विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
५३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे सर्पिषः पयसश्चैव दध्नोऽथ मधुनोऽनघे । जलस्य च तथा दद्यात् पूरयित्वा शशिप्रभे ॥ ४५ ॥ चन्द्रमाके समान कान्तिवाली निष्पाप अरुन्धती ! घी, दूध, दही तथा जलसे भी कमण्डलुओंको भरकर उनका दान करे ॥ ४५ ॥ एकस्मै ज्ञानवृद्धाय सुव्रताय जितात्मने । सपुत्रकरकान् दद्याद् यावन्तो मनसः प्रियाः ॥ ४६ ॥ नारीको चाहिये कि वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा मनको वशमें रखनेवाले एक ही ज्ञानवृद्ध ब्राह्मणको पुत्रार्थिनी स्त्रियोंद्वारा देनेयोग्य उतने कमण्डलु प्रदान करे; जितने उसके मनको अभीष्ट हों ॥ ४६ ॥ इच्छेत स्त्री दुहितरं स्त्रीणां कामकरं ततः । किंचिद् द्रव्यं सुताकामात् सुतां प्राप्नोत्यसंशयः ॥ ४७ ॥ जो नारी पुत्री प्राप्त करना चाहती हो, वह पुत्रीकी कामनासे ब्राह्मणी स्त्रियोंको कोई ऐसा द्रव्य दे, जो उनकी इच्छा पूर्ण करनेवाला हो, ऐसा करनेसे उसे पुत्रीकी प्राप्ति होती है। इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥ गौर्वाथ काञ्चनं वापि दक्षिणार्थं प्रशस्यते । विप्रस्याच्छादनं देयमवश्यं तु शुचिस्मिते ॥ ४८ ॥ दक्षिणाके लिये गौ अथवा सुवर्णको अच्छा बताया जाता है। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस व्रतमें ब्राह्मणको ओढ़ने- के लिये वस्त्र अवश्य देना चाहिये ॥ ४८ ॥ यज्ञोपवीतं व्रतके दद्यान्नारी शुचिव्रता । सपुत्रकरकाणां तु विधिरुक्तो विपश्चिता ॥ ४९ ॥ पवित्रतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाली नारी व्रतमें यज्ञोपवीतका दान करे। विद्वान् पुरुष इसमें पुत्रार्थिनी स्त्रियोंके लिये नियत करवोंके दानका विधान बताते हैं ॥ अपत्याख्यानयोगेन ब्राह्मणेभ्यः शुचिव्रता । संवत्सरं सुसम्पूर्ण व्रतधर्मानुपालिनी ॥ ५० ॥ करकानपि दद्याच्च पूर्णे संवत्सरे शुभे । अनुज्ञया सदा भर्तुः सत्यवादिन्यरुन्धति ॥ ५१ ॥ सुवर्णसूत्रं विप्राय कौमुद्यां दातुमर्हति । यज्ञोपवीतं विप्रस्य व्रतं संस्थाप्य कामिकम् ॥ ५२ ॥ यज्ञोपवीतं करकं दक्षिणां च स्वशक्तितः । प्रयच्छती सती स्त्रीभ्यः सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५३ ॥ शुभे ! व्रत-धर्मका निरन्तर पालन करनेवाली पवित्र व्रतधारिणी स्त्री अपत्याख्यान योगसे अर्थात् पुँल्लिङ्ग संतान (पुत्र) की कामना होनेपर पुँल्लिङ्ग नक्षत्र (पुष्य, हस्त और श्रवण) के योगमें और स्त्रीलिङ्ग संतान (पुत्री) की इच्छा होनेपर (रोहिणी आदि) स्त्रीलिङ्ग नक्षत्रके योगमें पूरे सालभरतक सदा पतिकी आज्ञासे करकों (करवों) का दान करे। सत्यवादिनी अरुन्धती ! वर्ष पूर्ण होनेपर कार्तिक- की पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणको सुवर्णसूत्र (यज्ञोपवीत) का दान करना चाहिये। कामनापूर्वक किये जानेवाले इस व्रतको समाप्त करके ब्राह्मणको यज्ञोपवीत, कमण्डलु और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। जो सती-साध्वी ब्राह्मणी स्त्रियोंको उनकी रुचिके अनुकूल वस्तुओंका दान करती है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ५०-५३ ॥ नवं न भक्षयेत् किंचिन्नारी धान्यमथो फलम् । पुष्पाणि नोपयुञ्जीत यावद्देवं समाचरेत् ॥ ५४ ॥ नारी जबतक इस प्रकार व्रतका आचरण करे, तबतक कोई नया अन्न अथवा फल न खाय और नये फूलोंका भी उपयोग न करे ॥ ५४ ॥ एकभक्तेन धर्मज्ञे पुण्यकं कर्तुमर्हति । ब्राह्मणाय तथा देयं भर्तुश्च तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥ धर्मज्ञे ! एक समय भोजन करके पुण्यक-व्रत करना चाहिये तथा पहले ब्राह्मणको भोजन देना चाहिये, उसके बाद पतिको ॥ ५५ ॥ एवं संवत्सरं कृत्वा सुभगा रूपशालिनी । भवत्यविधवा चैव स्त्री धनस्य तथेश्वरी ॥ ५६ ॥ एक वर्षतक ऐसा करके नारी सौभाग्यवती, रूप-सौन्दर्य- शालिनी, अविधवा और धनकी स्वामिनी होती है ॥ ५६ ॥ वार्ताकानि न खादेद् या स्त्री पूर्णे परिवत्सरे । न सा पुत्रविनाशं हि पश्यतीत्यवगम्यताम् ॥ ५७ ॥ जो स्त्री पूरे एक वर्षतक बैगन नहीं खाती है, वह अपने पुत्रका विनाश नहीं देखती है, यह निश्चित रूपसे जान लो ॥ शशकं मृगमांसं वा नित्यमेव विवर्जयेत् । नाप्नोति मरणं नारी प्राप्नोति पतिदेवताम् ॥ ५८ ॥ स्त्रीको चाहिये कि वह खरगोश, हिरन अथवा अन्य प्राणियोंका मांस सदाके लिये त्याग दे। ऐसा करनेवाली स्त्री (अकाल) मृत्यु या अल्पायुको नहीं प्राप्त होती और पातिव्रत्य धर्मके पालनका फल पाती है ॥ ५८ ॥ अलाबुं वर्जयेन्नारी तथैवोत्पादिकामपि । कलम्बीं काञ्चनं नाद्याद् या भर्तुः सुखमिच्छति ॥ ५९ ॥ जो स्त्री पतिका सुख चाहती है, वह लौकी और पोईको त्याग दे । सागका डंठल और गूलर भी न खाय ॥ ५९ ॥ पूर्णे संवत्सरे दद्यादेकैकं शाकमादृता । सदक्षिणं पुत्रवती 'भवत्येका पुरोऽधिका ॥ ६० ॥ इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रत्येक शाकका दक्षिणा- सहित आदरपूर्वक दान करे। ऐसा करनेवाली स्त्री एक (सपत्नीरहित), पुत्रवती तथा अग्रगण्या होती है ॥ ६० ॥
[विष्णुपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ५३१
स्वयं प्रक्षालयाना स्त्री स्वपादावेवमादितः ।
प्रतिष्ठां लभते नित्यमुद्वेगं नाधिगच्छति ॥ ६१ ॥
जो इस प्रकार व्रतमे स्थित हो आरम्भसे ही अपने पैरोंको स्वयं ही धोती है, उसे सदा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और वह कभी उद्वेगमें नहीं पड़ती ॥ ६१ ॥
दिवा या सूर्यपूतेन वर्तयेत् स्त्री पतिव्रता ।
एकं संवत्सरं पूर्णं रात्रावन्नं विवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
सा जीवपुत्रा सुभगा भवत्यमरवर्णिनि ।
अधितिष्ठति सर्वांश्च सपत्न्यो नात्र संशयः ॥ ६३ ॥
देवोपम कान्तिवाली देवि ! जो पतिव्रता नारी पूरे एक वर्षतक दिनमें सूर्यसे पवित्र हुए अन्नके द्वारा निर्वाह करती है और रातमें भोजन त्याग देती है, वह चिरंजीवी पुत्रोंसे युक्त और सौभाग्यशालिनी होती है तथा सारी सौतोंपर अधिकार रखती है; इसमें संशय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥
पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं सूर्यमुत्तमम् ।
ब्राह्मणायाभिरूपाय दरिद्राय यशस्विने ॥ ६४ ॥
एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह रूपवान्, दरिद्र और यशस्वी ब्राह्मणको सूर्यकी सुवर्णमयी उत्तम प्रतिमाका दान करे ॥
फलानि वाथ पुष्पाणि भक्ष्याण्यपि च सुव्रता ।
दद्यादनस्तमितके चरितव्रतका तथा ॥ ६५ ॥
अथवा उस व्रतका आचरण करनेवाली वह सुव्रता नारी सूर्यके अस्त होनेसे पूर्व ही फल-फूल और भक्ष्य पदार्थोंका दान करे ॥ ६५ ॥
या तथास्तमिते सूर्ये भुङ्क्ते स्त्री नियता सती ।
चन्द्रनक्षत्रपूतानि भोज्यानि वरवर्णिनि ॥ ६६ ॥
सा दद्यात् काञ्चनं चन्द्रं नक्षत्राणि ग्रहानपि ।
अभिरूपाय विप्राय वासश्च लवणान्वितम् ॥ ६७ ॥
वरवर्णिनि ! जो सती स्त्री पूर्वोक्त रूपसे व्रत लेकर सूर्यास्त होनेपर ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे पवित्र हुए भोज्य पदार्थोंका आहार करती है, वह वर्ष पूर्ण होनेपर सुयोग्य एवं रूपवान् ब्राह्मणको सुवर्णमय चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंकी प्रतिमाका दान करे; साथ ही उत्तम लक्षणसे युक्त वस्त्र भी दे ॥
चन्द्रशीतलगात्री सा भवत्यमरवर्णिनि ।
सुभगा दर्शनीया च पुत्रवत्यपि भाविनी ॥ ६८ ॥
वह नारी चन्द्रमाके समान शीतल गात्रवाली, देवोपम कान्तिसे सुशोभित, सौभाग्यवती, दर्शनीया, पुत्रवती तथा पतिके प्रति अनुरक्त होती है ॥ ६८ ॥
पौर्णमास्यां तु सततं प्राप्ते सोमोदयेऽङ्गना ।
अर्घ्यं दद्यात् सुमनसां साक्षतं सकुशलं तथा ॥ ६९ ॥
यावकं च बलिं दद्याद् दध्ना च सह संयुक्तम् ।
एवं या कुरुते नित्यं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७० ॥
वह कल्याणमयी स्त्री सदा पूर्णिमाको चन्द्रोदय होनेपर अक्षत और कुशके साथ देवताओंको अर्घ्य प्रदान करे तथा दहीके साथ यावक (पूआ) का नैवेद्य अर्पण करे। जो स्त्री नित्य नियमपूर्वक ऐसा करती है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ६९-७० ॥
अदृष्ट्वा या तु नाश्नाति सूर्यं नारी पतिव्रता ।
दुर्दिने वाथवा व्यभ्रे सेष्टान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७१ ॥
जो पतिव्रता नारी आकाशमें मेघोंकी घटा छायी हो, अथवा बादलोंसे रहित स्वच्छ आकाश हो, सूर्यका दर्शन किये बिना भोजन नहीं करती है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेती है ॥ ७१ ॥
काञ्चनं शक्तितो दद्यात् सा विप्राय मनस्विनी ।
सुभगा दर्शनीया च भवत्यमरवर्णिनि ॥ ७२ ॥
वह मनस्विनी सती अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको सुवर्ण दान करे, ऐसा करके वह सौभाग्यवती, दर्शनीया और देवोपम कान्तिसे सुशोभित होती है ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे व्रतकथने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें व्रतकथनविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
अशीतितमोऽध्यायः
नाना प्रकारके व्रतोंका विधान
भगवत्युवाच
निर्वर्त्यञ्च शरीरं यैर्व्रतकैः पुण्यकैरपि ।
अरुन्धति प्रवक्ष्यामि सहैताभिर्दरेण तु ॥ १ ॥
भगवती उमा कहती हैं—अरुन्धती ! जिन व्रतों और पुण्योंके द्वारा इस शरीरको परम सुखकी प्राप्तिके योग्य बनाया जा सकता है, उन्हे इन तिथियो और श्रेष्ठ फलके साथ बताती हूँ, सुनों ॥ १ ॥
कृष्णाष्टम्यां या क्षिपति स्याद्वा मूलफलाशिनी ।
ब्राह्मणाग्र्यैकमशनं स्वं दत्त्वा भर्तृदेवता ॥ २ ॥
शुक्लवस्त्रा शुभाचारा गुरुदैवतपूजका ।
| ५३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एवं संवत्सरं कृत्वा ततो दद्याद् द्विजातये ॥ ३ ॥
गोवालरज्जुसुकृतं चामरं च ध्वजं तथा ।
दक्षिणापूर्णमिष्टान्नं शक्त्या वापि शुचिस्मिते ॥ ४ ॥
ऊर्मिमन्तः खरालाग्राः श्रोणिदेशावलम्बिनः ।
तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्या हि भर्तरि ॥ ५ ॥
पवित्र व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो पतिव्रता नारी कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अपना एक समयका भोजन ब्राह्मणको देकर स्वयं उपवासपूर्वक व्यतीत करती है अथवा उस दिन फल-मूल खाकर रहती है, श्वेत वस्त्र धारण करके सदाचारके पालनपूर्वक गुरुजनों तथा देवताओंकी पूजा करती है और इस प्रकार एक वर्षतक इसी नियमका पालन करके वह अन्तमें सुरही गायके बालकी रस्सीसे अच्छी तरह बनाया हुआ चँवर, ध्वज तथा दक्षिणासहित मिष्टान्न यथाशक्ति ब्राह्मणको देती है, उस पतिभक्ता नारीके केश कटि-प्रदेशके नीचे तक लटककर लहराया करते हैं और उनके अग्रभाग घुँघराले हो जाते हैं ॥ २–५ ॥
शिरो निर्वेष्टुकामा तु गोमयेन शिरः सती ।
प्रक्षालयेन्मलं धात्र्या विल्वेन श्रीफलेन च ॥ ६ ॥
गोमूत्रं च सदा प्राश्येच्छिरःस्नानं च मिश्रयेत् ।
कृष्णां चतुर्दशीं त्वेतत् कर्तव्यं वरवर्णिनि ॥ ७ ॥
भवत्यविधवा चैव सुभगा विज्वरा तथा ।
शिरोरोगैर्नच चास्याः शरीरमभितप्यते ॥ ८ ॥
वरवर्णिनि ! जो सिरको सुख पहुँचाना चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री गोबर, आँवला, कच्चा बेल और श्रीफल (पका बेल)—इन सबको सम मात्रामें मिलाकर उसके द्वारा सिरको धोये । उसकी मैल दूर करे । सदा गोमूत्रका पान करे और सिरके ऊपरसे स्नान करते समय उस जलमें गोमूत्रको भी मिला ले । प्रत्येक कृष्णा चतुर्दशीको इस नियमका पालन करना चाहिये । ऐसा करनेवाली स्त्री विधवा नहीं होती; सौभाग्यवती बनी रहती है । उसे ज्वर आदि रोग नहीं सताते तथा उसके शरीरमें सिर-सम्बन्धी रोगोंसे कष्ट नहीं होता ॥ ६–८ ॥
दर्शनीयं ललाटं या काङ्क्षति स्त्री शुचिस्मिते ।
तिथिं प्रतिपदं नित्यं सा क्षिपेदेकभोजना ॥ ९ ॥
पयसा च तथाश्नीयाद् यावत्संवत्सरो गतः ।
ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पटं रूप्यमयं शुभम् ॥ १० ॥
ललाटं रूपसम्पन्नमाप्नोति स्त्री सुमध्यमा ।
