भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

विष्णुपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ५२१


'धर्मज्ञ नारद ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगो। मैं तुम्हें वह वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारे ऊपर मेरा बहुत प्रेम है' ॥ १५ ॥

नारद उवाच
नित्यमेवास्तु मे प्रीतो भवान् विष्णो सनातन ।
त्वत्प्रसादात्तु सालोक्यं व्रजेयं ते महामते ॥ १६ ॥

**नारदजीने कहा—**सनातन विष्णो ! महामते ! आप मुझपर सदा ही प्रसन्न रहें और आपकी कृपासे मुझे आपही-का सालोक्य प्राप्त हो ॥ १६ ॥

अयोनिजो भवेयं ते नारायण सतां गते ।
भवेयं ब्राह्मणश्चैव पुनर्जात्यन्तरेष्वपि ॥ १७ ॥

सत्पुरुषोंके आश्रयभूत नारायण ! मैं आपकी कृपासे अयोनिज होऊँ और जन्मान्तरोंमें भी पुनः ब्राह्मण ही होऊँ ॥ १७ ॥

एवमस्त्विति तं देवो विष्णुः प्रोवाच भारत ।
तुतोष च ततो धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ १८ ॥

भारत ! तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'एवमस्तु (ऐसा ही हो) ।' यह वरदान पाकर बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारद बहुत संतुष्ट हुए ॥ १८ ॥

षोडश स्त्रीसहस्राणि विष्णोरतुलतेजसः ।
निमन्त्रितानि कौरव्य सत्यया हरिकान्तया ॥ १९ ॥

कुरुकुलनन्दन ! श्रीकृष्णप्रिया सत्याने अतुल तेजस्वी श्रीहरिकी सोलह हजार स्त्रियोंको अपने भवनमें निमन्त्रित किया ॥ १९ ॥

तासां ददौ संनियोगमेकैकं हरिवल्लभा ।
शच्या यो वासुदेवस्य पुरा दत्तो नराधिप ॥ २० ॥

नरेश्वर ! पहले शचीने भगवान् वासुदेवको जो भेंट-सामग्री दी थी, श्रीकृष्णवल्लभा सत्यभामाने उसमेंसे एक-एक वस्तुको लेकर उन सबको दिया ॥ २० ॥

पारिजातो वसंस्तत्र ततः प्रववृते तदा ।
आज्ञया वासुदेवस्य नारदेन महात्मना ॥ २१ ॥
निमन्त्रिता गणाः सर्वे केशवेन महात्मना ।
विभूतिं पारिजातस्य ददृशुः कुरुनन्दन ॥ २२ ॥

पारिजात वृक्ष वहाँ रहकर अपने गुणोंको प्रसिद्ध करने लगा । तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महात्मा नारदने उनके समस्त सुहृदोंको निमन्त्रित किया । कुरुनन्दन ! महात्मा केशवद्वारा निमन्त्रित हुए उन सब लोगोंने अपनी आँखोंसे पारिजात वृक्षका वैभव देखा ॥ २१-२२ ॥

पाण्डवांश्चानयामास सहैव पृ॑थया हरिः ।
द्रौपद्या च महातेजास्तथैव च सुभद्रया ॥ २३ ॥

महातेजस्वी श्रीहरिने कुन्ती, द्रौपदी और सुभद्राके साथ पाण्डवोंको भी द्वारकामें बुलवाया ॥ २३ ॥

श्रुतश्रवां च ससुतां भीष्मकं ससुतं तदा ।
अन्यानपि च कौरव्य मित्रसम्बन्धिबान्धवान् ॥ २४ ॥

कुरुनन्दन ! श्रुतश्रवा और उसके पुत्र शिशुपालको, भीष्मक और उसके पुत्र रुक्मीको तथा अन्यान्य मित्रों, सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंको श्रीकृष्णने वहाँ बुलवाया था २४

रेमे च सह पार्थेन फाल्गुनेन जनार्दनः ।
सान्तःपुरो महातेजाः परमर्द्धयावसन्नृप ॥ २५ ॥

नरेश्वर ! महातेजस्वी जनार्दन कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ रनवाससहित वहाँ क्रीड़ाविनोदपूर्वक बड़े आनन्दसे रहे । वे उच्चकोटिकी समृद्धिसे सम्पन्न होकर द्वारकामें निवास करते थे ॥ २५ ॥

संवत्सरे ततो याते केशिहामरसत्तमः ।
पारिजातं पुनः स्वर्गमानयत् सर्वभावनः ॥ २६ ॥

एक वर्ष बीत जानेपर सबको उत्पन्न करनेवाले अमर-शिरोमणि केशिहन्ता श्रीकृष्णने पारिजात वृक्षको पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ २६ ॥

तत्रादितिं कश्यपं च दृष्ट्वा स्वजननीं प्रभुः ।
शक्रेण सहितो धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ २७ ॥

अप्रमेय पराक्रमशाली बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ इन्द्रसहित जाकर पिता कश्यप तथा अपनी माता अदितिका दर्शन किया ॥ २७ ॥

तमुवाचादितिर्माता प्रणतं मधुसूदनम् ।
सौभ्रात्रमस्तु वामेवं नित्यं चामरसत्तम ॥ २८ ॥
मनोरथं मम त्वं च पूरयस्व जनार्दन ।

उस समय अपने चरणोंमें पड़े हुए मधुसूदनसे माता अदितिने कहा—'अमरश्रेष्ठ ! तुम दोनोंमें सदा ही अच्छा भ्रातृभाव बना रहे । जनार्दन ! तुम मेरे इसी मनोरथको पूर्ण करो' ॥ २८½ ॥

तथेत्येवाब्रवीत् कृष्णस्ततो मातरमात्मवान् ॥ २९ ॥
आमन्त्रयित्वा पितरौ देवराजानमब्रवीत् ।
वासुदेवो महातेजाः कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३० ॥

तब मनस्वी श्रीकृष्णने माता अदितिसे कहा—'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' तत्पश्चात् पिता-मातासे विदा ले महातेजस्वी वासुदेवने देवराज इन्द्रसे यह समयोचित बात कही—॥ २९-३० ॥

महादेवेन देवेश संदिष्टोऽस्मि महात्मना ।
अन्तर्भूमितलेऽबध्यान्सुरान् प्रति मामद ॥ ३१ ॥