भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

विष्णुपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ५१९


उस वृक्षपर बहुत-से पक्षी मदमत्त होकर केलिकलामें आसक्त हो रहे थे। उस अद्भुत, अचिन्त्य एवं उत्तम वृक्षका दर्शन करनेवाले वृद्धोंकी वृद्धावस्था तत्काल दूर हो गयी ॥

ये त्वन्धचक्षुषः सर्वे तेऽभवन् दिव्यचक्षुषः ।
विरोगा रोगिणश्चासन् घ्रात्वा गन्धं वनस्पतेः ॥ ५६ ॥

उस वनस्पतिकी गन्ध सूंघकर रोगी नीरोग हो गये और जिनकी आँखें पहले अंधी थीं, वे उस समय दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हो गये ॥ ५६ ॥

लपन्तः कोकिलाञ्श्वेताञ्छुत्वाऽऽनर्तनिवासिनः ।
बभूवुर्हृष्टमनसो ववन्दुश्च जनार्दनम् ॥ ५७ ॥

पारिजात वृक्षपर सफेद कोकिलोंको मधुर बोली बोलते सुनकर आनर्त देशके निवासी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् जनार्दनकी वन्दना करने लगे ॥ ५७ ॥

नानाविधानि तूर्याणि गेयानि मधुराणि च ।
शुश्रुवुस्तस्य वृक्षस्य नातिदूरं गता नराः ॥ ५८ ॥

उस वृक्षके समीप गये हुए मनुष्य नाना प्रकारके वाद्य और मीठे-मीठे गीत सुनते थे ॥ ५८ ॥

योऽयं संकल्पयामास गन्धं हृद्यं नरस्तथा ।
स तदैव तमाजघ्रे पारिजातसमुद्भवम् ॥ ५९ ॥

मनुष्य अपने मनमें जिस-जिस मनोरम सुगन्धके लिये संकल्प करते थे, वही तत्काल पारिजात वृक्षसे उनकी घ्राणेन्द्रियमें प्रकट हो जाती थी ॥ ५९ ॥

ततः प्रविश्य रम्यां तु द्वारकां यदुनन्दनः ।
वसुदेवं महात्मानं ददर्श देवकीं तथा ॥ ६० ॥

तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने रमणीय द्वारकापुरीमें प्रवेश करके महात्मा वसुदेव तथा माता देवकीका दर्शन किया॥

कुकुराधिपतिं चैव बलं भ्रातरमेव च ।
वृद्धांश्च यादवानां ये मानार्हानमरोपमान् ॥ ६१ ॥

फिर क्रमशः कुकुरवंशके अधिपति उग्रसेन, भैया बलराम तथा यादवोंमें जो बड़े-बूढ़े माननीय देवोपम पुरुष थे, उन सबसे वे मिले ॥ ६१ ॥

विसृज्य तान् वै भगवाननादिनिधनोऽच्युतः ।
सम्पूज्य च यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ॥ ६२ ॥

तत्पश्चात् उन सबका यथोचित पूजन करके उन्हें विदा करनेके पश्चात् आदि-अन्तसे रहित भगवान् अच्युत अपने ही भवनमें चले गये ॥ ६२ ॥

स सत्यभामया वासं विवेश मधुसूदनः ।
पारिजातं तरुश्रेष्ठं ग्राह्य गदपूर्वजः ॥ ६३ ॥

गदके बड़े भाई उन मधुसूदनने तरुश्रेष्ठ पारिजात-को लेकर सत्यभामाके भवनमें प्रवेश किया ॥ ६३ ॥

सा देवी पूजयामास प्रहृष्टा वासवानुजम् ।
प्रतिजग्राह तं चापि पारिजातं महाद्रुमम् ॥ ६४ ॥

देवी सत्यभामाने अत्यन्त प्रसन्न होकर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णका पूजन किया और उस विशाल वृक्ष पारिजात-को ले लिया ॥ ६४ ॥

मनीषितेन स तरुरल्पो भवति भारत ।
महांश्च वासुदेवस्य तदद्भुतमभून्महत् ॥ ६५ ॥

भारत ! वह वृक्ष वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार कभी छोटा हो जाता था और कभी बहुत बड़ा। यह उसके विषयमें बड़ी ही अद्भुत बात थी ॥ ६५ ॥

कदाचिद् द्वारकां सर्वां प्रच्छादयति भारत ।
कदाचिद्धस्तधार्यस्तु भवत्यङ्गुष्ठसंनिभः ॥ ६६ ॥

भरतनन्दन ! कभी तो वह वृक्ष इतना अधिक बढ़ जाता कि सारी द्वारकाको आच्छादित कर लेता था और कभी हाथपर रख लेने योग्य अङ्गूठेके बराबर हो जाता था ॥ ६६ ॥

ननन्द सत्या कौरव्य देवी प्राप्य मनोरथम् ।
पुण्यकार्थे तु सम्भारान् सम्भर्तुमुपचक्रमे ॥ ६७ ॥

कुरुनन्दन ! देवी सत्या उस मनोवाञ्छित वृक्षको पाकर बहुत प्रसन्न हुई । उन्होंने पुण्य-व्रतके लिये सामान जुटाना आरम्भ किया ॥ ६७ ॥

यानि द्रव्याणि कौरव्य जम्बूद्वीपे तु कानिचित् ।
योग्यानि तानि कृष्णेन सम्भृतानि महात्मना ॥ ६८ ॥

कुरुकुलभूषण ! जम्बूद्वीपमें जो कोई भी उपयुक्त द्रव्य थे, उन सबका महात्मा श्रीकृष्णने संग्रह कर लिया ॥ ६८ ॥

मुनिं तदा संस्मृतवान् स नारदं
जनार्दनः सर्वगुणोचितं वशी ।
प्रतिग्रहार्थं व्रतकस्य सत्यया
यथोपदिष्टस्य पुरंदरानुजः ॥ ६९ ॥

उस समय इन्द्रके छोटे भाई जितेन्द्रिय जनार्दनने सत्य-भामाको बताये और उनके द्वारा आचरणमें लाये गये पुण्यक-व्रतमें दिये जानेवाले दानको ग्रहण करनेके लिये सर्वगुणसम्पन्न नारद मुनिका स्मरण किया ॥ ६९ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे, हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातानयने पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातका आनयनविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