पवित्र मुसकानवाली अरुन्धती ! जो स्त्री अपने ललाटको दर्शनीय (शोभासे सम्पन्न) बनाये रखना चाहती है, वह प्रत्येक प्रतिपदा तिथिको एक समय भोजन करके बिताये एवं दूधके साथ भात खाकर रहे । जबतक एक वर्ष पूरा न हो, तबतक ऐसा करती रहे । तदनन्तर ब्राह्मणको सुन्दर सुवर्णमय पट^१ दान करे । ऐसा करनेवाली सुन्दर कटि-प्रदेशवाली स्त्री मनोहर रूप-सौन्दर्यसे युक्त ललाट पाती है ॥ ९-१०½ ॥
सततं स्त्री द्वितीयायां भ्रुवोरिच्छेत् सुरूपताम् ॥ ११ ॥
अनन्तरोपवासेन शाकभक्ताशना सती ।
ततः संवत्सरे पूर्णे ब्राह्मणं स्वस्ति वाचयेत् ॥ १२ ॥
फलैः परिणतैः सौम्यैर्माषाणां दक्षिणान्वितैः ।
लवणेन च भद्रं ते घृतपात्रेण चानघे ॥ १३ ॥
निष्पाप अरुन्धती ! तुम्हारा भला हो, जो भौंहोंका सौन्दर्य चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री सदा द्वितीया तिथिको एक समय उपवास करके साग-भात खाकर रहे । इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सुन्दर पके हुए फल, एक माशा सुवर्णकी दक्षिणा, नमक और घीसे भरा हुआ पात्र देकर ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये ॥ ११–१३ ॥
आत्मनः शोभनौ कर्णाविच्छन्ती स्त्री सुमध्यमा ।
नक्षत्रे श्रवणे प्राप्ते ध्रुवं भुञ्जीत यावकम् ॥ १४ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे कर्णौ दद्याद्धिरण्मयौ ।
घृते प्रक्षिप्य विप्राय पयसा सहिते शुभे ॥ १५ ॥
जो सुन्दर कटिप्रदेशवाली स्त्री अपने कानोंको सुन्दर एवं शोभासम्पन्न बनाये रखना चाहती हो, वह श्रवण नक्षत्र प्राप्त होनेपर अवश्य यावक (जौके आटेका हलुवा या पूआ) भोजन करे । इस तरह एक वर्ष पूरा होनेपर दो सुवर्णमय कान बनवाकर उन्हें दुग्धमिश्रित घीमें रखकर ब्राह्मणको दान कर दे ॥ १४–१५ ॥
नासामिच्छेल्ललाटान्तामव्यङ्गां व्याधिवर्जिताम् ।
तिलगुल्मं सदा सिञ्चेद् यावत् पुष्येद्धि रक्षितः ॥ १६ ॥
अनन्तरोपवासेन सेकव्यः सलिलैः सदा ।
तस्मादवाप्य पुष्पाणि घृते प्रक्षिप्य दापयेत् ॥ १७ ॥
जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरी नासिका ललाटसे संलग्न हो, उसमें किसी तरहकी विकृति न आये और वह सदा रोग-व्याधिसे रहित एवं सुन्दर बनी रहे तो वह सदा तिलके पौधोंको सींचे और तबतक सींचती रहे, जबतक कि उसके द्वारा सुरक्षित हुए उन पौधोंमें फूल तथा फल न लग जायँ । जिस दिनसे सींचना आरम्भ करे, उसके एक दिन पहले उपवास कर ले; फिर, निरन्तर जलसे सींचती रहे । जब उन पौधोंमें फूल लग जायँ तो उनसे फूल ले घीमें डालकर उस घीका दान कर दे ॥ १६–१७ ॥
स्लक्ष्णीभवेयमिति या स्त्री काङ्क्षत्यमृतोद्भवे ।
अनन्तरं वै भुञ्जाना पयसाथ घृतेन वा ॥ १८ ॥
^१. एक आभूषण, जिसे स्त्रियाँ अपने पट्टीकी तरह सिरमें बाँधती हैं।
विष्णुपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ५३३ ततः संवत्सरे पूर्णे पद्मपत्राणि मण्डिता । तथैवोत्पलपत्राणि न्यसेत् क्षीरे शुचिस्मिते ॥ १९ ॥ प्लवमानानि विप्राय ततो दद्यात् सती सति । कृष्णसारसमानाक्षी तद् दत्त्वा भवति स्म वै ॥ २० ॥ अमृतमय चन्द्रमासे उत्पन्न हुई अरुन्धती ! जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरे नेत्र सुन्दर हों, वह निरन्तर दूध अथवा घीसे ही भोजन करे। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो कमल और कुमुदके पत्तोंको दूधमें डाले और जब वे उसमें तैरने लगें, तब वह सती उन पत्तोंसहित उस दूधका ब्राह्मण- को दान कर दे। पतिव्रते ! वह दान देकर नारी कृष्णसार मृगके समान नेत्रवाली हो जाती है ॥ १८-२० ॥ इच्छेदोष्ठौ चारुरूपौ या स्त्री धर्मगुणान्विता । सा मृन्मयेन तु पिबेदुदकं वत्सरं सती ॥ २१ ॥ अयाचितेन भुञ्जीत नवम्यां धर्मभागिनी । ततः संवत्सरे पूर्णे विद्रुमं दातुमर्हति ॥ २२ ॥ जो धर्मरूपी गुणसे युक्त सती-साध्वी स्त्री यह चाहती हो कि मेरे ओठ बड़े सुन्दर हों, वह एक वर्षतक मिट्टीके बर्तनसे पानी पीये और धर्मकी भागिनी होकर प्रत्येक नवमी तिथिको बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर उसे मूँगा दान करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥ तेन बिम्बफलाभोष्ठौ स्त्री भवत्येव शोभने । सुभगाथ वपुःपुत्रधनाढ्या गोमती तथा ॥ २३ ॥ शोभने ! ऐसा करनेसे उस स्त्रीके ओठ अवश्य ही बिम्बफलके समान लाल हो जाते हैं तथा वह सौभाग्यवती, रूपवती, पुत्रवती, धनाढ्य और गौओंसे युक्त होती है॥२३॥ या चारुरूपानिच्छेत दन्तानमरवर्णिनि । शुक्लाष्टमीं न साश्नीयाद् भक्तद्वयमनिन्दिता ॥ २४ ॥ अमरवर्णिनि ! जो चाहती हो कि मेरे दाँत बहुत ही सुन्दर और स्वच्छ हों, वह साध्वी स्त्री शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको दोनों समय भोजन त्याग दे ॥ २४ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याद् रौप्यमयान् सती । दन्तान् प्रक्षिप्य धर्मज्ञे पयस्यतिगुणोदिते ॥ २५ ॥ धर्मज्ञे ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह सती नारी चाँदीके दाँत बनवाकर उन्हें अत्यन्त उत्तम गुणवाले दूधमें डाल दे और दाँतोंसहित उस दुग्धका ब्राह्मणको दान कर दे ॥ २५ ॥ तेन सा जातिपुष्पाभान् दन्तान् प्राप्नोति सा सती । सौभाग्यमपि चाप्नोति सपुत्रत्वं तथानघे ॥ २६ ॥ अनघे ! ऐसा करनेसे वह सती-साध्वी स्त्री चमेलीके फूल-जैसे श्वेत दाँत पाती है और सौभाग्य तथा पुत्र लाभ करती है ॥ २६ ॥ सर्वमेव मुखं कान्तमिच्छेद् या रुचिरानने । सा पूर्णमास्यां स्नात्वा तु प्राप्य चन्द्रोदये शुभे ॥२७॥ यावकं पयसा सिद्धं दत्त्वा विप्राय भामिनी । ततः संवत्सरे पूर्णे चन्द्रं रूप्यमयं शुभम् ॥ २८ ॥ पद्मे फुल्ले तु विन्यस्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् । पूर्णचन्द्रमुखी तेन दानेन स्त्री शुभा भवेत् ॥ २९ ॥ रुचिरानने ! जो स्त्री सम्पूर्ण मुख-मण्डलको ही कमनीय कान्तिसे युक्त देखना चाहे, वह भामिनी पूर्णिमाको स्नान करके शुभ चन्द्रोदय होनेपर दूधमें तैयार किये गये यावकका ब्राह्मणको दान दे। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सोने या चाँदीकी चन्द्रमाकी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर उसे कमलके फूलपर रखे और ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उसका दान कर दे। वह शुभलक्षणा स्त्री उस दानके द्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली हो जाती है ॥२७-२९॥ स्तनाविच्छति या नारी तृणराजफलोपमौ । अयाचितं दशम्यां सा नित्यमश्नीत वाग्यता ॥ ३० ॥ संवत्सरे ततः पूर्णे द्वे बिल्वे काञ्चने शुभे । सदक्षिणे ब्राह्मणाय प्रयच्छति धृतात्मने ॥ ३१ ॥ सौभाग्यं परमाप्नोति बहुपुत्रांस्तथैव च । सदोन्नतौ स्तनौ सा स्त्री बिभर्त्यमरवर्णिनि ॥ ३२ ॥ जो नारी यह चाहती है कि मेरे दोनों स्तन ताड़के फलों- के समान पीन हों, वह प्रत्येक दशमी तिथिको सदा मौन रहकर बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर जो सोनेके बने हुए दो सुन्दर बेल जितात्मा ब्राह्मणको दक्षिणासहित दानमें देती है, वह परम सौभाग्य एवं बहुत-से पुत्र प्राप्त करती है। देवोपम कान्ति- वाली देवि ! वह स्त्री सदा ऊँचे स्तन धारण करती है॥३०-३२॥ शातोदरत्वमिच्छन्ती क्षिपेदेकान्तभोजिनी । पञ्चम्यां तन्न भोक्तव्यमन्नं तोयेन नित्यदा ॥ ३३ ॥ जो कृशोदरी होना चाहती है (अर्थात् जिसकी यह इच्छा है कि मेरा पेट उभड़ने या बढ़ने न पाये, भीतरको दबा रहे), वह एकान्तमें भोजन करे और पञ्चमीको सदा केवल जलसे अन्न ग्रहण करे ॥ ३३ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याज्जातिलतां शुभे । फुल्लां सदक्षिणां धन्ये ब्राह्मणाय धृतात्मने ॥ ३४ ॥ शुभे ! धन्ये ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर जितात्मा ब्राह्मणको खिली हुई चमेलीकी लताका दक्षिणासहित दान करे ॥ ३४ ॥ हस्ताविच्छति या नारी रूपयुक्तौ सुमध्यमे । द्वादशीं सा क्षिपत्वेवं शाकैः सर्वैरनिन्दितैः ॥ ३५ ॥
५३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे संवत्सरे ततः प्राप्ते रौक्मे पद्मे ददातु सा । मेरे पैरोंके गुल्फ ( घुट्टियाँ या गट्टे ) और नस-नाड़ियों ढकी ब्राह्मणायाभिरूपाय तथा पद्मद्वयं शुभम् ॥ ३६ ॥ रहें, वह प्रत्येक षष्ठी तिथिको केवल पानीके साथ भात खाय ॥ सुमध्यमे ! जो नारी अपने दोनों हाथोंको सुन्दर रूपसे अग्निर्वा ब्राह्मणो वापि न स्प्रष्टव्यः पदा सदा । युक्त देखना चाहती है, वह द्वादशी तिथिको सब प्रकारके यदा पदा स्पृशेत् तं च वन्देत तपसान्विते ॥ ४४ ॥ अनिन्दित ( उत्तम ) शाकोंद्वारा आहार करके व्यतीत करे। तपस्विनि ! यह व्रत लेनेवाली स्त्रीको सदा ही उचित है इस तरह एक वर्ष व्यतीत होनेपर वह सुवर्णमय कमलपर कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणका पैरसे स्पर्श न करे। यदि दो खिले हुए कमलके फूल रखकर उन सबका सुन्दर एवं कभी स्पर्श हो जाय तो उसको प्रणाम करे ॥ ४४ ॥ सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे ॥ ३५-३६ ॥ पादेन न च वै पादं प्रक्षालयितुमर्हति । श्रोणीं विशालामन्विच्छेत् स्त्री क्षिप्रत्वेव सुव्रते । एतैर्नित्यव्रतैर्युक्ता धर्मज्ञा पतिदेवता ॥ ४५ ॥ त्रयोदशीमेकभक्तमश्नात्वेवमयाचितम् ॥ ३७ ॥ कूर्मौ रूप्यमयौ दद्याद् ब्राह्मणाय पतिव्रते । उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो नारी विशाल तौ वराय ब्राह्मणाय स्थापयित्वा घृतेऽनघे ॥ ४६ ॥ नितम्ब चाहती हो, वह त्रयोदशी तिथिको केवल एक बार पद्मे चाधोमुखे कृत्वा दद्याद् विप्राय नन्दिनि । अयाचित अन्न भोजन करे और इसी तरह प्रत्येक त्रयोदशी- रक्तैर्द्रव्यैर्मिश्रयित्वा काञ्चनेनाभ्यलंकृते ॥ ४७ ॥ को व्यतीत करे ॥ ३७ ॥ उसे पैरसे पैरको नहीं धोना ( रगड़ना ) चाहिये । इन ततः संवत्सरे पूर्णे लवणं सम्प्रयच्छतु । नित्य व्रतोंसे युक्त हुई धर्मज्ञ पतिव्रता नारी सोने या चाँदीके प्रजापतिमुखाकारं कृत्वा तत्र वरानने ॥ ३८ ॥ दो कछुए बनवावे । निष्पाप पतिव्रते ! फिर उन दोनों वरानने ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रजापति कछुओंको घीमें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान कर दे । ब्रह्माजीके मुखकी-सी आकृतिवाली नमककी राशिका दान नन्दिनि ! इसके सिवा दो कमलोंको उनके मुख नीचेकी करे ॥ ३८ ॥ ओर करके रखे, उन्हें लाल रंगके गन्धादि द्रव्योंसे संयुक्त काञ्चनं चैव दातव्यं तदाकारस्य सर्वदा । करके सुवर्णसे अलंकृत करे; तत्पश्चात् उसका ब्राह्मणको दान अञ्जनेन च धर्मज्ञा शनकैरवचूर्णयेत् ॥ ३९ ॥ कर दे ॥ ४५-४७ ॥ इसी प्रकार प्रजापतिके मुखके आकारका ही सुवर्ण भी सर्वमेव तु या गात्रमिच्छत्यतिमनोहरम् । सदा दान करना चाहिये । धर्मज्ञ नारी धीरे-धीरे अञ्जनसे त्रिरात्रं पुष्पकाले सा करोतु पतिदेवता ॥ ४८ ॥ किसी ब्राह्मणीके नेत्रोंमें काजल लगावे ॥ ३९ ॥ जो पतिदेवता नारी अपने सम्पूर्ण शरीरको ही अत्यन्त रत्नानि चैव पूर्णानि वासो रक्तं च दापयेत् । मनोहर बनाना चाहती हो, वह रजोदर्शनके अवसरपर तीन तेन श्रोणीमभिमतां स्त्री सौम्ये प्रतिपद्यते ॥ ४० ॥ रात उपवास करे ॥ ४८ ॥ सौम्ये ! पूर्ण रत्न और लाल रंगका वस्त्र भी दे । इससे कौमुद्यामथवाषाढ्यां माघ्यां चाश्वयुजे तथा । वह स्त्री अपने मनके अनुकूल नितम्ब पाती है ॥ ४० ॥ मातरं पितरं चैव मन्यतेऽतिथिदैवतम् ॥ ४९ ॥ मधुरां वाचमिच्छन्ती वर्जयेल्लवणं सती । वह कार्तिक, आषाढ़, माघ तथा आश्विनकी पूर्णिमाको संवत्सरं वा मासं वा प्रयच्छेल्लवणं ततः ॥ ४१ ॥ माता, पिता, अतिथि और देवताका आदर-सत्कार एवं सदक्षिणं ब्राह्मणाय परं माधुर्यमिच्छती । पूजन करे ॥ ४९ ॥ शुकवाक्यारुच्छतगुणं भवत्यमरवर्णिनि ! ४२ ॥ घृतं च नित्यं विप्रेभ्यो ददातु लवणं तथा । मधुर वाणीकी इच्छा रखनेवाली सती नारी एक वर्ष या सम्मार्जनं गृहे चैव करोतु पतिदेवता ॥ ५० ॥ एक मासतक नमक खाना छोड़ दे और वाणीके अतिशय वह पतिव्रता ब्राह्मणोंको प्रतिदिन नमक और घी दान माधुर्यकी इच्छा रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित नमक दान करे । नित्य घरमें झाडू लगावे ॥ ५० ॥ करे । अमरवर्णिनि ! ऐसा करनेसे उसकी वाणीकी मिठास उपलेपनं च धर्मज्ञे बलिकर्म च मानिनि । तोतेकी वाणीसे सौ गुनी अधिक हो जाती है ॥ ४१-४२ ॥ वाग्दुष्टा चैव मा शुभ्रे भक्तवात्मार्थपण्डिता ॥ ५१ ॥ गूढगुल्फशिरौ पादाविच्छन्त्या सोमनन्दिनि । धर्मज्ञे ! मानिनि ! शुभ्रे ! अपने स्वार्थको समझनेमें षष्ठ्यां षष्ठ्यां वरारोहे भोक्तव्यं सलिलौदनम् ॥ ४३ ॥ कुशल नारी घरमें लीपने-पोतने तथा देवताओंको बलि सोमनन्दिनि ! वरारोहे ! जो स्त्री यह चाहती हो कि ( उपहार-सामग्री ) अर्पण करनेका कर्म भी करे। वह कभी दुर्वचनका प्रयोग न करे ॥ ५१ ॥ पर्यश्नतु च सा कञ्चिदपि शाकं यशस्विनि ।
