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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

५३८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

द्व्यशीतितमोऽध्यायः*

षट्पुरवासी असुरोंका संक्षिप्त परिचय, उन्हें ब्रह्मा और भगवान् शिवका वरदान

जनमेजय उवाच

वैशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन।
पारिजातस्य हरणे षट्पुरं परिकीर्तितम्॥ १॥

जनमेजयने कहा—धर्मज्ञ! व्यासशिष्य! तपोधन! वैशम्पायनजी! आपने पारिजातहरणके प्रसंगमें ‘षट्पुर’ की चर्चा की थी॥ १॥

निवासोऽसुरमुख्यानां दारुणानां तपोधन।
तेषां वधं मुनिश्रेष्ठ कीर्तयस्वान्धकस्य च॥ २॥

तपोधन! आपने कहा था कि वह नगर बड़े-बड़े भयंकर असुरोंका स्थान था। मुनिश्रेष्ठ! आप उन षट्पुरनिवासी दैत्यों तथा अन्धकासुरके वधका वर्णन कीजिये॥ २॥

वैशम्पायन उवाच

त्रिपुरे निहते वीर रुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा।
तत्र प्रधाना बहवो बभूवुरसुरोत्तमाः॥ ३॥
शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः।
षष्टिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च॥ ४॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वीर! अनायास ही समस्त कर्म करनेवाले रुद्रदेवके द्वारा जब दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश किया गया, उस समय वहाँ बहुत-से प्रधान-प्रधान असुर-शिरोमणि शेष रह गये। वे त्रिपुरनिवासी होनेपर भी रुद्रदेवके बाणोंकी आगसे दग्ध न हो सके। उनकी संख्या लगभग साठ लाख थी॥ ३-४॥

ते ज्ञातिवधसंतप्ताश्चक्रुर्वीराः पुरा तपः।
जम्बूमार्गे सतामिष्टे महर्षिगणसेविते॥ ५॥

उन असुर वीरोंने पूर्वकालमें अपने बन्धु-बान्धवोंके वधसे संतप्त होकर महर्षिगणोंसे सेवित तथा सत्पुरुषोंके प्रिय जम्बूमार्गमें जाकर तपस्या आरम्भ की॥ ५॥

आदित्याभिमुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः।
वायुभक्षा नृपश्रेष्ठ स्तुवन्तः पद्मसम्भवम्॥ ६॥

नृपश्रेष्ठ! वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर मुँह करके वायुके आहारपर रहकर एक लाख वर्षोंतक कमलयोनि ब्रह्माजीकी स्तुति करते रहे॥ ६॥

तेषामुदुम्बरं राजन् गण एकः समाश्रितः।
वृक्षं तत्रावसन् वीरास्ते कुर्वन्तो महत् तपः॥ ७॥

राजन्! उन दैत्योंमें एक दल ऐसा था, जो गूलरके वृक्षका आश्रय लेकर रहता था। वे वीर दैत्य वहाँ महान् तप करते हुए निवास करते थे॥ ७॥

कपित्थवृक्षमाश्रित्य केचित् तत्रोपिताः पुरा।
सृगालवाटीस्त्वपरे चेरुरुग्रं तथा तपः॥ ८॥

पूर्वकालमें उन दैत्योंमेंसे कुछ लोग कपित्थ (कैथ) वृक्षका आश्रय लेकर वहाँ रहते थे और दूसरे सियारोंकी माँदोंमें रहकर वहाँ उग्र तपस्या करते थे (अथवा सृगालनामक वृक्ष-विशेषकी वाटिकाओंमें रहकर तपस्या करते थे)॥ ८॥

वटमूले तथा चेरुस्तपः कौरवनन्दन।
अधीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वासुरात्मजाः॥ ९॥

कौरवनन्दन! कुछ असुरकुमार वट-वृक्षकी जड़में रहते और उस वृक्षपर चढ़कर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए तपस्या करते थे॥ ९॥

तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेव पितामहः।
वरं दातुं सुरश्रेष्ठः प्राप्तो धर्मभृतां वरः॥ १०॥

नरदेव! कुछ कालके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजास्रष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संतुष्ट हो उन्हें वर देनेके लिये वहाँ आये॥ १०॥

वरं वरयतेत्युक्तास्ते राजन् पद्मयोनिना।
नेषुस्तद्वरदानं तु द्विषन्तस्त्र्यम्बकं विभुम्॥ ११॥

राजन्! कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—'वर माँगो'। तब उन्होंने भगवान् त्रिनेत्रधारी रुद्रसे द्वेष रखनेके कारण वरदान लेनेकी इच्छा नहीं की॥ ११॥

इच्छन्तोऽपचितिं गन्तुं ज्ञातीनां कुरुनन्दन।
तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वज्ञः कुरुनन्दन॥ १२॥

कुरुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन! वे रुद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मारे गये अपने भाई-बन्धुओंके ऋणसे उऋण होना चाहते थे। तब सर्वज्ञ ब्रह्माजीने उनसे कहा—॥ १२॥

विश्वस्य जगतः कर्तुः संहर्तुश्च महात्मनः।
कः शक्तोऽपचितिं गन्तुं मास्तु वोऽत्र वृथा श्रमः॥ १३॥

जो सम्पूर्ण जगत्‌के कर्ता और संहर्ता हैं, उन महात्मा भगवान् शङ्करसे बदला लेनेमें कौन समर्थ है? इस विषयमें तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं उठाना चाहिये॥ १३॥

अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः।
तमासूय सुखं स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति येऽसुराः॥ १४॥


* पूनावाली प्रतिकी मान्यताके अनुसार यहाँसे हरिवंशका उत्तरार्ध भाग आरम्भ होता है।

विष्णुपर्व ] द्व्यशीतितमोऽध्यायः ५३९

ते नेषुस्तत्र केचित् तु दुरात्मानो महासुराः।
अथेषुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावनाः॥ १५॥
उमासहित महेश्वर देव आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। उनसे द्रोह रखकर जो असुर स्वर्गमें सुखपूर्वक रहना चाहते थे, उन दुरात्मा महान् असुरोंने तो वर लेनेकी इच्छा नहीं की; परंतु राजन् ! जो दूसरे असुर भव्य भावनासे सम्पन्न (दूरदर्शी) अथवा भगवान् शिवकी महिमाके ज्ञाता थे, उन्होंने वर लेनेकी अभिलाषा व्यक्त की ॥ १४-१५॥
नेषुर्यं सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामहः।
वरयध्वं वरं वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः ॥ १६॥
जिन दुरात्माओंने वर लेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे पितामह ब्रह्माने फिर कहा—'वीर असुरो ! तुम भगवान् रुद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर माँग लो।'॥
ते ऊचुः सर्वदेवानामावध्याः स्याम हे विभो।
पुराणि षट् च नो देव भवन्त्वन्तर्महीतले ॥ १७॥
सर्वकामसमृद्धार्थं षट्पुरं चास्तु नः प्रभो ।
वयं च षट्पुरं गत्वा वसेम च सुखं विभो ॥ १८ ॥
तब उन्होंने कहा—'विभो! हम सब देवताओंके लिये अवध्य हों। देव! पृथ्वीके भीतर हमारे छः पुर हों। प्रभो! हमारे वे छहों पुर सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंकी समृद्धिसे सम्पन्न हों । भगवन् ! हम षट्पुरमें जाकर सुखपूर्वक निवास करें ॥ १७-१८ ॥
रुद्रादुग्रं भयं न स्याद् येन नो ज्ञातयो हताः।
निहतं त्रिपुरं दृष्ट्वा भीताः स्म तपसां निधे ॥ १९॥
'तपोनिधे ! जिन्होंने हमारे बन्धु-बान्धवोंको मार डाला है, उन रुद्रदेवसे हमें उग्र भय प्राप्त न हो; क्योंकि त्रिपुरोंका विनाश देखकर हम भयभीत हो गये हैं' ॥ १९ ॥
पितामह उवाच
असुरा भवतावध्या देवानां शङ्करस्य च।
न बाधिष्यथ चेद् विप्रान् सत्पथस्थान् सतां प्रियान् ॥२०॥
पितामह बोले—असुरो ! तुम देवताओं तथा भगवान् शङ्करके लिये अवध्य हो जाओगे। परंतु ऐसा तभी होगा, जब तुम सन्मार्गपर सुस्थिर रहनेवाले सत्पुरुषोंके प्रिय ब्राह्मणों-को बाधा नहीं पहुँचाओगे ॥ २० ॥
विप्रोपघातं मोहाच्चेत् करिष्यथ कथंचन ।
नाशं यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः ॥ २१ ॥
यदि मोहवश किसी तरह ब्राह्मणोंकी हत्या करोगे तो नष्ट हो जाओगे; क्योंकि ब्राह्मण जगत्के परम आश्रय हैं ॥
नारायणाद् विभेतव्यं कुर्वद्भिर्ब्राह्मणाहितम् ।
सर्वभूतेषु भगवान् हितं धत्ते जनार्दनः ॥ २२॥
ब्राह्मणोंका अहित करनेवाले पुरुषोंको भगवान् नारायणसे डरना चाहिये । क्योंकि वे भगवान् जनार्दन समस्त भूतोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हैं ॥ २२ ॥
ते गता असुरा राजन् ब्रह्मणाथ विसर्जिताः ।
येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिणः ॥ २३ ॥
स्वयं हि दर्शनं तेषां ददौ त्रिपुरनाशनः ।
श्वेतं वृषभमारुह्य सोमः सप्रवरः प्रभुः ।
उवाचेदं च भगवानसुरान् स सतां गतिः ॥ २४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर ब्रह्माजीके विदा देनेपर वे असुर चले गये तथा जो दूसरे असुर धर्मचरणमें तत्पर रहनेवाले और महादेवजीके भक्त थे, उन्हें त्रिपुरविनाशन भगवान् महादेवजीने उमासहित श्वेत वृषभपर आरूढ़ होकर अपने पार्षदोंके साथ आ स्वयं ही दर्शन दिया तथा सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवने उन असुरोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३-२४ ॥
वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः।
मामेव चाश्रितास्तस्माद् वरं साधु ददामि वः ॥ २५ ॥
'असुरशिरोमणियो ! तुमने वैर, दम्भ और हिंसाका परित्याग करके जो केवल मेरा ही आश्रय लिया है, इससे मैं तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर प्रदान करता हूँ ॥ २५ ॥
यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सत्क्रियापरमैर्द्विजैः ।
सह तैर्गम्यतां स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा ॥ २६ ॥
'जिन सत्कर्मपरायण ब्रह्मर्षियोंने तुम्हें मेरी भक्तिकी दीक्षा दी है, उनके साथ ही तुम सब लोग स्वर्गलोकमें चले जाओ। मैं तुम्हारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २६ ॥
इह ये चैव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः ।
अपि कापित्थिका वृक्षे तेषां लोको यथा मम ॥ २७ ॥
'जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ वृक्षके पास निवास करेंगे, वे कापित्थिक कहलायेंगे और उन्हें मेरे समान लोक प्राप्त होगा ॥ २७ ॥
इह मासान्तपक्षान्तौ यः करिष्यति मानवः ।
वानप्रस्थेन विधिना पूजयन् मां तपोधनाः ॥ २८ ॥
वर्षाणां स सहस्रं तु तपसां प्राप्स्यते फलम् ।
कृत्वा त्रिरात्रं विधिवल्लप्स्यते चेप्सितां गतिम् ॥ २९ ॥
'तपोधनो ! जो मनुष्य अमावास्या और पूर्णिमाके दिन वानप्रस्थ विधिसे मेरी पूजा करता हुआ यहाँ निवास करेगा, वह सहस्र वर्षतक तपस्या करनेका फल पा लेगा तथा विधि-पूर्वक तीन राततक निवास करनेसे उसको मनोवाञ्छित गतिकी प्राप्ति होगी ॥ २८-२९ ॥
अर्कद्वीपे निवसतौ द्विगुणं तद् भविष्यति ।
न विदेशे च भद्रं वो वरमेतद् ददाम्यहम् ॥ ३० ॥
'अर्कद्वीपमें निवास करनेवालेको उससे दूना फल

