भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 546
५२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विदर्भराजकुमारी ! समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उमादेवीने उन सतियोंका प्रिय करनेके लिये मेरे सामने ही उस समय उन्हें पुण्यकोंका उपदेश दिया ॥ २५ ॥

ममैव चोमया दत्तः स तदा रत्नपर्वतः ।
प्रतिगृह्य मया चैव कृतो ब्राह्मणसाच्छुभे ॥ २६ ॥

शुभे ! उमादेवीने उस दिन मुझे ही उस रत्नमय पर्वतका दान दिया था । वह दान लेकर मैंने ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया था ॥ २६ ॥

उमा त्वरुन्धतीं साध्वीमामन्त्र्य यदभाषत ।
शृणु कल्याणि वक्ष्यामि सर्वाभिः सहिता शुभे ॥ २७ ॥

शुभे ! कल्याणी ! उमादेवीने साध्वी अरुन्धतीको सम्बोधित करके जो भाषण दिया था, उसे मैं बता रहा हूँ । तुम इन सभी रानियोंके साथ उसे सुनो ॥ २७ ॥

पुण्यकानां विधिं कृत्स्नं यथावदनुपूर्वशः ।
यथा चैव मया दृष्टस्तत एष विधिः शुभे ॥ २८ ॥

शुभे ! पुण्यकोंकी सम्पूर्ण विधिको जैसा मैंने वर्णन सुना है और जिस रूपमें उसे देखा है, उसी रूपमें मैं क्रमशः इसका यथावत् वर्णन करता हूँ, तुम सुनो ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पुण्यकविधिकथने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पुण्यकविधिको कथनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥


अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

उमाद्वारा सती स्त्रीके महत्त्वका वर्णन करते हुए पुण्यक-व्रतकी विधिका उपदेश

उमोवाच

सर्वज्ञाऽहं यदा भर्तुः प्रसादेन शुचिस्मिते ।
तदा पुरा ममादिष्टो दृष्टः पुण्यविधिः शुभः ॥ १ ॥

उमा बोलीं—पवित्र मुसकानवाली देवि ! मैं अपने पतिदेवकी कृपासे सर्वज्ञ हूँ तो भी पूर्वकालमें पतिदेवने मुझे इसका उपदेश दिया था । तभी मुझे इस शुभ पुण्यक-विधिका साक्षात्कार हुआ ॥ १ ॥

सनातनः पुण्यविधिरिति बुद्ध्यावगम्यताम् ।
महादेवप्रसादेन मया दृष्टस्त्वरुन्धति ॥ २ ॥

अरुन्धती ! तुम्हें अपनी बुद्धिसे इस बातको निश्चित रूपसे समझ लेना चाहिये कि पुण्यक-व्रतकी विधि सनातन है। मुझे महादेवजीकी कृपासे उसका दर्शन (ज्ञान) हुआ है ॥ २ ॥

पुण्यकानि च सर्वाणि चीर्णवत्यस्म्यनिन्दिते ।
अनुज्ञया भगवतो भर्तुः शर्वस्य धीमतः ॥ ३ ॥

अनिन्दिते ! मैंने अपने पति बुद्धिमान् भगवान् शिवकी आज्ञासे समस्त पुण्यकोंका आचरण किया है ॥ ३ ॥

सतीत्वं धर्मचरणं यस्या नित्यमखण्डितम् ।
पुण्यकानां विधिस्तस्याः पुराणैः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥

जिस नारीको सतीत्व और धर्माचरणका अखण्डित रूपसे निर्वाह सदा अभीष्ट होता है, उसीके लिये पुरातन महर्षियोंने पुण्यकोंकी विधिका प्रतिपादन किया है ॥ ४ ॥

दानोपवासपुण्यानि सुकृतान्यप्यरुन्धति ।
निष्फलान्यसतीनां हि पुण्यकानि तथा शुभे ॥ ५ ॥

शुभे ! अरुन्धति ! असती नारियोंके द्वारा भलीभाँति किये जानेपर भी दान और उपवासके पुण्य तथा पुण्यक निष्फल हो जाते हैं ॥ ५ ॥

या वञ्चयन्ति भर्तारं योनिदुष्टाश्च याः स्त्रियः ।
योनिदोषात् पुण्यफलं नाश्नन्ति निरयङ्गमाः ॥ ६ ॥

जो स्त्रियाँ अपने पतिको ठगती हैं, उन्हें धोखा देती हैं, जिनकी योनि जारसंगसे दूषित हो गयी है, वे उस योनि-दोषके कारण पुण्यका फल नहीं भोगने पातीं; नरकमें ही गिरती हैं ॥ ६ ॥

साध्व्यो जगद् धारयन्ति सुशीलाः पतिदेवताः ।
अनन्या धर्मनित्याश्च सतीपन्थानमाश्रिताः ॥ ७ ॥

जिनके आचार-विचार शुद्ध हैं, जो पतिको ही आराध्यदेव मानती हैं, उनमें अनन्य भावसे अनुरक्त होती हैं, सदा धर्मके अनुष्ठानमें लगी रहती हैं और सतियोंके पथपर ही चलती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ ही इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ७ ॥

अवाग्दुष्टाः शौचयुक्ता धृतिमत्यः शुभव्रताः ।
सततं साधुवादिन्यो धारयन्ति जगत् खलु ॥ ८ ॥

जिनकी वाणी परनिन्दा और असत्य आदि दोषसे दूषित नहीं है, जो बाहर-भीतरसे शुद्ध रहनेवाली हैं, जो धैर्यशालिनी तथा शुभ व्रतका पालन करनेवाली हैं, जो सदा अच्छी ही बातें बोला करती हैं, वे साध्वी स्त्रियाँ इस जगत्को धारण करती हैं ॥ ८ ॥

व्याधितः पतितो वापि दीनो वापि कथञ्चन ।
न त्यक्तव्यः स्त्रिया भर्ता धर्म एष सनातनः ॥ ९ ॥

अपना पति रोगी हो, पतित हो अथवा दीन हो, नारीको