै शिरसः सदामृन्मिश्रितैर्जलैः ॥ ३० ॥

बेल, हर्रे या आँवला तथा श्रीफलसे जिसमें मिट्टी न मिली हुई हो, संयुक्त जलके द्वारा सदा ही अपने सिरको धोना चाहिये ॥ ३० ॥

शिरसोऽभ्यञ्जनं सौम्ये नैव तावत् प्रशस्यते ।
न पादयोर्न गात्रस्य स्नेहेनेति स्थितिः स्मृता ॥ ३१ ॥

सौम्ये ! इस व्रतमें सिरका अभ्यङ्ग अर्थात् उबटन या बेसनका चूर्ण लगाकर नहाना नहीं अच्छा माना गया है। पैरों अथवा समूचे शरीरमें भी तेल न मले। यही मर्यादा मानी गयी है ॥ ३१ ॥

गोयानमुष्ट्रयानं च खरयानं च वर्जितम् ।
नग्नस्नानं च सततं व्रते चाप्युपवासके ॥ ३२ ॥

प्रत्येक व्रत और उपवासमें बैल, ऊँट और गधोंसे जुते हुए वाहनका उपयोग वर्जित है। उसमें कभी नग्न स्नान नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

नदीजलं प्रस्रवणं प्रशस्तं सोमनन्दिनि ।
शुभे तडागे वाप्यादौ विस्तीर्णे जलजायुते ॥ ३३ ॥
गत्वा स्नानं प्रशस्तं तु सदैव खलु सर्वथा ।

सोमनन्दिनि ! नदी और झरनेका जल उत्तम माना गया है। कमलोंसे मण्डित, सुन्दर एवं विस्तृत पोखरे या बावड़ी आदिमें जाकर स्नान करना सदा ही सब प्रकारसे प्रशस्त है॥

अलाभे त्ववरुद्धा स्त्री घटस्नानं समाचरेत् ॥ ३४ ॥
नवैश्च कुम्भैः स्नातव्यं विधिरेष पुरातनः ।
स्नानं च कार्यं शिरसा तपःफलमवाप्नुयात् ॥ ३५ ॥

जिसके लिये बाहर जानेपर रोक है, वह परदेके भीतर रहनेवाली नववधू नारी तड़ाग आदिमें स्नानका सुयोग न मिलनेपर घड़ोंके जलसे स्नान करे। वह नये घड़ोंके जलसे स्नान करे—यही प्राचीन विधि है। (व्रतके सिवा अन्य अवसरोंपर) सिरके ऊपरसे स्नान करना चाहिये। इससे तपस्याका फल प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे पुण्यकविधौ अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजाताहरणके प्रसङ्गमें पुण्यकविधिविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥


एकोनाशीतितमोऽध्यायः

पुण्यक-व्रतसम्बन्धी नियम एवं दानका वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त किये जानेवाले दूसरे व्रत एवं दानका प्रतिपादन

उमोवाच

विधिनैतेन कृत्स्नेन स्त्री सदा भर्तृदेवता ।
चरेत् संवत्सरं दान्ता षण्मासान् मासमेव च ॥ १ ॥

