विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 551, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ५२९ कालदेशानुरूपं च देयं विभवतः सति । अल्पं वा बहुलं वापि भर्तुश्छन्देन सर्वदा ॥ २९ ॥ पतिव्रते ! अगर घरमें वैभव हो तो स्वामीकी आज्ञाके अनुसार सदा देश-कालके अनुरूप थोड़ा-बहुत दान अवश्य देना चाहिये ॥ २९ ॥ तिलपात्रं प्रदातव्यं न देयं ननु शोभने । गौस्त्ववश्यं प्रदातव्या कपिला कांस्यमेव च ॥ ३० ॥ शोभने ! तिलसे भरा हुआ पात्र भी देना चाहिये; परंतु स्वामीकी आज्ञाके बिना कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। उनकी आज्ञा मिल जानेपर कपिला गौ तथा कांस्यपात्रका दान अवश्य करना चाहिये ॥ ३० ॥ कृष्णाजिनं च सुभगे सतिलं वाससान्वितम् । आदर्शञ्चैव कूर्चञ्च तथाजिनमनिन्दिते ॥ ३१ ॥ एतद् दत्त्वा सर्वकामानाप्नोति वरवर्णिनि । पुरोऽधिका पुत्रवती सुभगा रूपभागिनी ॥ ३२ ॥ सृष्टहस्ता धनाढ्या च स्त्री भवत्यमलेक्षणा । इच्छया लभते चैव कन्या रूपगुणान्विताः ॥ ३३ ॥ भवन्ति सुभगाश्चार्यास्तथैव च पुरोऽधिकाः । पुत्रवत्यो धनाढ्याश्च शीलवत्यश्च नित्यदा ॥ ३४ ॥ सुभगे ! अनिन्दिते ! काला मृगचर्म, तिल, वस्त्र, दर्पण, कुशासन और मृगचर्मका भी दान करना चाहिये। वरवर्णिनि ! इन सब वस्तुओंका दान करके नारी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है और नारियोंमें अग्रगण्य, पुत्रवती, सौभाग्यवती, रूपवती, शुद्ध हाथवाली, धनाढ्य तथा निर्मल नेत्रवाली होती है। वह इच्छामात्रसे ऐसी कन्याएँ प्राप्त कर लेती है, जो रूप-गुणसे सम्पन्न, सुभगा, आश्चर्ययुक्त गुणवाली, अग्रगण्य, पुत्रवती, धनाढ्य तथा सदा सुशील होती हैं ॥ अरुन्धति कृतं ह्येतन्मयैव प्रथमं यतः । उमाव्रतकमित्येव ख्यातमत्र महीतले ॥ ३५ ॥ अरुन्धति ! मैंने ही पहले इस व्रतका आचरण किया है, इसलिये इस पृथ्वीपर यह उमाव्रतके नामसे विख्यात होगा ॥ एतदेवोत्तमं स्त्रीणां व्रतं तस्मात् समाचरेत् । सर्वकामानवाप्नोति दत्त्वैवैतदनिन्दिते ॥ ३६ ॥ स्त्रियोंके लिये यही सबसे उत्तम व्रत है, अतः इसका आचरण अवश्य करे। अनिन्दिते ! इस व्रतके लिये विहित यह दान देकर नारी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ एतद्व्रतकरो ह्येष देवदेवो वृषध्वजः । पुराभिषिक्तवान् सौम्ये प्रियार्थं मम सर्वकृत् ॥ ३७ ॥ सौम्ये ! इसी व्रतके पुण्यसे मैंने देवाधिदेव भगवान् वृषध्वज शिवको खरीद-सा लिया है। उन सर्वस्रष्टा महादेव- जीने मेरा प्रिय करनेके लिये पूर्वकालमें मुझे पट्टमहिषीके पद- पर अभिषिक्त किया था ॥ ३७ ॥ व्रतकस्यावसानेऽथ देयं भोज्यं च नित्यदा । स्त्रीणां कामाः प्रदेयाश्च सदृशाः कालदेशयोः ॥ ३८ ॥ व्रतके अन्तमें सदा भोज्य-पदार्थोंका दान करना चाहिये। स्त्रियोंकी अभीष्ट वस्तुओंका भी, जो देश-कालके अनुरूप हों, दान करना उचित है ॥ ३८ ॥ एकैकस्य प्रदातव्यं व्रतकं वरवर्णिनि । छन्दतो ब्राह्मणानां तु देयमन्नं सदक्षिणम् ॥ ३९ ॥ वरवर्णिनि ! व्रतके जो उपकरण द्रव्य हैं, उनका बराबर विभाग करके प्रत्येक ब्राह्मणको उसे देना चाहिये तथा ब्राह्मणोंकी इच्छाके अनुसार उन्हें दक्षिणासहित अन्नका दान करना चाहिये ॥ ३९ ॥ पायसं तत्र दातव्यं व्रतके नान्यदिष्यते । नात्र प्राणिवधः कार्यः पुराणे नियता श्रुतिः ॥ ४० ॥ उस व्रतमें खीरका दान करना चाहिये। दूसरा कोई अन्न अभीष्ट नहीं है। इसमें प्राणियोंकी हिंसा कदापि नहीं करनी चाहिये। यह पुराणमें निश्चितरूपसे कहा गया श्रुतिका सिद्धान्त है ॥ ४० ॥ अथ द्वितीयं वक्ष्यामि व्रतं सोमसमुद्भवे । महादेवप्रसादेन दृष्टवत्यस्मि यच्छुभे ॥ ४१ ॥ चन्द्रकुमारी ! शुभे ! अब मैं दूसरे व्रतका वर्णन करूँगी, जिसका महादेवजीकी कृपासे मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ॥ सर्वाः पुत्रफला नार्यः सद्भिरेतदुदाहृतम् । तस्मादन्विष्यती दद्यात् सपुत्रकरकाञ्छुभे ॥ ४२ ॥ शुभे ! सत्पुरुषोंका कथन है कि सारी स्त्रियाँ पुत्ररूप फलवाली होती हैं अर्थात् पुत्रको जन्म देनेसे ही उनका नारीत्व सफल होता है; अतः पुत्रकी इच्छा रखनेवाली स्त्री पुत्रार्थिनी नारियोंद्वारा देनेयोग्य करकों (कमण्डलुओं) का दान करे ॥ ज्येष्ठाषाढौ शुभौ मासौ पुरोकं विधिमाचरेत् । अथवा ज्येष्ठमेवैकमाषाढं वा समाचरेत् ॥ ४३ ॥ पहले जो विधि बतलायी गयी है, उसका पुत्रार्थिनी स्त्री ज्येष्ठ और आषाढ़ इन दो शुभ मासोंतक पालन करे अथवा केवल ज्येष्ठ या आषाढ़ एक ही महीनेतक उसका आचरण करे ॥ ४३ ॥ ततो मासद्वये पूर्णे मासे वा वरवर्णिनि । सपुत्रकरकान् दद्यात् फाणितप्रतिपूरितान् ॥ ४४ ॥ वरवर्णिनि ! फिर व्रतके दो मास अथवा एक ही मास पूर्ण होनेपर पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य करकों (कमण्डलुओं) का दान करे। उन सबमें शीरे अथवा चीनी- के शरबत भरे होने चाहिये ॥ ४४ ॥