भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 563

[विष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ५४१


भरतनन्दन ! वह यज्ञ बुद्धिमान् वसुदेवजीकी अनुरूप समृद्धिसे युक्त था। उसमें मै, मेरे गुरु व्यासजी, याज्ञवल्क्य मुनि, सुमन्तु, जैमिनि, धैर्यशील जावलि (या जावालि) तथा देवल आदि महर्षि भी उपस्थित थे। उस यज्ञमें धर्म-परायणा देवकी देवी जगत्स्स्रष्टा भगवान् वासुदेवके प्रभावसे इस पृथ्वीपर सबको मनोवाञ्छित पदार्थ दान करती थीं ॥ ७-८ १/२ ॥

तस्मिन् सत्रे वर्तमाने दैत्याः षट्पुरवासिनः ॥ ९ ॥
निकुम्भाद्याः समागम्य तमूचुर्वरदर्पिताः ।

जब वह यज्ञ चलने लगा, उस समय षट्पुरमें रहनेवाले निकुम्भ आदि दैत्य, जो वर पाकर घमंडमें भरे रहते थे, वहाँ आकर ब्रह्मदत्तसे बोले — ॥ ९ १/२ ॥

कार्यतां यज्ञभागो नः सोमं पास्यामहे वयम् ।
कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु ॥ १० ॥

'हमारे लिये भी यज्ञका भाग निकाला जाय, हमलोग इस यज्ञमे सोमरसका पान करेंगे। यजमान ब्रह्मदत्त हमें अपनी कन्याएँ दें ॥ १० ॥

बह्व्यः सन्त्यस्य कन्याश्च रूपवत्यो महात्मनः ।
आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम् ॥ ११ ॥
रत्नानि च ब्रह्मदत्तो विशिष्टानि ददातु नः ।
अन्यथा तु न यष्टव्यं वयमाज्ञापयामहे ॥ १२ ॥

'हमने सुना है कि इन महात्माके बहुत-सी रूपवती कन्याएँ हैं। उन सबको बुलाकर सब प्रकारसे हमारे लिये दान कर देना चाहिये। ब्रह्मदत्तजी हमें उत्तमोत्तम रत्न प्रदान करें। (तभी ये यहाँ यज्ञ कर सकते हैं) अन्यथा इन्हें यज्ञ नहीं करना चाहिये। यह हम आज्ञा देते हैं' ॥ ११-१२ ॥

एतच्छ्रुत्वा ब्रह्मदत्तस्तानुवाच महासुरान् ।
यज्ञभागो न विहितः पुराणेऽसुरसत्तमाः ॥ १३ ॥
कथं सत्रे सोमपानं शक्यं दातुं मया हि वः ।
पृच्छतेह मुनिश्रेष्ठान् वेदभाष्यार्थकोविदान् ॥ १४ ॥

यह सुनकर ब्रह्मदत्तने उन बड़े-बड़े असुरोंसे कहा— 'असुरशिरोमणियो ! पुरातन वेदमे असुरोंके लिये यज्ञभाग देनेका विधान नहीं है; फिर मैं यज्ञमे आपलोगोंको सोमरस कैसे दे सकता हूँ ? यहाँ वेदके विस्तृत अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ मुनि बैठे है, इनसे पूछ लीजिये ॥ १३-१४ ॥

कन्या हि मम या देयास्ताश्च संकल्पिता मया ।
अन्तर्वेद्यां प्रदातव्याः सदृशानामसंशयम् ॥ १५ ॥

'मुझे अपनी जिन कन्याओका दान करना था, उनका मानसिक संकल्प मैंने कर दिया (वे दूसरोंको दी जा चुकी हैं), अब उन्हें अन्तर्वेदीमें योग्य वरोंके हाथमें सौंप देना है। इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥

रत्नानि तु प्रयच्छामि सान्त्वेनाहं विचिन्त्यताम् ।
बलाम्नैव प्रदास्यामि देवकीपुत्रमाश्रितः ॥ १६ ॥

'अब रही रत्नोंकी बात, उन्हे मैं आपलोगोंको तभी दूँगा, जब आप सान्त्वनापूर्वक बात करें, इस बातको आप अच्छी तरह सोच-समझ लें। बलपूर्वक माँगनेपर मैं कुछ नहीं दूँगा; क्योंकि भगवान् देवकीनन्दनकी शरण ले चुका हूँ (वे ही मेरी रक्षा करेंगे)' ॥ १६ ॥

निकुम्भाद्यास्तु रुषिताः पापाः षट्पुरवासिनः ।
यज्ञवाटं विलुलुठुर्जह्रुः कन्याश्च तास्तथा ॥ १७ ॥

यह उत्तर सुनकर षट्पुरमे निवास करनेवाले निकुम्भ आदि पापी असुर रोषमे भर गये। उन्होंने यज्ञमण्डपको तहस-नहस कर दिया और ब्रह्मदत्तकी कन्याओंको हर लिया ॥

तद् दृष्ट्वा सम्प्रवृत्तं तु दध्यौवानकदुन्दुभिः ।
वासुदेवं महात्मानं बलभद्रं गदं तथा ॥ १८ ॥

यज्ञमण्डपमें वह लूट मची हुई देख वसुदेवने महात्मा श्रीकृष्ण, बलदेव और गदका चिन्तन किया ॥ १८ ॥

विदितार्थस्ततः कृष्णः प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
गच्छ कन्यापरित्राणं कुरु पुत्राशु मायया ॥ १९ ॥
यावद् यादवसैन्येन षट्पुरं याम्यहं प्रभो ।

श्रीकृष्णको तो सब बात ज्ञात ही थी। उन्होंने प्रद्युम्नसे कहा—'बेटा ! जाओ और मायाद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंकी शीघ्र रक्षा करो। प्रभो ! तबतक मैं यादव वीरोंकी सेनाके साथ षट्पुरको चल रहा हूँ' ॥ १९ १/२ ॥

स ययौ षट्पुरं वीरः पितुराज्ञाकरस्तदा ॥ २० ॥
निमेषान्तरमात्रेण गत्वा कामो महाबलः ।
कन्यास्ता मायया धीमानपजह्रे महाबलः ॥ २१ ॥

महाबली कामस्वरूप वीर प्रद्युम्न पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे। वे तत्काल षट्पुरकी ओर चल दिये और पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर उन महाबली बुद्धिमान् वीरने उन कन्याओंका मायाद्वारा अपहरण कर लिया ॥ २०-२१ ॥

मायामयीश्च कृत्वाऽन्या न्यस्तवन् रुक्मिणीसुतः ।
मा भैरिति च धर्मात्मा देवकीमुक्तवांस्तदा ॥ २२ ॥

रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने मायामयी दूसरी कन्याओंका निर्माण करके उन्हें असुरोंके पास छोड़ दिया था। फिर उन धर्मात्माने अपनी पितामही देवकीसे कहा—'दादीजी ! आप भय न करें' ॥ २२ ॥

मायामयीस्ततो हृत्वा सुता ह्यस्य दुरासदाः ।
षट्पुरं विविशुर्दैत्याः परितुष्टा नराधिप ॥ २३ ॥

नरेश्वर ! ब्रह्मदत्तकी पुत्रियाँ दैत्योंके लिये दुष्प्राप्य थीं। वे मायामयी कन्याओंका ही अपहरण करके षट्पुरमें जा घुसे और अपनी सफलतापर संतुष्ट हुए ॥ २३ ॥