विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मिलेगा। परंतु दूर देशमें निवास करनेपर तुम्हारा भला नहीं होगा। यह वर मैं दे रहा हूँ ॥ ३० ॥
श्वेतवाहननामानं यश्च मां पूजयिष्यति।
सर्वतो भयचित्तोऽपि गतिं स मम यास्यति ॥ ३१ ॥
'जो श्वेतवाहन नामसे मेरी पूजा करेगा, वह सब ओरसे भयभीत-चित्त होनेपर भी मेरी ही गतिको प्राप्त होगा॥
औदुम्बरान् वाटमूलान् द्विजान् कापित्थिकानपि।
तथा सृगालवाटीयान् धर्मात्मानो दृढव्रतान् ॥ ३२ ॥
मुनींश्च ब्रह्मवादीयान् सविशेषेण ये नराः।
पूजयिष्यन्ति सततं ते यास्यन्तीप्सितां गतिम् ॥ ३३ ॥
'जो मनुष्य औदुम्बर<sup>१</sup>, वाटमूल<sup>२</sup>, कापित्थिक<sup>३</sup>, सृगालवाटीय<sup>४</sup>, धर्मात्मा दृढव्रत एवं ब्रह्मवादी मुनियोंका सदा विशेषरूपसे पूजन करेंगे, वे मनोवाञ्छित गतिको प्राप्त होंगे'॥
इत्युक्त्वाथ महादेवो भगवान्श्वेतवाहनः।
तैरेव सहितः सर्वै रुद्रलोकं जगाम वै ॥ ३४ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्वेतवाहन महादेव उन सबके साथ रुद्रलोकमें चले गये ॥ ३४ ॥
जम्बूमागं गमिष्यामि जम्बूमागे वसाम्यहम्।
एवं संकल्पमानोऽपि रुद्रलोके महीयते ॥ ३५ ॥
'मैं जम्बू-मार्गको जाऊँगा, मैं जम्बू-मार्गपर निवास करूँगा' इस तरह मनमें संकल्प करनेवाला मनुष्य भी रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
ब्रह्मदत्तके यज्ञमें वसुदेव-देवकीका आगमन, दैत्योंद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंका अपहरण और प्रद्युम्नद्वारा उनकी रक्षा, नारदजीके कहनेसे दैत्योंका क्षत्रियनरेशोंको अपने पक्षमें मिलाना तथा श्रीकृष्णका षट्पुरमें आगमन
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित्।
ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः ॥ १ ॥
ब्रह्मदत्तेति विख्यातो विप्रो वाजसनेयिवान्।
अश्वमेधः कृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः ॥ २ ॥
स संवत्सरदीक्षायां दीक्षितः षट्पुरालयः।
आवर्तायाः शुभे तीरे सुनद्या मुनिजुष्ट्या ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय चारों वेदों और छहों अङ्गोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण, जिनका नाम ब्रह्मदत्त था, एक वर्षतक चालू रहनेवाले यज्ञकी दीक्षामें दीक्षित हुए। ब्रह्मदत्त याज्ञवल्क्यके शिष्य, धर्मसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न तथा शुक्ल यजुर्वेद—वाजसनेय संहिताके अध्येता थे। उनका घर भी षट्पुरमे ही था। उन्होंने कभी बुद्धिमान् वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ कराया था ! वे मुनिसेवित श्रेष्ठ नदी आवर्ताके पवित्र तटपर यज्ञ करते थे ॥ १–३ ॥
सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्विजोत्तमः।
उपाध्यायश्च कौरव्य क्षीरहोता महात्मनः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन ! द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्त महात्मा वसुदेवजीके सहपाठी, सखा, उपाध्याय और अध्वर्यु भी थे ॥ ४ ॥
वसुदेवस्तत्र यातो देवक्या सहितः प्रभो।
यजमानं षट्पुरस्थं यथा शक्रो वृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
प्रभो ! इसीलिये जैसे इन्द्र बृहस्पतिके यहाँ जाते हैं, उसी प्रकार देवकीसहित वसुदेवजी वहाँ षट्पुरमें रहकर यज्ञ करनेवाले ब्रह्मदत्तके यहाँ निमन्त्रित होकर गये थे ॥ ५ ॥
तत् सत्रं ब्रह्मदत्तस्य वह्वन्नं बहुदक्षिणम्।
उपासन्ति मुनिश्रेष्ठा महात्मानो दृढव्रताः ॥ ६ ॥
ब्रह्मदत्तका वह यज्ञ बहुत-से अन्न और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न था। दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा उस यज्ञका सेवन करते थे ॥ ६ ॥
व्यासोऽहं याज्ञवल्क्यश्च सुमन्तुर्जैमिनिस्तथा।
धृतिमाञ्जावलिश्चैव देवलाद्याश्च भारत ॥ ७ ॥
ऋद्ध्यानुरूपया युक्तं वसुदेवस्य धीमतः।
यत्रेप्सितान् ददौ कामान् देवकी धर्मचारिणी ॥ ८ ॥
वासुदेवप्रभावेण जगत्स्रष्टुर्महीतले।
१. उदुम्बर (गूलर) वृक्षका आश्रय लेकर रहनेवाले मुनिकी औदुम्बर संज्ञा है।
२. वटवृक्षकी जड़में निवास करनेवालोंको वाटमूल कहा गया है।
३. कपित्थ वृक्षका आश्रय लेनेवाले कापित्थिक कहलाते हैं।
४. सृगाल नामक वृक्षकी वाटिकामें वास करनेवालेको सृगालवाटीय कहा गया है।