५४०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मिलेगा। परंतु दूर देशमें निवास करनेपर तुम्हारा भला नहीं होगा। यह वर मैं दे रहा हूँ ॥ ३० ॥

श्वेतवाहननामानं यश्च मां पूजयिष्यति।
सर्वतो भयचित्तोऽपि गतिं स मम यास्यति ॥ ३१ ॥
'जो श्वेतवाहन नामसे मेरी पूजा करेगा, वह सब ओरसे भयभीत-चित्त होनेपर भी मेरी ही गतिको प्राप्त होगा॥

औदुम्बरान् वाटमूलान् द्विजान् कापित्थिकानपि।
तथा सृगालवाटीयान् धर्मात्मानो दृढव्रतान् ॥ ३२ ॥
मुनींश्च ब्रह्मवादीयान् सविशेषेण ये नराः।
पूजयिष्यन्ति सततं ते यास्यन्तीप्सितां गतिम् ॥ ३३ ॥
'जो मनुष्य औदुम्बर<sup></sup>, वाटमूल<sup></sup>, कापित्थिक<sup></sup>, सृगालवाटीय<sup></sup>, धर्मात्मा दृढव्रत एवं ब्रह्मवादी मुनियोंका सदा विशेषरूपसे पूजन करेंगे, वे मनोवाञ्छित गतिको प्राप्त होंगे'॥

इत्युक्त्वाथ महादेवो भगवान्श्वेतवाहनः।
तैरेव सहितः सर्वै रुद्रलोकं जगाम वै ॥ ३४ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्वेतवाहन महादेव उन सबके साथ रुद्रलोकमें चले गये ॥ ३४ ॥

जम्बूमागं गमिष्यामि जम्बूमागे वसाम्यहम्।
एवं संकल्पमानोऽपि रुद्रलोके महीयते ॥ ३५ ॥
'मैं जम्बू-मार्गको जाऊँगा, मैं जम्बू-मार्गपर निवास करूँगा' इस तरह मनमें संकल्प करनेवाला मनुष्य भी रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३५ ॥

इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥


त्र्यशीतितमोऽध्यायः

ब्रह्मदत्तके यज्ञमें वसुदेव-देवकीका आगमन, दैत्योंद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंका अपहरण और प्रद्युम्नद्वारा उनकी रक्षा, नारदजीके कहनेसे दैत्योंका क्षत्रियनरेशोंको अपने पक्षमें मिलाना तथा श्रीकृष्णका षट्पुरमें आगमन

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित्।
ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः ॥ १ ॥
ब्रह्मदत्तेति विख्यातो विप्रो वाजसनेयिवान्।
अश्वमेधः कृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः ॥ २ ॥
स संवत्सरदीक्षायां दीक्षितः षट्पुरालयः।
आवर्तायाः शुभे तीरे सुनद्या मुनिजुष्ट्या ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय चारों वेदों और छहों अङ्गोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण, जिनका नाम ब्रह्मदत्त था, एक वर्षतक चालू रहनेवाले यज्ञकी दीक्षामें दीक्षित हुए। ब्रह्मदत्त याज्ञवल्क्यके शिष्य, धर्मसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न तथा शुक्ल यजुर्वेद—वाजसनेय संहिताके अध्येता थे। उनका घर भी षट्पुरमे ही था। उन्होंने कभी बुद्धिमान् वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ कराया था ! वे मुनिसेवित श्रेष्ठ नदी आवर्ताके पवित्र तटपर यज्ञ करते थे ॥ १–३ ॥

सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्विजोत्तमः।
उपाध्यायश्च कौरव्य क्षीरहोता महात्मनः ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन ! द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्त महात्मा वसुदेवजीके सहपाठी, सखा, उपाध्याय और अध्वर्यु भी थे ॥ ४ ॥

वसुदेवस्तत्र यातो देवक्या सहितः प्रभो।
यजमानं षट्पुरस्थं यथा शक्रो वृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
प्रभो ! इसीलिये जैसे इन्द्र बृहस्पतिके यहाँ जाते हैं, उसी प्रकार देवकीसहित वसुदेवजी वहाँ षट्पुरमें रहकर यज्ञ करनेवाले ब्रह्मदत्तके यहाँ निमन्त्रित होकर गये थे ॥ ५ ॥

तत् सत्रं ब्रह्मदत्तस्य वह्वन्नं बहुदक्षिणम्।
उपासन्ति मुनिश्रेष्ठा महात्मानो दृढव्रताः ॥ ६ ॥
ब्रह्मदत्तका वह यज्ञ बहुत-से अन्न और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न था। दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा उस यज्ञका सेवन करते थे ॥ ६ ॥

व्यासोऽहं याज्ञवल्क्यश्च सुमन्तुर्जैमिनिस्तथा।
धृतिमाञ्जावलिश्चैव देवलाद्याश्च भारत ॥ ७ ॥
ऋद्ध्यानुरूपया युक्तं वसुदेवस्य धीमतः।
यत्रेप्सितान् ददौ कामान् देवकी धर्मचारिणी ॥ ८ ॥
वासुदेवप्रभावेण जगत्स्रष्टुर्महीतले।


१. उदुम्बर (गूलर) वृक्षका आश्रय लेकर रहनेवाले मुनिकी औदुम्बर संज्ञा है।
२. वटवृक्षकी जड़में निवास करनेवालोंको वाटमूल कहा गया है।
३. कपित्थ वृक्षका आश्रय लेनेवाले कापित्थिक कहलाते हैं।
४. सृगाल नामक वृक्षकी वाटिकामें वास करनेवालेको सृगालवाटीय कहा गया है।

[विष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ५४१


भरतनन्दन ! वह यज्ञ बुद्धिमान् वसुदेवजीकी अनुरूप समृद्धिसे युक्त था। उसमें मै, मेरे गुरु व्यासजी, याज्ञवल्क्य मुनि, सुमन्तु, जैमिनि, धैर्यशील जावलि (या जावालि) तथा देवल आदि महर्षि भी उपस्थित थे। उस यज्ञमें धर्म-परायणा देवकी देवी जगत्स्स्रष्टा भगवान् वासुदेवके प्रभावसे इस पृथ्वीपर सबको मनोवाञ्छित पदार्थ दान करती थीं ॥ ७-८ १/२ ॥

तस्मिन् सत्रे वर्तमाने दैत्याः षट्पुरवासिनः ॥ ९ ॥
निकुम्भाद्याः समागम्य तमूचुर्वरदर्पिताः ।

जब वह यज्ञ चलने लगा, उस समय षट्पुरमें रहनेवाले निकुम्भ आदि दैत्य, जो वर पाकर घमंडमें भरे रहते थे, वहाँ आकर ब्रह्मदत्तसे बोले — ॥ ९ १/२ ॥

कार्यतां यज्ञभागो नः सोमं पास्यामहे वयम् ।
कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु ॥ १० ॥

'हमारे लिये भी यज्ञका भाग निकाला जाय, हमलोग इस यज्ञमे सोमरसका पान करेंगे। यजमान ब्रह्मदत्त हमें अपनी कन्याएँ दें ॥ १० ॥

बह्व्यः सन्त्यस्य कन्याश्च रूपवत्यो महात्मनः ।
आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम् ॥ ११ ॥
रत्नानि च ब्रह्मदत्तो विशिष्टानि ददातु नः ।
अन्यथा तु न यष्टव्यं वयमाज्ञापयामहे ॥ १२ ॥

'हमने सुना है कि इन महात्माके बहुत-सी रूपवती कन्याएँ हैं। उन सबको बुलाकर सब प्रकारसे हमारे लिये दान कर देना चाहिये। ब्रह्मदत्तजी हमें उत्तमोत्तम रत्न प्रदान करें। (तभी ये यहाँ यज्ञ कर सकते हैं) अन्यथा इन्हें यज्ञ नहीं करना चाहिये। यह हम आज्ञा देते हैं' ॥ ११-१२ ॥

एतच्छ्रुत्वा ब्रह्मदत्तस्तानुवाच महासुरान् ।
यज्ञभागो न विहितः पुराणेऽसुरसत्तमाः ॥ १३ ॥
कथं सत्रे सोमपानं शक्यं दातुं मया हि वः ।
पृच्छतेह मुनिश्रेष्ठान् वेदभाष्यार्थकोविदान् ॥ १४ ॥

