विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे सर्पिषः पयसश्चैव दध्नोऽथ मधुनोऽनघे । जलस्य च तथा दद्यात् पूरयित्वा शशिप्रभे ॥ ४५ ॥ चन्द्रमाके समान कान्तिवाली निष्पाप अरुन्धती ! घी, दूध, दही तथा जलसे भी कमण्डलुओंको भरकर उनका दान करे ॥ ४५ ॥ एकस्मै ज्ञानवृद्धाय सुव्रताय जितात्मने । सपुत्रकरकान् दद्याद् यावन्तो मनसः प्रियाः ॥ ४६ ॥ नारीको चाहिये कि वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा मनको वशमें रखनेवाले एक ही ज्ञानवृद्ध ब्राह्मणको पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य उतने कमण्डलु प्रदान करे; जितने उसके मनको अभीष्ट हों ॥ ४६ ॥ इच्छेत स्त्री दुहितरं स्त्रीणां कामकरं ततः । किंचिद् द्रव्यं सुताकामात् सुतां प्राप्नोत्यसंशयः ॥ ४७ ॥ जो नारी पुत्री प्राप्त करना चाहती हो, वह पुत्रीकी कामनासे ब्राह्मणी स्त्रियोंको कोई ऐसा द्रव्य दे, जो उनकी इच्छा पूर्ण करनेवाला हो, ऐसा करनेसे उसे पुत्रीकी प्राप्ति होती है। इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥ गौर्वाथ काञ्चनं वापि दक्षिणार्थं प्रशस्यते । विप्रस्याच्छादनं देयमवश्यं तु शुचिस्मिते ॥ ४८ ॥ दक्षिणाके लिये गौ अथवा सुवर्णको अच्छा बताया जाता है। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस व्रतमें ब्राह्मणको ओढ़ने- के लिये वस्त्र अवश्य देना चाहिये ॥ ४८ ॥ यज्ञोपवीतं व्रतके दद्यान्नारी शुचिव्रता । सपुत्रकरकाणां तु विधिरुक्तो विपश्चिता ॥ ४९ ॥ पवित्रतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाली नारी व्रतमें यज्ञोपवीतका दान करे। विद्वान् पुरुष इसमें पुत्रार्थिनी स्त्रियोंके लिये नियत करवोंके दानका विधान बताते हैं ॥ अपत्याख्यानयोगेन ब्राह्मणेभ्यः शुचिव्रता । संवत्सरं सुसम्पूर्ण व्रतधर्मानुपालिनी ॥ ५० ॥ करकानपि दद्याच्च पूर्णे संवत्सरे शुभे । अनुज्ञया सदा भर्तुः सत्यवादिन्यरुन्धति ॥ ५१ ॥ सुवर्णसूत्रं विप्राय कौमुद्यां दातुमर्हति । यज्ञोपवीतं विप्रस्य व्रतं संस्थाप्य कामिकम् ॥ ५२ ॥ यज्ञोपवीतं करकं दक्षिणां च स्वशक्तितः । प्रयच्छती सती स्त्रीभ्यः सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५३ ॥ शुभे ! व्रत-धर्मका निरन्तर पालन करनेवाली पवित्र व्रतधारिणी स्त्री अपत्याख्यान योगसे अर्थात् पुँल्लिङ्ग संतान (पुत्र) की कामना होनेपर पुँल्लिङ्ग नक्षत्र (पुष्य, हस्त और श्रवण) के योगमें और स्त्रीलिङ्ग संतान (पुत्री) की इच्छा होनेपर (रोहिणी आदि) स्त्रीलिङ्ग नक्षत्रके योगमें पूरे सालभरतक सदा पतिकी आज्ञासे करकों (करवों) का दान करे। सत्यवादिनी अरुन्धती ! वर्ष पूर्ण होनेपर कार्तिक- की पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणको सुवर्णसूत्र (यज्ञोपवीत) का दान करना चाहिये। कामनापूर्वक किये जानेवाले इस व्रतको समाप्त करके ब्राह्मणको यज्ञोपवीत, कमण्डलु और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जो सती-साध्वी ब्राह्मणी स्त्रियोंको उनकी रुचिके अनुकूल वस्तुओंका दान करती है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ५०-५३ ॥ नवं न भक्षयेत् किंचिन्नारी धान्यमथो फलम् । पुष्पाणि नोपयुञ्जीत यावद्देवं समाचरेत् ॥ ५४ ॥ नारी जबतक इस प्रकार व्रतका आचरण करे, तबतक कोई नया अन्न अथवा फल न खाय और नये फूलोंका भी उपयोग न करे ॥ ५४ ॥ एकभक्तेन धर्मज्ञे पुण्यकं कर्तुमर्हति । ब्राह्मणाय तथा देयं भर्तुश्च तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥ धर्मज्ञे ! एक समय भोजन करके पुण्यक-व्रत करना चाहिये तथा पहले ब्राह्मणको भोजन देना चाहिये, उसके बाद पतिको ॥ ५५ ॥ एवं संवत्सरं कृत्वा सुभगा रूपशालिनी । भवत्यविधवा चैव स्त्री धनस्य तथेश्वरी ॥ ५६ ॥ एक वर्षतक ऐसा करके नारी सौभाग्यवती, रूप-सौन्दर्य- शालिनी, अविधवा और धनकी स्वामिनी होती है ॥ ५६ ॥ वार्ताकानि न खादेद् या स्त्री पूर्णे परिवत्सरे । न सा पुत्रविनाशं हि पश्यतीत्यवगम्यताम् ॥ ५७ ॥ जो स्त्री पूरे एक वर्षतक बैगन नहीं खाती है, वह अपने पुत्रका विनाश नहीं देखती है, यह निश्चित रूपसे जान लो ॥ शशकं मृगमांसं वा नित्यमेव विवर्जयेत् । नाप्नोति मरणं नारी प्राप्नोति पतिदेवताम् ॥ ५८ ॥ स्त्रीको चाहिये कि वह खरगोश, हिरन अथवा अन्य प्राणियोंका मांस सदाके लिये त्याग दे। ऐसा करनेवाली स्त्री (अकाल) मृत्यु या अल्पायुको नहीं प्राप्त होती और पातिव्रत्य धर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५८ ॥ अलाबुं वर्जयेन्नारी तथैवोत्पादिकामपि । कलम्बीं काञ्चनं नाद्याद् या भर्तुः सुखमिच्छति ॥ ५९ ॥ जो स्त्री पतिका सुख चाहती है, वह लौकी और पोईको त्याग दे । सागका डंठल और गूलर भी न खाय ॥ ५९ ॥ पूर्णे संवत्सरे दद्यादेकैकं शाकमादृता । सदक्षिणं पुत्रवती 'भवत्येका पुरोऽधिका ॥ ६० ॥ इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रत्येक शाकका दक्षिणा- सहित आदरपूर्वक दान करे। ऐसा करनेवाली स्त्री एक (सपत्नीरहित), पुत्रवती तथा अग्रगण्या होती है ॥ ६० ॥