विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ५१३
आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। आप ही जगदीश्वर तथा देववीरोंके शत्रुओंका हनन करनेवाले हैं॥ २३॥
यस्मादीशो महतामीश्वराणां
$\quad$ भवोनाद्यः प्रीतिदः प्राणदश्च।
तस्माद्धि त्वामीश्वरं प्राहुरीशं
$\quad$ संतो विद्वांसः सर्वशास्त्रार्थतज्ज्ञाः ॥ २४॥
आप बड़े-बड़े ईश्वर-कोटिके पुरुषोंके भी ईश्वर हैं। आप ही आदिपुरुष, प्रीतिदाता तथा प्राणदाता हैं; इसीलिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले विद्वान् साधुपुरुष आपको ही ईश्वर तथा ईश कहते हैं॥ २४॥
भूतं यस्माज्जगदत्यन्त धीर
$\quad$ त्वत्तोऽव्यक्तादक्षरादक्षरेश ।
तस्मात् त्वामाहुर्भव इत्येव भूतं
$\quad$ सर्वेश्वराणां महतामप्युदारम् ॥ २५॥
अत्यन्त ! धीर! अक्षरेश्वर ! अतः आप अव्यक्त अविनाशी परमेश्वरसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है, अतः विद्वान् पुरुष आपको 'भव' कहते हैं। वास्तवमें तो आप 'भूत' (नित्यसिद्ध) हैं। महान् सर्वेश्वरोंके लिये भी अत्यन्त उदार हैं (फिर दीन-दुखियोंके लिये तो बात ही क्या है?)॥२५॥
यस्माज्जितैरभिषिक्तोऽसि सर्वै-
$\quad$ र्देवासुरैः सर्वभूतैश्च देव।
महेश्वरं विश्वकर्माणमाहु-
$\quad$ स्त्वां वै सर्वे तेन देवातिदेवम् ॥ २६॥
देव ! अतः पराजित हुए समस्त देवताओं, असुरों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंने आपका 'महान् ईश्वर' के पदपर अभिषेक किया है; अतः सभी विद्वान् आप विश्वनिर्माता भगवान्को 'महेश्वर' तथा 'देवातिदेव' (देवताओंसे बढ़कर महादेव) कहते हैं॥ २६॥
पूज्यो देवैः पूज्यसे नित्यदा वै
$\quad$ शश्वच्छ्रेयःकाङ्क्षिभिर्वरदामेयवीर्य ।
तस्माद् विख्यातो भगवान् देवदेवः
$\quad$ सतामिष्टः सर्वभूतात्मभावी ॥ २७॥
अमेय बल-पराक्रमसे सम्पन्न वरदायक महेश्वर ! अतः सदा कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले देवता आप पूजनीय परमेश्वरकी नित्य पूजा करते हैं; अतः आप 'भगवान् देवदेव' (देवताओंके भी देवता) के रूपमे विख्यात हैं। सत्पुरुषोंके इष्टदेव आप ही हैं। आप समस्त भूतोंको अपने भीतर ही उत्पन्न करनेवाले हैं॥ २७॥
भूमिस्त्रयाणां देव यस्मात् प्रतिष्ठा
$\quad$ पुनर्लोकानां भावनामेयकीर्तिः ।
त्र्यम्बकेति प्रथमं तेन नाम
$\quad$ तवाप्रमेय त्रिदशेशनाथ ॥ २८॥
ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंके भी स्वामी अप्रमेयस्वरूप देव! बारंबार लोकोंको उत्पन्न करनेवाले लोकभावन ! अतः आप भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—इन तीनों लोकोंकी भूमियोंके आश्रय हैं, अतः आपका प्रथम (प्रमुख) नाम त्र्यम्बक (त्रिलोकीके आश्रय) है, आपकी कीर्ति अमेय है।२८।
शर्वः शत्रूणां शासनादप्रमेय-
$\quad$ स्तथा भूयः शासनाच्चेश्वरेण।
सर्वव्यापित्वाच्छङ्करत्वाच्च सद्भिः
$\quad$ शब्दस्येशानः श्रीकराकर्ग्यतेजाः ॥ २९॥
आप संहारकारी होनेके कारण शर्व कहलाते हैं, समस्त शत्रुओंका शासन करनेके कारण अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न हैं; फिर ईश्वररूपसे समस्त जगत्का शासन करनेके कारण भी आप अप्रमेय हैं, सर्वव्यापी तथा सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी होनेसे भी आपको अप्रमेय कहा गया है, श्री (लक्ष्मी) की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर ! आप सम्पूर्ण शब्दोंके भी ईश्वर हैं अर्थात् समस्त शब्दोंद्वारा आपका ही प्रतिपादन होता है। आपका उत्तम तेज सूर्यसे भी बढ़कर है॥ २९॥
संसक्तानां नित्यदा यत् करोषि
$\quad$ शर्म भ्रातृव्यान यद्यनैषीः समस्तान् ।
तस्माद् देवः शङ्करोऽस्यप्रमेयः
$\quad$ सद्भिर्धर्मज्ञैः कथ्यसे सर्वनाथः ॥ ३०॥
आप भक्तजनोंको जो सदा सुख और शान्ति प्रदान करते हैं तथा शत्रुभाव रखनेवाले समस्त असुरोंको जो दण्ड देते हैं, उसके कारण आप अप्रमेय शक्तिसे सम्पन्न कल्याणकारी देवता शङ्कर कहे जाते हैं। धर्मज्ञ संत आपको सर्वनाथ (सबके स्वामी या संरक्षक) कहते हैं॥ ३०॥
दत्तः प्रहारः कुलिशेन पूर्वं
$\quad$ तवेशान सुरराज्ञातिवीर्य ।
कण्ठे नीलं तेन ते यत् प्रवृत्तं
$\quad$ तस्मात् ख्यातस्त्वं नीलकण्ठेति कल्पः ॥ ३१॥
अत्यन्त पराक्रमी ईशान ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने आपके कण्ठमें जो वज्रसे प्रहार किया था और उससे जो वहाँ नील चिह्न बन गया था, उसके कारण आप नीलकण्ठ नामसे विख्यात हुए। आप समर्थ होते हुए भी दयावश ऐसे अपराध सह लेते हैं॥ ३१॥
यल्लिङ्गं यच्च लोके भगाङ्गं
$\quad$ सर्वं सोम त्वं स्थावरं जङ्गमं च।
१. अन्न अर्थात् मृत्युको लाघनेवाले । २. बुद्धिके प्रेरक ।
३. अक्षरों—अविनाशी जीवोंके ईश्वर ।
म० द० १७ —