उमा कहती हैं—देवि ! पतिव्रता स्त्री इस सम्पूर्ण विधिके साथ एक वर्ष या छः मास अथवा एक मासतक सदा इन्द्रिय-संयमपूर्वक व्रतका आचरण करे ॥ १ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ५२७ स्त्रियो ह्यावाहयेत् साध्वीरेकादश समाधिना । स्वयं चैव विधिर्दृष्टो व्रतकानां मया शुभः ॥ २ ॥ इसमें ग्यारह साध्वी स्त्रियोंको बुलाना चाहिये। मैंने स्वयं ही समाधिके द्वारा व्रतोंके इस शुभ विधानका साक्षात्कार किया है ॥ २ ॥ अद्भिर्दद्यात् सतीः सर्वा या मूलव्रतिनी भवेत् । तासां तु निष्क्रयो देयः कालदेशानुरूपतः ॥ ३ ॥ मूल व्रतका अनुष्ठान करनेवाली प्रधान स्त्री अपने यहाँ आमन्त्रित की गयी उन समस्त ग्यारह सतियोंका दान करे और देश-कालके अनुसार उनका निष्क्रय दे दे* ॥ ३ ॥ ततो मासान्तशुक्लस्य तिथौ च नवमी तथा । आराधयित्वा कर्तव्यं व्रतस्यापवर्जनम् ॥ ४ ॥ तदनन्तर मासके अन्तमें शुक्ल-पक्षकी नवमी तिथिको देवाराधना करके व्रतको समाप्त करना चाहिये ॥ ४ ॥ उपवासमहोरात्रं व्रतकं चापि निश्चितम् । आदौ चान्ते च कुर्वीत व्रतस्यापि सिद्धये ॥ ५ ॥ व्रतके उद्देश्यसे उसकी सिद्धिके लिये आदि और अन्तमें निश्चितरूपसे एक दिन और रातका उपवास करना चाहिये ॥ क्षुरकर्म ततो भर्तुरात्मनश्चैव कारयेत् । उत्सादनं च स्नानं च तस्मिन्नहनि संस्मृतम् ॥ ६ ॥ तदनन्तर अपने पतिकी हजामत बनवावे और अपना भी नखमात्र कटा ले। उसी दिन व्रतान्त स्नान तथा व्रतके उद्यापन या उत्सर्गका विधान है ॥ ६ ॥ ततो विवाहवत् स्नानं विहितं पुण्यके शुभे । मण्डनं चैव विहितं माल्यधारणमेव च ॥ ७ ॥ शुभे ! पुण्यक-व्रतमें भी विवाहके समान ही विधिपूर्वक स्नान करनेकी आज्ञा है। उसमें शृङ्गार और माला धारण करनेका विधान है ॥ ७ ॥ कुम्भैस्तु स्नाप्यमानेयं साध्वी मन्त्रमुदीरयेत् । भर्तुः पादौ नमस्कृत्य मनसा वाथ वा गिरा ॥ ८ ॥ घड़ोंके जलसे नहलायी जाती हुई व्रतपरायणा साध्वी स्त्री अपने पतिके दोनों चरणोंको मन अथवा वाणीद्वारा नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—॥ ८ ॥

  • इन पंक्तियोंको देखकर यह अनुमान होता है कि पहले जिन ग्यारह सती स्त्रियोंका उनके पतियोंकी अनुमतिसे आवाहन किया जाता है, उनका व्रतचारिणी स्त्री पुनः उनके पतियोंको ही दान कर देती है। देश कालके अनुरूप निष्क्रय देकर पहले उन्हें अपनी बनाती है और फिर उनको उनके पतियोंको ही संकल्पपूर्वक सौंपकर दानजनित पुण्यकी भागिनी होती है। आपो देव्य ऋषीणां हि विश्वधात्र्यो दिव्या मदन्त्यो याः शङ्करा धर्मधात्र्यः। हिरण्यवर्णाः पावकाः शिवतमेन रसेन श्रेयसो मां जुषन्तु ॥९॥ 'जलकी अधिष्ठात्री देवी ऋषियोंकी जननी, सम्पूर्ण विश्वकी माता, आकाशसे प्रकट होनेवाली, हर्ष प्रदान करने- वाली, कल्याणकारिणी, धर्मके पोषणमें तत्पर, सुवर्णके समान वर्णवाली, निर्मल तथा सबको पावन बनानेवाली है। वह अपने परम कल्याणमय रसके द्वारा मुझे श्रेयका भागी बनाये'॥ अपामेष स्मृतो मन्त्रः सर्वत्रान्यत्र मे शृणु । मन्त्राः पुराणविहिताः स्त्रीणां सर्वाङ्गशोभने ॥ १० ॥ सर्वाङ्गशोभने देवि ! यह जलसम्बन्धी मन्त्र सर्वत्र उपयोगमें लाया जाता है। अन्यत्र स्त्रियोंके स्नानके लिये पुराणविहित मन्त्र उपलब्ध होते हैं। उन्हें मुझसे सुनो ॥ शुभाव्यया गुणिनी युक्तधर्मा भर्त्रा साकं मम दास्या वरेण । मा कर्मणा मनसा वापि वाचा भर्तुर्भवेयं रूपती स्यां वशाङ्गा ॥ ११ ॥ मैं पतिके लिये कल्याणकारिणी होऊँ। धन आदिसे कभी क्षीण न होऊँ। सद्गुणवती होऊँ। सदा पतिके साथ धर्ममें संलग्न रहूँ। मैं अपने स्वामीके साथ दासीके समान रहकर उनकी छोटी-से-छोटी भी सेवा-टहल स्वयं ही करूँ। सदा पतिके अधीन रहूँ और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा भी कभी उनसे रुष्ट न होऊँ ॥ ११ ॥ सपत्नीनामधि नित्यं भवेयं सपुत्रा स्यां सुभगा चारुरूपा । सम्पन्नहस्ता गुणवादिनी च सर्वात्मना स्यां मा दरिद्रा भवेयम्॥ १२॥ सपत्नियोंमें मेरा स्थान सदा सबसे ऊपर हो। मैं पुत्रवती, सौभाग्यवती और मनोहर रूपवाली होऊँ। मेरा हाथ सदा सम्पन्न रहे अर्थात् मैं मुक्तहस्त होकर दान कर सकूँ। मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा दूसरोंके गुणोंका ही बखान करूँ और कभी दरिद्र न होऊँ ॥ १२ ॥ पतिश्च मे स्यात् सुमुखो मत्प्रतीक्षो नित्यं मदुक्तः स्यान्मन्मतिर्मद्गतिश्च। प्रीतिश्च नौ स्याच्चक्रवाकानुरूपा मनोविरागो न भवेत् साधुवत् स्यात् ॥ १३॥ मेरे पति भी सदा प्रसन्नमुख रहकर मेरी प्रतीक्षा करने- वाले हों, उनका सदा मुझमें अनुराग बना रहे। उनकी मति और गति मेरी ही ओर रहे। हम दोनोंमें चकवा और चकवी- के समान प्रेम बना रहे। हमारे मनमें कभी एक दूसरेके प्रति

