भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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५३८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

द्व्यशीतितमोऽध्यायः*

षट्पुरवासी असुरोंका संक्षिप्त परिचय, उन्हें ब्रह्मा और भगवान् शिवका वरदान

जनमेजय उवाच

वैशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन।
पारिजातस्य हरणे षट्पुरं परिकीर्तितम्॥ १॥

जनमेजयने कहा—धर्मज्ञ! व्यासशिष्य! तपोधन! वैशम्पायनजी! आपने पारिजातहरणके प्रसंगमें ‘षट्पुर’ की चर्चा की थी॥ १॥

निवासोऽसुरमुख्यानां दारुणानां तपोधन।
तेषां वधं मुनिश्रेष्ठ कीर्तयस्वान्धकस्य च॥ २॥

तपोधन! आपने कहा था कि वह नगर बड़े-बड़े भयंकर असुरोंका स्थान था। मुनिश्रेष्ठ! आप उन षट्पुरनिवासी दैत्यों तथा अन्धकासुरके वधका वर्णन कीजिये॥ २॥

वैशम्पायन उवाच

त्रिपुरे निहते वीर रुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा।
तत्र प्रधाना बहवो बभूवुरसुरोत्तमाः॥ ३॥
शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः।
षष्टिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च॥ ४॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वीर! अनायास ही समस्त कर्म करनेवाले रुद्रदेवके द्वारा जब दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश किया गया, उस समय वहाँ बहुत-से प्रधान-प्रधान असुर-शिरोमणि शेष रह गये। वे त्रिपुरनिवासी होनेपर भी रुद्रदेवके बाणोंकी आगसे दग्ध न हो सके। उनकी संख्या लगभग साठ लाख थी॥ ३-४॥

ते ज्ञातिवधसंतप्ताश्चक्रुर्वीराः पुरा तपः।
जम्बूमार्गे सतामिष्टे महर्षिगणसेविते॥ ५॥

उन असुर वीरोंने पूर्वकालमें अपने बन्धु-बान्धवोंके वधसे संतप्त होकर महर्षिगणोंसे सेवित तथा सत्पुरुषोंके प्रिय जम्बूमार्गमें जाकर तपस्या आरम्भ की॥ ५॥

आदित्याभिमुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः।
वायुभक्षा नृपश्रेष्ठ स्तुवन्तः पद्मसम्भवम्॥ ६॥

नृपश्रेष्ठ! वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर मुँह करके वायुके आहारपर रहकर एक लाख वर्षोंतक कमलयोनि ब्रह्माजीकी स्तुति करते रहे॥ ६॥

तेषामुदुम्बरं राजन् गण एकः समाश्रितः।
वृक्षं तत्रावसन् वीरास्ते कुर्वन्तो महत् तपः॥ ७॥

राजन्! उन दैत्योंमें एक दल ऐसा था, जो गूलरके वृक्षका आश्रय लेकर रहता था। वे वीर दैत्य वहाँ महान् तप करते हुए निवास करते थे॥ ७॥

कपित्थवृक्षमाश्रित्य केचित् तत्रोपिताः पुरा।
सृगालवाटीस्त्वपरे चेरुरुग्रं तथा तपः॥ ८॥

पूर्वकालमें उन दैत्योंमेंसे कुछ लोग कपित्थ (कैथ) वृक्षका आश्रय लेकर वहाँ रहते थे और दूसरे सियारोंकी माँदोंमें रहकर वहाँ उग्र तपस्या करते थे (अथवा सृगालनामक वृक्ष-विशेषकी वाटिकाओंमें रहकर तपस्या करते थे)॥ ८॥

वटमूले तथा चेरुस्तपः कौरवनन्दन।
अधीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वासुरात्मजाः॥ ९॥

कौरवनन्दन! कुछ असुरकुमार वट-वृक्षकी जड़में रहते और उस वृक्षपर चढ़कर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए तपस्या करते थे॥ ९॥

तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेव पितामहः।
वरं दातुं सुरश्रेष्ठः प्राप्तो धर्मभृतां वरः॥ १०॥

नरदेव! कुछ कालके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजास्रष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संतुष्ट हो उन्हें वर देनेके लिये वहाँ आये॥ १०॥

वरं वरयतेत्युक्तास्ते राजन् पद्मयोनिना।
नेषुस्तद्वरदानं तु द्विषन्तस्त्र्यम्बकं विभुम्॥ ११॥

राजन्! कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—'वर माँगो'। तब उन्होंने भगवान् त्रिनेत्रधारी रुद्रसे द्वेष रखनेके कारण वरदान लेनेकी इच्छा नहीं की॥ ११॥

इच्छन्तोऽपचितिं गन्तुं ज्ञातीनां कुरुनन्दन।
तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वज्ञः कुरुनन्दन॥ १२॥

कुरुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन! वे रुद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मारे गये अपने भाई-बन्धुओंके ऋणसे उऋण होना चाहते थे। तब सर्वज्ञ ब्रह्माजीने उनसे कहा—॥ १२॥

विश्वस्य जगतः कर्तुः संहर्तुश्च महात्मनः।
कः शक्तोऽपचितिं गन्तुं मास्तु वोऽत्र वृथा श्रमः॥ १३॥

जो सम्पूर्ण जगत्‌के कर्ता और संहर्ता हैं, उन महात्मा भगवान् शङ्करसे बदला लेनेमें कौन समर्थ है? इस विषयमें तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं उठाना चाहिये॥ १३॥

अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः।
तमासूय सुखं स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति येऽसुराः॥ १४॥


* पूनावाली प्रतिकी मान्यताके अनुसार यहाँसे हरिवंशका उत्तरार्ध भाग आरम्भ होता है।