विष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३५
बलिं सृजत्वतथ्यं च परित्यजतु भामिनि ॥ ५२ ॥
यशस्विनि ! वह किसी एक शाकका ही भक्षण करे ।
भामिनि ! वह देवताओंके लिये उपहार दे और असत्य भाषणका त्याग करे ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे व्रतकविधानोऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें व्रतोंका विधानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
एकाशीतितमोऽध्यायः
उमाके द्वारा व्रतकथनका उपसंहार, श्रीनारदजीका देवियोंद्वारा किये गये व्रतोंका वर्णन करना तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंद्वारा व्रतका अनुष्ठान एवं दान
उमोवाच
बान्धवान् सगुणानिच्छेदेकभक्तेन नित्यदा ।
सप्तमीं सप्तमीं नित्यं क्षपेत् स्त्री पतिदेवता ॥ १ ॥
उमादेवी कहती हैं—जो पतिव्रता स्त्री गुणवान् बान्धवोंकी इच्छा रखती है, वह प्रत्येक सप्तमीको सदा एक समय भोजन करके व्यतीत करे ॥ १ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे वृक्षं दद्याद्धिरण्मयम् ।
सदक्षिणं ब्राह्मणाय शुभबन्धुमती भवेत् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् वर्ष पूर्ण होनेपर ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक सुवर्णमय वृक्षका दान करे । इससे वह शुभ गुणसम्पन्न बन्धु-बान्धवोंसे युक्त होती है ॥ २ ॥
करञ्जे दीपकं दद्यात् सदा या प्रमदा वरे ।
पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं दीपकं ततः ॥ ३ ॥
जो नारी सदा उत्तम करंज (कंजा या करज) वृक्षके नीचे दीप दान करती है, उसे वर्ष पूर्ण होनेपर सुवर्णमय दीपकका दान करना चाहिये ॥ ३ ॥
रुच्या सा स्त्री भवेद् भर्तुरिष्टा पुत्रवती तथा ।
सपत्नीनामधि तथा दीपवज्ज्वलते शुभे ॥ ४ ॥
शुभे ! वह स्त्री अपनी सुन्दर कान्तिसे पतिकी प्राण-वल्लभा बन जाती है और पुत्रवती होती है। वह सपत्नियोंमें सबसे ऊँचा स्थान बना लेती है और दीपककी भाँति प्रकाशित होती रहती है ॥ ४ ॥
या शेषभोजिनी नित्यं नैव च स्यादरुन्तुदा ।
न च स्याद्व्यशना सौम्ये नित्यं च पतिदेवता ॥ ५ ॥
शौचान्विता च सततं न च रूक्षाभिभाषिणी ।
श्वश्रूश्वशुरयोर्नित्यं शुश्रूषाभिरता सती ॥ ६ ॥
किं तस्या व्रतकैः कार्यं किं वा स्यादुपवासकैः ।
या भर्तृदेवता नित्यं सत्यधर्मगुणान्विता ॥ ७ ॥
सौम्ये ! जो स्त्री प्रतिदिन सबके भोजनके पश्चात् शेष अन्नका आहार करती है, किसीके हृदयको चोट नहीं पहुँचाती, बिना खाये नहीं रहती और सदा पातिव्रत्यमें स्थित रहती है; सदा शौचाचारका पालन करती है, कभी रूखी बात नहीं बोलती, प्रतिदिन सास-ससुरकी सेवामें तत्पर रहती है, उस सती स्त्रीको व्रतोंसे क्या करना है ? अथवा उपवासोंसे क्या प्रयोजन है ? जो सदा पतिको ही देवताकी भाँति पूजती है और सत्यधर्म तथा सद्गुणोंसे सम्पन्न है (उसका जीवन सफल है) ॥ ५-७ ॥
विधवा स्त्री तु या हि स्याद् दैवयोगात् सती सति ।
तस्या वक्ष्यामि यो धर्मः पुराणोक्तः सुमध्यमे ॥ ८ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली पतिव्रते ! जो सती-साध्वी नारी कभी दैवयोगसे विधवा हो जाय, उसके लिये पुराणोंमें जो धर्म बताया गया है, उसका वर्णन करती हूँ ॥ ८ ॥
पतिं संकल्पयित्वा सा चित्रस्थं वाथ मृन्मयम् ।
तस्य पूजां सदा कुर्यात् सतां धर्ममनुस्मरेत् ॥ ९ ॥
वह पतिके चित्रमें अथवा उसकी मिट्टीकी प्रतिमामें पतिकी भावना करके सदा उसीकी पूजा करे और सत्पुरुषोंके धर्मका निरन्तर स्मरण रखे ॥ ९ ॥
तत एवाभ्यनुज्ञां सा नित्यं याचेत सुव्रता ।
व्रतके चोपवासे च भोजने च विशेषतः ॥ १० ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह स्त्री प्रतिदिन उसी (चित्रगत या प्रतिमागत) पतिसे व्रत, उपवास और विशेषतः भोजनके लिये आज्ञा माँगे ॥ १० ॥
भर्तृलोकान् व्रजत्येव न चेद् व्युच्चरते पतिम् ।
शाण्डिली सूर्यवद् भाति सततं पतिदेवता ॥ ११ ॥
यदि वह अपने पतिका उल्लङ्घन नहीं करती तो पति-लोकमें ही जाती है और स्वर्गमें पतिव्रता शाण्डिलीकी भाँति सदा सूर्यके समान प्रकाशित होती रहती है ॥ ११ ॥
अद्यप्रभृति सर्वेषां देवानां चैव योषितः ।
द्रक्ष्यन्ति पुण्यकविधिं पौराणो यः सनातनः ॥ १२ ॥
५३६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
आजसे समस्त देवताओंकी पत्नियाँ जो पुराणप्रतिपादित सनातन पुण्यकविधि है, उसका दर्शन करेंगी ॥ १२ ॥
मुनिश्च नारदः कृत्स्नं पौराणं ज्ञास्यते विधिम् ।
उपवासस्य धर्मात्मा व्रतकानां तथैव च ॥ १३ ॥
धर्मात्मा नारद मुनि भी व्रत-उपवासकी सम्पूर्ण पौराणिक विधिके ज्ञाता होंगे ॥ १३ ॥
अदितिस्तपसेन्द्राणी त्वं च सोमसुते वरे ।
प्रवर्तने पुण्यकानां व्रतकानां च सर्वदा ॥ १४ ॥
कीर्तनीयाः सतीनां हि भविष्यथ गुणान्विताः ।
श्रेष्ठ सोमकुमारी ! अदिति देवी, इन्द्राणी और तुम भी अपनी तपस्यासे उस विधिको जानोगी । पुण्यों और व्रतोंके प्रवर्तन (आरम्भ) में सदा तुम सद्गुणवती देवियोंका सती नारियोंद्वारा कीर्तन होगा ॥ १४ १/२ ॥
उपवासव्रतविधिं यथावदिह कृत्स्नशः ॥ १५ ॥
प्रादुर्भावेषु सर्वेषु भार्या विष्णोर्महात्मनः ।
ज्ञास्यन्ति पुण्यकविधिं नित्यमेव सनातनम् ॥ १६ ॥
महात्मा विष्णुके सभी अवतारोंमें जो उनकी पत्नियाँ होंगी, वे उपवास-व्रत एवं पुण्यकोंकी सम्पूर्ण सनातन विधिको यहाँ सदा ही यथावत् रूपसे जानेंगी ॥ १५-१६ ॥
सविशेषं च धर्माणां स्त्रीधर्मेषु प्रशस्यते ।
पतिभक्तिरदुष्टत्वमवाग्दुष्टत्वमेव च ॥ १७ ॥
सभी धर्मों अथवा स्त्रीधर्मोंमें पतिभक्ति, दुराचारका अभाव और दुर्वचनका प्रयोग न करना—इन तीनकी विशेष-रूपसे प्रशंसा की जाती है ॥ १७ ॥
नारद उवाच
एवमुक्तास्तु ताः साध्व्यो महादेव्या तपोधनाः ।
जग्मुर्हृष्टा महादेवीं प्रणिपत्य हरप्रियाम् ॥ १८ ॥
नारदजी कहते हैं—देवि ! महादेवी पार्वतीके ऐसा कहनेपर वे साध्वी तपोधना देवियाँ हर्षमें भरकर उन हरप्रिया पार्वतीको प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली गयीं ॥
अदितिर्व्रतकं चक्रे शृणु यद् धर्मचारिणी ।
उमाव्रतविधिः सर्वः पूर्वोद्दिष्टस्तया कृतः ॥ १९ ॥
धर्मचारिणी अदितिने जो व्रत किया, उसे सुनो—उमाने पहले जो व्रतकी विधि बतायी थी, उस सबका पालन अदिति देवीने किया ॥ १९ ॥
पारिजाते निवध्न्याथ मम दत्तस्तु कश्यपः ।
अदितिव्रतकं नाम तद् दत्तं सत्यभामया ॥ २० ॥
उन्होंने महर्षि कश्यपको पारिजातमें बाँधकर मेरे हाथमें दे दिया । इसीका नाम 'अदितिव्रतक' है । अदितिने जिस तरह व्रतक (व्रतसम्बन्धी दान) दिया था, उसी प्रकार सत्यभामाने भी दिया ॥ २० ॥
तदेव व्रतकं दत्तं सावित्र्या धर्मनित्यया ।
तैरैव युक्तैः संयुक्तमिदं त्वभ्यधिकं कृतम् ॥ २१ ॥
नित्य धर्मपरायणा सावित्रीने भी वही व्रत किया और उसी तरह दान दिया था । उन्हीं समुचित साधनोंसे संयुक्त होनेके कारण यह संध्याकाल अत्यन्त उत्कृष्ट माना गया है ॥
संध्याकाले तु सम्प्राप्ते स्थाने स्थाने तथैव च ।
पूजनं वा नमस्कारो जपेश्च द्विगुणः स्मृतः ॥ २२ ॥
संध्याकाल आनेपर जगह-जगह किया गया पूजन, नमस्कार और जप द्विगुण माना गया है ॥ २२ ॥
सावित्रीव्रतकं कृत्वा तथादित्या व्रतं सती ।
भर्तुः कुलं पितृकुलमात्मानं चैव तारयेत् ॥ २३ ॥
सती नारी सावित्री-व्रत और अदिति व्रतका अनुष्ठान करके पतिकुल, पितृकुल तथा अपने-आपको भी उद्धार कर देती है ॥ २३ ॥
इन्द्राणी व्रतकं चक्रे तदेवौमं यथाविधि ।
रक्तमभ्यधिकं वासो भोजनं चैव सामिषम् ॥ २४ ॥
इन्द्राणीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका विधि-पूर्वक पालन किया । उनमें अधिक या विशेष बात इतनी ही थी कि उन्होंने लाल रंगका वस्त्र और योग्य पदार्थोंसे युक्त उत्तम भोजन दिया ॥ २४ ॥
चतुर्थे दिवसे वापि पुण्यकार्थे विधिः पुनः ।
अहोरात्रोपवासश्च देयं कुम्भशतं तथा ॥ २५ ॥
चौथे दिन फिर पुण्यकव्रतके लिये दानकी विधि है। एक दिन-रातका उपवास करके सौ घड़ोंका दान करना चाहिये॥
गङ्गाया व्रतकं दत्तं तदेवौमं यशस्करि ।
स्नानमभ्यधिकं त्वात्र प्रत्युषस्यात्मनो जले ॥ २६ ॥
अन्यस्मिन् वा जले माघशुक्लपक्षे हरिप्रिये ।
एतद् गङ्गाव्रतं नाम सर्वकामप्रदं स्मृतम् ॥ २७ ॥
यशका विस्तार करनेवाली हरिप्रिये रुक्मिणी ! गङ्गाजीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका अनुष्ठान और दान किया। उसमें अधिक बात इतनी ही थी कि वे प्रतिदिन प्रातःकाल माघ शुक्ल पक्षमें अपने ही जलमें अथवा दूसरे जलमें भी स्नान किया करती थीं । यह गङ्गा-व्रत समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाला माना गया है ॥ २६-२७ ॥
सप्त सप्त च सप्तार्थ कुलानि हरिवल्लभे ।
स्त्री तारयति धर्मज्ञा गङ्गाव्रतकचारिणी ॥ २८ ॥
हरिवल्लभे ! गङ्गा-व्रतका पालन करनेवाली धर्मज्ञ नारी पितृकुल, मातामहकुल और पतिकुलकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है ॥ २८ ॥
देयं कुम्भसहस्रं तु गङ्गाया व्रतके शुभे ।
तत्क्षणं पारणं चैव तद् व्रतं सार्वकामिकम् ॥ २९ ॥
[विष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३७
शुभे ! गङ्गाव्रतमें एक सहस्र घड़ोंका दान करना चाहिये। वह समस्त कामनाओंका पूरक व्रत दुःखसे तारने और मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है ॥ २९ ॥
यमभार्या चकाराथ व्रतं यामरथं शुभम् ।
हेमन्ते तत् तु कर्तव्यमाकाशे हरिवल्लभे ॥ ३० ॥
हरिवल्लभे ! यमराजकी पत्नीने यामरथ नामक शुभ व्रतका अनुष्ठान किया था। वह व्रत हेमन्त ऋतुमें खुले आकाशके नीचे करना चाहिये ॥ ३० ॥
इमानि चैव वाक्यानि ब्रूयादाकाशमास्थिता ।
स्नात्वा शुचिसमाचारा नमस्कृत्य पतिं शुभे ॥ ३१ ॥
शुभे ! पवित्र आचरणवाली स्त्री स्नानके पश्चात् पतिको नमस्कार करके खुले मैदानमें खड़ी ये निम्नाङ्कित वाक्य कहे—॥
चराम्यहं यामरथं हिमं पृष्ठेन धारये ।
पतिव्रता जीवपुत्रा भवेयं च पुरोऽधिका ॥ ३२ ॥
‘मैं अपनी पीठपर हिम (बर्फ या पाला) का आघात सहती हुई यामरथ व्रतका आचरण कर रही हूँ। मेरी यह कामना है कि मैं पतिव्रता, चिरंजीवी पुत्रोंकी माता और नारियोंमें अग्रगण्या होऊँ ॥ ३२ ॥
सपत्नीरधितिष्ठेयं पश्येयं चैव मा यमम् ।
सभर्तृपुत्रा जीवेयं चिरं च सुखमेव च ॥ ३३ ॥
‘सौतोंपर मेरा प्रभुत्व स्थापित हो, मैं कभी यमका दर्शन न करूँ और अपने पति एवं पुत्रोंके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक जीवित रहूँ ॥ ३३ ॥
पतिलोकं च गच्छेयं भवेयं नन्दिनी तथा ।
सुचैला सृष्टहस्ता च स्वजनेष्टा गुणान्विता ॥ ३४ ॥
‘अन्तमें पतिलोकको प्राप्त होऊँ, अपने कुल-परिवारका आनन्द बढ़ानेवाली होऊँ। मेरे वस्त्र स्वच्छ रहें, मेरा हाथ शुद्ध हो, मैं स्वजनोंकी प्यारी एवं सद्गुणवती होऊँ’ ॥ ३४ ॥
एवं कृत्वा ततो विप्रं मधुना स्वस्ति वाचयेत् ।
तिलैरपि तथा कृष्णैः पायसेन तु भोजयेत् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार व्रतको पूर्ण करके ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये तथा उसे मधु और काला तिलसे मिश्रित खीर खिलाये ॥
एवं व्रतानि देवीभिः कृतान्यमरवर्णिनि ।
महादेव्या पुरोक्तानि रुद्रपत्नया हरिप्रिये ॥ ३६ ॥
देवोपम कान्तिवाली देवि ! हरिप्रिये ! इस प्रकार रुद्र-पत्नी महादेवी उमाद्वारा पूर्वकालमें बताये गये व्रतोंका अनुष्ठान पहलेकी देवियोंने किया है ॥ ३६ ॥
अहं ब्रवीमि तपसा मदीयेन समन्विताः ।
सर्वा द्रक्ष्यथ गुह्यानि व्रतकानि तथैव च ॥ ३७ ॥
पौराणान्युमया देव्या यानि दृष्टानि वै पुरा ।