यह सुनकर ब्रह्मदत्तने उन बड़े-बड़े असुरोंसे कहा— 'असुरशिरोमणियो ! पुरातन वेदमे असुरोंके लिये यज्ञभाग देनेका विधान नहीं है; फिर मैं यज्ञमे आपलोगोंको सोमरस कैसे दे सकता हूँ ? यहाँ वेदके विस्तृत अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ मुनि बैठे है, इनसे पूछ लीजिये ॥ १३-१४ ॥

कन्या हि मम या देयास्ताश्च संकल्पिता मया ।
अन्तर्वेद्यां प्रदातव्याः सदृशानामसंशयम् ॥ १५ ॥

'मुझे अपनी जिन कन्याओका दान करना था, उनका मानसिक संकल्प मैंने कर दिया (वे दूसरोंको दी जा चुकी हैं), अब उन्हें अन्तर्वेदीमें योग्य वरोंके हाथमें सौंप देना है। इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥

रत्नानि तु प्रयच्छामि सान्त्वेनाहं विचिन्त्यताम् ।
बलाम्नैव प्रदास्यामि देवकीपुत्रमाश्रितः ॥ १६ ॥

'अब रही रत्नोंकी बात, उन्हे मैं आपलोगोंको तभी दूँगा, जब आप सान्त्वनापूर्वक बात करें, इस बातको आप अच्छी तरह सोच-समझ लें। बलपूर्वक माँगनेपर मैं कुछ नहीं दूँगा; क्योंकि भगवान् देवकीनन्दनकी शरण ले चुका हूँ (वे ही मेरी रक्षा करेंगे)' ॥ १६ ॥

निकुम्भाद्यास्तु रुषिताः पापाः षट्पुरवासिनः ।
यज्ञवाटं विलुलुठुर्जह्रुः कन्याश्च तास्तथा ॥ १७ ॥

यह उत्तर सुनकर षट्पुरमे निवास करनेवाले निकुम्भ आदि पापी असुर रोषमे भर गये। उन्होंने यज्ञमण्डपको तहस-नहस कर दिया और ब्रह्मदत्तकी कन्याओंको हर लिया ॥

तद् दृष्ट्वा सम्प्रवृत्तं तु दध्यौवानकदुन्दुभिः ।
वासुदेवं महात्मानं बलभद्रं गदं तथा ॥ १८ ॥

यज्ञमण्डपमें वह लूट मची हुई देख वसुदेवने महात्मा श्रीकृष्ण, बलदेव और गदका चिन्तन किया ॥ १८ ॥

विदितार्थस्ततः कृष्णः प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
गच्छ कन्यापरित्राणं कुरु पुत्राशु मायया ॥ १९ ॥
यावद् यादवसैन्येन षट्पुरं याम्यहं प्रभो ।

श्रीकृष्णको तो सब बात ज्ञात ही थी। उन्होंने प्रद्युम्नसे कहा—'बेटा ! जाओ और मायाद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंकी शीघ्र रक्षा करो। प्रभो ! तबतक मैं यादव वीरोंकी सेनाके साथ षट्पुरको चल रहा हूँ' ॥ १९ १/२ ॥

स ययौ षट्पुरं वीरः पितुराज्ञाकरस्तदा ॥ २० ॥
निमेषान्तरमात्रेण गत्वा कामो महाबलः ।
कन्यास्ता मायया धीमानपजह्रे महाबलः ॥ २१ ॥

महाबली कामस्वरूप वीर प्रद्युम्न पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे। वे तत्काल षट्पुरकी ओर चल दिये और पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर उन महाबली बुद्धिमान् वीरने उन कन्याओंका मायाद्वारा अपहरण कर लिया ॥ २०-२१ ॥

मायामयीश्च कृत्वाऽन्या न्यस्तवन् रुक्मिणीसुतः ।
मा भैरिति च धर्मात्मा देवकीमुक्तवांस्तदा ॥ २२ ॥

रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने मायामयी दूसरी कन्याओंका निर्माण करके उन्हें असुरोंके पास छोड़ दिया था। फिर उन धर्मात्माने अपनी पितामही देवकीसे कहा—'दादीजी ! आप भय न करें' ॥ २२ ॥

मायामयीस्ततो हृत्वा सुता ह्यस्य दुरासदाः ।
षट्पुरं विविशुर्दैत्याः परितुष्टा नराधिप ॥ २३ ॥

नरेश्वर ! ब्रह्मदत्तकी पुत्रियाँ दैत्योंके लिये दुष्प्राप्य थीं। वे मायामयी कन्याओंका ही अपहरण करके षट्पुरमें जा घुसे और अपनी सफलतापर संतुष्ट हुए ॥ २३ ॥

५४२ · श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

कर्म चासार्यते तत्र विधिदृष्टेन कर्मणा।
यद् विशिष्टं बहुगुणं तदभूच्च नराधिप ॥ २४॥
राजन् ! इधर शास्त्रीय विधिके अनुसार वहाँ यज्ञकर्मका सम्पादन होने लगा। जो विशिष्ट एवं बहुगुण सम्पन्न कार्य था, वह सब सम्पन्न हुआ ॥ २४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता राजानस्तत्र भारत।
सत्रे निमन्त्रिताः पूर्वं ब्रह्मदत्तेन धीमता ॥ २५॥
भारत ! इसी बीचमें वहाँ बहुत-से राजा आये, जिन्हें बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने पहलेसे ही यज्ञमें पधारनेके लिये निमन्त्रण दे रखा था ॥ २५ ॥

जरासंधो दन्तवक्त्रः शिशुपालस्तथैव च।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च मालवाः सगणास्तथा ॥ २६॥
रुक्मी चैवाहृतिश्चैव नीलो वा धर्म एव च।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यः शकुनिरेव च ॥ २७॥
राजनश्चापरे वीरा महात्मानो दृढायुधाः।
आवासिता नातिदूरे षट्पुरस्य च भारत ॥ २८॥
जरासंध, दन्तवक्त्र, शिशुपाल, पाण्डव, धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, अपने गणोंसहित मालवनरेश, रुक्मी, आह्वृति, नील, धर्म, अवन्तीके विन्द और अनुविन्द, शल्य, शकुनि, दूसरे वीर नरेश, सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले दूसरे महा-मनस्वी वीर नरेश वहाँ पधारे थे। भरतनन्दन ! उन्हें षट्पुरसे थोड़ी ही दूरपर ठहराया गया ॥ २६-२८ ॥

तान् दृष्ट्वा नारदः श्रीमानचिन्तयदनिन्दितः।
क्षात्रस्य यादवानां च भविष्यति समागमः ॥ २९॥
उन सबको वहाँ उपस्थित देख साधु-महात्मा श्रीमान् नारदजीने सोचा, यहाँ यादवों तथा दूसरे क्षत्रियोंमें संघर्ष होगा ॥ २९ ॥

अत्र हेतुरहं युद्धे तस्मात् तत् प्रयताम्यहम्।
एवं संचिन्तयित्वाथ निकुम्भभवनं गतः ॥ ३०॥
इस युद्धमें मैं ही कारण बनूँगा; अतः उसके लिये अभीसे प्रयत्न आरम्भ करता हूँ। ऐसा सोचकर वे निकुम्भके घरमें गये ॥ ३० ॥

पूजितः स निकुम्भेन दानवैश्च तथापरैः।
उपविष्टः स धर्मात्मा निकुम्भमिदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
निकुम्भ तथा दूसरे-दूसरे दानवोंने वहाँ इनकी बड़ी आवभगत की। धर्मात्मा नारदजी वहाँ एक आसनपर बैठ-कर निकुम्भसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥

कथं विरोधं यदुभिः कृत्वा स्वस्थैरिहास्यते ।
यो ब्रह्मदत्तः स हरिः स हितस्य पितुः सखा ॥ ३२॥
'तुमलोग यादवोंके साथ विरोध करके यहाँ कैसे निश्चिन्त बैठे हुए हो। अरे भाई ! जो ब्रह्मदत्त हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं। क्योंकि वे ब्रह्मदत्त उन श्रीकृष्णके पिता वसुदेवके मित्र हैं॥

शतानि पञ्च भार्याणां ब्रह्मदत्तस्य धीमतः।
आनीता वसुदेवस्य सुतस्य प्रियकाम्यया ॥ ३३ ॥
'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तके पाँच सौ भार्याएँ हैं, जिन्हें वे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना करके प्राप्त कर सके थे ॥ ३३ ॥

शतद्वयं ब्राह्मणीनां राजन्यानां शतं तथा।
वैश्यानां शतमेकं च शूद्राणां शतमेव च ॥ ३४ ॥
'उनकी स्त्रियोंमें दो सौ तो ब्राह्मणियाँ थीं, एक सौ क्षत्रिय-कन्याएँ, एक सौ वैश्य-कन्याएँ और एक सौ शूद्रोंकी कन्याएँ थीं ॥ ३४ ॥

ताभिः शुश्रूषितो धीमान् दुर्वासा धर्मवित्तमः।
तेन तासां वरो दत्तो मुनिना पुण्यकर्मणा ॥ ३५ ॥
'उन सबने धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् दुर्वासाकी सेवा की थी। उससे प्रसन्न होकर उन पुण्यकर्मा मुनिने उन्हें वर दिया ॥

एकैकस्तनयो राजन्नेकैका दुहिता तथा।
रूपेणानुपमाः सर्वा वरदानेन धीमतः ॥ ३६॥
'राजन् ! उन बुद्धिमान् मुनिके वरदानसे ब्रह्मदत्तकी प्रत्येक स्त्रीके एक-एक पुत्र और एक-एक कन्या हुई। उनकी वे सारी कन्याएँ अनुपम रूपवती हैं ॥ ३६ ॥

कन्या भवन्ति तनयास्तस्यासुर पुनः पुनः।
सङ्गमे सङ्गमे वीर भर्तृभिः शयने सह ॥ ३७॥
'वीर असुर ! उनकी वे कन्याएँ पतियोंके साथ शयन करते समय प्रत्येक संगमके अवसरपर कुमारी कन्याओंके समान कमनीय हो जाती हैं ॥ ३७ ॥

सर्वपुष्पमयं गन्धं प्रस्रवन्ति वराङ्गनाः।
सर्वदा यौवने न्यस्ताः सर्वाश्चैव पतिव्रताः ॥ ३८ ॥
'वे परम सुन्दरी कन्याएँ अपने शरीरसे सब प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध प्रकट करती हैं, सदा युवावस्थामें ही स्थित रहती हैं और सब-की-सब पतिव्रताएँ हैं ॥ ३८ ॥

