विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५१४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्राहुर्विप्रास्त्वां गुणिनं तत्त्वविज्ञा-
स्तां ध्येयामम्बिकां लोकधात्रीम् ॥ ३२ ॥
उमासहित महेश्वर ! अतः संसारमें सब कुछ लिङ्ग और भगके चिह्नसे ही अङ्कित है, अतः यह समस्त चराचर जगत् आप दोनोंका ही स्वरूप है। तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपको गुणवान् और ध्येयस्वरूपा लोकजननी अम्बिकाको त्रिगुणरूपा कहते हैं ॥ ३२ ॥
वेदैर्गीर्णा सा हि तत् त्वं प्रसूता
यज्ञो दीक्षाणां योगिनां चातिरूपः।
नात्यद्भुतं त्वत्समं देव भूतं
भूतं भव्यं भवदेवाथ नास्ति ॥ ३३ ॥
वे अम्बिका ही वेदोंमें 'अजा' (माया) नामसे वर्णित हैं, वे ही महत्तत्त्वकी जननी हैं। आप यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले यजमानोंके द्रव्ययज्ञ तथा योगियोंके योगयज्ञ हैं। लौकिक रूपसे ऊपर उठे हुए दिव्य चिन्मय विग्रहधारी हैं। देव ! आपके समान अत्यन्त अद्भुत भूत (तत्त्व) भूत, वर्तमान और भविष्य कालमें भी दूसरा कोई नहीं है ॥ ३३ ॥
अहं ब्रह्मा कपिलो योऽप्यनन्तः
पुत्राः सर्वे ब्रह्मणश्चातिवीराः ।
त्वत्तः सर्वे देवदेव प्रसूता
एवं सर्वेशः कारणात्मा त्वमीड्यः ॥ ३४ ॥
देवदेव ! मैं, ब्रह्मा, कपिल, शेषनाग और आन्तरिक शत्रुओंपर विजय पानेके कारण अत्यन्त वीर (सनक आदि) सभी ब्रह्मपुत्र—ये सब-के-सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार आप सबके ईश्वर और कारणरूप होनेके कारण स्तुतिके योग्य हैं ॥ ३४ ॥
इति संस्तूयमानस्तु भगवान् गोवृषध्वजः।
प्रसार्य दक्षिणं हस्तं नारायणमथाब्रवीत् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णने जब स्तुति की, तब भगवान् वृषभध्वज शिवने अपना दाहिना हाथ फैलाकर भगवान् नारायणदेवसे इस प्रकार कहा— ॥ ३५ ॥
मनीषितानामर्थानां प्राप्तिस्ते सुरसत्तम ।
पारिजातं च हर्तासि मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥ ३६ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! तुम्हें अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होगी। तुम पारिजातको अवश्य ले जाओगे। इसके लिये तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये ॥ ३६ ॥
यथा मैनाकमाश्रित्य तपस्त्वमकरोः प्रभो ।
तथा मम वरं कृष्ण संस्मृत्य स्थैर्यमाप्नुहि ॥ ३७ ॥
'प्रभो ! श्रीकृष्ण ! जैसे मैनाकका आश्रय लेकर तुमने तप किया, उसी तरह मेरी ओरसे तुम्हें वर भी मिला। उस वरको याद करके तुम स्थिरता (धैर्य) धारण करो ॥ ३७ ॥
अवध्यस्त्वमजेयश्च मत्तः शूरतरस्तथा ।
भवितासीत्यवोचं यत् तत् तथा न तदन्यथा ॥ ३८ ॥
'मैंने जो तुमसे कहा था कि तुम अवध्य, अजेय तथा मुझसे भी बढ़कर शूरवीर होओगे, वह बात उसी रूपमें सत्य होगी। उसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता ॥ ३८ ॥
यश्च स्तवेन मां भक्त्या स्तोष्यतेऽमरसत्तम ।
त्वया कृतेन धर्मज्ञ धर्मभाक् सम्भविष्यति ।
समरे च जयं धिष्ण्ये प्राप्य पूजां तथोत्तमाम् ॥ ३९ ॥
'धर्मज्ञ ! अमरश्रेष्ठ ! विष्णो ! जो भक्तिभावसे तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिके द्वारा मेरा स्तवन करेगा, वह समरभूमिमें विजय तथा उत्तम सम्मान पाकर धर्मका भागी होगा ॥ ३९ ॥
बिल्वोदकेश्वरो नाम भविताहमिहानघ ।
देवेश्वर त्वयास्यापि देव सिद्धोपयाचनः ॥ ४० ॥
'अनघ ! देवेश्वर ! देव ! तुमने जो मेरी यहाँ स्थापना की है, उसके अनुसार मैं बिल्वोदकेश्वर नामसे विख्यात होऊँगा। यहाँकी हुई याचना मेरे द्वारा अवश्य सफल होगी॥ ४० ॥
इहस्थोपोषितो विद्वान् भक्तिमान् मम केशव ।
त्रिरात्रमीप्सिताँल्लोकान् गमिष्यति जनार्दन ॥ ४१ ॥
'केशव ! जनार्दन ! जो विद्वान् पुरुष यहाँ उपवासपूर्वक रहकर मुझमें भक्तिभाव रखते हुए तीन रात उपवास करेगा, वह मनोवाञ्छित लोकोंमें जायगा ॥ ४१ ॥
अविन्ध्या नाम देशेऽस्मिन् गङ्गा चैव भविष्यति ।
गङ्गास्नानसमं स्नानं मन्त्रतो भविता तथा ॥ ४२ ॥
'इस प्रदेशमें अविन्ध्या नामसे प्रसिद्ध गङ्गा प्रवाहित होगी। उसमें गङ्गासम्बन्धी मन्त्रोच्चारणपूर्वक किया हुआ स्नान साक्षात् गङ्गा-स्नानके समान फलदायक होगा ॥ ४२ ॥
षट्पुरं नाम नगरं दानवानां जनार्दन ।
अन्तरन्तर्द्धरणीदेशे पराक्रम्य महाबलाः ॥ ४३ ॥
'जनार्दन ! यहाँ धरतीके भीतर दानवोंका 'षट्पुर' नामक नगर है, जहाँ पराक्रमपूर्वक महाबली दानव निवास करते हैं ॥ ४३ ॥
एते दैत्या दुरात्मानो जगतो देव कण्टकाः ।
छन्ना वसन्ति गोविन्द सानावस्य महागिरेः ॥ ४४ ॥
'देव ! ये दुरात्मा दैत्य जगत्के लिये कण्टकरूप हैं। गोविन्द ! ये इस महापर्वतके शिखरपर छिपे रहते हैं ॥ ४४ ॥
अवध्याः देवदेवानां वरेण ब्रह्मणोऽनघ ।
मानुषान्तरितस्तस्मात् त्वमेताञ्जहि केशव ॥ ४५ ॥
'अनघ ! ब्रह्माजीके दिये हुए वरके प्रभावसे ये दैत्य देवदेवोंके लिये अवध्य हैं; अतः केशव ! तुम मानव-शरीरकी आड़ लेकर इन सब दैत्योंको मार डालो' ॥ ४५ ॥