कल्याणगुणयुक्तानि पावनानि शुभानि च ॥ ३८ ॥
मैं कहता हूँ, देवियो ! प्राचीन कालमें देवी उमाने जिन कल्याणमय गुणोंसे युक्त, पावन, गुणकारक एवं शुभ पुरातन व्रतोंका साक्षात्कार किया था, उन सबको तुम सब लोग मेरे तपोबलसे सम्पन्न होकर देखोगी ॥ ३७-३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
रुक्मिणी व्रतकं चक्रे दृष्ट्वा व्रतकविस्तरम् ।
उमाया वरदानेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥ ३९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! रुक्मिणीने उमाके वरदानके अनुसार दिव्यदृष्टिसे व्रतोंका विस्तार देखकर स्वयं भी एक ‘व्रत’ का अनुष्ठान किया ॥ ३९ ॥
उमाव्रतकवत् सर्वं वृषदानं तथाधिकम् ।
रत्नमालाप्रदानं च तथान्नं सार्वकामिकम् ॥ ४० ॥
उन्होंने सब कुछ उमाके व्रतके ही समान किया, किंतु वृषभदान, रत्नमाला-दान और सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक अन्नदान—उनसे अधिक किया ॥ ४० ॥
तथा जाम्बवती चक्रे पुरोमाव्रतकं तथा ।
ददावभ्यधिकं सा तु रत्नवृक्षं मनोहरम् ॥ ४१ ॥
जाम्बवतीने भी वैसा ही किया, जैसा पहले उमाने किया था; किंतु उन्होंने मनोहर रत्नमय वृक्षका दान उनकी अपेक्षा अधिक किया ॥ ४१ ॥
सत्या ददौ तथैवाथ पुरोमाव्रतकं तथा ।
पीतमभ्यधिकं वासस्तया दत्तमुमात्रते ॥ ४२ ॥
सत्याने भी पूर्वकालमे उमाद्वारा किये गये व्रतकके समान ही दान किया; परंतु उस उमाव्रतमें उन्होंने पीतवस्त्रका दान अधिक किया ॥ ४२ ॥
रोहिण्याथ च फाल्गुन्या मघया च पुरातने ।
व्रतानि खलु दत्तानि बहूनि कुलवर्धन ॥४३ ॥
कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! पुरातन कालमें रोहिणी, फाल्गुनी और मघाने भी बहुत-से व्रत-दान किये थे ॥ ४३ ॥
ददौ शतभिषा चैव व्रतकं पुण्यलक्षणम् ।
येन नक्षत्रमुख्यत्वं जगाम कुरुनन्दन ॥ ४४ ॥
कुरुनन्दन ! शतभिषाने भी पुण्यको लक्षित करानेवाले व्रतकका दान किया था, जिससे उसने नक्षत्रोंमे मुख्यता प्राप्त कर ली ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे उमाव्रतकथनसमाप्तौ
पारिजातहरणकथनसमाप्तौ चैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें उमा-व्रतकथन-समाप्तिविषयक इक्यासीवाँ* अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
* कुछ लोग यहाँ हरिवंश ग्रन्थके पूर्वार्ध भागकी समाप्ति मानते हैं और आगेके ग्रन्थको उत्तरार्धके अन्तर्गत बताते हैं ।
५३८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे
द्व्यशीतितमोऽध्यायः*
षट्पुरवासी असुरोंका संक्षिप्त परिचय, उन्हें ब्रह्मा और भगवान् शिवका वरदान
जनमेजय उवाच
वैशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन।
पारिजातस्य हरणे षट्पुरं परिकीर्तितम्॥ १॥
जनमेजयने कहा—धर्मज्ञ! व्यासशिष्य! तपोधन! वैशम्पायनजी! आपने पारिजातहरणके प्रसंगमें ‘षट्पुर’ की चर्चा की थी॥ १॥
निवासोऽसुरमुख्यानां दारुणानां तपोधन।
तेषां वधं मुनिश्रेष्ठ कीर्तयस्वान्धकस्य च॥ २॥
तपोधन! आपने कहा था कि वह नगर बड़े-बड़े भयंकर असुरोंका स्थान था। मुनिश्रेष्ठ! आप उन षट्पुरनिवासी दैत्यों तथा अन्धकासुरके वधका वर्णन कीजिये॥ २॥
वैशम्पायन उवाच
त्रिपुरे निहते वीर रुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा।
तत्र प्रधाना बहवो बभूवुरसुरोत्तमाः॥ ३॥
शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः।
षष्टिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च॥ ४॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वीर! अनायास ही समस्त कर्म करनेवाले रुद्रदेवके द्वारा जब दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश किया गया, उस समय वहाँ बहुत-से प्रधान-प्रधान असुर-शिरोमणि शेष रह गये। वे त्रिपुरनिवासी होनेपर भी रुद्रदेवके बाणोंकी आगसे दग्ध न हो सके। उनकी संख्या लगभग साठ लाख थी॥ ३-४॥
ते ज्ञातिवधसंतप्ताश्चक्रुर्वीराः पुरा तपः।
जम्बूमार्गे सतामिष्टे महर्षिगणसेविते॥ ५॥
उन असुर वीरोंने पूर्वकालमें अपने बन्धु-बान्धवोंके वधसे संतप्त होकर महर्षिगणोंसे सेवित तथा सत्पुरुषोंके प्रिय जम्बूमार्गमें जाकर तपस्या आरम्भ की॥ ५॥
आदित्याभिमुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः।
वायुभक्षा नृपश्रेष्ठ स्तुवन्तः पद्मसम्भवम्॥ ६॥
नृपश्रेष्ठ! वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर मुँह करके वायुके आहारपर रहकर एक लाख वर्षोंतक कमलयोनि ब्रह्माजीकी स्तुति करते रहे॥ ६॥
तेषामुदुम्बरं राजन् गण एकः समाश्रितः।
वृक्षं तत्रावसन् वीरास्ते कुर्वन्तो महत् तपः॥ ७॥
राजन्! उन दैत्योंमें एक दल ऐसा था, जो गूलरके वृक्षका आश्रय लेकर रहता था। वे वीर दैत्य वहाँ महान् तप करते हुए निवास करते थे॥ ७॥
कपित्थवृक्षमाश्रित्य केचित् तत्रोपिताः पुरा।
सृगालवाटीस्त्वपरे चेरुरुग्रं तथा तपः॥ ८॥
पूर्वकालमें उन दैत्योंमेंसे कुछ लोग कपित्थ (कैथ) वृक्षका आश्रय लेकर वहाँ रहते थे और दूसरे सियारोंकी माँदोंमें रहकर वहाँ उग्र तपस्या करते थे (अथवा सृगालनामक वृक्ष-विशेषकी वाटिकाओंमें रहकर तपस्या करते थे)॥ ८॥
वटमूले तथा चेरुस्तपः कौरवनन्दन।
अधीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वासुरात्मजाः॥ ९॥
कौरवनन्दन! कुछ असुरकुमार वट-वृक्षकी जड़में रहते और उस वृक्षपर चढ़कर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए तपस्या करते थे॥ ९॥
तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेव पितामहः।
वरं दातुं सुरश्रेष्ठः प्राप्तो धर्मभृतां वरः॥ १०॥
नरदेव! कुछ कालके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजास्रष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संतुष्ट हो उन्हें वर देनेके लिये वहाँ आये॥ १०॥
वरं वरयतेत्युक्तास्ते राजन् पद्मयोनिना।
नेषुस्तद्वरदानं तु द्विषन्तस्त्र्यम्बकं विभुम्॥ ११॥
राजन्! कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—'वर माँगो'। तब उन्होंने भगवान् त्रिनेत्रधारी रुद्रसे द्वेष रखनेके कारण वरदान लेनेकी इच्छा नहीं की॥ ११॥
इच्छन्तोऽपचितिं गन्तुं ज्ञातीनां कुरुनन्दन।
तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वज्ञः कुरुनन्दन॥ १२॥
कुरुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन! वे रुद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मारे गये अपने भाई-बन्धुओंके ऋणसे उऋण होना चाहते थे। तब सर्वज्ञ ब्रह्माजीने उनसे कहा—॥ १२॥
विश्वस्य जगतः कर्तुः संहर्तुश्च महात्मनः।
कः शक्तोऽपचितिं गन्तुं मास्तु वोऽत्र वृथा श्रमः॥ १३॥
जो सम्पूर्ण जगत्के कर्ता और संहर्ता हैं, उन महात्मा भगवान् शङ्करसे बदला लेनेमें कौन समर्थ है? इस विषयमें तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं उठाना चाहिये॥ १३॥
अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः।
तमासूय सुखं स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति येऽसुराः॥ १४॥
* पूनावाली प्रतिकी मान्यताके अनुसार यहाँसे हरिवंशका उत्तरार्ध भाग आरम्भ होता है।
विष्णुपर्व ] द्व्यशीतितमोऽध्यायः ५३९
ते नेषुस्तत्र केचित् तु दुरात्मानो महासुराः।
अथेषुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावनाः॥ १५॥
उमासहित महेश्वर देव आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। उनसे द्रोह रखकर जो असुर स्वर्गमें सुखपूर्वक रहना चाहते थे, उन दुरात्मा महान् असुरोंने तो वर लेनेकी इच्छा नहीं की; परंतु राजन् ! जो दूसरे असुर भव्य भावनासे सम्पन्न (दूरदर्शी) अथवा भगवान् शिवकी महिमाके ज्ञाता थे, उन्होंने वर लेनेकी अभिलाषा व्यक्त की ॥ १४-१५॥
नेषुर्यं सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामहः।
वरयध्वं वरं वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः ॥ १६॥
जिन दुरात्माओंने वर लेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे पितामह ब्रह्माने फिर कहा—'वीर असुरो ! तुम भगवान् रुद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर माँग लो।'॥
ते ऊचुः सर्वदेवानामावध्याः स्याम हे विभो।
पुराणि षट् च नो देव भवन्त्वन्तर्महीतले ॥ १७॥
सर्वकामसमृद्धार्थं षट्पुरं चास्तु नः प्रभो ।
वयं च षट्पुरं गत्वा वसेम च सुखं विभो ॥ १८ ॥
तब उन्होंने कहा—'विभो! हम सब देवताओंके लिये अवध्य हों। देव! पृथ्वीके भीतर हमारे छः पुर हों। प्रभो! हमारे वे छहों पुर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंकी समृद्धिसे सम्पन्न हों । भगवन् ! हम षट्पुरमें जाकर सुखपूर्वक निवास करें ॥ १७-१८ ॥
रुद्रादुग्रं भयं न स्याद् येन नो ज्ञातयो हताः।
निहतं त्रिपुरं दृष्ट्वा भीताः स्म तपसां निधे ॥ १९॥
'तपोनिधे ! जिन्होंने हमारे बन्धु-बान्धवोंको मार डाला है, उन रुद्रदेवसे हमें उग्र भय प्राप्त न हो; क्योंकि त्रिपुरोंका विनाश देखकर हम भयभीत हो गये हैं' ॥ १९ ॥
पितामह उवाच
असुरा भवतावध्या देवानां शङ्करस्य च।
न बाधिष्यथ चेद् विप्रान् सत्पथस्थान् सतां प्रियान् ॥२०॥
पितामह बोले—असुरो ! तुम देवताओं तथा भगवान् शङ्करके लिये अवध्य हो जाओगे। परंतु ऐसा तभी होगा, जब तुम सन्मार्गपर सुस्थिर रहनेवाले सत्पुरुषोंके प्रिय ब्राह्मणों-को बाधा नहीं पहुँचाओगे ॥ २० ॥
विप्रोपघातं मोहाच्चेत् करिष्यथ कथंचन ।
नाशं यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः ॥ २१ ॥
यदि मोहवश किसी तरह ब्राह्मणोंकी हत्या करोगे तो नष्ट हो जाओगे; क्योंकि ब्राह्मण जगत्के परम आश्रय हैं ॥
नारायणाद् विभेतव्यं कुर्वद्भिर्ब्राह्मणाहितम् ।
सर्वभूतेषु भगवान् हितं धत्ते जनार्दनः ॥ २२॥
ब्राह्मणोंका अहित करनेवाले पुरुषोंको भगवान् नारायणसे डरना चाहिये । क्योंकि वे भगवान् जनार्दन समस्त भूतोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हैं ॥ २२ ॥
ते गता असुरा राजन् ब्रह्मणाथ विसर्जिताः ।
येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिणः ॥ २३ ॥
स्वयं हि दर्शनं तेषां ददौ त्रिपुरनाशनः ।
श्वेतं वृषभमारुह्य सोमः सप्रवरः प्रभुः ।
उवाचेदं च भगवानसुरान् स सतां गतिः ॥ २४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर ब्रह्माजीके विदा देनेपर वे असुर चले गये तथा जो दूसरे असुर धर्मचरणमें तत्पर रहनेवाले और महादेवजीके भक्त थे, उन्हें त्रिपुरविनाशन भगवान् महादेवजीने उमासहित श्वेत वृषभपर आरूढ़ होकर अपने पार्षदोंके साथ आ स्वयं ही दर्शन दिया तथा सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवने उन असुरोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३-२४ ॥
वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः।
मामेव चाश्रितास्तस्माद् वरं साधु ददामि वः ॥ २५ ॥
'असुरशिरोमणियो ! तुमने वैर, दम्भ और हिंसाका परित्याग करके जो केवल मेरा ही आश्रय लिया है, इससे मैं तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर प्रदान करता हूँ ॥ २५ ॥
यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सत्क्रियापरमैर्द्विजैः ।
सह तैर्गम्यतां स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा ॥ २६ ॥
'जिन सत्कर्मपरायण ब्रह्मर्षियोंने तुम्हें मेरी भक्तिकी दीक्षा दी है, उनके साथ ही तुम सब लोग स्वर्गलोकमें चले जाओ। मैं तुम्हारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २६ ॥
इह ये चैव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः ।
अपि कापित्थिका वृक्षे तेषां लोको यथा मम ॥ २७ ॥
'जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ वृक्षके पास निवास करेंगे, वे कापित्थिक कहलायेंगे और उन्हें मेरे समान लोक प्राप्त होगा ॥ २७ ॥
इह मासान्तपक्षान्तौ यः करिष्यति मानवः ।
वानप्रस्थेन विधिना पूजयन् मां तपोधनाः ॥ २८ ॥
वर्षाणां स सहस्रं तु तपसां प्राप्स्यते फलम् ।
कृत्वा त्रिरात्रं विधिवल्लप्स्यते चेप्सितां गतिम् ॥ २९ ॥