सर्वा गुणैरप्सरसां गीतनृत्यगुणोदयम्।
जानन्ति सर्वा दैतेय वरदानेन धीमतः ॥ ३९॥
'दैत्यकुमार ! ये सब अप्सराओंके समान गुणवती हैं और बुद्धिमान् दुर्वासाके वरदानसे संगीत और नृत्यके गुणोंको प्रकट करना जानती हैं ॥ ३९ ॥

पुत्राश्च रूपसम्पन्नाः शास्त्रार्थकुशलास्तथा।
स्वे स्वे स्थिता वर्णधर्मे यथावदनुपूर्वशः ॥ ४० ॥
'उनके सभी पुत्र रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न तथा शास्त्रार्थमें कुशल हैं और क्रमशः सभी यथावत्रूपसे अपने-अपने वर्णधर्ममें स्थित रहते हैं ॥ ४० ॥

विष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ ५४३


ताः कन्या भौममुख्यानां दत्ताः प्रायेण धीमता ।
अवशेषं शतं त्वेकं यदानीतं किल त्वया ॥ ४१ ॥

'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने प्रायः उन सब कन्याओंका विवाह मुख्य-मुख्य यदुवंशियोंके साथ कर दिया है। केवल एक सौ शेष रह गयी थीं, जिन्हें तुम हर लाये हो ॥ ४१ ॥

तदर्थं यादवान् वीर योधयिष्यसि सर्वथा ।
सहायार्थं तु राजानो प्रियन्तां हेतुपूर्वकम् ॥ ४२ ॥

'वीर ! उनके लिये भी तुम्हें सर्वथा यादवोंके साथ युद्ध करना होगा। अतः तुम अपनी सहायताके लिये युक्तिपूर्वक यहाँ आये हुए राजाओंको अपने पक्षमे कर लो ॥ ४२ ॥

ब्रह्मदत्तसुतार्थं च रत्नानि विविधानि च।
दीयन्तां भूमिपालानां सहायार्थं महात्मनाम् ॥ ४३ ॥
आतिथ्यं क्रियतां चैव ये समेष्यन्ति वै नृपाः ।

'ब्रह्मदत्तकी पुत्रियोंके लिये उन महामनस्वी नरेशोंकी सहायता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम उन्हें नाना प्रकारके रत्न भेंट करो । जो राजा यहाँ आवें, उन सबका आतिथ्य-सत्कार करो' ॥ ४३१/२ ॥

एवमुक्ते तथा चक्रुरसुरास्तेऽतिहृष्टवत् ॥ ४४ ॥
लब्ध्वा पञ्चशतं कन्या रत्नानि विविधानि च।
यथार्हेण नरेन्द्रैस्ता विभक्ता भक्तवत्सलैः ॥ ४५ ॥

नारदजीके ऐसा कहनेपर असुरोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर वैसा ही किया। उन भक्तवत्सल नरेशोंने पाँच सौ कन्याएँ और नाना प्रकारके रत्न पाकर उन्हें यथोचित रीतिसे आपसमें बाँट लिया ॥ ४४-४५ ॥

ऋते पाण्डुसुतान् वीरान् वारिता नारदेन ते ।
निमेषान्तरमात्रेण तत्र गत्वा महात्मना ॥ ४६ ॥

केवल पाँचों पाण्डवोंको छोड़कर और सबने कन्याओं और रत्नोंका भाग ग्रहण किया था। महात्मा नारदजीने पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर वीर पाण्डवोंको उनका भाग लेनेसे रोक लिया था ॥ ४६ ॥

तुष्टैस्तैरसुरा ह्युक्ता राजन् भूमिसत्तमैः ।
सर्वकामसमृद्धार्थैर्भवद्भिः खगमैः स्वयम् ॥ ४७ ॥
अर्चिताः स्म यथान्यायं क्षत्रं किं वः प्रयच्छतु ।
क्षत्रं चार्चितपूर्वं हि दिव्यैर्वीरैर्भवद्विधैः ॥ ४८ ॥

राजन् ! रत्न और कन्या पाकर वे भूपालशिरोमणि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने असुरोंसे कहा--'आपलोग समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा स्वयं आकाशमें विचरने-वाले हैं तो भी आपने न्यायोचित रीतिसे हमारा सत्कार किया है; अतः बताइये, यह क्षत्रियसमूह आपलोगोंको क्या दे ? आप-जैसे दिव्य वीरोंने पहले-पहल क्षत्रिय-समाजका पूजन किया है' ॥ ४७-४८ ॥

निकुम्भोऽथाब्रवीद् धृष्टः क्षत्रं सुररिपुस्तदा ।
अनुवर्णयित्वा क्षत्रस्य माहात्म्यं सत्यमेव च ॥ ४९ ॥

यह सुनकर हर्षमें भरे हुए देववैरी निकुम्भने क्षत्रियोंके यथार्थ माहात्म्यका बारंबार वर्णन करके उस समय उनसे इस प्रकार कहा-॥ ४९ ॥

युद्धं नो रिपुभिः सार्द्धं भविष्यति नृपोत्तमाः ।
साहाय्यं दातुमिच्छामो भवद्भिस्तत्र सर्वथा ॥ ५० ॥

'श्रेष्ठ नरेशो ! हमारा अपने शत्रुओंके साथ युद्ध होने-वाला है। उसमें आपलोग सब प्रकारसे हमें सहायता प्रदान करें, यह हमारी इच्छा है' ॥ ५० ॥

एवमस्त्विति तानूचुः क्षत्रियाः क्षीणकिल्विषः ।
पाण्डवेयादृते वीराञ्छ्रुतार्थान्नारदाद् विभो ॥ ५१ ॥

प्रभो ! जिनके पाप क्षीण हो गये थे, उन क्षत्रियोंमेंसे वीर पाण्डवोंको छोड़कर अन्य सबने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पाण्डव नारदजीसे सारी बात सुन चुके थे, इसलिये वे उनसे अलग रहे ॥ ५१ ॥

क्षत्रियाः संनिविष्टास्ते युद्धार्थं कुरुनन्दन ।
पत्न्यस्तु ब्रह्मदत्तस्य यज्ञवाटं गता अपि ॥ ५२ ॥
कृष्णोऽपि सेनया सार्द्धं प्रययौ षट्पुरं विभुः ।

कुरुनन्दन ! वे सब क्षत्रिय युद्धके लिये उद्यत हो वहीं डेरा डालकर डटे रहे। इधर ब्रह्मदत्तकी पत्नियाँ यज्ञशालामें प्रविष्ट हुईं और उधरसे सेनासहित भगवान् श्रीकृष्ण भी षट्पुरमें आ पहुँचे ॥ ५२१/२ ॥

महादेवस्य वचनमुद्वहन् मनसा नृप ॥ ५३ ॥
स्थापयित्वा द्वारवत्यामाहुकं पार्थिवं तदा ।

नरेश्वर ! महादेवजीके वचनको मन-ही-मन स्मरण करके द्वारकामें राजा उग्रसेनको बिठाकर भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ आये थे ॥ ५३१/२ ॥

स तया सेनया सार्द्धं पौराणां हितकाम्यया ॥ ५४ ॥
यज्ञवाटस्याविदूरे देवो निविविशे विभुः ।
देशे प्रवरकल्याणे वसुदेवप्रचोदितः ॥ ५५ ॥

भगवान् जनार्दनदेव उस सेनाके साथ आकर षट्पुर-वासियोंके हितकी कामनासे यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर उत्तम कल्याणमय प्रदेशमें वसुदेवकी आज्ञासे छावनी डालकर ठहर गये ॥ ५४-५५ ॥

दत्तगुल्माप्रतिसरं कृत्वा तं विधिवत् प्रभुः ।
प्रद्युम्नमटने श्रीमान् रक्षार्थं विनियुज्य च ॥ ५६ ॥

श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ विधिपूर्वक रक्षक सैनिकोंके दल तैनात कर दिये, जिसके कारण किसी अवा-

