विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उसके लिये अपने पैरोंको स्वयं ही धोनेका विधान है। साध्वी अरुन्धती ! यदि आँसू गिराया गया, रोष और कलह किया गया तो वह स्त्रियोंको तत्काल ही उपवास और व्रतके पुण्यसे भ्रष्ट कर देता है ॥ २५ ॥
शुक्लमेव सदा वासः प्रशस्तं चन्द्रसम्भवे ।
अन्तर्वासोऽपरं चैव उपवासे व्रते तथा ॥ २६ ॥
चन्द्रकुमारी ! उपवास तथा व्रतमें सदा श्वेत वस्त्र धारण करना ही उत्तम माना गया है। साड़ीके भीतर एक दूसरा वस्त्र (पेटीकोट आदि) भी डाल लेना चाहिये ॥ २६ ॥
पादुकार्थं तृणैः कार्यं सर्वदा व्रतके सति ।
उपवासेऽपि च विधिरेष एव प्रवर्तितः ॥ २७ ॥
साध्वी अरुन्धती ! व्रतके अवसरपर उपयोगमें लानेके लिये सदा बेंत आदि तृणोंकी ही पादुका बनवा लेनी चाहिये (चमड़ेकी पादुका नहीं धारण करनी चाहिये)। उपवासमें भी यही विधि चलायी गयी है ॥ २७ ॥
अञ्जनं रोचनं चापि गन्धान् सुमनसस्तथा ।
व्रतके चोपवासे च नित्यमेव विवर्जयेत् ॥ २८ ॥
सती नारीको चाहिये कि वह व्रत तथा उपवासके अवसरपर अञ्जन, गोरोचन, भाँति-भाँतिके गन्ध और फूलोंका सदा ही परित्याग करे ॥ २८ ॥
दन्तकाष्ठं शिरःस्नानमुद्वर्तनमथापि वा ।
विवर्जितं मृदा सर्वं शौचार्थं तु विधीयते ॥ २९ ॥
इस व्रतमें नारीके लिये काठका दातौन करना, सिरके ऊपरसे नहाना अथवा अङ्गोंमें उबटन लगवाना वर्जित है। सब प्रकारकी शुद्धिके लिये मृत्तिकाके ही उपयोगका विधान है॥
बिल्वामृतफलैर्नित्यं श्रीफलैश्च समाचरेत् ।
प्रक्षालनं वै शिरसः सदामृन्मिश्रितैर्जलैः ॥ ३० ॥
बेल, हर्रे या आँवला तथा श्रीफलसे जिसमें मिट्टी न मिली हुई हो, संयुक्त जलके द्वारा सदा ही अपने सिरको धोना चाहिये ॥ ३० ॥
शिरसोऽभ्यञ्जनं सौम्ये नैव तावत् प्रशस्यते ।
न पादयोर्न गात्रस्य स्नेहेनेति स्थितिः स्मृता ॥ ३१ ॥
सौम्ये ! इस व्रतमें सिरका अभ्यङ्ग अर्थात् उबटन या बेसनका चूर्ण लगाकर नहाना नहीं अच्छा माना गया है। पैरों अथवा समूचे शरीरमें भी तेल न मले। यही मर्यादा मानी गयी है ॥ ३१ ॥
गोयानमुष्ट्रयानं च खरयानं च वर्जितम् ।
नग्नस्नानं च सततं व्रते चाप्युपवासके ॥ ३२ ॥
प्रत्येक व्रत और उपवासमें बैल, ऊँट और गधोंसे जुते हुए वाहनका उपयोग वर्जित है। उसमें कभी नग्न स्नान नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥
नदीजलं प्रस्रवणं प्रशस्तं सोमनन्दिनि ।
शुभे तडागे वाप्यादौ विस्तीर्णे जलजायुते ॥ ३३ ॥
गत्वा स्नानं प्रशस्तं तु सदैव खलु सर्वथा ।
सोमनन्दिनि ! नदी और झरनेका जल उत्तम माना गया है। कमलोंसे मण्डित, सुन्दर एवं विस्तृत पोखरे या बावड़ी आदिमें जाकर स्नान करना सदा ही सब प्रकारसे प्रशस्त है॥
अलाभे त्ववरुद्धा स्त्री घटस्नानं समाचरेत् ॥ ३४ ॥
नवैश्च कुम्भैः स्नातव्यं विधिरेष पुरातनः ।
स्नानं च कार्यं शिरसा तपःफलमवाप्नुयात् ॥ ३५ ॥
जिसके लिये बाहर जानेपर रोक है, वह परदेके भीतर रहनेवाली नववधू नारी तड़ाग आदिमें स्नानका सुयोग न मिलनेपर घड़ोंके जलसे स्नान करे। वह नये घड़ोंके जलसे स्नान करे—यही प्राचीन विधि है। (व्रतके सिवा अन्य अवसरोंपर) सिरके ऊपरसे स्नान करना चाहिये। इससे तपस्याका फल प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे पुण्यकविधौ अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजाताहरणके प्रसङ्गमें पुण्यकविधिविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
पुण्यक-व्रतसम्बन्धी नियम एवं दानका वर्णन तथा पुत्र आदिके निमित्त किये जानेवाले दूसरे व्रत एवं दानका प्रतिपादन
उमोवाच
विधिनैतेन कृत्स्नेन स्त्री सदा भर्तृदेवता ।
चरेत् संवत्सरं दान्ता षण्मासान् मासमेव च ॥ १ ॥
उमा कहती हैं—देवि ! पतिव्रता स्त्री इस सम्पूर्ण विधिके साथ एक वर्ष या छः मास अथवा एक मासतक सदा इन्द्रिय-संयमपूर्वक व्रतका आचरण करे ॥ १ ॥