विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५२२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! महात्मा महादेवजीने भूमिके भीतर निवास करनेवाले अवध्य असुरोंका वध करनेके लिये मुझे आदेश दिया है ॥ ३१ ॥
तदितो दशरात्रेण हन्ताहमसुरोत्तमान् ।
तत्रोपविष्टान् स्थातव्यं प्रवरेण महात्मना ॥ ३२ ॥
जयन्तेन च वीरेण दानवानां जिघांसया ।
'अतः मैं आजसे लेकर दस रातके भीतर भूमिके भीतर बैठे हुए उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर डालूँगा। वहाँ दानवोंके वधकी इच्छासे महात्मा प्रवर तथा वीर जयन्तको भी मेरे साथ रहना चाहिये ॥ ३२½ ॥
एकोऽत्र मानुषो देवो देवपुत्रस्तथा परः ॥ ३३ ॥
अवध्याः किल ते देवैर्ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
अस्माभिः किल हन्तव्यां मानुषत्वमुपागतैः ॥ ३४ ॥
'इनमेंसे एक (प्रवर) तो मनुष्य देव है और दूसरा (जयन्त) देवपुत्र। ब्रह्माजीके वरसे मदमत्त हुए वे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं; परंतु मनुष्य-भावको प्राप्त हुए हमलोग उन्हें अवश्य मार डालेंगे' ॥ ३३-३४ ॥
तथेति कृष्णं स हरिः प्रीतरूपस्तथाब्रवीत् ।
सस्वजाते ततो देवावन्योन्यं जनमेजय ॥ ३५ ॥
जनमेजय ! तब इन्द्रने प्रसन्न होकर श्रीकृष्णसे कहा— 'ऐसा ही होगा।' फिर वे दोनों देवता एक-दूसरेसे गले मिले ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे स्वर्गे पारिजातस्थापने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें पारिजातकी पुनः स्वर्गलोकमें स्थापनाविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
पुण्यक-विधिके वर्णनका उपक्रम
जनमेजय उवाच
पुण्यकानां ममोत्पत्तिं कथयस्व द्विजोत्तम ।
द्वैपायनप्रसादेन सर्वं हि विदितं तव ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ ! पुण्यकोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है, यह मुझे बताइये; क्योंकि द्वैपायन व्यासकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
उमया पुण्यकविधिर्नरेन्द्रोत्पादितः पुरा ।
शृणु येन विधानेन लोके धर्मभृतां वर ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र ! पूर्वकालमें भगवती उमाने पुण्यकव्रतकी विधिक प्रतिपादन किया है। उसके अनुसार लोकमें जिस विधानसे व्रत किया जाता है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
स्वर्गान्नीते पारिजाते कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
ययौ द्वारवतीं धीमान् नारदो मुनिसत्तमः ॥ ३ ॥
जब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण स्वर्गसे पारिजात वृक्षको द्वारकामें ले गये, उस समय बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ पधारे ॥ ३ ॥
देवासुरे नृपश्रेष्ठ संग्रामे समुपस्थिते ।
षट्पुरस्य वधे घोरे महादेवाज्ञयानघ ॥ ४ ॥
निष्पाप नृपश्रेष्ठ ! जब महादेवजीकी आज्ञासे देवासुर-संग्रामका अवसर उपस्थित था और षट्पुरवासी दानवोंका घोर वध होनेवाला था, उसी समयकी बात है ॥ ४ ॥
कृष्णेन सहितं विप्रं नारदं धर्मवित्तमम् ।
आसीनं परिपप्रच्छ रुक्मिणी भैष्मिकी नृप ॥ ५ ॥
नरेश्वर ! धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रवर नारदजी श्रीकृष्णके साथ बैठे थे। उस समय भीष्मककुमारी रुक्मिणीने उनसे पूछा ॥ ५ ॥
तत्र जाम्बवती देवी सत्यभामा च भामिनी ।
गान्धारराजपुत्री च योगयुक्ता नराधिप ॥ ६ ॥
देव्यश्च नृप कृष्णस्य वह्व्योऽन्या वै समागताः ।
कुलशीलगुणोपेता धर्मशीलाः पतिव्रताः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! वहाँ रुक्मिणीके साथ जाम्बवती देवी, भामिनी सत्यभामा, गान्धारराजकुमारी योगयुक्ता शैव्या तथा श्रीकृष्णकी अन्य बहुत-सी कुलवती, सुशीला, गुणवती, धर्मशीला एवं पतिव्रता पत्नियाँ भी आयी हुई थीं ॥ ६-७ ॥
रुक्मिण्युवाच
मुने धर्मभृतां श्रेष्ठ धर्मज्ञानभृतां वर ।
उत्पत्तिं पुण्यकानां त्वं वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥ ८ ॥
रुक्मिणीने कहा—धर्मात्माओं और ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मुने ! आप मुझे पुण्यकोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