५४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे च्छनीय व्यक्तिको उधरसे आनेके लिये मार्ग नहीं मिल पाता फिरकर सेनाकी देखभाल करनेके लिये नियुक्त कर था। साथ ही उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्नको सब ओर घूम- दिया था ॥ ५६ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे कृष्णस्य षट्पुरगमने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णका षट् पुरगमनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा यादव-सेनाकी युद्धके लिये नियुक्ति, दानवोंका निष्क्रमण, निकुम्भद्वारा कुछ यादव वीरोंका गुफामें बंदी होना, श्रीकृष्णके द्वारा दानव-सैनिकोंका संहार, प्रद्युम्नद्वारा राजसैनिकोंका गुफामें अवरोध तथा ब्रह्मदत्तको सान्त्वना वैशम्पायन उवाच श्रीकृष्णने उन दोनोंको प्रद्युम्नकी भाँति आकाशमें ही मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुषि निर्मले । (ऊपरकी ओरसे सेनाकी रक्षाके लिये) नियुक्त कर दिया ॥६॥ बलः कृष्णः सात्यकिश्च तार्क्ष्यमारुरुहुस्तदा ॥ १ ॥ ततः कृष्णस्य वचनादाहतो रणदुन्दुभिः । बद्धगोधाङ्गुलित्राणा दंशिता युद्धकाङ्क्षिणः । जलजा मुरजाश्चैव वाद्यान्येवापराणि च ॥ ७ ॥ बिल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य सुरोत्तमम् ॥ २ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णके कहनेसे युद्धका डंका बजाया गया। आवर्तया जले स्नात्वा रुद्रेण वरदत्तया । शङ्ख, मुरज तथा अन्य बाजे भी बज उठे ॥ ७ ॥ गङ्गायाः पुरुषार्दूल रुद्रवाक्येन पुण्यया ॥ ३ ॥ मकरो रचितो व्यूहः साम्ब्रेन च गदेन च । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुरुश्रेष्ठ ! सारणश्चोद्धवश्चैव भोजो वैतरणस्तथा ॥ ८ ॥ जब सूर्योदय हुए दो ही घड़ी बीती थी और लोगोंके नेत्र निर्मल अनाधृष्टिश्च धर्मात्मा पृथुर्विपृथुरेव च । हो गये थे, उस समय बलभद्र, श्रीकृष्ण और सात्यकि—ये कृतवर्मा च दंष्ट्रश्च निचङ्कुरारिमर्दनः ॥ ९ ॥ तीनों गरुड़पर सवार हुए। उन सबने अपने हाथोंमें गोधाचर्मके साम्ब और गदने यादव सेनाका मकरव्यूह बनाया। बने हुए दस्ताने बाँध रक्खे थे और कवच धारण करके सारण, उद्धव, भोज, वैतरण, धर्मात्मा अनाधृष्टि, पृथु, युद्धके लिये इच्छुक थे। उन्होंने सबसे पहले, जिसे रुद्रदेवने विपृथु, कृतवर्मा, दंष्ट्र तथा शत्रुमर्दन निचङ्क—ये सब उस वर दिया था और जो उन्हींके वचनसे पुण्यमयी हो गयी व्यूहके अग्रभागमें खड़े थे ॥ ८-९ ॥ थी, उस आवर्ता नामवाली गङ्गामें स्नान करके सुरश्रेष्ठ सनत्कुमारो धर्मात्मा चारुदेष्णश्च भारत । बिल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार किया था (इसके बाद वे अनिरुद्धसहायौ तौ पृष्ठानीकं ररक्षतुः ॥ १० ॥ युद्धकी व्यवस्थामें लगे थे।) ॥ १-३ ॥ शेषा यादवसेना तु व्यूहमध्ये व्यवस्थिता । प्रद्युम्नमग्रे सैन्यस्य विधाति स्थाप्य मानदः । रथैरश्वैर्नरैर्नागैर्व्याकुला कुलवर्धन ॥ ११ ॥ रक्षार्थं यज्ञवाटस्य पाण्डवान् विनियुज्य च ॥ ४ ॥ धर्मात्मा सनत्कुमार और चारुदेष्ण ये—दोनों अनिरुद्धके शेषां सेनां गुहाद्वारि भगवान् विनियुज्य च । साथ रहकर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगे। अपने जयन्तमथ सस्मार प्रवरं च सतां गतिः ॥ ५ ॥ कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! रथों, घोड़ों, मनुष्यों और सबको मान देनेवाले, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत श्रीकृष्णने हाथियोंसे भरी हुई शेष यादवसेना व्यूहके मध्यभागमें सबसे आगे प्रद्युम्नको सेनाकी रक्षाके लिये उसके ऊपरी भाग खड़ी थी ॥ १०-११ ॥ आकाशमें स्थापित किया। यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये पाण्डवोंको षट्पुरादपि निष्क्रान्ता दानवा युद्धदुर्मदाः । नियुक्त किया तथा शेष सेनाको गुफाके द्वारपर नियुक्त करके आरुह्य मेघनादांश्च गर्दभानपि हस्तिनः ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीहरिने जयन्त और प्रवरको स्मरण किया ॥४-५॥ तदनन्तर षट्पुरसे भी रणदुर्मद दानव निकले । उनमेंसे तावापेततुरेवाथ स्वयं चापश्यतां तथा । कुछ मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले गदहों और वियत्येव नियुक्तौ तौ प्रद्युम्न इव भारत ॥ ६ ॥ हाथियोंपर आरूढ थे ॥ १२ ॥ भरतनन्दन ! वे दोनों वहाँ आ पहुँचे और स्वयं ही मकराञ्छिशुमारांश्च द्रुतानपि च भारत । आकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन किया। तत्पश्चात् भगवान् महिषानपि खड्गांश्च उष्ट्रानपि च कच्छपान् ॥ १३ ॥

विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः ५४५ भरतनन्दन ! कितने ही दैत्य वेगशाली मगरों, शिशुमारों शल्यश्च शकुनिश्चोभौ भगदत्तश्च पार्थिवः । (सँसों), भैंसों, गैंडों, ऊँटों और कछुओंपर भी सवार थे । १३। जरासंधस्त्रिगर्तश्च विराटश्च सहोत्तरः ॥ २१ ॥ एतैरेव रथैर्युक्ता विविधायुधपाणयः । युद्धार्थमुद्यता वीरा निकुम्भाद्या जयैषिणः । किरीटापीडमुकुटैरङ्गदैरपि मण्डिताः ॥ १४ ॥ युयुत्समाना यदुभिर्दैवैरिव महासुराः ॥ २२ ॥ कितनोंके पास इन्हीं वाहनोंसे जुते हुए रथ थे । उन शल्य, शकुनि, राजा भगदत्त, जरासंध, त्रिगर्तराज रथोंसे सम्पन्न हुए वे दैत्य अपने हाथोंमें नानाप्रकारके आयुध सुशर्मा और उत्तरसहित राजा विराट--ये वीर नरेश लिये हुए थे । वे किरीट, मुकुट या पगड़ी तथा अङ्गदों विजयकी अभिलाषा रखकर निकुम्भकी प्रधानतामें युद्धके (भुजबंदों) से अलंकृत थे ॥ १४ ॥ लिये उद्यत हुए थे । जैसे महान् असुर देवताओंके साथ नानार्दमानैर्विविधैस्तूर्यैर्नेमिस्वनाकुलैः । जूझना चाहते हैं, उसी प्रकार ये सब नरेश यादवोंके साथ प्रध्मायमानैः शङ्खैश्च महाम्बुदसमस्वनैः ॥ १५ ॥ युद्ध करनेकी इच्छा रखते थे ॥ २१-२२ ॥ उनके साथ वारंवार नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । ततो निकुम्भः समरे शरैराशीविषोपमैः । उन बाजोंकी आवाजमें रथके नेमियों (पहियों) की घर्घराहट ममर्द समरे सेनां भैमानां भीमदर्शनाम् ॥ २३ ॥ भी मिली हुई थी । वहाँ जोर-जोरसे शङ्ख बजाये जाते थे, जो तब निकुम्भ समराङ्गणमें विषधर सर्पोंके समान भयंकर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट करते थे १५ बाणोंद्वारा भैर्मों ( यादवों ) की भयानक दिखायी देनेवाली तासामसुरसेनानामुद्यतानां जनेश्वर । सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥ निकुम्भो निर्ययावग्रे देवानाामिव वासवः ॥ १६ ॥ सेनापतिरनाधृष्टिर्ममृषे तन्न यादवः । जनेश्वर ! युद्धके लिये उद्यत हुई उन असुर-सेनाओंमें ममर्द घोरैर्बाणौघैश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २४ ॥ सबसे आगे निकुम्भ निकला, मानो देवताओंके आगे इन्द्र यादव-सेनापति अनाधृष्टि निकुम्भके इस पराक्रमको नहीं चल रहे हों ॥ १६ ॥ सहन कर सके । उन्होंने शिला या सानपर तेज किये हुए भूमिं द्यां च ववृधिरे दानवास्ते बलोत्कटाः । विचित्र पंखवाले घोर बाणसमूहोंद्वारा उस असुरको नदन्तो विविधान् नादान् क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः ॥ १७ ॥ कुचल डाला ॥ २४ ॥ वे उत्कट बलशाली दानव नाना प्रकारसे सिंहनाद करते, न रथोऽसुरमुख्यस्य ददृशे न च वाजिनः । बारंबार गरजते तथा आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए न ध्वजो न निकुम्भस्तु सर्वै बाणाभिसंवृताः ॥ २५ ॥ बढ़ने लगे ॥ १७ ॥ उस असुर-सेनापतिका न तो रथ दिखायी देता था न राजसेनःपि संयत्ता चेदिराजपुरोगमा । घोड़े, न ध्वज और न स्वयं निकुम्भ ही । वे सब-के-सब असुराणां सहायार्थे निश्चिता जनमेजय ॥ १८ ॥ बाणोंसे ढक गये थे ॥ २५ ॥ जनमेजय ! राजाओकी सेना भी असुरोंकी सहायताके स परीत्य ततो वीरो निकुम्भो मायिनां वरः । लिये निश्चय करके चेदिराज शिशुपालके नेतृत्वमें युद्धके लिये अस्तम्भयदनाधृष्टिं मायया भैमसत्तमम् ॥ २६ ॥ तैयार हो गयी ॥ १८ ॥ तब मायावी असुरोंमें श्रेष्ठ वीर निकुम्भने सब ओर दुर्योधनध्रातृशतं चेदिराजानुजायगम् । चक्कर लगाकर अपनी मायाद्वारा भैँमशिरोमणि (यादवश्रेष्ठ) स्थितं रथैर्नरव्याघ्र गन्धर्वनगरोपमैः ॥ १९ ॥ अनाधृष्टिको स्तम्भित कर दिया ॥ २६ ॥ पुरुषसिंह ! दुर्योधन आदिसौ भाई चेदिराज शिशुपालके स्तम्भयित्वानयद् वीरं गुहां षट्पुरसंज्ञिताम् । छोटे भाइयोंस आगे चल रहे थे। ये सब-के-सब गन्धर्वनगरकार रुद्ध्वा चाभ्यगमद् वीरो मायावलमुपाश्रितः ॥ २७ ॥ रथोंद्वारा युद्धके लिये खड़े थे ॥ १९ ॥ स्तम्भित करके वह वीर अनाधृष्टिको षट्पुर नामवाली कठिनानादिनो वीर द्रुपदस्यन्दनास्तथा । गुफामें उठा ले गया और वहाँ बंद करके मायावलका रुक्मी चैवाहितश्चैव तस्थतुर्निश्चितौ रणे । आश्रय लेनेवाला वीर निकुम्भ पुनः युद्धभूमिमें लौट आया २७ तालवृक्षप्रतीकाशे धुन्वानौ धनुषी शुभे ॥ २० ॥ पुनरेव. निकुम्भस्तु कृतवर्माणमाहवे । वीर ! राजा द्रुपदके रथ बड़े कठोर (दुःसह) घर- अनयच्चारुदेष्णं च भोजं वैतरणं तथा ॥ २८ ॥ घराहटका शब्द करते थे । रुक्मी और आहुति-ये दोनों सनत्कुमारमृक्षं च तथैव निशठोल्मुकौ । युद्धके लिये निश्चय करके वहाँ डट गये । वे ताड़-वृक्षके बहूंश्चैवापरान् भोजान् मायावलसमाश्रितः ॥ २९ ॥ समान अपने सुन्दर धनुष हिलाने लगे ॥ २० ॥ अबकी बार युद्धस्थलमें पुनः मायाबलका आश्रय लेनेवाल म० ह० १८४-

