भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 549

विष्णुपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ५२७ स्त्रियो ह्यावाहयेत् साध्वीरेकादश समाधिना । स्वयं चैव विधिर्दृष्टो व्रतकानां मया शुभः ॥ २ ॥ इसमें ग्यारह साध्वी स्त्रियोंको बुलाना चाहिये। मैंने स्वयं ही समाधिके द्वारा व्रतोंके इस शुभ विधानका साक्षात्कार किया है ॥ २ ॥ अद्भिर्दद्यात् सतीः सर्वा या मूलव्रतिनी भवेत् । तासां तु निष्क्रयो देयः कालदेशानुरूपतः ॥ ३ ॥ मूल व्रतका अनुष्ठान करनेवाली प्रधान स्त्री अपने यहाँ आमन्त्रित की गयी उन समस्त ग्यारह सतियोंका दान करे और देश-कालके अनुसार उनका निष्क्रय दे दे* ॥ ३ ॥ ततो मासान्तशुक्लस्य तिथौ च नवमी तथा । आराधयित्वा कर्तव्यं व्रतस्यापवर्जनम् ॥ ४ ॥ तदनन्तर मासके अन्तमें शुक्ल-पक्षकी नवमी तिथिको देवाराधना करके व्रतको समाप्त करना चाहिये ॥ ४ ॥ उपवासमहोरात्रं व्रतकं चापि निश्चितम् । आदौ चान्ते च कुर्वीत व्रतस्यापि सिद्धये ॥ ५ ॥ व्रतके उद्देश्यसे उसकी सिद्धिके लिये आदि और अन्तमें निश्चितरूपसे एक दिन और रातका उपवास करना चाहिये ॥ क्षुरकर्म ततो भर्तुरात्मनश्चैव कारयेत् । उत्सादनं च स्नानं च तस्मिन्नहनि संस्मृतम् ॥ ६ ॥ तदनन्तर अपने पतिकी हजामत बनवावे और अपना भी नखमात्र कटा ले। उसी दिन व्रतान्त स्नान तथा व्रतके उद्यापन या उत्सर्गका विधान है ॥ ६ ॥ ततो विवाहवत् स्नानं विहितं पुण्यके शुभे । मण्डनं चैव विहितं माल्यधारणमेव च ॥ ७ ॥ शुभे ! पुण्यक-व्रतमें भी विवाहके समान ही विधिपूर्वक स्नान करनेकी आज्ञा है। उसमें शृङ्गार और माला धारण करनेका विधान है ॥ ७ ॥ कुम्भैस्तु स्नाप्यमानेयं साध्वी मन्त्रमुदीरयेत् । भर्तुः पादौ नमस्कृत्य मनसा वाथ वा गिरा ॥ ८ ॥ घड़ोंके जलसे नहलायी जाती हुई व्रतपरायणा साध्वी स्त्री अपने पतिके दोनों चरणोंको मन अथवा वाणीद्वारा नमस्कार करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—॥ ८ ॥

  • इन पंक्तियोंको देखकर यह अनुमान होता है कि पहले जिन ग्यारह सती स्त्रियोंका उनके पतियोंकी अनुमतिसे आवाहन किया जाता है, उनका व्रतचारिणी स्त्री पुनः उनके पतियोंको ही दान कर देती है। देश कालके अनुरूप निष्क्रय देकर पहले उन्हें अपनी बनाती है और फिर उनको उनके पतियोंको ही संकल्पपूर्वक सौंपकर दानजनित पुण्यकी भागिनी होती है। आपो देव्य ऋषीणां हि विश्वधात्र्यो दिव्या मदन्त्यो याः शङ्करा धर्मधात्र्यः। हिरण्यवर्णाः पावकाः शिवतमेन रसेन श्रेयसो मां जुषन्तु ॥९॥ 'जलकी अधिष्ठात्री देवी ऋषियोंकी जननी, सम्पूर्ण विश्वकी माता, आकाशसे प्रकट होनेवाली, हर्ष प्रदान करने- वाली, कल्याणकारिणी, धर्मके पोषणमें तत्पर, सुवर्णके समान वर्णवाली, निर्मल तथा सबको पावन बनानेवाली है। वह अपने परम कल्याणमय रसके द्वारा मुझे श्रेयका भागी बनाये'॥ अपामेष स्मृतो मन्त्रः सर्वत्रान्यत्र मे शृणु । मन्त्राः पुराणविहिताः स्त्रीणां सर्वाङ्गशोभने ॥ १० ॥ सर्वाङ्गशोभने देवि ! यह जलसम्बन्धी मन्त्र सर्वत्र उपयोगमें लाया जाता है। अन्यत्र स्त्रियोंके स्नानके लिये पुराणविहित मन्त्र उपलब्ध होते हैं। उन्हें मुझसे सुनो ॥ शुभाव्यया गुणिनी युक्तधर्मा भर्त्रा साकं मम दास्या वरेण । मा कर्मणा मनसा वापि वाचा भर्तुर्भवेयं रूपती स्यां वशाङ्गा ॥ ११ ॥ मैं पतिके लिये कल्याणकारिणी होऊँ। धन आदिसे कभी क्षीण न होऊँ। सद्गुणवती होऊँ। सदा पतिके साथ धर्ममें संलग्न रहूँ। मैं अपने स्वामीके साथ दासीके समान रहकर उनकी छोटी-से-छोटी भी सेवा-टहल स्वयं ही करूँ। सदा पतिके अधीन रहूँ और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा भी कभी उनसे रुष्ट न होऊँ ॥ ११ ॥ सपत्नीनामधि नित्यं भवेयं सपुत्रा स्यां सुभगा चारुरूपा । सम्पन्नहस्ता गुणवादिनी च सर्वात्मना स्यां मा दरिद्रा भवेयम्॥ १२॥ सपत्नियोंमें मेरा स्थान सदा सबसे ऊपर हो। मैं पुत्रवती, सौभाग्यवती और मनोहर रूपवाली होऊँ। मेरा हाथ सदा सम्पन्न रहे अर्थात् मैं मुक्तहस्त होकर दान कर सकूँ। मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा दूसरोंके गुणोंका ही बखान करूँ और कभी दरिद्र न होऊँ ॥ १२ ॥ पतिश्च मे स्यात् सुमुखो मत्प्रतीक्षो नित्यं मदुक्तः स्यान्मन्मतिर्मद्गतिश्च। प्रीतिश्च नौ स्याच्चक्रवाकानुरूपा मनोविरागो न भवेत् साधुवत् स्यात् ॥ १३॥ मेरे पति भी सदा प्रसन्नमुख रहकर मेरी प्रतीक्षा करने- वाले हों, उनका सदा मुझमें अनुराग बना रहे। उनकी मति और गति मेरी ही ओर रहे। हम दोनोंमें चकवा और चकवी- के समान प्रेम बना रहे। हमारे मनमें कभी एक दूसरेके प्रति