'तपोधनो ! जो मनुष्य अमावास्या और पूर्णिमाके दिन वानप्रस्थ विधिसे मेरी पूजा करता हुआ यहाँ निवास करेगा, वह सहस्र वर्षतक तपस्या करनेका फल पा लेगा तथा विधि-पूर्वक तीन राततक निवास करनेसे उसको मनोवाञ्छित गतिकी प्राप्ति होगी ॥ २८-२९ ॥
अर्कद्वीपे निवसतौ द्विगुणं तद् भविष्यति ।
न विदेशे च भद्रं वो वरमेतद् ददाम्यहम् ॥ ३० ॥
'अर्कद्वीपमें निवास करनेवालेको उससे दूना फल
| ५४० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
मिलेगा। परंतु दूर देशमें निवास करनेपर तुम्हारा भला नहीं होगा। यह वर मैं दे रहा हूँ ॥ ३० ॥
श्वेतवाहननामानं यश्च मां पूजयिष्यति।
सर्वतो भयचित्तोऽपि गतिं स मम यास्यति ॥ ३१ ॥
'जो श्वेतवाहन नामसे मेरी पूजा करेगा, वह सब ओरसे भयभीत-चित्त होनेपर भी मेरी ही गतिको प्राप्त होगा॥
औदुम्बरान् वाटमूलान् द्विजान् कापित्थिकानपि।
तथा सृगालवाटीयान् धर्मात्मानो दृढव्रतान् ॥ ३२ ॥
मुनींश्च ब्रह्मवादीयान् सविशेषेण ये नराः।
पूजयिष्यन्ति सततं ते यास्यन्तीप्सितां गतिम् ॥ ३३ ॥
'जो मनुष्य औदुम्बर<sup>१</sup>, वाटमूल<sup>२</sup>, कापित्थिक<sup>३</sup>, सृगालवाटीय<sup>४</sup>, धर्मात्मा दृढव्रत एवं ब्रह्मवादी मुनियोंका सदा विशेषरूपसे पूजन करेंगे, वे मनोवाञ्छित गतिको प्राप्त होंगे'॥
इत्युक्त्वाथ महादेवो भगवान्श्वेतवाहनः।
तैरेव सहितः सर्वै रुद्रलोकं जगाम वै ॥ ३४ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्वेतवाहन महादेव उन सबके साथ रुद्रलोकमें चले गये ॥ ३४ ॥
जम्बूमागं गमिष्यामि जम्बूमागे वसाम्यहम्।
एवं संकल्पमानोऽपि रुद्रलोके महीयते ॥ ३५ ॥
'मैं जम्बू-मार्गको जाऊँगा, मैं जम्बू-मार्गपर निवास करूँगा' इस तरह मनमें संकल्प करनेवाला मनुष्य भी रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
ब्रह्मदत्तके यज्ञमें वसुदेव-देवकीका आगमन, दैत्योंद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंका अपहरण और प्रद्युम्नद्वारा उनकी रक्षा, नारदजीके कहनेसे दैत्योंका क्षत्रियनरेशोंको अपने पक्षमें मिलाना तथा श्रीकृष्णका षट्पुरमें आगमन
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित्।
ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः ॥ १ ॥
ब्रह्मदत्तेति विख्यातो विप्रो वाजसनेयिवान्।
अश्वमेधः कृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः ॥ २ ॥
स संवत्सरदीक्षायां दीक्षितः षट्पुरालयः।
आवर्तायाः शुभे तीरे सुनद्या मुनिजुष्ट्या ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय चारों वेदों और छहों अङ्गोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण, जिनका नाम ब्रह्मदत्त था, एक वर्षतक चालू रहनेवाले यज्ञकी दीक्षामें दीक्षित हुए। ब्रह्मदत्त याज्ञवल्क्यके शिष्य, धर्मसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न तथा शुक्ल यजुर्वेद—वाजसनेय संहिताके अध्येता थे। उनका घर भी षट्पुरमे ही था। उन्होंने कभी बुद्धिमान् वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ कराया था ! वे मुनिसेवित श्रेष्ठ नदी आवर्ताके पवित्र तटपर यज्ञ करते थे ॥ १–३ ॥
सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्विजोत्तमः।
उपाध्यायश्च कौरव्य क्षीरहोता महात्मनः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन ! द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्त महात्मा वसुदेवजीके सहपाठी, सखा, उपाध्याय और अध्वर्यु भी थे ॥ ४ ॥
वसुदेवस्तत्र यातो देवक्या सहितः प्रभो।
यजमानं षट्पुरस्थं यथा शक्रो वृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
प्रभो ! इसीलिये जैसे इन्द्र बृहस्पतिके यहाँ जाते हैं, उसी प्रकार देवकीसहित वसुदेवजी वहाँ षट्पुरमें रहकर यज्ञ करनेवाले ब्रह्मदत्तके यहाँ निमन्त्रित होकर गये थे ॥ ५ ॥
तत् सत्रं ब्रह्मदत्तस्य वह्वन्नं बहुदक्षिणम्।
उपासन्ति मुनिश्रेष्ठा महात्मानो दृढव्रताः ॥ ६ ॥
ब्रह्मदत्तका वह यज्ञ बहुत-से अन्न और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न था। दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा उस यज्ञका सेवन करते थे ॥ ६ ॥
व्यासोऽहं याज्ञवल्क्यश्च सुमन्तुर्जैमिनिस्तथा।
धृतिमाञ्जावलिश्चैव देवलाद्याश्च भारत ॥ ७ ॥
ऋद्ध्यानुरूपया युक्तं वसुदेवस्य धीमतः।
यत्रेप्सितान् ददौ कामान् देवकी धर्मचारिणी ॥ ८ ॥
वासुदेवप्रभावेण जगत्स्रष्टुर्महीतले।
१. उदुम्बर (गूलर) वृक्षका आश्रय लेकर रहनेवाले मुनिकी औदुम्बर संज्ञा है।
२. वटवृक्षकी जड़में निवास करनेवालोंको वाटमूल कहा गया है।
३. कपित्थ वृक्षका आश्रय लेनेवाले कापित्थिक कहलाते हैं।
४. सृगाल नामक वृक्षकी वाटिकामें वास करनेवालेको सृगालवाटीय कहा गया है।
[विष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ५४१
भरतनन्दन ! वह यज्ञ बुद्धिमान् वसुदेवजीकी अनुरूप समृद्धिसे युक्त था। उसमें मै, मेरे गुरु व्यासजी, याज्ञवल्क्य मुनि, सुमन्तु, जैमिनि, धैर्यशील जावलि (या जावालि) तथा देवल आदि महर्षि भी उपस्थित थे। उस यज्ञमें धर्म-परायणा देवकी देवी जगत्स्स्रष्टा भगवान् वासुदेवके प्रभावसे इस पृथ्वीपर सबको मनोवाञ्छित पदार्थ दान करती थीं ॥ ७-८ १/२ ॥
तस्मिन् सत्रे वर्तमाने दैत्याः षट्पुरवासिनः ॥ ९ ॥
निकुम्भाद्याः समागम्य तमूचुर्वरदर्पिताः ।
जब वह यज्ञ चलने लगा, उस समय षट्पुरमें रहनेवाले निकुम्भ आदि दैत्य, जो वर पाकर घमंडमें भरे रहते थे, वहाँ आकर ब्रह्मदत्तसे बोले — ॥ ९ १/२ ॥
कार्यतां यज्ञभागो नः सोमं पास्यामहे वयम् ।
कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु ॥ १० ॥
'हमारे लिये भी यज्ञका भाग निकाला जाय, हमलोग इस यज्ञमे सोमरसका पान करेंगे। यजमान ब्रह्मदत्त हमें अपनी कन्याएँ दें ॥ १० ॥
बह्व्यः सन्त्यस्य कन्याश्च रूपवत्यो महात्मनः ।
आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम् ॥ ११ ॥
रत्नानि च ब्रह्मदत्तो विशिष्टानि ददातु नः ।
अन्यथा तु न यष्टव्यं वयमाज्ञापयामहे ॥ १२ ॥
'हमने सुना है कि इन महात्माके बहुत-सी रूपवती कन्याएँ हैं। उन सबको बुलाकर सब प्रकारसे हमारे लिये दान कर देना चाहिये। ब्रह्मदत्तजी हमें उत्तमोत्तम रत्न प्रदान करें। (तभी ये यहाँ यज्ञ कर सकते हैं) अन्यथा इन्हें यज्ञ नहीं करना चाहिये। यह हम आज्ञा देते हैं' ॥ ११-१२ ॥
एतच्छ्रुत्वा ब्रह्मदत्तस्तानुवाच महासुरान् ।
यज्ञभागो न विहितः पुराणेऽसुरसत्तमाः ॥ १३ ॥
कथं सत्रे सोमपानं शक्यं दातुं मया हि वः ।
पृच्छतेह मुनिश्रेष्ठान् वेदभाष्यार्थकोविदान् ॥ १४ ॥
यह सुनकर ब्रह्मदत्तने उन बड़े-बड़े असुरोंसे कहा— 'असुरशिरोमणियो ! पुरातन वेदमे असुरोंके लिये यज्ञभाग देनेका विधान नहीं है; फिर मैं यज्ञमे आपलोगोंको सोमरस कैसे दे सकता हूँ ? यहाँ वेदके विस्तृत अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ मुनि बैठे है, इनसे पूछ लीजिये ॥ १३-१४ ॥
कन्या हि मम या देयास्ताश्च संकल्पिता मया ।
अन्तर्वेद्यां प्रदातव्याः सदृशानामसंशयम् ॥ १५ ॥
'मुझे अपनी जिन कन्याओका दान करना था, उनका मानसिक संकल्प मैंने कर दिया (वे दूसरोंको दी जा चुकी हैं), अब उन्हें अन्तर्वेदीमें योग्य वरोंके हाथमें सौंप देना है। इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥
रत्नानि तु प्रयच्छामि सान्त्वेनाहं विचिन्त्यताम् ।
बलाम्नैव प्रदास्यामि देवकीपुत्रमाश्रितः ॥ १६ ॥
'अब रही रत्नोंकी बात, उन्हे मैं आपलोगोंको तभी दूँगा, जब आप सान्त्वनापूर्वक बात करें, इस बातको आप अच्छी तरह सोच-समझ लें। बलपूर्वक माँगनेपर मैं कुछ नहीं दूँगा; क्योंकि भगवान् देवकीनन्दनकी शरण ले चुका हूँ (वे ही मेरी रक्षा करेंगे)' ॥ १६ ॥
निकुम्भाद्यास्तु रुषिताः पापाः षट्पुरवासिनः ।
यज्ञवाटं विलुलुठुर्जह्रुः कन्याश्च तास्तथा ॥ १७ ॥
यह उत्तर सुनकर षट्पुरमे निवास करनेवाले निकुम्भ आदि पापी असुर रोषमे भर गये। उन्होंने यज्ञमण्डपको तहस-नहस कर दिया और ब्रह्मदत्तकी कन्याओंको हर लिया ॥
तद् दृष्ट्वा सम्प्रवृत्तं तु दध्यौवानकदुन्दुभिः ।
वासुदेवं महात्मानं बलभद्रं गदं तथा ॥ १८ ॥
यज्ञमण्डपमें वह लूट मची हुई देख वसुदेवने महात्मा श्रीकृष्ण, बलदेव और गदका चिन्तन किया ॥ १८ ॥
विदितार्थस्ततः कृष्णः प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
गच्छ कन्यापरित्राणं कुरु पुत्राशु मायया ॥ १९ ॥
यावद् यादवसैन्येन षट्पुरं याम्यहं प्रभो ।
श्रीकृष्णको तो सब बात ज्ञात ही थी। उन्होंने प्रद्युम्नसे कहा—'बेटा ! जाओ और मायाद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंकी शीघ्र रक्षा करो। प्रभो ! तबतक मैं यादव वीरोंकी सेनाके साथ षट्पुरको चल रहा हूँ' ॥ १९ १/२ ॥
स ययौ षट्पुरं वीरः पितुराज्ञाकरस्तदा ॥ २० ॥
निमेषान्तरमात्रेण गत्वा कामो महाबलः ।
कन्यास्ता मायया धीमानपजह्रे महाबलः ॥ २१ ॥
महाबली कामस्वरूप वीर प्रद्युम्न पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे। वे तत्काल षट्पुरकी ओर चल दिये और पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर उन महाबली बुद्धिमान् वीरने उन कन्याओंका मायाद्वारा अपहरण कर लिया ॥ २०-२१ ॥
मायामयीश्च कृत्वाऽन्या न्यस्तवन् रुक्मिणीसुतः ।
मा भैरिति च धर्मात्मा देवकीमुक्तवांस्तदा ॥ २२ ॥
रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने मायामयी दूसरी कन्याओंका निर्माण करके उन्हें असुरोंके पास छोड़ दिया था। फिर उन धर्मात्माने अपनी पितामही देवकीसे कहा—'दादीजी ! आप भय न करें' ॥ २२ ॥
मायामयीस्ततो हृत्वा सुता ह्यस्य दुरासदाः ।
षट्पुरं विविशुर्दैत्याः परितुष्टा नराधिप ॥ २३ ॥
नरेश्वर ! ब्रह्मदत्तकी पुत्रियाँ दैत्योंके लिये दुष्प्राप्य थीं। वे मायामयी कन्याओंका ही अपहरण करके षट्पुरमें जा घुसे और अपनी सफलतापर संतुष्ट हुए ॥ २३ ॥
५४२ · श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
कर्म चासार्यते तत्र विधिदृष्टेन कर्मणा।
यद् विशिष्टं बहुगुणं तदभूच्च नराधिप ॥ २४॥
राजन् ! इधर शास्त्रीय विधिके अनुसार वहाँ यज्ञकर्मका सम्पादन होने लगा। जो विशिष्ट एवं बहुगुण सम्पन्न कार्य था, वह सब सम्पन्न हुआ ॥ २४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता राजानस्तत्र भारत।
सत्रे निमन्त्रिताः पूर्वं ब्रह्मदत्तेन धीमता ॥ २५॥
भारत ! इसी बीचमें वहाँ बहुत-से राजा आये, जिन्हें बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने पहलेसे ही यज्ञमें पधारनेके लिये निमन्त्रण दे रखा था ॥ २५ ॥
जरासंधो दन्तवक्त्रः शिशुपालस्तथैव च।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च मालवाः सगणास्तथा ॥ २६॥
रुक्मी चैवाहृतिश्चैव नीलो वा धर्म एव च।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यः शकुनिरेव च ॥ २७॥
राजनश्चापरे वीरा महात्मानो दृढायुधाः।
आवासिता नातिदूरे षट्पुरस्य च भारत ॥ २८॥
जरासंध, दन्तवक्त्र, शिशुपाल, पाण्डव, धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, अपने गणोंसहित मालवनरेश, रुक्मी, आह्वृति, नील, धर्म, अवन्तीके विन्द और अनुविन्द, शल्य, शकुनि, दूसरे वीर नरेश, सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले दूसरे महा-मनस्वी वीर नरेश वहाँ पधारे थे। भरतनन्दन ! उन्हें षट्पुरसे थोड़ी ही दूरपर ठहराया गया ॥ २६-२८ ॥
तान् दृष्ट्वा नारदः श्रीमानचिन्तयदनिन्दितः।
क्षात्रस्य यादवानां च भविष्यति समागमः ॥ २९॥
उन सबको वहाँ उपस्थित देख साधु-महात्मा श्रीमान् नारदजीने सोचा, यहाँ यादवों तथा दूसरे क्षत्रियोंमें संघर्ष होगा ॥ २९ ॥
अत्र हेतुरहं युद्धे तस्मात् तत् प्रयताम्यहम्।
एवं संचिन्तयित्वाथ निकुम्भभवनं गतः ॥ ३०॥
इस युद्धमें मैं ही कारण बनूँगा; अतः उसके लिये अभीसे प्रयत्न आरम्भ करता हूँ। ऐसा सोचकर वे निकुम्भके घरमें गये ॥ ३० ॥
पूजितः स निकुम्भेन दानवैश्च तथापरैः।
उपविष्टः स धर्मात्मा निकुम्भमिदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
निकुम्भ तथा दूसरे-दूसरे दानवोंने वहाँ इनकी बड़ी आवभगत की। धर्मात्मा नारदजी वहाँ एक आसनपर बैठ-कर निकुम्भसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥
कथं विरोधं यदुभिः कृत्वा स्वस्थैरिहास्यते ।
यो ब्रह्मदत्तः स हरिः स हितस्य पितुः सखा ॥ ३२॥
'तुमलोग यादवोंके साथ विरोध करके यहाँ कैसे निश्चिन्त बैठे हुए हो। अरे भाई ! जो ब्रह्मदत्त हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं। क्योंकि वे ब्रह्मदत्त उन श्रीकृष्णके पिता वसुदेवके मित्र हैं॥
शतानि पञ्च भार्याणां ब्रह्मदत्तस्य धीमतः।
आनीता वसुदेवस्य सुतस्य प्रियकाम्यया ॥ ३३ ॥
'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तके पाँच सौ भार्याएँ हैं, जिन्हें वे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना करके प्राप्त कर सके थे ॥ ३३ ॥
शतद्वयं ब्राह्मणीनां राजन्यानां शतं तथा।
वैश्यानां शतमेकं च शूद्राणां शतमेव च ॥ ३४ ॥
'उनकी स्त्रियोंमें दो सौ तो ब्राह्मणियाँ थीं, एक सौ क्षत्रिय-कन्याएँ, एक सौ वैश्य-कन्याएँ और एक सौ शूद्रोंकी कन्याएँ थीं ॥ ३४ ॥
ताभिः शुश्रूषितो धीमान् दुर्वासा धर्मवित्तमः।
तेन तासां वरो दत्तो मुनिना पुण्यकर्मणा ॥ ३५ ॥
'उन सबने धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् दुर्वासाकी सेवा की थी। उससे प्रसन्न होकर उन पुण्यकर्मा मुनिने उन्हें वर दिया ॥
एकैकस्तनयो राजन्नेकैका दुहिता तथा।
रूपेणानुपमाः सर्वा वरदानेन धीमतः ॥ ३६॥
'राजन् ! उन बुद्धिमान् मुनिके वरदानसे ब्रह्मदत्तकी प्रत्येक स्त्रीके एक-एक पुत्र और एक-एक कन्या हुई। उनकी वे सारी कन्याएँ अनुपम रूपवती हैं ॥ ३६ ॥
कन्या भवन्ति तनयास्तस्यासुर पुनः पुनः।
सङ्गमे सङ्गमे वीर भर्तृभिः शयने सह ॥ ३७॥
'वीर असुर ! उनकी वे कन्याएँ पतियोंके साथ शयन करते समय प्रत्येक संगमके अवसरपर कुमारी कन्याओंके समान कमनीय हो जाती हैं ॥ ३७ ॥
सर्वपुष्पमयं गन्धं प्रस्रवन्ति वराङ्गनाः।
सर्वदा यौवने न्यस्ताः सर्वाश्चैव पतिव्रताः ॥ ३८ ॥
'वे परम सुन्दरी कन्याएँ अपने शरीरसे सब प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध प्रकट करती हैं, सदा युवावस्थामें ही स्थित रहती हैं और सब-की-सब पतिव्रताएँ हैं ॥ ३८ ॥
सर्वा गुणैरप्सरसां गीतनृत्यगुणोदयम्।
जानन्ति सर्वा दैतेय वरदानेन धीमतः ॥ ३९॥
'दैत्यकुमार ! ये सब अप्सराओंके समान गुणवती हैं और बुद्धिमान् दुर्वासाके वरदानसे संगीत और नृत्यके गुणोंको प्रकट करना जानती हैं ॥ ३९ ॥
पुत्राश्च रूपसम्पन्नाः शास्त्रार्थकुशलास्तथा।
स्वे स्वे स्थिता वर्णधर्मे यथावदनुपूर्वशः ॥ ४० ॥
'उनके सभी पुत्र रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न तथा शास्त्रार्थमें कुशल हैं और क्रमशः सभी यथावत्रूपसे अपने-अपने वर्णधर्ममें स्थित रहते हैं ॥ ४० ॥
विष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ ५४३
ताः कन्या भौममुख्यानां दत्ताः प्रायेण धीमता ।
अवशेषं शतं त्वेकं यदानीतं किल त्वया ॥ ४१ ॥
'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने प्रायः उन सब कन्याओंका विवाह मुख्य-मुख्य यदुवंशियोंके साथ कर दिया है। केवल एक सौ शेष रह गयी थीं, जिन्हें तुम हर लाये हो ॥ ४१ ॥
तदर्थं यादवान् वीर योधयिष्यसि सर्वथा ।
सहायार्थं तु राजानो प्रियन्तां हेतुपूर्वकम् ॥ ४२ ॥
'वीर ! उनके लिये भी तुम्हें सर्वथा यादवोंके साथ युद्ध करना होगा। अतः तुम अपनी सहायताके लिये युक्तिपूर्वक यहाँ आये हुए राजाओंको अपने पक्षमे कर लो ॥ ४२ ॥
ब्रह्मदत्तसुतार्थं च रत्नानि विविधानि च।
दीयन्तां भूमिपालानां सहायार्थं महात्मनाम् ॥ ४३ ॥
आतिथ्यं क्रियतां चैव ये समेष्यन्ति वै नृपाः ।
'ब्रह्मदत्तकी पुत्रियोंके लिये उन महामनस्वी नरेशोंकी सहायता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम उन्हें नाना प्रकारके रत्न भेंट करो । जो राजा यहाँ आवें, उन सबका आतिथ्य-सत्कार करो' ॥ ४३१/२ ॥
एवमुक्ते तथा चक्रुरसुरास्तेऽतिहृष्टवत् ॥ ४४ ॥
लब्ध्वा पञ्चशतं कन्या रत्नानि विविधानि च।
यथार्हेण नरेन्द्रैस्ता विभक्ता भक्तवत्सलैः ॥ ४५ ॥
नारदजीके ऐसा कहनेपर असुरोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर वैसा ही किया। उन भक्तवत्सल नरेशोंने पाँच सौ कन्याएँ और नाना प्रकारके रत्न पाकर उन्हें यथोचित रीतिसे आपसमें बाँट लिया ॥ ४४-४५ ॥
ऋते पाण्डुसुतान् वीरान् वारिता नारदेन ते ।
निमेषान्तरमात्रेण तत्र गत्वा महात्मना ॥ ४६ ॥
केवल पाँचों पाण्डवोंको छोड़कर और सबने कन्याओं और रत्नोंका भाग ग्रहण किया था। महात्मा नारदजीने पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर वीर पाण्डवोंको उनका भाग लेनेसे रोक लिया था ॥ ४६ ॥
तुष्टैस्तैरसुरा ह्युक्ता राजन् भूमिसत्तमैः ।
सर्वकामसमृद्धार्थैर्भवद्भिः खगमैः स्वयम् ॥ ४७ ॥
अर्चिताः स्म यथान्यायं क्षत्रं किं वः प्रयच्छतु ।
क्षत्रं चार्चितपूर्वं हि दिव्यैर्वीरैर्भवद्विधैः ॥ ४८ ॥
राजन् ! रत्न और कन्या पाकर वे भूपालशिरोमणि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने असुरोंसे कहा--'आपलोग समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा स्वयं आकाशमें विचरने-वाले हैं तो भी आपने न्यायोचित रीतिसे हमारा सत्कार किया है; अतः बताइये, यह क्षत्रियसमूह आपलोगोंको क्या दे ? आप-जैसे दिव्य वीरोंने पहले-पहल क्षत्रिय-समाजका पूजन किया है' ॥ ४७-४८ ॥
निकुम्भोऽथाब्रवीद् धृष्टः क्षत्रं सुररिपुस्तदा ।
अनुवर्णयित्वा क्षत्रस्य माहात्म्यं सत्यमेव च ॥ ४९ ॥
यह सुनकर हर्षमें भरे हुए देववैरी निकुम्भने क्षत्रियोंके यथार्थ माहात्म्यका बारंबार वर्णन करके उस समय उनसे इस प्रकार कहा-॥ ४९ ॥
युद्धं नो रिपुभिः सार्द्धं भविष्यति नृपोत्तमाः ।
साहाय्यं दातुमिच्छामो भवद्भिस्तत्र सर्वथा ॥ ५० ॥
'श्रेष्ठ नरेशो ! हमारा अपने शत्रुओंके साथ युद्ध होने-वाला है। उसमें आपलोग सब प्रकारसे हमें सहायता प्रदान करें, यह हमारी इच्छा है' ॥ ५० ॥
एवमस्त्विति तानूचुः क्षत्रियाः क्षीणकिल्विषः ।
पाण्डवेयादृते वीराञ्छ्रुतार्थान्नारदाद् विभो ॥ ५१ ॥
प्रभो ! जिनके पाप क्षीण हो गये थे, उन क्षत्रियोंमेंसे वीर पाण्डवोंको छोड़कर अन्य सबने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पाण्डव नारदजीसे सारी बात सुन चुके थे, इसलिये वे उनसे अलग रहे ॥ ५१ ॥
क्षत्रियाः संनिविष्टास्ते युद्धार्थं कुरुनन्दन ।
पत्न्यस्तु ब्रह्मदत्तस्य यज्ञवाटं गता अपि ॥ ५२ ॥
कृष्णोऽपि सेनया सार्द्धं प्रययौ षट्पुरं विभुः ।
कुरुनन्दन ! वे सब क्षत्रिय युद्धके लिये उद्यत हो वहीं डेरा डालकर डटे रहे। इधर ब्रह्मदत्तकी पत्नियाँ यज्ञशालामें प्रविष्ट हुईं और उधरसे सेनासहित भगवान् श्रीकृष्ण भी षट्पुरमें आ पहुँचे ॥ ५२१/२ ॥
महादेवस्य वचनमुद्वहन् मनसा नृप ॥ ५३ ॥
स्थापयित्वा द्वारवत्यामाहुकं पार्थिवं तदा ।
नरेश्वर ! महादेवजीके वचनको मन-ही-मन स्मरण करके द्वारकामें राजा उग्रसेनको बिठाकर भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ आये थे ॥ ५३१/२ ॥
स तया सेनया सार्द्धं पौराणां हितकाम्यया ॥ ५४ ॥
यज्ञवाटस्याविदूरे देवो निविविशे विभुः ।
देशे प्रवरकल्याणे वसुदेवप्रचोदितः ॥ ५५ ॥
भगवान् जनार्दनदेव उस सेनाके साथ आकर षट्पुर-वासियोंके हितकी कामनासे यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर उत्तम कल्याणमय प्रदेशमें वसुदेवकी आज्ञासे छावनी डालकर ठहर गये ॥ ५४-५५ ॥
दत्तगुल्माप्रतिसरं कृत्वा तं विधिवत् प्रभुः ।
प्रद्युम्नमटने श्रीमान् रक्षार्थं विनियुज्य च ॥ ५६ ॥
श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ विधिपूर्वक रक्षक सैनिकोंके दल तैनात कर दिये, जिसके कारण किसी अवा-
५४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे च्छनीय व्यक्तिको उधरसे आनेके लिये मार्ग नहीं मिल पाता फिरकर सेनाकी देखभाल करनेके लिये नियुक्त कर था। साथ ही उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्नको सब ओर घूम- दिया था ॥ ५६ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे कृष्णस्य षट्पुरगमने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णका षट् पुरगमनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा यादव-सेनाकी युद्धके लिये नियुक्ति, दानवोंका निष्क्रमण, निकुम्भद्वारा कुछ यादव वीरोंका गुफामें बंदी होना, श्रीकृष्णके द्वारा दानव-सैनिकोंका संहार, प्रद्युम्नद्वारा राजसैनिकोंका गुफामें अवरोध तथा ब्रह्मदत्तको सान्त्वना वैशम्पायन उवाच श्रीकृष्णने उन दोनोंको प्रद्युम्नकी भाँति आकाशमें ही मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुषि निर्मले । (ऊपरकी ओरसे सेनाकी रक्षाके लिये) नियुक्त कर दिया ॥६॥ बलः कृष्णः सात्यकिश्च तार्क्ष्यमारुरुहुस्तदा ॥ १ ॥ ततः कृष्णस्य वचनादाहतो रणदुन्दुभिः । बद्धगोधाङ्गुलित्राणा दंशिता युद्धकाङ्क्षिणः । जलजा मुरजाश्चैव वाद्यान्येवापराणि च ॥ ७ ॥ बिल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य सुरोत्तमम् ॥ २ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णके कहनेसे युद्धका डंका बजाया गया। आवर्तया जले स्नात्वा रुद्रेण वरदत्तया । शङ्ख, मुरज तथा अन्य बाजे भी बज उठे ॥ ७ ॥ गङ्गायाः पुरुषार्दूल रुद्रवाक्येन पुण्यया ॥ ३ ॥ मकरो रचितो व्यूहः साम्ब्रेन च गदेन च । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुरुश्रेष्ठ ! सारणश्चोद्धवश्चैव भोजो वैतरणस्तथा ॥ ८ ॥ जब सूर्योदय हुए दो ही घड़ी बीती थी और लोगोंके नेत्र निर्मल अनाधृष्टिश्च धर्मात्मा पृथुर्विपृथुरेव च । हो गये थे, उस समय बलभद्र, श्रीकृष्ण और सात्यकि—ये कृतवर्मा च दंष्ट्रश्च निचङ्कुरारिमर्दनः ॥ ९ ॥ तीनों गरुड़पर सवार हुए। उन सबने अपने हाथोंमें गोधाचर्मके साम्ब और गदने यादव सेनाका मकरव्यूह बनाया। बने हुए दस्ताने बाँध रक्खे थे और कवच धारण करके सारण, उद्धव, भोज, वैतरण, धर्मात्मा अनाधृष्टि, पृथु, युद्धके लिये इच्छुक थे। उन्होंने सबसे पहले, जिसे रुद्रदेवने विपृथु, कृतवर्मा, दंष्ट्र तथा शत्रुमर्दन निचङ्क—ये सब उस वर दिया था और जो उन्हींके वचनसे पुण्यमयी हो गयी व्यूहके अग्रभागमें खड़े थे ॥ ८-९ ॥ थी, उस आवर्ता नामवाली गङ्गामें स्नान करके सुरश्रेष्ठ सनत्कुमारो धर्मात्मा चारुदेष्णश्च भारत । बिल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार किया था (इसके बाद वे अनिरुद्धसहायौ तौ पृष्ठानीकं ररक्षतुः ॥ १० ॥ युद्धकी व्यवस्थामें लगे थे।) ॥ १-३ ॥ शेषा यादवसेना तु व्यूहमध्ये व्यवस्थिता । प्रद्युम्नमग्रे सैन्यस्य विधाति स्थाप्य मानदः । रथैरश्वैर्नरैर्नागैर्व्याकुला कुलवर्धन ॥ ११ ॥ रक्षार्थं यज्ञवाटस्य पाण्डवान् विनियुज्य च ॥ ४ ॥ धर्मात्मा सनत्कुमार और चारुदेष्ण ये—दोनों अनिरुद्धके शेषां सेनां गुहाद्वारि भगवान् विनियुज्य च । साथ रहकर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगे। अपने जयन्तमथ सस्मार प्रवरं च सतां गतिः ॥ ५ ॥ कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! रथों, घोड़ों, मनुष्यों और सबको मान देनेवाले, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत श्रीकृष्णने हाथियोंसे भरी हुई शेष यादवसेना व्यूहके मध्यभागमें सबसे आगे प्रद्युम्नको सेनाकी रक्षाके लिये उसके ऊपरी भाग खड़ी थी ॥ १०-११ ॥ आकाशमें स्थापित किया। यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये पाण्डवोंको षट्पुरादपि निष्क्रान्ता दानवा युद्धदुर्मदाः । नियुक्त किया तथा शेष सेनाको गुफाके द्वारपर नियुक्त करके आरुह्य मेघनादांश्च गर्दभानपि हस्तिनः ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीहरिने जयन्त और प्रवरको स्मरण किया ॥४-५॥ तदनन्तर षट्पुरसे भी रणदुर्मद दानव निकले । उनमेंसे तावापेततुरेवाथ स्वयं चापश्यतां तथा । कुछ मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले गदहों और वियत्येव नियुक्तौ तौ प्रद्युम्न इव भारत ॥ ६ ॥ हाथियोंपर आरूढ थे ॥ १२ ॥ भरतनन्दन ! वे दोनों वहाँ आ पहुँचे और स्वयं ही मकराञ्छिशुमारांश्च द्रुतानपि च भारत । आकर उन्होंने भगवान्का दर्शन किया। तत्पश्चात् भगवान् महिषानपि खड्गांश्च उष्ट्रानपि च कच्छपान् ॥ १३ ॥
विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः ५४५ भरतनन्दन ! कितने ही दैत्य वेगशाली मगरों, शिशुमारों शल्यश्च शकुनिश्चोभौ भगदत्तश्च पार्थिवः । (सँसों), भैंसों, गैंडों, ऊँटों और कछुओंपर भी सवार थे । १३। जरासंधस्त्रिगर्तश्च विराटश्च सहोत्तरः ॥ २१ ॥ एतैरेव रथैर्युक्ता विविधायुधपाणयः । युद्धार्थमुद्यता वीरा निकुम्भाद्या जयैषिणः । किरीटापीडमुकुटैरङ्गदैरपि मण्डिताः ॥ १४ ॥ युयुत्समाना यदुभिर्दैवैरिव महासुराः ॥ २२ ॥ कितनोंके पास इन्हीं वाहनोंसे जुते हुए रथ थे । उन शल्य, शकुनि, राजा भगदत्त, जरासंध, त्रिगर्तराज रथोंसे सम्पन्न हुए वे दैत्य अपने हाथोंमें नानाप्रकारके आयुध सुशर्मा और उत्तरसहित राजा विराट--ये वीर नरेश लिये हुए थे । वे किरीट, मुकुट या पगड़ी तथा अङ्गदों विजयकी अभिलाषा रखकर निकुम्भकी प्रधानतामें युद्धके (भुजबंदों) से अलंकृत थे ॥ १४ ॥ लिये उद्यत हुए थे । जैसे महान् असुर देवताओंके साथ नानार्दमानैर्विविधैस्तूर्यैर्नेमिस्वनाकुलैः । जूझना चाहते हैं, उसी प्रकार ये सब नरेश यादवोंके साथ प्रध्मायमानैः शङ्खैश्च महाम्बुदसमस्वनैः ॥ १५ ॥ युद्ध करनेकी इच्छा रखते थे ॥ २१-२२ ॥ उनके साथ वारंवार नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । ततो निकुम्भः समरे शरैराशीविषोपमैः । उन बाजोंकी आवाजमें रथके नेमियों (पहियों) की घर्घराहट ममर्द समरे सेनां भैमानां भीमदर्शनाम् ॥ २३ ॥ भी मिली हुई थी । वहाँ जोर-जोरसे शङ्ख बजाये जाते थे, जो तब निकुम्भ समराङ्गणमें विषधर सर्पोंके समान भयंकर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट करते थे १५ बाणोंद्वारा भैर्मों ( यादवों ) की भयानक दिखायी देनेवाली तासामसुरसेनानामुद्यतानां जनेश्वर । सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥ निकुम्भो निर्ययावग्रे देवानाामिव वासवः ॥ १६ ॥ सेनापतिरनाधृष्टिर्ममृषे तन्न यादवः । जनेश्वर ! युद्धके लिये उद्यत हुई उन असुर-सेनाओंमें ममर्द घोरैर्बाणौघैश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २४ ॥ सबसे आगे निकुम्भ निकला, मानो देवताओंके आगे इन्द्र यादव-सेनापति अनाधृष्टि निकुम्भके इस पराक्रमको नहीं चल रहे हों ॥ १६ ॥ सहन कर सके । उन्होंने शिला या सानपर तेज किये हुए भूमिं द्यां च ववृधिरे दानवास्ते बलोत्कटाः । विचित्र पंखवाले घोर बाणसमूहोंद्वारा उस असुरको नदन्तो विविधान् नादान् क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः ॥ १७ ॥ कुचल डाला ॥ २४ ॥ वे उत्कट बलशाली दानव नाना प्रकारसे सिंहनाद करते, न रथोऽसुरमुख्यस्य ददृशे न च वाजिनः । बारंबार गरजते तथा आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए न ध्वजो न निकुम्भस्तु सर्वै बाणाभिसंवृताः ॥ २५ ॥ बढ़ने लगे ॥ १७ ॥ उस असुर-सेनापतिका न तो रथ दिखायी देता था न राजसेनःपि संयत्ता चेदिराजपुरोगमा । घोड़े, न ध्वज और न स्वयं निकुम्भ ही । वे सब-के-सब असुराणां सहायार्थे निश्चिता जनमेजय ॥ १८ ॥ बाणोंसे ढक गये थे ॥ २५ ॥ जनमेजय ! राजाओकी सेना भी असुरोंकी सहायताके स परीत्य ततो वीरो निकुम्भो मायिनां वरः । लिये निश्चय करके चेदिराज शिशुपालके नेतृत्वमें युद्धके लिये अस्तम्भयदनाधृष्टिं मायया भैमसत्तमम् ॥ २६ ॥ तैयार हो गयी ॥ १८ ॥ तब मायावी असुरोंमें श्रेष्ठ वीर निकुम्भने सब ओर दुर्योधनध्रातृशतं चेदिराजानुजायगम् । चक्कर लगाकर अपनी मायाद्वारा भैँमशिरोमणि (यादवश्रेष्ठ) स्थितं रथैर्नरव्याघ्र गन्धर्वनगरोपमैः ॥ १९ ॥ अनाधृष्टिको स्तम्भित कर दिया ॥ २६ ॥ पुरुषसिंह ! दुर्योधन आदिसौ भाई चेदिराज शिशुपालके स्तम्भयित्वानयद् वीरं गुहां षट्पुरसंज्ञिताम् । छोटे भाइयोंस आगे चल रहे थे। ये सब-के-सब गन्धर्वनगरकार रुद्ध्वा चाभ्यगमद् वीरो मायावलमुपाश्रितः ॥ २७ ॥ रथोंद्वारा युद्धके लिये खड़े थे ॥ १९ ॥ स्तम्भित करके वह वीर अनाधृष्टिको षट्पुर नामवाली कठिनानादिनो वीर द्रुपदस्यन्दनास्तथा । गुफामें उठा ले गया और वहाँ बंद करके मायावलका रुक्मी चैवाहितश्चैव तस्थतुर्निश्चितौ रणे । आश्रय लेनेवाला वीर निकुम्भ पुनः युद्धभूमिमें लौट आया २७ तालवृक्षप्रतीकाशे धुन्वानौ धनुषी शुभे ॥ २० ॥ पुनरेव. निकुम्भस्तु कृतवर्माणमाहवे । वीर ! राजा द्रुपदके रथ बड़े कठोर (दुःसह) घर- अनयच्चारुदेष्णं च भोजं वैतरणं तथा ॥ २८ ॥ घराहटका शब्द करते थे । रुक्मी और आहुति-ये दोनों सनत्कुमारमृक्षं च तथैव निशठोल्मुकौ । युद्धके लिये निश्चय करके वहाँ डट गये । वे ताड़-वृक्षके बहूंश्चैवापरान् भोजान् मायावलसमाश्रितः ॥ २९ ॥ समान अपने सुन्दर धनुष हिलाने लगे ॥ २० ॥ अबकी बार युद्धस्थलमें पुनः मायाबलका आश्रय लेनेवाल म० ह० १८४-
| ५४६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
निकुम्भ, कृतवर्मा, चारुदेष्ण, भोज, वैतरण, सनत्कुमार, जाम्बवतीपुत्र ऋक्ष, निशठ, उल्मुक तथा दूसरे-दूसरे बहुत से भोजवंशियोंको उठा ले गया ॥ २८-२९ ॥
न तस्य ददृशे देहो मायाच्छन्नो जनेश्वर।
नयतो यादवान् घोरान्गुहां पट्ट्पुरसंज्ञिताम् ॥ ३०॥
जनेश्वर ! घोर यादव वीरोंको पट्ट्पुर नामवाली गुफामें ले जाते समय उस असुरकी देह दिखायी नहीं देती थी; क्योंकि वह उसकी मायासे आच्छादित थी ॥ ३० ॥
तद् दृष्ट्वा कदनं घोरं भैमानां भयवर्धनः।
चुकोप भगवान् कृष्णो बलः सत्यक एव च ॥ ३१ ॥
भीमवंशियोंका वह घोर संहार देखकर शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि कुपित हो उठे ॥ ३१ ॥
सविशेषं तथा कामः साम्बश्च परवीरहा।
अनिरुद्धश्च दुर्धर्षो भैमाश्च बहवोऽपरे ॥ ३२॥
कामावतार प्रद्युम्नको विशेष क्रोध हुआ। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले साम्ब, दुर्धर्ष वीर अनिरुद्ध तथा दूसरे बहुत-से भीमवंशी यादव भी रोषमें भर गये ॥ ३२ ॥
ततः शार्ङ्गयुधः शार्ङ्गं कृत्वा सज्यं नरेश्वर।
दानवेषु प्रवृत्तेषु तृणेष्विव हुताशनः ॥ ३३॥
नरेश्वर ! शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णने अपने उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और जैसे अग्नि तिनकोंमें प्रवेश करती हो, उसी प्रकार वे दानवोंपर धनुषसे बाण बरसाने लगे ॥ ३३ ॥
तं दृष्ट्वा दानवा देवमभिदुद्रुवुरीश्वरम्।
शलभाः कालपाशार्ताः प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ३४ ॥
उन भगवान् गोविन्ददेवको वहाँ देखकर सब दानव उन्हींपर टूट पड़े; ठीक वैसे ही, जैसे कालपाशसे पीड़ित हुए पतिंगे जलती हुई आगमें कूद पड़ते हैं ॥ ३४ ॥
समुत्सृज्य शतघ्नीश्च परिघांश्च सहस्रशः।
शूलानि चाग्नितुल्यानि प्रदीप्तांश्च परश्वधान् ॥ ३५ ॥
वे सहस्रों शतघ्नी, परिघ, अग्नितुल्य त्रिशूल तथा प्रज्वलित हुए फरसे चलाने लगे ॥ ३५ ॥
पर्वताग्राणि वृक्षांश्च घोराश्च विपुलाः शिलाः।
उत्क्षिप्य च गजान्मत्तान् रथानपि हयानपि ॥ ३६॥
पर्वतोंके शिखर, वृक्ष, भयंकर बड़ी-बड़ी शिलाएँ, मतवाले हाथी, रथ और घोड़े—इन सबको उठा-उठाकर भगवान् श्रीकृष्णपर फेंकने लगे ॥ ३६ ॥
नारायणाग्निस्तान् सर्वान् ददाह प्रहसन्निव।
बाणार्चिषा महातेजा जगद्धितकरो हरिः ॥ ३७ ॥
परंतु जगत्का हित करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण हरिने हँसते हुए-से अग्निरूप होकर अपनी बाणमयी लपटोंसे उन सबको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३७ ॥
शारदं वर्षणं यद्वत् सेहे धीरो गवां पतिः।
तद्वद् यदुवृषः सेहे बाणवर्षमरिंदमः ॥ ३८ ॥
जैसे धीर साँड़ शरद्ऋतुकी वर्षाको चुपचाप सहन करता है, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण दैत्योंकी बाणवर्षाको धैर्यपूर्वक सहन करते रहे ॥ ३८ ॥
न सेहिरेऽसुरा बाणान् नारायणधनुश्च्युतान्।
घर्षं पर्जन्यविहितं वालुकासेतवो यथा ॥ ३९॥
परंतु जैसे बालूके बने हुए सेतु (पुल) मेघोंद्वारा की गयी वर्षाका वेग नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे असुर नारायण (श्रीकृष्ण) के धनुषसे छूटे हुए बाणोंको नहीं सह सके ॥ ३९ ॥
न शेकुः प्रमुखे स्थातुं कृष्णस्यासुरसत्तमाः।
व्यादितास्यस्य सिंहस्य वृषभा इव भारत ॥ ४० ॥
भारत ! जैसे मुँह बाये हुए सिंहके सामने बैल नहीं ठहर सकते, उसी प्रकार वे बड़े-बड़े असुर श्रीकृष्णके सम्मुख खड़े नहीं रह सके ॥ ४० ॥
ते वध्यमानाः कृष्णेन दिवमाचक्रमुस्तदा।
जीविताशां वहन्तस्तु नारायणभयार्दिताः ॥ ४१ ॥
नारायणके भयसे पीड़ित हो उनके द्वारा मारे जाते हुए वे असुर जीवनकी आशाका भार वहन करते हुए आकाशमें उड़ चले ॥ ४१ ॥
तानाकाशगतानैन्द्रिर्जयन्तः प्रवरस्तथा।
निजघ्नतुः शरैर्घोरैर्ज्वलतार्चिःसमैः प्रभो ॥ ४२ ॥
प्रभो ! आकाशमें गये हुए उन असुरोंको जयन्त और प्रवर प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा मार गिराते थे ॥ ४२ ॥
निपेतुस्सुराणां तु शिरांसि धरणीतले।
तृणराजफलानीव मुक्तानि शिखरात् तरोः ॥ ४३ ॥
उन असुरोंके कटे हुए सिर वृक्ष-शिखरसे टूटकर गिरे हुए तालफलोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ४३ ॥
निपेतुर्बाहवश्छिन्ना दैत्यानां वसुधातले।
कालेनोपहता वीर पञ्चवक्त्रा इवोरगाः ॥ ४४ ॥
वीर ! दैत्योंकी कटी हुई भुजाएँ पृथ्वीपर कालके मारे हुए पाँच मुखवाले सर्पोंके समान गिर रही थीं ॥ ४४ ॥
रौक्मिणेयस्ततः सृष्ट्वा घोरां मायामयीं गुहाम्।
अदृश्यनिष्क्रमं वीरः क्षत्रं प्रक्षेप्तुमुद्यतः ॥ ४५ ॥
गदेन सह धर्मात्मा सारणेन सुतेन च।
साम्बेन चापरैश्चापि पूर्वं ये न प्रवेशिताः ॥ ४६॥
तदनन्तर गद, सारण, अनिरुद्ध, साम्ब तथा अन्य वीरोंके साथ, जिन्हें निकुम्भने पहले अपनी गुफामें नहीं घुसाया था, वीर धर्मात्मा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न घोर मायामयी गुफाकी सृष्टि करके समस्त क्षत्रिय नरेशोंके समुदायको,
विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः [ ५४७
जो उस गुफामे निकलनेके मार्गको नहीं देख पाता था, उसमें फेंक देनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४५-४६ ॥
प्रमथ्य तरसा कर्णे यतन्तं रणमूर्धनि ।
जग्राह बलवान् कार्ष्णिः प्रस्फुरन्तं ततस्ततः ॥ ४७ ॥
विनद्य च गुहां वीरो घोरां मायामयीं नृप ।
नरेश्वर ! बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमारने युद्धके मुहानेपर विजयके लिये प्रयत्न करते हुए कर्णको वेगपूर्वक पटककर उसके उछल कूद मचाने या छटपटानेपर भी पकड़ लिया और गरजकर उसे घोर मायामयी गुफामें (फेंकनेका विचार किया) ॥ ४७ ॥
दुर्योधनं च राजानं विराटद्रुपदावपि ॥ ४८ ॥
शकुनिं चैव शल्यं च नीलं चापि नदीसुतम् ।
विन्दानुविन्दौ राजानौ जरासंधं च भारत ॥ ४९ ॥
त्रिगर्तान् मालवांश्चैव वासन्त्यांश्च महाबलान् ।
धृष्टद्युम्नादिकांश्चैव पञ्चालानस्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥
तथाह्वतिमुवाचेदं मातुलं रुक्मिमेव च ।
शिशुपालं च राजानं भगदत्तं च भारत ॥ ५१ ॥
भारत ! इसी तरह उन्होंने राजा दुर्योधन, विराट, द्रुपद, शकुनि, शल्य, नील, भीष्म, राजा विन्द और अनुविन्द तथा जरासंधको, त्रिगर्त, मालव एवं महाबली वासन्त्यगणोंको और अस्त्रज्ञानमें निपुण धृष्टद्युम्न आदि पाञ्चाल वीरोंको भी पकड़ लिया। फिर अपने मामा आह्वति और रुक्मीको एवं राजा शिशुपाल और भगदत्तको सम्बोधित करके कहा—॥ ४८-५१ ॥
सम्बन्धं च गुरुत्वं च मानयामि नराधिपाः ।
गुहामिमां घोररूपां यत्र प्रक्षेपयामि वः ॥ ५२ ॥
बिल्वोदकेश्वरेणाहमाज्ञप्तः शूलपाणिना ।
प्रक्षेतव्या नरेन्द्रास्ते गुहायामिति धीमता ॥ ५३ ॥
'नरेश्वरो ! हमारे साथ आपलोगोंका जो सम्बन्ध और गुरुत्व है, उसका मैं आदर करता हूँ तो भी आपलोगोंको इस भयंकर गुफामें जहाँ फेंक रहा हूँ, वहाँ फेंकनेके लिये बुद्धिमान् शूलपाणि भगवान् बिल्वोदकेश्वरने मुझे आज्ञा दी है। उन्होंने कहा है कि तुम सब राजाओंको गुफामें फेंक दो ॥
आश्रित्य शाम्बरीं मायां निकुम्भेन महात्मना ।
प्रक्षिप्तान् यादवांश्चैव मोक्षयिष्यामि सर्वथा ॥ ५४ ॥