५४६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

निकुम्भ, कृतवर्मा, चारुदेष्ण, भोज, वैतरण, सनत्कुमार, जाम्बवतीपुत्र ऋक्ष, निशठ, उल्मुक तथा दूसरे-दूसरे बहुत से भोजवंशियोंको उठा ले गया ॥ २८-२९ ॥

न तस्य ददृशे देहो मायाच्छन्नो जनेश्वर।
नयतो यादवान् घोरान्गुहां पट्ट्पुरसंज्ञिताम् ॥ ३०॥

जनेश्वर ! घोर यादव वीरोंको पट्ट्पुर नामवाली गुफामें ले जाते समय उस असुरकी देह दिखायी नहीं देती थी; क्योंकि वह उसकी मायासे आच्छादित थी ॥ ३० ॥

तद् दृष्ट्वा कदनं घोरं भैमानां भयवर्धनः।
चुकोप भगवान् कृष्णो बलः सत्यक एव च ॥ ३१ ॥

भीमवंशियोंका वह घोर संहार देखकर शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि कुपित हो उठे ॥ ३१ ॥

सविशेषं तथा कामः साम्बश्च परवीरहा।
अनिरुद्धश्च दुर्धर्षो भैमाश्च बहवोऽपरे ॥ ३२॥

कामावतार प्रद्युम्नको विशेष क्रोध हुआ। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले साम्ब, दुर्धर्ष वीर अनिरुद्ध तथा दूसरे बहुत-से भीमवंशी यादव भी रोषमें भर गये ॥ ३२ ॥

ततः शार्ङ्गयुधः शार्ङ्गं कृत्वा सज्यं नरेश्वर।
दानवेषु प्रवृत्तेषु तृणेष्विव हुताशनः ॥ ३३॥

नरेश्वर ! शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णने अपने उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और जैसे अग्नि तिनकोंमें प्रवेश करती हो, उसी प्रकार वे दानवोंपर धनुषसे बाण बरसाने लगे ॥ ३३ ॥

तं दृष्ट्वा दानवा देवमभिदुद्रुवुरीश्वरम्।
शलभाः कालपाशार्ताः प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ३४ ॥

उन भगवान् गोविन्ददेवको वहाँ देखकर सब दानव उन्हींपर टूट पड़े; ठीक वैसे ही, जैसे कालपाशसे पीड़ित हुए पतिंगे जलती हुई आगमें कूद पड़ते हैं ॥ ३४ ॥

समुत्सृज्य शतघ्नीश्च परिघांश्च सहस्रशः।
शूलानि चाग्नितुल्यानि प्रदीप्तांश्च परश्वधान् ॥ ३५ ॥

वे सहस्रों शतघ्नी, परिघ, अग्नितुल्य त्रिशूल तथा प्रज्वलित हुए फरसे चलाने लगे ॥ ३५ ॥

पर्वताग्राणि वृक्षांश्च घोराश्च विपुलाः शिलाः।
उत्क्षिप्य च गजान्मत्तान् रथानपि हयानपि ॥ ३६॥

पर्वतोंके शिखर, वृक्ष, भयंकर बड़ी-बड़ी शिलाएँ, मतवाले हाथी, रथ और घोड़े—इन सबको उठा-उठाकर भगवान् श्रीकृष्णपर फेंकने लगे ॥ ३६ ॥

नारायणाग्निस्तान् सर्वान् ददाह प्रहसन्निव।
बाणार्चिषा महातेजा जगद्धितकरो हरिः ॥ ३७ ॥

परंतु जगत्का हित करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण हरिने हँसते हुए-से अग्निरूप होकर अपनी बाणमयी लपटोंसे उन सबको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३७ ॥


शारदं वर्षणं यद्वत् सेहे धीरो गवां पतिः।
तद्वद् यदुवृषः सेहे बाणवर्षमरिंदमः ॥ ३८ ॥

जैसे धीर साँड़ शरद्ऋतुकी वर्षाको चुपचाप सहन करता है, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण दैत्योंकी बाणवर्षाको धैर्यपूर्वक सहन करते रहे ॥ ३८ ॥

न सेहिरेऽसुरा बाणान् नारायणधनुश्च्युतान्।
घर्षं पर्जन्यविहितं वालुकासेतवो यथा ॥ ३९॥

परंतु जैसे बालूके बने हुए सेतु (पुल) मेघोंद्वारा की गयी वर्षाका वेग नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे असुर नारायण (श्रीकृष्ण) के धनुषसे छूटे हुए बाणोंको नहीं सह सके ॥ ३९ ॥

न शेकुः प्रमुखे स्थातुं कृष्णस्यासुरसत्तमाः।
व्यादितास्यस्य सिंहस्य वृषभा इव भारत ॥ ४० ॥

भारत ! जैसे मुँह बाये हुए सिंहके सामने बैल नहीं ठहर सकते, उसी प्रकार वे बड़े-बड़े असुर श्रीकृष्णके सम्मुख खड़े नहीं रह सके ॥ ४० ॥

ते वध्यमानाः कृष्णेन दिवमाचक्रमुस्तदा।
जीविताशां वहन्तस्तु नारायणभयार्दिताः ॥ ४१ ॥

नारायणके भयसे पीड़ित हो उनके द्वारा मारे जाते हुए वे असुर जीवनकी आशाका भार वहन करते हुए आकाशमें उड़ चले ॥ ४१ ॥

तानाकाशगतानैन्द्रिर्जयन्तः प्रवरस्तथा।
निजघ्नतुः शरैर्घोरैर्ज्वलतार्चिःसमैः प्रभो ॥ ४२ ॥

प्रभो ! आकाशमें गये हुए उन असुरोंको जयन्त और प्रवर प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा मार गिराते थे ॥ ४२ ॥

निपेतुस्सुराणां तु शिरांसि धरणीतले।
तृणराजफलानीव मुक्तानि शिखरात् तरोः ॥ ४३ ॥

उन असुरोंके कटे हुए सिर वृक्ष-शिखरसे टूटकर गिरे हुए तालफलोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ४३ ॥

निपेतुर्बाहवश्छिन्ना दैत्यानां वसुधातले।
कालेनोपहता वीर पञ्चवक्त्रा इवोरगाः ॥ ४४ ॥

वीर ! दैत्योंकी कटी हुई भुजाएँ पृथ्वीपर कालके मारे हुए पाँच मुखवाले सर्पोंके समान गिर रही थीं ॥ ४४ ॥

रौक्मिणेयस्ततः सृष्ट्वा घोरां मायामयीं गुहाम्।
अदृश्यनिष्क्रमं वीरः क्षत्रं प्रक्षेप्तुमुद्यतः ॥ ४५ ॥
गदेन सह धर्मात्मा सारणेन सुतेन च।
साम्बेन चापरैश्चापि पूर्वं ये न प्रवेशिताः ॥ ४६॥

तदनन्तर गद, सारण, अनिरुद्ध, साम्ब तथा अन्य वीरोंके साथ, जिन्हें निकुम्भने पहले अपनी गुफामें नहीं घुसाया था, वीर धर्मात्मा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न घोर मायामयी गुफाकी सृष्टि करके समस्त क्षत्रिय नरेशोंके समुदायको,

विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः [ ५४७


जो उस गुफामे निकलनेके मार्गको नहीं देख पाता था, उसमें फेंक देनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४५-४६ ॥

प्रमथ्य तरसा कर्णे यतन्तं रणमूर्धनि ।
जग्राह बलवान् कार्ष्णिः प्रस्फुरन्तं ततस्ततः ॥ ४७ ॥
विनद्य च गुहां वीरो घोरां मायामयीं नृप ।

नरेश्वर ! बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमारने युद्धके मुहानेपर विजयके लिये प्रयत्न करते हुए कर्णको वेगपूर्वक पटककर उसके उछल कूद मचाने या छटपटानेपर भी पकड़ लिया और गरजकर उसे घोर मायामयी गुफामें (फेंकनेका विचार किया) ॥ ४७ ॥

दुर्योधनं च राजानं विराटद्रुपदावपि ॥ ४८ ॥
शकुनिं चैव शल्यं च नीलं चापि नदीसुतम् ।
विन्दानुविन्दौ राजानौ जरासंधं च भारत ॥ ४९ ॥
त्रिगर्तान् मालवांश्चैव वासन्त्यांश्च महाबलान् ।
धृष्टद्युम्नादिकांश्चैव पञ्चालानस्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥
तथाह्वतिमुवाचेदं मातुलं रुक्मिमेव च ।
शिशुपालं च राजानं भगदत्तं च भारत ॥ ५१ ॥

भारत ! इसी तरह उन्होंने राजा दुर्योधन, विराट, द्रुपद, शकुनि, शल्य, नील, भीष्म, राजा विन्द और अनुविन्द तथा जरासंधको, त्रिगर्त, मालव एवं महाबली वासन्त्यगणोंको और अस्त्रज्ञानमें निपुण धृष्टद्युम्न आदि पाञ्चाल वीरोंको भी पकड़ लिया। फिर अपने मामा आह्वति और रुक्मीको एवं राजा शिशुपाल और भगदत्तको सम्बोधित करके कहा—॥ ४८-५१ ॥

सम्बन्धं च गुरुत्वं च मानयामि नराधिपाः ।
गुहामिमां घोररूपां यत्र प्रक्षेपयामि वः ॥ ५२ ॥
बिल्वोदकेश्वरेणाहमाज्ञप्तः शूलपाणिना ।
प्रक्षेतव्या नरेन्द्रास्ते गुहायामिति धीमता ॥ ५३ ॥

'नरेश्वरो ! हमारे साथ आपलोगोंका जो सम्बन्ध और गुरुत्व है, उसका मैं आदर करता हूँ तो भी आपलोगोंको इस भयंकर गुफामें जहाँ फेंक रहा हूँ, वहाँ फेंकनेके लिये बुद्धिमान् शूलपाणि भगवान् बिल्वोदकेश्वरने मुझे आज्ञा दी है। उन्होंने कहा है कि तुम सब राजाओंको गुफामें फेंक दो ॥

आश्रित्य शाम्बरीं मायां निकुम्भेन महात्मना ।
प्रक्षिप्तान् यादवांश्चैव मोक्षयिष्यामि सर्वथा ॥ ५४ ॥

