विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 550, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
विरक्ति न हो और हमारा व्यवहार सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके समान हो ॥ १३ ॥
लोकान् साध्वीनामुत्तमानां व्रजेयं याभिः सर्वं धार्यते विश्वरूपम् ।
उभे कुले याः शुभाः पावयन्ति पितुर्भर्तुश्च पतिभक्त्योर्जिताश्च ॥ १४ ॥
जो शुभलक्षणा देवियाँ पतिभक्तिके प्रभावसे शक्तिशालिनी होकर पिता और पति दोनोंके कुलोंको पावन बनाती हैं तथा जो अपने धर्मसे इस सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हैं, उन्हीं उत्तम पतिव्रता देवियोंके लोकोंमें मैं जाऊँ ॥ १४ ॥
भूमिर्वायुर्जलमाकाशमग्नि- रन्तःक्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्यो महांश्च ।
अहंकारश्च मम साक्ष्ये नियुक्ताः स्मरेयुर्मे निश्चयं च व्रतं च ॥ १५ ॥
पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, अन्तर्यामी क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, महत्तत्त्व और अहङ्कार—इन सबको मैंने अपना साक्षी बनाया है। ये मेरे इस निश्चय और व्रतको स्मरण रखें ॥
यैरारब्धो देहिनां भौतिकोऽयं विधिः सत्त्वाद्यैर्भूतयुक्तैः सबीजैः ।
सन्त्वेते मे साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १६ ॥
जिन सत्त्व आदि गुणोंने भूतों और उनके कर्मबीजोंसे युक्त हो देहधारियोंके इस भौतिक शरीरका निर्माण किया है, वे और उनके अभिमानी देवता जो सबमें स्थित हैं, मेरे इस व्रत और निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १६ ॥
चन्द्रादित्यौ पुण्यसाक्षी यमश्च दिशः सर्वा दश चात्मा च मेऽयम् ।
सन्त्वेते वै साक्षिणः सर्वसंस्था व्रते चास्मिन् निश्चये चापि नित्यम् ॥ १७ ॥
चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यके साक्षी यम, सम्पूर्ण दसों दिशाएँ और मेरा यह आत्मा—ये सबमें स्थित रहनेवाले देवता मेरे इस व्रत एवं निश्चयमें सदा साक्षी बने रहें ॥ १७ ॥
मन्त्रैरेतैः पुराणोक्तैः सर्वद्रव्याभिमन्त्रणम् ।
व्रतचर्यात् प्रभृति वै पुराणे समुदाहृतम् ॥ १८ ॥
व्रतके आरम्भसे लेकर प्रतिदिन इन पुराणोक्त मन्त्रोंद्वारा समस्त द्रव्योंको अभिमन्त्रित करना चाहिये। यह पुराणमें कहा गया है ॥ १८ ॥
स्नात्वाथ वाससी दद्याद् भर्तुः कर्त्य स्वयं शुभे ।
अथात्मकर्तितं न स्याच्छुभे विघ्नेन केनचित् ॥ १९ ॥
वासोऽन्यदेव दद्याच्च श्वेतं मुख्यं नवं शुचि ।
स्वकर्तितं च सूत्रं तु वाससा तेन मिश्रयेत् ॥ २० ॥
शुभे ! स्नान करके अपने पतिको स्वयं ही सूत कातकर बनाये हुए दो वस्त्र भेंट करे। यदि किसी विघ्न विशेषके कारण अपने ही काते हुए सूतका वस्त्र न हो तो दूसरा ही वस्त्र दे दे। वह वस्त्र शुद्ध, नवीन, उत्तम और श्वेत वर्णका होना चाहिये। उस वस्त्रके साथ अपना काता हुआ सूत भी मिला दे ॥ १९-२० ॥
ततो द्विजं शुचिं दान्तं ज्ञानविज्ञानकोविदम् ।
भोजयेच्च यथाशक्त्या सह भर्त्रा सुमध्यमे ॥ २१ ॥
सुमध्यमे ! तदनन्तर ज्ञान-विज्ञानकोविद, पवित्र, जितेन्द्रिय ब्राह्मणको अपने पतिके साथ बिठाकर यथाशक्ति भोजन कराये ॥ २१ ॥
ब्राह्मणस्यापि दातव्यं वासोयुग्मं महातपे ।
शय्यासनं गृहं धान्यं दासं दासीं तथैव च ॥ २२ ॥
अलंकारः शक्तिताश्च रत्नपर्वत एव च ।
सर्वधान्यसमुन्मिश्रस्तिलैश्च सविशेषतः ॥ २३ ॥
वासोभिश्च प्रतिच्छन्नो नानावर्णैररुन्धति ।
हस्त्यश्वावचयश्चैव देया गौरेव च ध्रुवम् ॥ २४ ॥
महान् तप करनेवाली देवि ! अरुन्धति ! ब्राह्मणको भी यथासम्भव जोड़ा वस्त्र, शय्या, आसन, गृह, धान्य, दास-दासी, आभूषण, सब प्रकारके धान्यों और विशेषतः तिलोंसे मिश्रित रत्नमय पर्वत, जो नाना रंगके वस्त्रोंसे आच्छादित हो, यथाशक्ति दान करना चाहिये। सम्भव हो तो हाथी-घोड़ोंका समूह दिया जाय अन्यथा एक गौका ही दान कर दिया जाय। यथाशक्ति दान देना आवश्यक है ॥ २२—२४ ॥
लवणप्रतिमां दद्यान्नवनीतस्य चापराम् ।
गुडस्य मधुनश्चैव सुवर्णस्य च शोभनाम् ॥ २५ ॥
नमक, माखन, गुड़, मधु और सुवर्णकी बनी हुई पृथक्-पृथक् उमा-महेश्वरकी सुन्दर प्रतिमाका भी दान करना चाहिये ॥ २५ ॥
तथैव सर्वगन्धानां रसानां पृथगेव च ।
तथा सुमनसां दद्याद् रौप्यस्यौदुम्बरस्य च ॥ २६ ॥
फलानां चैव सर्वेषां वाससामपि नन्दिनि ।
चित्रप्रतिकृतिं चैव काष्ठस्य प्रतिमां तथा ॥ २७ ॥
नन्दिनि ! उसी तरह सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थों, रसों, फूलों, चाँदी, सम्पूर्ण फल, वस्त्र, चित्र और काष्ठकी प्रतिमाका भी यथासम्भव दान करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥
शिलां प्रतिकृतिं चैव दध्नोऽथ पयसस्तथा ।
सर्पिषा दूर्वया चैव या चान्यामप्यभीप्सति ॥ २८ ॥
प्रस्तर, दूध, दही, घी और दूर्वाकी प्रतिमाको तथा और तरहकी प्रतिमाको भी, जिसे तुम देना चाहो, दे सकती हो ॥ २८ ॥