'महामनस्वी निकुम्भने शाम्बरी मायाका आश्रय लेकर जिन यादवोंको गुफामें डाल रक्खा है, उन्हें मैं सर्वथा छुड़ा लूँगा' ॥ ५४ ॥
इत्युक्तो शिशुपालस्तु राजा सेनापतिस्तथा ।
शरैस्ततर्द तान् भैमान् प्रद्युम्नं च विशेषतः ॥ ५५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सेनापति राजा शिशुपालने अपने बाणोंद्वारा उन भैभों (यादवो) तथा विशेषतः प्रद्युम्नको पीडित कर दिया ॥ ५५ ॥
बिल्वोदकेश्वरं देवं रौक्मिणेयो नमस्य च ।
आरभन्नृपतिं बद्धुं शिशुपालं महाबलम् ॥ ५६ ॥
तब रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार करके महाबली राजा शिशुपालको बाँधना आरम्भ किया ॥
ततः पाशसहस्राणि गृह्य प्रवरोत्तमः ।
शैलादिरब्रवीद् वीरं रौक्मिणेयं महाबलम् ॥ ५७ ॥
तत्पश्चात् रुद्रदेवके पार्षदोंमें श्रेष्ठ नन्दीने एक सहस्र पाश लेकर महाबली रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नसे कहा—॥
बिल्वोदकेश्वरो देवः प्राह त्वां यदुनन्दन ।
सर्वं कुरु तथा रात्र्यां चोक्तस्त्वं भो यथा मया ॥ ५८ ॥
'यदुनन्दन ! बिल्वोदकेश्वरने तुम्हें यह संदेश दिया है कि मैंने जैसा तुमसे कहा है, उसके अनुसार तुम रातमें सब कार्य करो ॥ ५८ ॥
कन्यार्थं रत्नलब्धांस्तु बद्ध्वा चेमान् नराधिपान् ।
पाशैस्त्वमेव मोक्तुं च प्रमाणं यदुनन्दन ॥ ५९ ॥
'यदुनन्दन ! कन्याओं और रत्नोंपर लुभाये हुए इन राजाओंको पाशोंसे बाँधकर फिर इन्हें मुक्त करनेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुम्हीं चाहो तो उन्हें छोड़ सकते हो ॥ ५९ ॥
असुरांस्तु महाबाहो निःशेषान् कर्तुमर्हसि ।
एवमेव च वक्तव्यस्त्वया वीर जनार्दनः ॥ ६० ॥
'वीर महाबाहो ! तुम इन असुरोंको निःशेष कर डालो—इनमेसे एकको भी जीवित न छोड़ो। तुम्हे जनार्दनसे भी ऐसा ही कहना चाहिये' ॥ ६० ॥
ततः स भगदत्तं च शिशुपालं च भूमिप ।
आह्वितिं चैव रुक्मिं च शेषांश्चान्यान् नराधिपान् ॥ ६१ ॥
बबन्ध हरदत्तैस्तैः पाशैरुत्तमवीर्यधृक् ।
मायामयीं गुहां चैवमानयत् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥
पृथ्वीपते ! कुरुनन्दन ! तदनन्तर उत्तम बल धारण करनेवाले प्रद्युम्नने भगवान् शङ्करके दिये हुए पाशोंसे राजा भगदत्त, शिशुपाल, आह्वृति, रुक्मी तथा शेष अन्य नरेशोंको भी बाँधा और उन सबको मायामयी गुफामें ले आये ॥
बद्ध्वा च रौक्मिणेयोऽथ निःश्वसन्त इवोरगान् ।
अनिरुद्धं चकाराथ रक्षितारं स्वमात्मजम् ॥ ६३ ॥
रुक्मिणीकुमारने फुफकारते हुए सर्पोंके समान लंबी साँस खींचते हुए राजाओंको बाँधकर डाल दिया और अपने पुत्र अनिरुद्धको उनका रक्षक नियुक्त कर दिया ॥ ६३ ॥
तेषां निरवशेषेण बबन्ध यदुनन्दनः ।
सेनापतीन् क्षत्रियांश्च कोषाध्यक्षांश्च भारत ॥ ६४ ॥
हस्त्यश्वरथवृन्दांश्च चकार च तथाऽऽत्मसात् ।
| ५४८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भारत ! यदुनन्दन प्रद्युम्नने उनमेंसे किसीको भी बिना बाँधे नहीं छोड़ा । फिर उनके क्षत्रिय-सेनापतियों, कोषाध्यक्षों तथा हाथी, घोड़ों और रथके समूहोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ६४३॥
अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यतः प्रभो ॥ ६५ ॥
संनद्ध एव चोवाच ब्रह्मदत्तं द्विजोत्तमम् ।
विस्रब्धं वर्ततां कर्म मा भैः पश्य धनंजयम् ॥ ६६ ॥
प्रभो ! तत्पश्चात् अव्यग्र (शान्त) भावसे स्थित हो वे असुरोंको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये और संनद्ध रहकर द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्तसे बोले—'ब्रह्मन् ! आप निर्भय हो अपना यज्ञकर्म चालू रखें। देखिये, अर्जुन आपकी रक्षामें खड़े हैं ॥
न देवेभ्यो नासुरेभ्यो नागेभ्यो द्विजसत्तम ।
भयं हि विद्यते तस्य गोप्तारो यस्य पाण्डवाः ॥ ६७ ॥
'द्विजश्रेष्ठ ! पाण्डव जिसके रक्षक हों, उसे न तो देवताओंसे, न असुरोंसे और न नागोंसे ही भय प्राप्त हो सकता है ॥ ६७ ॥
न चासुरैस्तव सुताः स्पृष्टाः खल्वपि चेतसा ।
यज्ञवाटे निरीक्ष्यन्तां मायया निहिता मया ॥ ६८ ॥
'असुरोंने आपकी पुत्रियोंका मनसे भी स्पर्श नहीं किया है। आप यज्ञमण्डपमें देखिये, मैंने मायाद्वारा उन्हें छिपाकर वहीं रख छोड़ा है' ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
निकुम्भका जयन्तसे पराजित होकर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको निकुम्भका चरित्र बताना, आकाशवाणीकी प्रेरणासे सुदर्शन चक्रद्वारा निकुम्भका वध करना और ब्रह्मदत्तको षट्पुरनगर देकर द्वारकाको प्रस्थान करना
वैशम्पायन उवाच
रुद्धेषु भूमिपालेषु सानुगेषु विशाम्पते ।
आविवेशासुरांश्चाथ कश्मलं जनमेजय ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! जनमेजय ! जब अनुचरोंसहित सब भूपाल गुफामें बंद कर दिये गये, तब असुरोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥
दिशः प्रतस्युस्ते वीरा वध्यमानाः समन्ततः ।
कृष्णानन्तप्रभृतिभिर्यदुभिर्युद्धदुर्मदैः ॥ २ ॥
श्रीकृष्ण, बलराम आदि रणदुर्मद यादवोंद्वारा सब ओरसे मारे जाते हुए वीर असुर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर पलायन करने लगे ॥ २ ॥
निकुम्भस्तानथोवाच रुषितो दानवोत्तमः ।
भित्त्वा प्रतिज्ञां किं मोहाद् भयार्तार्यात विह्वलाः ॥ ३ ॥
यह देख दानवश्रेष्ठ निकुम्भ रोषमें भरकर उनसे बोला—'अरे ! तुमलोग मोहवश अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भयसे पीड़ित और विह्वल होकर क्यों भागे जा रहे हो ? ॥ ३॥
हीनप्रतिज्ञाः काँल्लोकान् प्रयास्यथ पलायिताः ।
अगत्वापचितिं युद्धे ज्ञातीनां कृतनिश्चयाः ॥ ४ ॥
'प्रतिज्ञाहीन होकर भाग जानेवाले तथा पहले बदला लेनेका निश्चय करके भी युद्धमें अपने भाई-बन्धुओंका ऋण उतारे बिना पीठ दिखानेवाले तुमलोग किन लोकोंमें जाओगे ? ॥ ४ ॥
फलं जित्वेह भोक्तव्यं रिपून् समरकर्कशान् ।
हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं त्रिदिवे सुखम् ॥ ५ ॥
'समराङ्गणमें निर्दयतापूर्वक जूझनेवाले शत्रुओंको जीतकर इस लोकमें उत्तम फल (राज्य आदि) का उपभोग प्राप्त होगा अथवा रणमें मारे जानेपर शूरवीरको स्वर्गलोकमें सुखदायक निवास सुलभ होगा ॥ ५ ॥
पलायित्वा गृहं गत्वा कस्य द्रक्ष्यथ हे मुखम् ।
दारान् वक्ष्यथ किं चापि धिग् धिक् किं किं न लज्जथ ॥ ६ ॥
'हे दैत्यो ! भागकर घर जाकर किसका मुँह देखोगे (अथवा किसे मुँह दिखाओगे) ? अपनी पत्नियोंसे क्या कहोगे ? धिक्कार है, धिक्कार है। क्यों ? क्यों तुम्हें लज्जा नहीं आती ?' ॥ ६ ॥
एवमुक्ता निवृत्तास्ते लज्जमाना नृपासुराः ।
द्विगुणेन च वेगेन युयुधुर्यदुभिः सह ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! निकुम्भके ऐसा कहनेपर वे असुर लज्जित होकर लौट पड़े और दुगुने वेगसे यादवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ७ ॥
उत्सवे युद्धशौण्डानां नानाप्रहरणैर्नृप ।
ये यान्ति यज्ञवाटं तं तान् निहन्ति धनंजयः ॥ ८ ॥
यमौ भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्यां प्रयाताश्चाद्यनैन्द्रिः प्रवरश्च द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥
राजन् ! नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धकुशल
विष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ५४९
योद्धाओंके उस समरोत्सवमें जो दैत्य यज्ञमण्डपकी ओर जाते थे, उन्हें अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मार डालते थे। जो लोग आकाशमे जाते थे, उन्हें इन्द्रकुमार जयन्त और द्विजश्रेष्ठ प्रवर कालके गालमें भेज देते थे॥ ८-९॥
अथासुरासृक्तोयाढ्या केशशैवलशाद्वला।
चक्रकूर्मरथावर्ता गजशैलांशुशोभिनी॥ १०॥
ध्वजकुन्ततरुच्छन्ना स्वनितोत्कृष्टनादिनी।
गोविन्दशैलप्रभवा भीरुचित्तप्रमाथिनी॥ ११॥
असृग्बुद्बुदफेनाढ्या असिमत्स्यतरङ्गिणी।
सुस्राव शोणितनदी नदीव जलदागमे॥ १२॥
फिर तो वहाँ वर्षांमें बढ़ी हुई नदीके समान एक खूनकी नदी बह चली। असुरोंके रक्त ही उसके जल थे। उनके सिरके केश ही उसमें सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे। रथके पहिये उसमें कछुए-जैसे लगते थे और रथ भँवरके समान प्रतीत होता था। हाथियोंकी लाशें पर्वतोंकी चट्टानोंके समान उसकी शोभा बढ़ाती थीं। ध्वज और भाले तटवर्ती वृक्षोंके समान उसे आच्छादित किये हुए थे। योद्धाओंका गर्जना और चीखना ही उसका कलकल नाद था। वह नदी श्रीकृष्णरूपी पर्वतसे प्रकट हुई थी और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करती थी। रक्तके बुलबुले ही उसमें फेन थे और तलवारें ही मछलियों और तरंगोंके समान प्रतीत होती थीं॥ १०-१२॥
तान् दृष्ट्वैष निकुम्भस्तु वर्धमानांश्च शत्रूवान्।
हतान् सर्वान् सहायांश्च वीर्यादेवात्पपात ह॥ १३॥
निकुम्भ अपने उन शत्रुओंको बढ़ता हुआ और समस्त सहायकोंको मारा गया देख अपने बलसे ही ऊपरको उछला॥ १३॥
स वारितो जयन्तेन प्रवरेण च भारत।
शरैः कुलिशसंकाशैर्निकुम्भो रणकर्कशः॥ १४॥
संनिवृत्याथ दष्टौष्ठः परिघेन दुरासदः।
प्रवरं ताडयामास स पपात महीतले॥ १५॥
भारत! ऊपर गये हुए रणकर्कश निकुम्भको जयन्त और प्रवरने अपने वज्रतुल्य बाणोंद्वारा रोका। तब दुर्जय वीर निकुम्भ दाँतोंसे ओठ दबाकर लौटा। उसने प्रवरपर परिघसे प्रहार किया। इससे वह पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १४-१५॥
पेन्द्रिस्तं पतितं भूमौ बाहुभ्यां परिषस्वजे।
विदित्वा चैव सप्राणं हित्वासुरमभिद्रुतः॥ १६॥
पृथ्वीपर गिरे हुए इन प्रवरको इन्द्रकुमार जयन्तने अपनी दोनों भुजाओंसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और जब उन्हें मालूम हुआ कि प्रवर जीवित हैं, तब वे उन्हें छोड़कर उस असुरकी ओर दौड़े॥ १६॥
अभिद्रुत्य निकुम्भं च निस्त्रिंशेन जघान ह।
परिघेणापि दैतेयो जयन्तं समताडयत्॥ १७॥
निकुम्भपर धावा करके जयन्तने उसे खड्गसे मारा। तब उस दैत्यने भी जयन्तपर परिघसे प्रहार किया॥ १७॥
ततक्ष बहुलं गात्रं निकुम्भस्येन्द्रिराहवे।
स चिन्तयामास तदा वध्यमानो महासुरः॥ १८॥
कृष्णेन सह योद्धव्यं वैरिणा ज्ञातिघातिना।
श्रावयामि किमात्मानमाहवे शक्रसूनुना॥ १९॥
इन्द्रकुमारने युद्धस्थलमे निकुम्भके शरीरको प्रायः क्षत-विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारे जाते हुए उस महान् असुरने उस समय मन-ही-मन सोचा कि मुझे श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना चाहिये, क्योंकि वे मेरे बन्धु-बान्धवोंके घातक एवं वैरी हैं। मैं युद्धमें इन्द्रकुमारके साथ लड़कर अपने लिये कौन-सी ख्याति प्राप्त करूँगा॥ १८-१९॥
एवं स निश्चयं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत।
जगाम चैव युद्धार्थं यत्र कृष्णो महाबलः॥ २०॥
ऐसा निश्चय करके वह महाबली असुर वहीं अन्तर्धान हो गया और युद्धके लिये उस स्थानपर गया, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे॥ २०॥
तं दृष्ट्वावतस्कन्धमास्थितो बलनाशनः।
द्रष्टुमभ्यागतो युद्धं जहर्ष सह दैवतैः॥ २१॥
उसे वहाँ गया हुआ देख बलनाशन इन्द्र ऐरावतकी पीठपर बैठकर वह युद्ध देखनेके लिये आये। उस समय वे देवताओंके साथ बहुत प्रसन्न थे॥ २१॥
साधु साध्विति पुत्रं च परितुष्टः स सस्वजे।
प्रवरं चापि धर्मात्मा सस्वजे मोहवर्जितम्॥ २२॥
धर्मात्मा इन्द्रने 'साधु साधु (वाह-वाह)' कहकर संतुष्ट हो अपने पुत्र जयन्तको हृदयसे लगा लिया और मूर्च्छा दूर हो जानेपर प्रवरसे भी गले मिले॥ २२॥
देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्वाद्सवाज्ञया।
जयमानं रणे दृष्ट्वा जयन्तं रणदुर्जयम्॥ २३॥
उस समय रणदुर्जय जयन्तकी युद्धमें विजय देखकर इन्द्रकी आज्ञासे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ २३॥
ददर्शार्थ निकुम्भस्तु केशवं रणदुर्जयम्।
अर्जुनेन स्थितं सार्धं यज्ञवाटाविदूरतः॥ २४॥
निकुम्भने देखा, युद्धमें जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, वे श्रीकृष्ण यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुनके साथ खड़े हैं॥ २४॥
स नादं सुमहान् कृत्वा पक्षिराजमताडयत्।
परिघेण सुघोरेण बलं सत्यकमेव च॥ २५॥