विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
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विष्णुपर्व ] चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ५११
| इतो द्वारवतीं गत्वा रथमानय मा चिरम्।<br>सदारुकं महाबाहो मत्तेजोबलमाश्रितः ॥१०२॥<br>'महाबाहो ! यहाँसे द्वारका जाकर मेरे तेज और बलका आश्रय ले दारुकसहित मेरे रथको शीघ्र यहाँ ले आओ ॥<br>वक्तव्यो बलभद्रश्च राजा च कुकुराधिपः।<br>श्वो जित्वेन्द्रं त्वागमिष्ये द्वारकामिति मानद ॥१०३॥<br>'मानद ! वहाँ भैया बलभद्र तथा कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनसे कह देना कि कल इन्द्रको जीतकर मैं द्वारका-पुरीको आऊँगा' ॥ १०३ ॥ | तथेत्युक्त्वा तु धर्मात्मा प्रद्युम्नः पितरं विभुः।<br>गत्वा यथोक्तमुक्त्वा च यादवेन्द्रबलावुभौ ॥१०४॥<br>नाडिकान्तरमात्रेण पुनस्तं देशमाययौ।<br>दारुकेन समायुकं रथमास्थाय भारत ॥१०५॥<br>भारत ! तब अपने पितासे 'बहुत अच्छा' कहकर प्रभाव-शाली धर्मात्मा प्रद्युम्न द्वारकामें गये और यादवराज उग्रसेन तथा बलराम दोनोंसे उनका यथावत् संदेश कहकर वे दारुक-के द्वारा जोते गये रथपर आरूढ़ हो घड़ीभरमें फिर उस स्थान-पर लौट आये ॥ १०४-१०५ ॥ |
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे श्रीकृष्णोन्द्रयुद्धे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें श्रीकृष्ण और इन्द्रका युद्धविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
रात्रिमें युद्ध स्थगित करके श्रीकृष्णका पारियात्र पर्वतको वरदान देना, गङ्गाका स्मरण करना, बिल्व और गङ्गाजलपर महादेवजीका आवाहन करके उन बिल्वोदकेश्वरकी पूजा और स्तुति करना, महादेवजीका उन्हें अभीष्ट वर देकर दैत्योंको मारनेका आदेश देना तथा पारियात्र-पर्वतपर भगवान्का निवास एवं उनकी प्रतिमाके पूजनकी महिमा
| वैशम्पायन उवाच<br>तमारुह्य रथं कृष्णः पारियात्रं गिरिं ययौ।<br>यत्रैरावतमास्थाय स्थितः सुरपतिः प्रभुः ॥ १ ॥<br>वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हो पारियात्र पर्वतकी ओर चले, जहाँ प्रभावशाली देवराज इन्द्र ऐरावतपर आरूढ़ होकर खड़े थे ॥ १ ॥ | प्रद्युम्नः सात्यकिश्चापि गरुडस्थौ महाबलौ।<br>गतावुभौ रक्षणार्थे पारिजातमरिन्दमौ ॥ ५ ॥<br>गरुड़पर बैठे हुए महाबली प्रद्युम्न और सात्यकि ये दोनों शत्रुदमन वीर भी पारिजातकी रक्षाके लिये वहाँ गये ॥५॥ |
| पारियात्रो गिरिश्रेष्ठो दृष्ट्वा यान्तं जनार्दनम्।<br>शाणपादसमो भूत्वा प्रविवेश वसुंधराम् ॥ २ ॥<br>भगवान् श्रीकृष्णको आते देख पर्वतश्रेष्ठ पारियात्र उड़द-के ढेर या सनके बीजकी राशिके समान शिथिल होकर धरती-में समा गया ॥ २ ॥ | ततस्त्वस्तं गतः सूर्यः प्रवृत्ता रजनी नृप।<br>उपस्थितं पुनर्युद्धं शक्रकेशवयोरिह ॥ ६ ॥<br>नरेश्वर ! तत्पश्चात् सूर्यदेव अस्त हो गये और सब ओर रात फैल गयी तो भी वहाँ इन्द्र और श्रीकृष्णका युद्ध पुनः उपस्थित हुआ ॥ ६ ॥ |
| प्रियार्थं वासुदेवस्य प्रभावज्ञो महात्मनः।<br>तस्य प्रीतो हृषीकेशः पर्वतस्य जनाधिप ॥ ३ ॥<br>भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही उसने ऐसा किया था; क्योंकि वह महात्मा श्रीकृष्णके प्रभावको जानता था। नरेश्वर ! उस पर्वतके इस व्यवहारसे इन्द्रियोंके स्वामी श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३ ॥ | सुप्रहाराहतं दृष्ट्वा विष्णुस्तैरावतं गजम्।<br>नातिकल्पं महातेजा देवराजानमब्रवीत् ॥ ७ ॥<br>महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने ऐरावत हाथीको गरुड़के प्रहारोंसे अत्यन्त आहत और असमर्थ हुआ देख देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा—॥ ७ ॥ |
| ततः प्रयातं युद्धार्थमच्युतं कुरुनन्दन।<br>सपारिजातो गरुडः पृष्ठतोऽनुययौ तदा ॥ ४ ॥<br>कुरुनन्दन ! तदनन्तर युद्धके लिये जाते हुए श्रीकृष्णके पीछे-पीछे पारिजातसहित गरुड़ भी गये ॥ ४ ॥ | गरुडाभिहतः पूर्वं नातिकल्पो गजोत्तमः।<br>ऐरावतो महाबाहो रात्रिश्च समुपोद्यते ॥ ८ ॥<br>श्वः प्रभाते यथाकामं प्रवर्तेथा यथेच्छसि।<br>एवमस्त्विति कृष्णं तु देवराजोऽब्रवीत् प्रभुः ॥ ९ ॥<br>'महाबाहो ! गरुड़द्वारा पहलेसे ही आहत होकर आपका यह उत्तम हाथी ऐरावत इस समय कुछ असमर्थ हो गया है। इधर रात भी आ पहुँची है; अतः अब कल सबेरे |