विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] [ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ] ५२३
विधिं च फलयोंग च दानकालं तथैव च । कौतूहलं नस्तत्सिद्धिं वदस्व वदतां वर ॥ ९ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवर्षे ! उस पुण्यकव्रतकी विधि, फलयोंग और दानकाल क्या है ? उसकी सिद्धि कैसे होती है ? यह सब बताइये । हमें उसके विषयमें सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ९ ॥
नारद उवाच
शृणु वैदर्भि धर्मज्ञे सपत्नीभिः सहानघे । पुण्यकानां विधिः प्रोक्तो यथा देवि पुरोमया ॥ १० ॥
नारदजीने कहा—धर्मको जाननेवाली निष्पाप विदर्भनन्दिनि ! देवि ! पूर्वकालमें उमादेवीने पुण्यकोंकी जैसी विधि बतायी थी, उसे तुम अपनी सौतोंके साथ सुनो ॥ १०॥
चचारोमा व्रतं देवी पुण्यकानां शुचिव्रता । व्रतावसानेऽथ तथा सख्यो देवि निमन्त्रिताः ॥ ११ ॥
देवि ! पवित्र व्रत धारण करनेवाली उमादेवीने जब पुण्यकोंका व्रत किया था, उस समय व्रतके अन्तमें उन्होंने अपनी सखियोंको निमन्त्रित किया ॥ ११ ॥
अदित्याद्याः सुताः सर्वा दक्षस्याक्लिष्टकर्मणः । पौलोमी च शची देवी ख्याता लोके पतिव्रता ॥ १२ ॥ रोहिणी च महाभागा सोमस्य दयिता सती । फाल्गुनी च तथा पूर्वा रेवती च विशाम्पते ॥ १३ ॥ तथा शतभिषा चैव मघा च कुरुनन्दन । एताभिर्हि महादेवी पूर्वमाराधिता सती ॥ १४ ॥
प्रजानाथ ! कुरुनन्दन ! अनायास ही सृष्टिसम्बन्धी महान् कर्म करनेवाले प्रजापति दक्षकी अदिति आदि समस्त पुत्रियाँ, लोकविख्यात पतिव्रता पुलोमकुमारी शची देवी, सोमकी प्यारी पत्नी सती साध्वी महाभागा रोहिणी, पूर्वा फाल्गुनी, रेवती, शतभिषा और मघा—ये सब-की-सब निमन्त्रित होकर वहाँ आयी थीं । इन सबने पूर्वकालमें सती महादेवी उमाकी आराधना की थी ॥ १२-१४ ॥
गङ्गा सरस्वती चैव वेणी गोदा च निम्नगा । तथा वैतरणी चैव गण्डकी या च भारत ॥ १५ ॥ अन्याश्च सरितो रम्या लोपामुद्रा च भारत । सत्यश्चान्या जगद् देव्यो धारयन्ति हिताः शुभाः॥ १६ ॥
भारत ! गङ्गा, सरस्वती, वेणी, गोदावरी, वैतरणी और गण्डकी—ये तथा और भी बहुत सी रमणीय सरिताएँ वहाँ आयी थीं । लोपामुद्रा और अन्य शुभलक्षणा सती देवियाँ, जो अपने धर्मसे इस जगत्को धारण करती हैं, वहाँ उपस्थित थीं ॥ १५-१६ ॥
शुभाश्च गिरिनन्दिन्यो वह्निकन्याश्च सुव्रताः । स्वाहा वह्निप्रिया देवी सावित्री च यशस्विनी ॥ १७ ॥ ऋद्धिः कुबेरकान्ता च जलेशमहिषी तथा । भार्या पितृपतेश्चैव वसुपत्न्यस्तथा च याः ॥ १८ ॥
सुन्दरी गिरिकन्याएँ, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अग्नि-कन्याएँ, अग्निदेवकी प्यारी पत्नी स्वाहा देवी, यशस्विनी सावित्री देवी, कुबेरकान्ता ऋद्धि, जलके स्वामी वरुणकी रानी, यमराजकी भार्या तथा वसुओंकी पत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित हुई थीं ॥ १७-१८ ॥
ह्रीः श्रीर्धृतिस्तथा कीर्तिराशा मेधा च सुव्रताः । प्रीतिर्मतिश्च ख्यातिश्च संनीतिश्च तपोधनाः ॥ १९ ॥
ह्री, श्री, धृति, कीर्ति, आशा, मेधा, प्रीति, मति, ख्याति और संनीति—ये सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तपोधना नारियाँ भी वहाँ एकत्र हुई थीं ॥ १९ ॥
देव्यः सत्यस्तथैवान्याः सर्वभूतहिते रताः । तासां व्रतावसाने च पूजां चक्रेऽम्बिका तदा ॥ २० ॥
इनके सिवा और भी समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाली सती देवियाँ उपस्थित थीं । अम्बिकाने व्रतके अन्तमें उन सबका पूजन किया ॥ २० ॥
तिलरत्नमयं दत्त्वा पर्वतं सर्वधान्यवत् । वासोभिर्भूषणैर्मुख्यैर्नानारागैः सुमध्यमे ॥ २१ ॥
सुमध्यमे ! तिल और रत्नोंद्वारा निर्मित हुए सम्पूर्ण धान्योंसे युक्त पर्वतका दान करके उमाने अनेक रंगोंके अच्छे-अच्छे वस्त्रों और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनकी पूजा की ॥ २१ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजां दत्तां देव्या तपोधनाः । उपविष्टाः कथाश्चित्राः कुर्वन्त्यो भर्तृदेवताः ॥ २२ ॥
उमादेवीद्वारा दी गयी उस पूजाको ग्रहण करके वे तपोधना एवं पतिव्रता देवियाँ वहाँ बैठकर आपसमें विचित्र कथावार्ता करने लगीं ॥ २२ ॥
पुण्यकार्थे कथास्तासामासन्न देवी शशंस याः । विधिं च पुण्यकस्याथ सतीनां भर्तृदेवते ॥ २३ ॥
पतिदेवते ! उन सब देवियोंकी चर्चाका विषय था पुण्यकव्रत—ये उसके विषयमें जिज्ञासा करती थीं । उस समय देवी उमाने उन सतियोंको पुण्यकव्रत और उसकी विधिका उपदेश दिया था ॥ २३ ॥
तासां मतेन साध्वीनां सर्वासां सोमनन्दिनी । पर्यपृच्छदुमां देवीं पुण्यकानां विधिं वरा ॥ २४ ॥
वहाँ जुटी हुई उन सभी साध्वी देवियोंके मतसे श्रेष्ठ पतिव्रता सोमनन्दिनी अरुन्धतीने उमादेवीसे पुण्यकोंकी विधि पूछी ॥ २४ ॥
उमा तासां प्रियार्थं तु पुण्यकान्यब्रवीत् तदा । समक्षं मम वैदर्भि सर्वभूतहिते रता ॥ २५ ॥