'महामनस्वी निकुम्भने शाम्बरी मायाका आश्रय लेकर जिन यादवोंको गुफामें डाल रक्खा है, उन्हें मैं सर्वथा छुड़ा लूँगा' ॥ ५४ ॥

इत्युक्तो शिशुपालस्तु राजा सेनापतिस्तथा ।
शरैस्ततर्द तान् भैमान् प्रद्युम्नं च विशेषतः ॥ ५५ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सेनापति राजा शिशुपालने अपने बाणोंद्वारा उन भैभों (यादवो) तथा विशेषतः प्रद्युम्नको पीडित कर दिया ॥ ५५ ॥

बिल्वोदकेश्वरं देवं रौक्मिणेयो नमस्य च ।
आरभन्नृपतिं बद्धुं शिशुपालं महाबलम् ॥ ५६ ॥

तब रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार करके महाबली राजा शिशुपालको बाँधना आरम्भ किया ॥

ततः पाशसहस्राणि गृह्य प्रवरोत्तमः ।
शैलादिरब्रवीद् वीरं रौक्मिणेयं महाबलम् ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् रुद्रदेवके पार्षदोंमें श्रेष्ठ नन्दीने एक सहस्र पाश लेकर महाबली रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नसे कहा—॥

बिल्वोदकेश्वरो देवः प्राह त्वां यदुनन्दन ।
सर्वं कुरु तथा रात्र्यां चोक्तस्त्वं भो यथा मया ॥ ५८ ॥

'यदुनन्दन ! बिल्वोदकेश्वरने तुम्हें यह संदेश दिया है कि मैंने जैसा तुमसे कहा है, उसके अनुसार तुम रातमें सब कार्य करो ॥ ५८ ॥

कन्यार्थं रत्नलब्धांस्तु बद्ध्वा चेमान् नराधिपान् ।
पाशैस्त्वमेव मोक्तुं च प्रमाणं यदुनन्दन ॥ ५९ ॥

'यदुनन्दन ! कन्याओं और रत्नोंपर लुभाये हुए इन राजाओंको पाशोंसे बाँधकर फिर इन्हें मुक्त करनेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुम्हीं चाहो तो उन्हें छोड़ सकते हो ॥ ५९ ॥

असुरांस्तु महाबाहो निःशेषान् कर्तुमर्हसि ।
एवमेव च वक्तव्यस्त्वया वीर जनार्दनः ॥ ६० ॥

'वीर महाबाहो ! तुम इन असुरोंको निःशेष कर डालो—इनमेसे एकको भी जीवित न छोड़ो। तुम्हे जनार्दनसे भी ऐसा ही कहना चाहिये' ॥ ६० ॥

ततः स भगदत्तं च शिशुपालं च भूमिप ।
आह्वितिं चैव रुक्मिं च शेषांश्चान्यान् नराधिपान् ॥ ६१ ॥
बबन्ध हरदत्तैस्तैः पाशैरुत्तमवीर्यधृक् ।
मायामयीं गुहां चैवमानयत् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥

पृथ्वीपते ! कुरुनन्दन ! तदनन्तर उत्तम बल धारण करनेवाले प्रद्युम्नने भगवान् शङ्करके दिये हुए पाशोंसे राजा भगदत्त, शिशुपाल, आह्वृति, रुक्मी तथा शेष अन्य नरेशोंको भी बाँधा और उन सबको मायामयी गुफामें ले आये ॥

बद्ध्वा च रौक्मिणेयोऽथ निःश्वसन्त इवोरगान् ।
अनिरुद्धं चकाराथ रक्षितारं स्वमात्मजम् ॥ ६३ ॥

रुक्मिणीकुमारने फुफकारते हुए सर्पोंके समान लंबी साँस खींचते हुए राजाओंको बाँधकर डाल दिया और अपने पुत्र अनिरुद्धको उनका रक्षक नियुक्त कर दिया ॥ ६३ ॥

तेषां निरवशेषेण बबन्ध यदुनन्दनः ।
सेनापतीन् क्षत्रियांश्च कोषाध्यक्षांश्च भारत ॥ ६४ ॥
हस्त्यश्वरथवृन्दांश्च चकार च तथाऽऽत्मसात् ।

५४८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

भारत ! यदुनन्दन प्रद्युम्नने उनमेंसे किसीको भी बिना बाँधे नहीं छोड़ा । फिर उनके क्षत्रिय-सेनापतियों, कोषाध्यक्षों तथा हाथी, घोड़ों और रथके समूहोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ६४३॥

अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यतः प्रभो ॥ ६५ ॥
संनद्ध एव चोवाच ब्रह्मदत्तं द्विजोत्तमम् ।
विस्रब्धं वर्ततां कर्म मा भैः पश्य धनंजयम् ॥ ६६ ॥

प्रभो ! तत्पश्चात् अव्यग्र (शान्त) भावसे स्थित हो वे असुरोंको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये और संनद्ध रहकर द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्तसे बोले—'ब्रह्मन् ! आप निर्भय हो अपना यज्ञकर्म चालू रखें। देखिये, अर्जुन आपकी रक्षामें खड़े हैं ॥

न देवेभ्यो नासुरेभ्यो नागेभ्यो द्विजसत्तम ।
भयं हि विद्यते तस्य गोप्तारो यस्य पाण्डवाः ॥ ६७ ॥

'द्विजश्रेष्ठ ! पाण्डव जिसके रक्षक हों, उसे न तो देवताओंसे, न असुरोंसे और न नागोंसे ही भय प्राप्त हो सकता है ॥ ६७ ॥

न चासुरैस्तव सुताः स्पृष्टाः खल्वपि चेतसा ।
यज्ञवाटे निरीक्ष्यन्तां मायया निहिता मया ॥ ६८ ॥

'असुरोंने आपकी पुत्रियोंका मनसे भी स्पर्श नहीं किया है। आप यज्ञमण्डपमें देखिये, मैंने मायाद्वारा उन्हें छिपाकर वहीं रख छोड़ा है' ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥


पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

निकुम्भका जयन्तसे पराजित होकर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको निकुम्भका चरित्र बताना, आकाशवाणीकी प्रेरणासे सुदर्शन चक्रद्वारा निकुम्भका वध करना और ब्रह्मदत्तको षट्पुरनगर देकर द्वारकाको प्रस्थान करना

वैशम्पायन उवाच
रुद्धेषु भूमिपालेषु सानुगेषु विशाम्पते ।
आविवेशासुरांश्चाथ कश्मलं जनमेजय ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! जनमेजय ! जब अनुचरोंसहित सब भूपाल गुफामें बंद कर दिये गये, तब असुरोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥

दिशः प्रतस्युस्ते वीरा वध्यमानाः समन्ततः ।
कृष्णानन्तप्रभृतिभिर्यदुभिर्युद्धदुर्मदैः ॥ २ ॥

श्रीकृष्ण, बलराम आदि रणदुर्मद यादवोंद्वारा सब ओरसे मारे जाते हुए वीर असुर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर पलायन करने लगे ॥ २ ॥

निकुम्भस्तानथोवाच रुषितो दानवोत्तमः ।
भित्त्वा प्रतिज्ञां किं मोहाद् भयार्तार्यात विह्वलाः ॥ ३ ॥

यह देख दानवश्रेष्ठ निकुम्भ रोषमें भरकर उनसे बोला—'अरे ! तुमलोग मोहवश अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भयसे पीड़ित और विह्वल होकर क्यों भागे जा रहे हो ? ॥ ३॥

हीनप्रतिज्ञाः काँल्लोकान् प्रयास्यथ पलायिताः ।
अगत्वापचितिं युद्धे ज्ञातीनां कृतनिश्चयाः ॥ ४ ॥

'प्रतिज्ञाहीन होकर भाग जानेवाले तथा पहले बदला लेनेका निश्चय करके भी युद्धमें अपने भाई-बन्धुओंका ऋण उतारे बिना पीठ दिखानेवाले तुमलोग किन लोकोंमें जाओगे ? ॥ ४ ॥

फलं जित्वेह भोक्तव्यं रिपून् समरकर्कशान् ।
हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं त्रिदिवे सुखम् ॥ ५ ॥

'समराङ्गणमें निर्दयतापूर्वक जूझनेवाले शत्रुओंको जीतकर इस लोकमें उत्तम फल (राज्य आदि) का उपभोग प्राप्त होगा अथवा रणमें मारे जानेपर शूरवीरको स्वर्गलोकमें सुखदायक निवास सुलभ होगा ॥ ५ ॥

पलायित्वा गृहं गत्वा कस्य द्रक्ष्यथ हे मुखम् ।
दारान् वक्ष्यथ किं चापि धिग् धिक् किं किं न लज्जथ ॥ ६ ॥

'हे दैत्यो ! भागकर घर जाकर किसका मुँह देखोगे (अथवा किसे मुँह दिखाओगे) ? अपनी पत्नियोंसे क्या कहोगे ? धिक्कार है, धिक्कार है। क्यों ? क्यों तुम्हें लज्जा नहीं आती ?' ॥ ६ ॥

एवमुक्ता निवृत्तास्ते लज्जमाना नृपासुराः ।
द्विगुणेन च वेगेन युयुधुर्यदुभिः सह ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! निकुम्भके ऐसा कहनेपर वे असुर लज्जित होकर लौट पड़े और दुगुने वेगसे यादवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ७ ॥

उत्सवे युद्धशौण्डानां नानाप्रहरणैर्नृप ।
ये यान्ति यज्ञवाटं तं तान् निहन्ति धनंजयः ॥ ८ ॥
यमौ भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्यां प्रयाताश्चाद्यनैन्द्रिः प्रवरश्च द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥

राजन् ! नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धकुशल

विष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ५४९


योद्धाओंके उस समरोत्सवमें जो दैत्य यज्ञमण्डपकी ओर जाते थे, उन्हें अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मार डालते थे। जो लोग आकाशमे जाते थे, उन्हें इन्द्रकुमार जयन्त और द्विजश्रेष्ठ प्रवर कालके गालमें भेज देते थे॥ ८-९॥

अथासुरासृक्तोयाढ्या केशशैवलशाद्वला।
चक्रकूर्मरथावर्ता गजशैलांशुशोभिनी॥ १०॥
ध्वजकुन्ततरुच्छन्ना स्वनितोत्कृष्टनादिनी।
गोविन्दशैलप्रभवा भीरुचित्तप्रमाथिनी॥ ११॥
असृग्बुद्बुदफेनाढ्या असिमत्स्यतरङ्गिणी।
सुस्राव शोणितनदी नदीव जलदागमे॥ १२॥

