विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः [ ५१५
एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ।
परिष्वज्य महात्मानं वासुदेवं जनाधिप ॥ ४६ ॥
जनेश्वर ! ऐसा कहकर महादेवजी महात्मा वासुदेवको हृदयसे लगाकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ४६ ॥
ततो याते महादेवे प्रभातायां नराधिप ।
तस्यां निशायां गोविन्दो भूयः पर्वतमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
नरेश्वर ! महादेवजीके चले जानेपर जब रात बीती और प्रभातकाल आया, तब भगवान् गोविन्दने पुनः उस पर्वतसे कहा—॥ ४७ ॥
तवाधः पर्वतश्रेष्ठ निवसन्ति महासुराः ।
अवध्या देवदेवानां वरेण ब्रह्मणः पुरा ॥ ४८ ॥
'पर्वतश्रेष्ठ ! तुम्हारे नीचे बड़े-बड़े असुर निवास करते हैं, जो पूर्वकालमें ब्रह्माजीका वर पानेके कारण देवाधिदेवोंके लिये भी अवध्य हैं ॥ ४८ ॥
निर्गमिष्यन्ति ते नैव मया रुद्धा महाबलाः ।
द्वारे निरुद्धे तत्रैव विनङ्क्ष्यन्ति ममाज्ञया ॥ ४९ ॥
'मैंने उन महाबली दैत्योंका द्वार बंद करके उन्हें अवरुद्ध कर दिया है। अब वे नहीं निकल सकेंगे। मेरी आज्ञासे द्वार अवरुद्ध हो जानेपर वहीं नष्ट हो जायेंगे ॥ ४९ ॥
त्वयि संनिहितश्चाहं भविष्यामि महागिरे ।
अधिष्ठाय महाघोरान् निवत्स्यामि च पर्वत ॥ ५० ॥
'महागिरे ! मैं सदा तुमपर निवास करूँगा। पर्वत ! उन महाभयानक असुरोंको दबाकर मैं यहीं रहूँगा ॥ ५० ॥
आरुह्य मूर्ध्नि मद्रूपं दृष्ट्वा पर्वतसत्तम ।
गोसहस्रप्रदानस्य फलं प्राप्स्यति शाश्वतम् ॥ ५१ ॥
'पर्वतप्रवर ! जो इस पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो मेरे अर्चाविग्रहका दर्शन करेगा, वह सहस्र गोदानका शाश्वत (अक्षय) फल प्राप्त करेगा ॥ ५१ ॥
त्वत्तोऽश्मभिश्च प्रतिमां कारयित्वा हि भक्तितः ।
शुश्रूषयन्ति ये नित्यं मम यास्यन्ति ते गतिम् ॥ ५२ ॥
'जो लोग तुम्हारे प्रस्तरोंसे मेरी प्रतिमा बनवाकर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करेंगे, वे मेरी गतिको प्राप्त होंगे' ॥ ५२ ॥
इति तं पर्वतं कृष्णो वरदोऽनुगृहीतवान् ।
तदाप्रभृति देवेशस्तत्र संनिहितोऽच्युतः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार वरदायक श्रीकृष्णने उस पर्वतपर अनुग्रह किया और तभीसे देवेश्वर अच्युत वहाँ निवास करने लगे ॥ ५३ ॥
पाषाणैः प्रतिमां तात कारयित्वा च कौरव ।
शुश्रूषन्ति कृतात्मानो विष्णुलोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ ५४ ॥
तात कुरुनन्दन ! शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष विष्णुलोककी इच्छा रखते हुए पारियात्रके पत्थरोंसे भगवान्की प्रतिमा बनवाकर सदा उसकी सेवा करते हैं ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे श्रीकृष्णकृतशिवस्तुतिर्नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकृत शिवस्तुतिविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
इन्द्र और उपेन्द्रका पुनर्युद्ध, उत्पातोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिका बीचमें आकर दोनोंका युद्ध बंद कराना, फिर सबका स्वर्गमें गमन, अदितिकी आज्ञासे शचीद्वारा उपहार पाकर पारिजातसहित द्वारकागमन, पारिजातसे द्वारकावासियोंकी प्रसन्नता, सत्यभामाके पुण्यक व्रतमें प्रतिग्रहके लिये श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका वरण
वैशम्पायन उवाच
ततो रथवरं कृष्णः समारुह्य महामनाः ।
विल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य ययौ नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! तदनन्तर महामनस्वी श्रीकृष्ण विल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार करके अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले ॥ १ ॥
महेन्द्रमाह्वयामास रथस्थो मधुसूदनः ।
सत्कृतं पुष्कराभ्याशे सर्वैर्देवगणैः सह ॥ २ ॥
रथपर बैठे हुए मधुसूदनने पुष्करके निकट समस्त देवगणोंके साथ सत्कारपूर्वक खड़े हुए देवराज इन्द्रका युद्धके लिये आह्वान किया ॥ २ ॥
ततः शक्रो जयन्तोऽथ हरिभिर्युक्तमुत्तमम् ।
आरुरोह रथं देवः सर्वकामप्रदः सताम् ॥ ३ ॥
तब साधुओंको समस्त मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेवाले देवेन्द्र घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम रथपर जयन्तसहित आरूढ़ हुए ॥ ३ ॥
ततो रथस्थयोर्युद्धमभवत् कुरुनन्दन ।
देवयोर्देवयोगेन पारिजातकृते तदा ॥ ४ ॥