भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 539
५१८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

उपेन्द्र द्वारकां गच्छ पारिजातं नयस्व च।
वध्वा सम्प्रापयस्वैश पुण्यकं हृदये स्थितम्॥ ३८॥
'उपेन्द्र ! द्वारकाको जाओ और पारिजात भी लेते जाओ। ईश ! बहू सत्यभामाके हृदयमें जो पुण्यक नामक व्रतका उत्सव करनेकी इच्छा है, उसे पूर्ण कराओ॥ ३८॥

पुण्यके सत्यया प्राप्ते पुनरेष त्वया तरुः।
नन्दने पुरुषश्रेष्ठ स्थाप्यः स्थाने यथोचिते॥ ३९॥
'पुरुषश्रेष्ठ ! सत्यभामाद्वारा पुण्यक-व्रतका अनुष्ठान पूर्ण हो जानेपर फिर तुम्हीं इस वृक्षको नन्दनवनमें यथोचित स्थानपर स्थापित कर देना'॥ ३९॥

एवमस्त्विति कृष्णेन देवमाता यशस्विनी।
उक्ता धर्मगुणैर्युक्ता नारदेन महात्मना॥ ४०॥
तब श्रीकृष्णने यशस्विनी देवमाता अदितिसे, जिन्हें महात्मा नारदजीने धार्मिक गुणोंसे सम्पन्न बताया था, कहा—'ऐसा ही होगा'॥ ४०॥

ततोऽभिवाद्य पितरं मातरं च जनार्दनः।
महेन्द्रं सह शच्याथ प्रतस्थे द्वारकां प्रति॥ ४१॥
तदनन्तर पिता-माताको तथा शचीसहित महेन्द्रको प्रणाम करके श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुए॥ ४१॥

ददौ कृष्णाय पौलोमी नियोगान् कुरुनन्दन।
सर्वासामेव कृष्णस्य भार्याणां धर्मचारिणी॥ ४२॥
कुरुनन्दन ! उस समय धर्मचारिणी शचीने श्रीकृष्णकी सभी पत्नियोंके लिये बहुत-से उपहार दिये॥ ४२॥

दिव्यानां सर्वरत्नानां वाससां च मनस्विनी।
नानारागविरक्तानां सदैवारजसामपि॥ ४३॥
भार्याणां च सहस्राणि यानि षोडश माधवे।
प्रतिगृह्य महातेजाः प्रययौ द्वारकां प्रति॥ ४४॥
मनस्विनी शचीने उनकी सोलह हजार पत्नियोंके लिये सब प्रकारके दिव्य रत्न तथा भाँति-भाँतिके रंगोंमें रँगे हुए और कभी मलिन न होनेवाले बहुत-से वस्त्र श्रीकृष्णको अर्पित किये। महातेजस्वी श्रीकृष्ण वह सब उपहार लेकर द्वारकाको चले॥ ४३-४४॥

सम्पूज्यमानो द्युतिमान् खेचरैः पुण्यकर्मभिः।
ससात्यकिः सपुत्रश्च प्राप्तो रैवतकं गिरिम्॥ ४५॥
पुण्यकर्मा आकाशचारी प्राणियोंसे पूजित होते हुए तेजस्वी श्रीकृष्ण सात्यकि और अपने पुत्र प्रद्युम्नसहित रैवतक पर्वतपर आ पहुँचे॥ ४५॥

स तत्र स्थापयित्वा च पारिजातं वरद्रुमम्।
सात्यकिं प्रेषयामास द्वारकां द्वारशालिनीम्॥ ४६॥
श्रेष्ठ वृक्ष पारिजातको वहीं स्थापित करके श्रीकृष्णने सात्यकिको द्वारशालिनी द्वारकापुरीको भेजा॥ ४६॥

श्रीकृष्ण उवाच
पारिजातमहानीतं महेन्द्रसदनान्मया।
निवेदय महाबाहो भैमानां भीमवर्द्धन॥ ४७॥
श्रीकृष्ण बोले—भीमवंशी यादवोंमें भीमकुलकी वृद्धि करनेवाले महाबाहो ! तुम द्वारकामें जाकर यह सूचना दे दो कि मैं इन्द्रभवनसे पारिजात वृक्षको यहाँ लाया हूँ॥ ४७॥

अद्य द्वारवतीं चैव पारिजातमहं द्रुमम्।
प्रवेशयिष्ये नगरे शोभा प्रक्रियतां शुभा॥ ४८॥
आज मैं द्वारवतीपुरीमें पारिजात वृक्षका प्रवेश कराऊँगा; अतः नगरमें सुन्दर ढंगसे सजावट की जाय॥ ४८॥

इत्युक्तः सात्यको गत्वा तथोक्त्वा पुनरागतः।
कुमारैर्नागरैः सार्द्धं साम्बप्रभृतिभिः प्रभो॥ ४९॥
प्रभो ! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि नगरमें गये और उनका संदेश सुनाकर साम्ब आदि कुमारों तथा नागरिकोंके साथ फिर वहीं लौट आये॥ ४९॥

ततोऽग्रतः पारिजातमारोप्य गरुडे तदा।
प्रद्युम्नो द्वारकां रम्यां विवेश रथिनां वरः॥ ५०॥
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने पारिजातको अपने आगे गरुडपर रखकर सबसे पहले रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश किया॥

शैव्यादियुक्तयुक्तेन रथेनानुययौ हरिः।
तस्याथ रथमुख्येन सात्यकः साम्ब एव च॥ ५१॥
फिर शैव्य आदि घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा श्रीकृष्णने पारिजातका अनुसरण किया। उन्हींके श्रेष्ठ रथद्वारा सात्यकि और साम्ब भी गये॥ ५१॥

ये त्वन्ये नृप वार्ष्णेया यानैर्बहुविधैस्तथा।
ययुः प्रहृष्टास्तत् कर्म पूजयन्तो महात्मनः॥ ५२॥
नरेश्वर ! जो अन्य वृष्णिवंशी थे, वे अनेक प्रकारके वाहनोंद्वारा महात्मा श्रीकृष्णके उस कर्मकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षके साथ पुरीमें प्रविष्ट हुए॥ ५२॥

सात्यकाद् विस्तरं श्रुत्वा यादवा नागरास्तथा।
विस्मयं परमं जग्मुरप्रमेयस्य कर्मणा॥ ५३॥
सात्यकिसे पारिजात-हरणका विस्तृत समाचार सुनकर यादव तथा नागरिक अप्रमेयस्वरूप श्रीकृष्णके उस कर्मसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए॥ ५३॥

तं दिव्यकुसुमं वृक्षं दृष्ट्वाऽऽनर्तनिवासिनः।
राजन् न ततृपुर्दृष्ट्या पश्यमाना महोदयम्॥ ५४॥
राजन् ! उस महान् अभ्युदयकारी दिव्य पुष्पवाले वृक्षको देखकर आनर्तनिवासी बड़े प्रसन्न हुए। वे बारंबार देखनेपर भी तृप्त नहीं होते थे॥ ५४॥

तमद्भुतमचिन्त्यं च मदकेलिकलाण्डजम्।
वृक्षोत्तमं पश्यतां वै वृद्धानामगमज्जरा॥ ५५॥