विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्व्यशीतितमोऽध्यायः ५३९
ते नेषुस्तत्र केचित् तु दुरात्मानो महासुराः।
अथेषुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावनाः॥ १५॥
उमासहित महेश्वर देव आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। उनसे द्रोह रखकर जो असुर स्वर्गमें सुखपूर्वक रहना चाहते थे, उन दुरात्मा महान् असुरोंने तो वर लेनेकी इच्छा नहीं की; परंतु राजन् ! जो दूसरे असुर भव्य भावनासे सम्पन्न (दूरदर्शी) अथवा भगवान् शिवकी महिमाके ज्ञाता थे, उन्होंने वर लेनेकी अभिलाषा व्यक्त की ॥ १४-१५॥
नेषुर्यं सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामहः।
वरयध्वं वरं वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः ॥ १६॥
जिन दुरात्माओंने वर लेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे पितामह ब्रह्माने फिर कहा—'वीर असुरो ! तुम भगवान् रुद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर माँग लो।'॥
ते ऊचुः सर्वदेवानामावध्याः स्याम हे विभो।
पुराणि षट् च नो देव भवन्त्वन्तर्महीतले ॥ १७॥
सर्वकामसमृद्धार्थं षट्पुरं चास्तु नः प्रभो ।
वयं च षट्पुरं गत्वा वसेम च सुखं विभो ॥ १८ ॥
तब उन्होंने कहा—'विभो! हम सब देवताओंके लिये अवध्य हों। देव! पृथ्वीके भीतर हमारे छः पुर हों। प्रभो! हमारे वे छहों पुर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंकी समृद्धिसे सम्पन्न हों । भगवन् ! हम षट्पुरमें जाकर सुखपूर्वक निवास करें ॥ १७-१८ ॥
रुद्रादुग्रं भयं न स्याद् येन नो ज्ञातयो हताः।
निहतं त्रिपुरं दृष्ट्वा भीताः स्म तपसां निधे ॥ १९॥
'तपोनिधे ! जिन्होंने हमारे बन्धु-बान्धवोंको मार डाला है, उन रुद्रदेवसे हमें उग्र भय प्राप्त न हो; क्योंकि त्रिपुरोंका विनाश देखकर हम भयभीत हो गये हैं' ॥ १९ ॥
पितामह उवाच
असुरा भवतावध्या देवानां शङ्करस्य च।
न बाधिष्यथ चेद् विप्रान् सत्पथस्थान् सतां प्रियान् ॥२०॥
पितामह बोले—असुरो ! तुम देवताओं तथा भगवान् शङ्करके लिये अवध्य हो जाओगे। परंतु ऐसा तभी होगा, जब तुम सन्मार्गपर सुस्थिर रहनेवाले सत्पुरुषोंके प्रिय ब्राह्मणों-को बाधा नहीं पहुँचाओगे ॥ २० ॥
विप्रोपघातं मोहाच्चेत् करिष्यथ कथंचन ।
नाशं यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः ॥ २१ ॥
यदि मोहवश किसी तरह ब्राह्मणोंकी हत्या करोगे तो नष्ट हो जाओगे; क्योंकि ब्राह्मण जगत्के परम आश्रय हैं ॥
नारायणाद् विभेतव्यं कुर्वद्भिर्ब्राह्मणाहितम् ।
सर्वभूतेषु भगवान् हितं धत्ते जनार्दनः ॥ २२॥
ब्राह्मणोंका अहित करनेवाले पुरुषोंको भगवान् नारायणसे डरना चाहिये । क्योंकि वे भगवान् जनार्दन समस्त भूतोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हैं ॥ २२ ॥
ते गता असुरा राजन् ब्रह्मणाथ विसर्जिताः ।
येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिणः ॥ २३ ॥
स्वयं हि दर्शनं तेषां ददौ त्रिपुरनाशनः ।
श्वेतं वृषभमारुह्य सोमः सप्रवरः प्रभुः ।
उवाचेदं च भगवानसुरान् स सतां गतिः ॥ २४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर ब्रह्माजीके विदा देनेपर वे असुर चले गये तथा जो दूसरे असुर धर्मचरणमें तत्पर रहनेवाले और महादेवजीके भक्त थे, उन्हें त्रिपुरविनाशन भगवान् महादेवजीने उमासहित श्वेत वृषभपर आरूढ़ होकर अपने पार्षदोंके साथ आ स्वयं ही दर्शन दिया तथा सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवने उन असुरोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३-२४ ॥
वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः।
मामेव चाश्रितास्तस्माद् वरं साधु ददामि वः ॥ २५ ॥
'असुरशिरोमणियो ! तुमने वैर, दम्भ और हिंसाका परित्याग करके जो केवल मेरा ही आश्रय लिया है, इससे मैं तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर प्रदान करता हूँ ॥ २५ ॥
यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सत्क्रियापरमैर्द्विजैः ।
सह तैर्गम्यतां स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा ॥ २६ ॥
'जिन सत्कर्मपरायण ब्रह्मर्षियोंने तुम्हें मेरी भक्तिकी दीक्षा दी है, उनके साथ ही तुम सब लोग स्वर्गलोकमें चले जाओ। मैं तुम्हारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २६ ॥
इह ये चैव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः ।
अपि कापित्थिका वृक्षे तेषां लोको यथा मम ॥ २७ ॥
'जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ वृक्षके पास निवास करेंगे, वे कापित्थिक कहलायेंगे और उन्हें मेरे समान लोक प्राप्त होगा ॥ २७ ॥
इह मासान्तपक्षान्तौ यः करिष्यति मानवः ।
वानप्रस्थेन विधिना पूजयन् मां तपोधनाः ॥ २८ ॥
वर्षाणां स सहस्रं तु तपसां प्राप्स्यते फलम् ।
कृत्वा त्रिरात्रं विधिवल्लप्स्यते चेप्सितां गतिम् ॥ २९ ॥
'तपोधनो ! जो मनुष्य अमावास्या और पूर्णिमाके दिन वानप्रस्थ विधिसे मेरी पूजा करता हुआ यहाँ निवास करेगा, वह सहस्र वर्षतक तपस्या करनेका फल पा लेगा तथा विधि-पूर्वक तीन राततक निवास करनेसे उसको मनोवाञ्छित गतिकी प्राप्ति होगी ॥ २८-२९ ॥
अर्कद्वीपे निवसतौ द्विगुणं तद् भविष्यति ।
न विदेशे च भद्रं वो वरमेतद् ददाम्यहम् ॥ ३० ॥
'अर्कद्वीपमें निवास करनेवालेको उससे दूना फल