विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 533, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५१२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
आपकी जैसी इच्छा हो, उस तरह युद्ध कीजियेगा।' तब प्रभावशाली देवराजने श्रीकृष्णसे कहा, 'एवमस्तु (ऐसा ही हो)' ॥ ८-९ ॥
उवास पुष्कराभ्याशे देवराजः पुरंदरः । व्रजं गिरिमयं कृत्वा धर्मात्मा नृपसत्तम ॥ १० ॥
नृपश्रेष्ठ ! इसके बाद धर्मात्मा देवराज इन्द्र अपने लिये पर्वतमय आवरण बनाकर पुष्करके निकट ठहर गये ॥ १० ॥
ब्रह्मा ततो जगामाथ कश्यपश्च महानृषिः । अदितिश्चैव सर्वे च देवा मुनय एव च ॥ ११ ॥ साध्या विश्वे च कौरव्य नासत्यावश्विनौ तथा । आदित्याश्चैव रुद्राश्च वसवश्च जनेश्वर ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन ! जनेश्वर ! तदनन्तर ब्रह्मा, महर्षि कश्यप, अदितिदेवी, समस्त देवता, मुनि, साध्य, विश्वेदेव, नासत्य नामसे प्रसिद्ध अश्विनीकुमार, आदित्य, रुद्र तथा वसुगण उस स्थानपर गये ॥ ११-१२ ॥
नारायणश्च पुत्रेण सात्यकेन च भारत । सहोवास गिरौ रम्ये पारियात्रे प्रहृष्टवत् ॥ १३ ॥
भारत ! इधर पुत्र प्रद्युम्न तथा भाई सात्यकिके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उस रातमें सुरम्य गिरि पारियात्रपर बड़े हर्षके साथ रहे ॥ १३ ॥
यत् स शाणप्रमाणोऽस्य भक्त्या समभवन्नृप । वरं प्रादात् ततस्तस्य पर्वतस्य महाद्युतिः ॥ १४ ॥
नरेश्वर ! वह पर्वत भगवान्के प्रति भक्तिभावसे नम्र हो जो शाण (उड़द या सनके बीजकी राशि) के बराबर हो गया था, इससे उस पर्वतपर प्रसन्न हो महातेजस्वी श्रीकृष्णने उस पर्वतको यह वर दिया— ॥ १४ ॥
शाणपाद इति ख्यातो भविष्यसि महागिरे । पुण्येनार्द्धेन तुल्यो हि पुण्यो हिमवतः शुभः ॥ १५ ॥
'महागिरे ! तुम शाणपादके नामसे विख्यात होओगे। जैसे हिमालय पर्वतके ऊपरी आधा भाग परम पवित्र होता है, उसीके समान तुम भी शुभ एवं पवित्र बने रहोगे ॥ १५ ॥
एवमेव च भूयिष्ठो भव पर्वतसत्तम । मेरुणा स्पर्धमानो हि बहुचित्रमृगैर्वृतः । रमे त्वां पश्यमानोऽहं बहुचित्रनगायुतम् ॥ १६ ॥
'पर्वतश्रेष्ठ ! तुम इसी प्रकार बहुसंख्यक विचित्र मृगोंसे युक्त हो मेरुके साथ स्पर्धा रखते हुए बहुत बड़े हो जाओ। तुम्हें अनेक विचित्र वृक्षोंसे सम्पन्न देखकर मैं आनन्दमग्न हो जाता हूँ' ॥ १६ ॥
तथा दत्त्वा वरं तस्य पर्वतस्य तु केशवः । दध्यौ गङ्गां सरिच्छ्रेष्ठां नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार उस पर्वतको वर देकर भगवान् श्रीकृष्णने महादेवजीको नमस्कार करके सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका चिन्तन किया ॥ १७ ॥
अथाययौ विष्णुपदी स्मृता कृष्णेन भारत । सम्पूज्य तां ततः कृष्णः कृत्वा स्नानमथोक्षजः ॥ १८ ॥
भारत ! श्रीकृष्णके स्मरण करनेपर विष्णुपदी गङ्गा वहाँ आ गयीं। अधोक्षज श्रीकृष्णने उनकी पूजा करके उनके जलसे स्नान किया ॥ १८ ॥
उदकं च गृहायाथ विल्वं च हरिरव्ययः । देवमावाहयामास रुद्रं सर्वेश्वरेश्वरम् ॥ १९ ॥
फिर अविनाशी श्रीहरिने गङ्गाजल और बेलका फल लेकर उसीपर सर्वेश्वरेश्वर रुद्रदेवका आवाहन किया ॥ १९ ॥
ततः प्राप्तो महादेवः सोमः सप्रवरो विभुः । तस्यायुपरि विल्वस्य तथा गङ्गोदकस्य च ॥ २० ॥
तब पार्वतीसहित भगवान् महादेव प्रमथगणोंके साथ वहाँ आये और गङ्गाजल तथा बेलके ऊपर खड़े हो गये ॥ २० ॥
तं पारिजातकुसुमैरर्चयामास केशवः । तुष्टाव वाग्भिर्गीशेशं सर्वकर्तारमीश्वरम् ॥ २१ ॥
तब श्रीकृष्णने उनका पारिजातके फूलोंद्वारा पूजन किया और सबके कर्ता ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् शिवका वाणीद्वारा स्तवन किया ॥ २१ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
रुद्रो देव त्वं रुदनाद् रावणाच्च रोरुयमाणो द्रावणाच्चातिदेवः । भक्तं भक्तानां वत्सलं वत्सलानां कीर्त्या युक्तुकृच्छेशाय प्रपद्ये शरण्यम् ॥ २२ ॥
श्रीकृष्ण बोले—देव ! आप ही रोदन (रोना), रावण (रुलाना), अतिशय 'रव' तथा जन्म-मरणरूप संसारका द्रावण (निवारण) करनेके कारण 'रुद्र' कहे गये हैं। आप सब देवताओंसे बढ़कर हैं। ईश ! मैं आपके भक्तोंका भक्त तथा स्नेहियोंका स्नेही हूँ, आप मुझे विजय-कीर्तिका भागी बनाइये। मैं आज आप शरणागतवत्सल प्रभुकी शरण लेता हूँ ॥ २२ ॥
ग्राम्यारण्यानां त्वं पतिस्त्वं पशूनां ख्यातो देवः पशुपतिः सर्वकर्मा । नान्यस्त्वत्तः परमो देवदेव जगत्पतिः सुरवीरारिहन्ता ॥ २३ ॥
देवदेव ! आप ही ग्रामीण और वन्य पशुओं (जीवों) के पति (पालक) हैं; इसीलिये आप भगवान् पशुपतिके रूपमें विख्यात हैं। यह सारा जगत् आपका ही कर्म है।