भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

विष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ५१७


नरश्रेष्ठ! तब ब्रह्माजीसे 'बहुत अच्छा' कहकर मुनिवर कश्यप रथपर बैठकर गये और दोनों पुत्रोंके निकट खड़े हो गये ॥ २१ ॥

स्थितं तु कश्यपं दृष्ट्वा सहादित्या तदन्तरा ।
उभौ रथाभ्यां धरणीमवतीर्णौ महाबलौ ॥ २२ ॥

बीचमें अदितिसहित कश्यपको खड़ा हुआ देख वे दोनों महाबली वीर रथोंसे पृथ्वीपर उतर गये ॥ २२ ॥

न्यस्तशस्त्रौ च तौ वीरौ ववन्दतुररिंदमौ ।
पितरौ धर्मतत्त्वज्ञौ सर्वभूतहिते रतौ ॥ २३ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले उन दोनों वीरोंने हथियार नीचे डालकर समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मतत्त्वके ज्ञाता माता-पिताको प्रणाम किया ॥ २३ ॥

उभौ गृहीत्वा हस्ताभ्यामदितिस्त्वब्रवीद् वचः ।
असोदराविवैवं किमन्योन्यं हन्तुमिच्छतः ॥ २४ ॥

उस समय अदितिने दोनोंको हाथोंसे पकड़कर कहा— 'जो एक माताकी कोखसे पैदा न हुए हों, ऐसे दो व्यक्तियोंकी भाँति तुम दोनों एक-दूसरेको मारनेकी इच्छा क्यों करते हो?॥

स्वल्पमर्थं पुरस्कृत्य प्रवृत्तमतिदारुणम् ।
सदृशं नेति पश्यामि सर्वथा मम पुत्रयोः ॥ २५ ॥

'छोटी-सी वस्तुको सामने रखकर यह अत्यन्त दारुण कर्म आरम्भ हो गया। मैं सब प्रकारसे विचार करके देखती हूँ तो यह काम मुझे अपने पुत्रोंके योग्य नहीं दिखायी देता ॥

श्रोतव्यं यदि मातुश्च पितुश्चैव प्रजापतेः ।
न्यस्तशस्त्रौ स्थितौ भूत्वा कुरुतं वचनं मम ॥ २६ ॥

'यदि तुम दोनोंको माताकी बात सुननी है और अपने पिता प्रजापतिकी आज्ञाका पालन करना है तो तुम दोनों नीचे हथियार डालकर सामने खड़े हो जाओ और मैं जो कहूँ, उसे मानो' ॥ २६ ॥

तथेत्युक्त्वा च तौ देवौ स्नातुकामौ महाबलौ ।
गङ्गां जग्मतुरेवाथ प्रजल्पन्तौ परस्परम् ॥ २७ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर दोनों महाबली देवता स्नान-की इच्छासे परस्पर बात करते हुए गङ्गातटपर गये ॥ २७ ॥

शक्र उवाच

त्वं प्रभुर्लोककृत् कृत्स्नराज्येऽहं स्थापितस्त्वया ।
स्थापयित्वा कथं नाम पुनर्मामवमन्यसे ॥ २८ ॥

इन्द्रने कहा—श्रीकृष्ण ! तुम समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले प्रभु हो ! तुमने ही सारी त्रिलोकीके राज्यपर मुझे स्थापित किया है । स्थापित करके फिर किसलिये मेरा अपमान करते हो ? ॥ २८ ॥

भ्रातृत्वमुपगम्यैव ज्येष्ठत्वं चाप्यपोह्य च ।
कथं कमलपत्राक्ष निर्वाणं कर्तुमिच्छसि ॥ २९ ॥

कमलनयन ! तुम मेरे भाई होकर भी मेरी ज्येष्ठताको दूर हटाकर उसका कुछ भी खयाल न करके कैसे मेरे जीवन-दीपको सदाके लिये बुझा देना चाहते हो ? ॥ २९ ॥

स्नातौ तु जाह्नवीतोये पुनरभ्यागतौ नृप ।
यत्रादितिः कश्यपश्च महात्मानौ दृढव्रतौ ॥ ३० ॥

नरेश्वर ! गङ्गाजीके जलमें नहाकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और इन्द्र जहाँ कश्यप और अदिति विद्यमान थे, वहाँ पुनः आ पहुँचे ॥

प्रियसंगमनं नाम तं देशं मुनयोऽवदन् ।
यत्र तौ संगतौ चोभौ पितृभ्यां कमलेक्षणौ ॥ ३१ ॥

मुनिलोग उस स्थानका नाम प्रियसङ्गमन बतलाते हैं, जहाँ वे दोनों कमलोचन बन्धु माता-पितासे मिले थे ॥ ३१ ॥

ततः शक्रस्य कौरव्य दत्त्वा वाचामभयं तदा ।
यत्र देवगणाः सर्वे समेता धर्मचारिणः ॥ ३२ ॥

कुरुनन्दन ! तदनन्तर श्रीकृष्णने इन्द्रको उस स्थानपर अपनी वाणीद्वारा अभयदान दिया, जहाँ समस्त धर्माचारी देवता एकत्र थे ॥ ३२ ॥

ततो ययुर्विमानैस्तु देवाः सर्वे त्रिविष्टपम् ।
श्रद्धया परमया युक्तास्तेषामेवानुरूपया ॥ ३३ ॥

तत्पश्चात् सब देवता उत्तम समृद्धिसे, जो उन्हींके अनुरूप थी, युक्त हो अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको गये ॥

कश्यपश्चादितिश्चैव तथा शक्रजनार्दनौ ।
विमानमेकमारुह्य गता राजंस्त्रिविष्टपम् ॥ ३४ ॥

राजन् ! कश्यप, अदिति, इन्द्र और श्रीकृष्ण—ये सब लोग एक विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको गये ॥ ३४ ॥

ते शक्रसदनं प्राप्ता रम्यं सर्वगुणान्वितम् ।
ऊषुरेकत्र कौरव्य मुदिता धर्मचारिणः ॥ ३५ ॥

कुरुनन्दन ! सर्वसद्गुण-सम्पन्न रमणीय इन्द्रभवनमें पहुँचकर वे समस्त धर्माचारी महात्मा बड़े आनन्दके साथ एक ही जगह ठहरे ॥ ३५ ॥

शची तु कश्यपं पत्न्या सहितं धर्मवत्सला ।
उपाचरन्महात्मानं सर्वभूतहिते रतम् ॥ ३६ ॥

धर्मवत्सला शचीने समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पत्नीसहित महात्मा कश्यपकी परिचर्या की ॥ ३६ ॥

ततस्तस्यां प्रभातायां रजन्यामब्रवीद्धरिम् ।
अदितिर्धर्मतत्त्वज्ञा सर्वभूतहितं वचः ॥ ३७ ॥

तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब धर्मके तत्त्वको जाननेवाली अदितिने श्रीकृष्णसे यह समस्त प्राणियोंके लिये हितकर वचन कहा— ॥ ३७ ॥