भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 537

५१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


कुरुनन्दन ! तत्पश्चात् रथपर बैठे हुए उन दोनों देवताओंका दैववश पारिजातके लिये युद्ध आरम्भ हो गया ॥

ततोऽहन्दू रणे विष्णुर्बाणैः शत्रुबलार्दनः।
सैन्यानि देवराजस्य वाणजालैरजिह्मगैः ॥ ५ ॥

उस रणभूमिमें शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले श्रीकृष्णने अपने सीधे जानेवाले वाणसमूहोंद्वारा देवराज इन्द्रके सैनिकोंका संहार आरम्भ किया ॥ ५ ॥

उपेन्द्रं न महेन्द्रोऽथ नैव विष्णुः सुरेश्वरम्।
ताडयामासतुर्वीरौ शस्त्रैः शक्तावपि प्रभो ॥ ६ ॥

प्रभो ! वे दोनों वीर शक्तिशाली थे तो भी महेन्द्रने उपेन्द्रपर और उपेन्द्र विष्णुने देवेश्वर इन्द्रपर शस्त्रोंद्वारा प्रहार नहीं किया ॥ ६ ॥

एकैकमश्वं दशभिर्महेन्द्रस्य जनार्दनः।
विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैरस्त्रयुक्तैर्जनेश्वर ॥ ७ ॥

जनेश्वर ! जनार्दनने महेन्द्रके एक-एक अश्वको दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित दस-दस तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ७ ॥

शैव्याद्यानपि देवेन्द्रः शरैरमरसत्तमः।
छादयामास राजेन्द्र घोरैरस्त्राभिमन्त्रितैः ॥ ८ ॥

राजेन्द्र ! अमरश्रेष्ठ देवेन्द्रने भी दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भयंकर बाणोंसे श्रीकृष्णके शैव्य आदि चारों घोड़ोंको आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥

स च वाणसहस्रैश्च कृष्णो गजमवाकिरत्।
गरुडं च महातेजा वलभिद्धरिवाहनम् ॥ ९ ॥

श्रीकृष्णने इन्द्रके ऐरावत हाथीपर सहस्रों बाण बरसाये तथा महातेजस्वी वलविनाशन इन्द्रने श्रीहरिके वाहन गरुड़पर हजारों बाणोंकी वर्षा की ॥ ९ ॥

भूयिष्ठाभ्यां रथाभ्यां तौ तदहः शत्रुदारणौ।
युयुधाते महात्मानौ नारायणसुराधिपौ ॥ १० ॥

शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले महात्मा नारायण और देवेन्द्र उस दिन बड़े-बड़े रथोंद्वारा युद्ध कर रहे थे ॥ १० ॥

चकम्पे वसुधा कृत्स्ना नौर्जलस्थेव भारत।
दिशां दाहेन दिग्देशाः संवृताश्च समन्ततः ॥ ११ ॥

भारत ! उस समय जलमें ठहरी हुई नौकाकी भाँति सारी पृथ्वी काँपने लगी । दिशाओंके प्रदेश सब ओरसे दिग्दाहजनित आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देते थे ॥ ११ ॥

चेलुर्गिरिवराश्चैव पेतुश्च शतशो द्रुमाः।
पेतुश्च धरणीपृष्ठे मर्त्या धर्मगुणान्विताः ॥ १२ ॥

बड़े-बड़े पर्वत हिल गये । सैकड़ों वृक्ष गिर गये और धर्मात्मा मनुष्य भी धराशायी होने लगे ॥ १२ ॥

निर्घाताः शतशश्चैव पेतुस्तत्र नगाधिप।
ऊहुश्च सरितः सर्वाः प्रतिस्रोतो विशाम्पते ॥ १३ ॥

नरेश्वर ! वहाँ सैकड़ों बार वज्रपात हुआ तथा प्रजानाथ ! समस्त सरिताएँ अपने प्रवाहके प्रतिकूल उलटी दिशामें बहने लगीं ॥ १३ ॥

विव्वग्वाता ववुश्चैव पेतुरुल्काश्च निष्प्रभाः।
मुहुर्मुहुर्भूतसंघा रथनादेन मोहिताः ॥ १४ ॥

चारों ओर आँधी चलने लगी, प्रभाशून्य उल्काएँ गिरने लगीं और प्राणियोंके समुदाय रथोंकी घर्घरराहटसे बारंबार मोहित होने लगे ॥ १४ ॥

प्रजज्वाल जले चैव वह्निर्जनपदेश्वर।
युयुधुश्च ग्रहैः सार्द्धं ग्रहा नभसि सर्वतः ॥ १५ ॥

जनपदेश्वर ! पानीमें भी आग जलने लगी । आकाशमें सब ओर ग्रह दूसरे ग्रहोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १५ ॥

ज्योतींषि शतशः पेतुः स्वर्गाच्च धरणीतले।
दिशां गजाः प्रकुपिता नागाश्च धरणीतले ॥ १६ ॥

सैकड़ों तारे टूटकर स्वर्गसे पृथ्वीपर गिर पड़े । दिग्गज और पातालनिवासी नाग अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १६ ॥

गर्दभारुणसंस्थानैश्छिन्नाग्रैश्चावृतं नभः।
विनद्भिर्महारावैरुल्काशोणितवर्षिभिः ॥ १७ ॥

गदहोंकी भाँति धूसर और अरुण वर्णवाले बादलोंके टुकड़े बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाशमें छा गये और उल्कापात तथा रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ १७ ॥

न भूर्न द्यौर्न गगनं नरेन्द्रवृषभाभवन्।
स्वस्थानि सुरवीरौ तु दृष्ट्वा युद्धगतौ तदा ॥ १८ ॥

नरेन्द्रशिरोमणे ! उस समय उन दोनों देववीरोंको युद्धमें उपस्थित हुआ देख भूमि, अन्तरिक्ष तथा आकाशके प्राणी स्वस्थ न रह सके ॥ १८ ॥

जेपुर्मुनिगणा मन्त्रान्जगतो हितकाम्यया।
ब्राह्मणाश्च महात्मानो ह्यतिष्ठंस्तेषु सत्वराः ॥ १९ ॥

मुनिगण जगत्के हितकी कामनासे मन्त्रोंका जप करने लगे और महात्मा ब्राह्मण भी बड़ी उतावलीके साथ उन्हीं मन्त्रोंके जपमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥

ततो ब्रह्मा महातेजाः कश्यपं वाक्यमब्रवीत्।
गच्छ वध्वा सहादित्या पुत्रौ वारय सुव्रत ॥ २० ॥

तब महातेजस्वी ब्रह्माजीने कश्यपसे कहा—'सुव्रत ! तुम बहू अदितिके साथ जाओ और दोनों पुत्रोंको मना करो' ॥

स तथेति तदा देवमुक्तवा पद्मभवं मुनिः।
जगाम रथमास्थाय तस्थौ नरवरान्तिके ॥ २१ ॥