५२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

विरक्ति न हो और हमारा व्यवहार सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके समान हो ॥ १३ ॥

लोकान् साध्वीनामुत्तमानां व्रजेयं याभिः सर्वं धार्यते विश्वरूपम् ।
उभे कुले याः शुभाः पावयन्ति पितुर्भर्तुश्च पतिभक्त्योर्जिताश्च ॥ १४ ॥

जो शुभलक्षणा देवियाँ पतिभक्तिके प्रभावसे शक्तिशालिनी होकर पिता और पति दोनोंके कुलोंको पावन बनाती हैं तथा जो अपने धर्मसे इस सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हैं, उन्हीं उत्तम पतिव्रता देवियोंके लोकोंमें मैं जाऊँ ॥ १४ ॥

भूमिर्वायुर्जलमाकाशमग्नि- रन्तःक्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्यो महांश्च ।
अहंकारश्च मम साक्ष्ये नियुक्ताः स्मरेयुर्मे निश्चयं च व्रतं च ॥ १५ ॥

पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, अन्तर्यामी क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, महत्तत्त्व और अहङ्कार—इन सबको मैंने अपना साक्षी बनाया है। ये मेरे इस निश्चय और व्रतको स्मरण रखें ॥

यैरारब्धो देहिनां भौतिकोऽयं विधिः सत्त्वाद्यैर्भूतयुक्तैः सबीजैः ।
सन्त्वेते मे साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १६ ॥

जिन सत्त्व आदि गुणोंने भूतों और उनके कर्मबीजोंसे युक्त हो देहधारियोंके इस भौतिक शरीरका निर्माण किया है, वे और उनके अभिमानी देवता जो सबमें स्थित हैं, मेरे इस व्रत और निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १६ ॥

चन्द्रादित्यौ पुण्यसाक्षी यमश्च दिशः सर्वा दश चात्मा च मेऽयम् ।
सन्त्वेते वै साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १७ ॥

चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यके साक्षी यम, सम्पूर्ण दसों दिशाएँ और मेरा यह आत्मा—ये सबमें स्थित रहनेवाले देवता मेरे इस व्रत एवं निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १७ ॥

मन्त्रैरेतैः पुराणोक्तैः सर्वद्रव्याभिमन्त्रणम् ।
व्रतचर्यात् प्रभृति वै पुराणे समुदाहृतम् ॥ १८ ॥

व्रतके आरम्भसे लेकर प्रतिदिन इन पुराणोक्त मन्त्रोंद्वारा समस्त द्रव्योंको अभिमन्त्रित करना चाहिये। यह पुराणमें कहा गया है ॥ १८ ॥

स्नात्वाथ वाससी दद्याद् भर्तुः कर्त्य स्वयं शुभे ।
अथात्मकर्तितं न स्याच्छुभे विघ्नेन केनचित् ॥ १९ ॥
वासोऽन्यदेव दद्याच्च श्वेतं मुख्यं नवं शुचि ।
स्वकर्तितं च सूत्रं तु वाससा तेन मिश्रयेत् ॥ २० ॥

शुभे ! स्नान करके अपने पतिको स्वयं ही सूत कातकर बनाये हुए दो वस्त्र भेंट करे। यदि किसी विघ्न विशेषके कारण अपने ही काते हुए सूतका वस्त्र न हो तो दूसरा ही वस्त्र दे दे। वह वस्त्र शुद्ध, नवीन, उत्तम और श्वेत वर्णका होना चाहिये। उस वस्त्रके साथ अपना काता हुआ सूत भी मिला दे ॥ १९-२० ॥

ततो द्विजं शुचिं दान्तं ज्ञानविज्ञानकोविदम् ।
भोजयेच्च यथाशक्त्या सह भर्त्रा सुमध्यमे ॥ २१ ॥

सुमध्यमे ! तदनन्तर ज्ञान-विज्ञानकोविद, पवित्र, जितेन्द्रिय ब्राह्मणको अपने पतिके साथ बिठाकर यथाशक्ति भोजन कराये ॥ २१ ॥

ब्राह्मणस्यापि दातव्यं वासोयुग्मं महातपे ।
शय्यासनं गृहं धान्यं दासं दासीं तथैव च ॥ २२ ॥
अलंकारः शक्तिताश्च रत्नपर्वत एव च ।
सर्वधान्यसमुन्मिश्रस्तिलैश्च सविशेषतः ॥ २३ ॥
वासोभिश्च प्रतिच्छन्नो नानावर्णैररुन्धति ।
हस्त्यश्वावचयश्चैव देया गौरेव च ध्रुवम् ॥ २४ ॥

महान् तप करनेवाली देवि ! अरुन्धति ! ब्राह्मणको भी यथासम्भव जोड़ा वस्त्र, शय्या, आसन, गृह, धान्य, दास-दासी, आभूषण, सब प्रकारके धान्यों और विशेषतः तिलोंसे मिश्रित रत्नमय पर्वत, जो नाना रंगके वस्त्रोंसे आच्छादित हो, यथाशक्ति दान करना चाहिये। सम्भव हो तो हाथी-घोड़ोंका समूह दिया जाय अन्यथा एक गौका ही दान कर दिया जाय। यथाशक्ति दान देना आवश्यक है ॥ २२—२४ ॥

लवणप्रतिमां दद्यान्नवनीतस्य चापराम् ।
गुडस्य मधुनश्चैव सुवर्णस्य च शोभनाम् ॥ २५ ॥

नमक, माखन, गुड़, मधु और सुवर्णकी बनी हुई पृथक्-पृथक् उमा-महेश्वरकी सुन्दर प्रतिमाका भी दान करना चाहिये ॥ २५ ॥

तथैव सर्वगन्धानां रसानां पृथगेव च ।
तथा सुमनसां दद्याद् रौप्यस्यौदुम्बरस्य च ॥ २६ ॥
फलानां चैव सर्वेषां वाससामपि नन्दिनि ।
चित्रप्रतिकृतिं चैव काष्ठस्य प्रतिमां तथा ॥ २७ ॥

नन्दिनि ! उसी तरह सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थों, रसों, फूलों, चाँदी, सम्पूर्ण फल, वस्त्र, चित्र और काष्ठकी प्रतिमाका भी यथासम्भव दान करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥

शिलां प्रतिकृतिं चैव दध्नोऽथ पयसस्तथा ।
सर्पिषा दूर्वया चैव या चान्यामप्यभीप्सति ॥ २८ ॥

प्रस्तर, दूध, दही, घी और दूर्वाकी प्रतिमाको तथा और तरहकी प्रतिमाको भी, जिसे तुम देना चाहो, दे सकती हो ॥ २८ ॥