फिर तो वहाँ वर्षांमें बढ़ी हुई नदीके समान एक खूनकी नदी बह चली। असुरोंके रक्त ही उसके जल थे। उनके सिरके केश ही उसमें सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे। रथके पहिये उसमें कछुए-जैसे लगते थे और रथ भँवरके समान प्रतीत होता था। हाथियोंकी लाशें पर्वतोंकी चट्टानोंके समान उसकी शोभा बढ़ाती थीं। ध्वज और भाले तटवर्ती वृक्षोंके समान उसे आच्छादित किये हुए थे। योद्धाओंका गर्जना और चीखना ही उसका कलकल नाद था। वह नदी श्रीकृष्णरूपी पर्वतसे प्रकट हुई थी और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करती थी। रक्तके बुलबुले ही उसमें फेन थे और तलवारें ही मछलियों और तरंगोंके समान प्रतीत होती थीं॥ १०-१२॥

तान् दृष्ट्वैष निकुम्भस्तु वर्धमानांश्च शत्रूवान्।
हतान् सर्वान् सहायांश्च वीर्यादेवात्पपात ह॥ १३॥

निकुम्भ अपने उन शत्रुओंको बढ़ता हुआ और समस्त सहायकोंको मारा गया देख अपने बलसे ही ऊपरको उछला॥ १३॥

स वारितो जयन्तेन प्रवरेण च भारत।
शरैः कुलिशसंकाशैर्निकुम्भो रणकर्कशः॥ १४॥
संनिवृत्याथ दष्टौष्ठः परिघेन दुरासदः।
प्रवरं ताडयामास स पपात महीतले॥ १५॥

भारत! ऊपर गये हुए रणकर्कश निकुम्भको जयन्त और प्रवरने अपने वज्रतुल्य बाणोंद्वारा रोका। तब दुर्जय वीर निकुम्भ दाँतोंसे ओठ दबाकर लौटा। उसने प्रवरपर परिघसे प्रहार किया। इससे वह पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १४-१५॥

पेन्द्रिस्तं पतितं भूमौ बाहुभ्यां परिषस्वजे।
विदित्वा चैव सप्राणं हित्वासुरमभिद्रुतः॥ १६॥

पृथ्वीपर गिरे हुए इन प्रवरको इन्द्रकुमार जयन्तने अपनी दोनों भुजाओंसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और जब उन्हें मालूम हुआ कि प्रवर जीवित हैं, तब वे उन्हें छोड़कर उस असुरकी ओर दौड़े॥ १६॥

अभिद्रुत्य निकुम्भं च निस्त्रिंशेन जघान ह।
परिघेणापि दैतेयो जयन्तं समताडयत्॥ १७॥

निकुम्भपर धावा करके जयन्तने उसे खड्गसे मारा। तब उस दैत्यने भी जयन्तपर परिघसे प्रहार किया॥ १७॥

ततक्ष बहुलं गात्रं निकुम्भस्येन्द्रिराहवे।
स चिन्तयामास तदा वध्यमानो महासुरः॥ १८॥
कृष्णेन सह योद्धव्यं वैरिणा ज्ञातिघातिना।
श्रावयामि किमात्मानमाहवे शक्रसूनुना॥ १९॥

इन्द्रकुमारने युद्धस्थलमे निकुम्भके शरीरको प्रायः क्षत-विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारे जाते हुए उस महान् असुरने उस समय मन-ही-मन सोचा कि मुझे श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना चाहिये, क्योंकि वे मेरे बन्धु-बान्धवोंके घातक एवं वैरी हैं। मैं युद्धमें इन्द्रकुमारके साथ लड़कर अपने लिये कौन-सी ख्याति प्राप्त करूँगा॥ १८-१९॥

एवं स निश्चयं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत।
जगाम चैव युद्धार्थं यत्र कृष्णो महाबलः॥ २०॥

ऐसा निश्चय करके वह महाबली असुर वहीं अन्तर्धान हो गया और युद्धके लिये उस स्थानपर गया, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे॥ २०॥

तं दृष्ट्वावतस्कन्धमास्थितो बलनाशनः।
द्रष्टुमभ्यागतो युद्धं जहर्ष सह दैवतैः॥ २१॥

उसे वहाँ गया हुआ देख बलनाशन इन्द्र ऐरावतकी पीठपर बैठकर वह युद्ध देखनेके लिये आये। उस समय वे देवताओंके साथ बहुत प्रसन्न थे॥ २१॥

साधु साध्विति पुत्रं च परितुष्टः स सस्वजे।
प्रवरं चापि धर्मात्मा सस्वजे मोहवर्जितम्॥ २२॥

धर्मात्मा इन्द्रने 'साधु साधु (वाह-वाह)' कहकर संतुष्ट हो अपने पुत्र जयन्तको हृदयसे लगा लिया और मूर्च्छा दूर हो जानेपर प्रवरसे भी गले मिले॥ २२॥

देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्वाद्सवाज्ञया।
जयमानं रणे दृष्ट्वा जयन्तं रणदुर्जयम्॥ २३॥

उस समय रणदुर्जय जयन्तकी युद्धमें विजय देखकर इन्द्रकी आज्ञासे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ २३॥

ददर्शार्थ निकुम्भस्तु केशवं रणदुर्जयम्।
अर्जुनेन स्थितं सार्धं यज्ञवाटाविदूरतः॥ २४॥

निकुम्भने देखा, युद्धमें जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, वे श्रीकृष्ण यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुनके साथ खड़े हैं॥ २४॥

स नादं सुमहान् कृत्वा पक्षिराजमताडयत्।
परिघेण सुघोरेण बलं सत्यकमेव च॥ २५॥

५५०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

फिर तो उसने बड़े जोरसे सिंहनाद करके अत्यन्त भयंकर परिघद्वारा पक्षिराज गरुड़, बलराम और सात्यकिपर प्रहार किया ॥ २५ ॥

नारायणं चार्जुनं च भीमं चाथ युधिष्ठिरम् ।
यमौ च वासुदेवं च साम्बं कामं च वीर्यवान् ॥ २६ ॥

तत्पश्चात् उस पराक्रमी असुरने श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्णकुमार साम्ब और प्रद्युम्नपर भी प्रहार किया ॥ २६ ॥

युयुधे मायया दैत्यः शीघ्रकारी च भारत ।
न चैनं ददृशुः सर्वे सर्वशस्त्रविशारदाः ॥ २७ ॥

भरतनन्दन ! वह शीघ्रकारी दैत्य मायाद्वारा युद्ध कर रहा था; इसलिये सम्पूर्ण शस्त्रोंके ज्ञानमें कुशल वे समस्त वीर उसे देख नहीं पाते थे ॥ २७ ॥

यदा तु नैवापश्यंस्तं तदा बिल्वोदकेश्वरम् ।
दध्यौ देवं हृषीकेशः प्रमथानां गणेश्वरम् ॥ २८ ॥

जब वे उस असुरको नहीं देख सके, तब भगवान् श्रीकृष्णने प्रमथगणोंके स्वामी बिल्वोदकेश्वर देवका स्मरण किया ॥ २८ ॥

ततस्ते ददृशुः सर्वे प्रभावान्नतितेजसः ।
बिल्वोदकेश्वरस्याशु निकुम्भं मायिनां वरम् ॥ २९ ॥

फिर तुरंत ही अत्यन्त तेजस्वी बिल्वोदकेश्वरके प्रभावसे उन सबने मायावियोंमें श्रेष्ठ निकुम्भको देखा ॥ २९ ॥

कैलासशिखराकारं ग्रसन्तमिव विष्ठितम् ।
आह्वयन्तं रणे कृष्णं वैरिणं ज्ञातिनाशनम् ॥ ३० ॥
सज्यगाण्डीव एवाथ पार्थस्तस्य रथेयुभिः ।
परिघं चैव गात्रेषु विव्याधैनमथासकृत् ॥ ३१ ॥

उसका शरीर कैलास शिखरके समान विशाल था। वह इसप्रकार खड़ा था, मानो सबको ग्रस लेगा। वह अपने बन्धु-बान्धवोंका नाश करनेवाले वैरी श्रीकृष्णको युद्धके लिये ललकार रहा था। उस समय जिनके गाण्डीव धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, उन अर्जुनने रथका भेदन करनेवाले बाणोंद्वारा उसके परिघ और अङ्गोंपर वारंवार प्रहार किया ॥

ते बाणास्तस्य गात्रेषु परिघे च जनाधिप ।
भग्नाः शिलाशिताः सर्वे निपेतुः कुञ्चिताः क्षितौ ॥ ३२ ॥

नरेश्वर ! अर्जुनके वे सभी बाण जो शिलापर तेज किये गये थे, उसके परिघ और अङ्गोंसे टकराकर टूटकर अथवा मुड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३२ ॥

विफलानस्त्रयुक्तांस्तान् दृष्ट्वा बाणान् धनंजयः ।
पप्रच्छ केशवं वीरः किमेतदिति भारत ॥ ३३ ॥

भरतनन्दन ! उन दिव्यास्त्रयुक्त बाणोंको निष्फल हुआ देख वीर अर्जुनने श्रीकृष्णसे पूछा, 'यह क्या हुआ ? ॥ ३३ ॥

पर्वतानपि भिन्दन्ति मम वज्रोपमाः शराः ।
किमिदं देवकीपुत्र विस्मयोऽत्र महान् मम ॥ ३४ ॥

'देवकीनन्दन ! मेरे वज्रतुल्य बाण पर्वतोंको भी विदीर्ण कर डालते हैं (परंतु यहाँ निष्फल हो गये)। यह क्या बात है ? इस विषयमें मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है' ॥ ३४ ॥

तमुवाच ततः कृष्णः प्रहसन्निव भारत ।
महद्भूतं निकुम्भोऽयं कौन्तेय शृणु विस्तरात् ॥ ३५ ॥

भारत ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से कहा—'कुन्तीनन्दन ! यह निकुम्भ एक महान् भूत है। इसका परिचय विस्तारपूर्वक सुनो ॥ ३५ ॥

पुरा गत्वोत्तरकुरूंस्तपश्चक्रे महासुरः ।
शतं वर्षसहस्राणां देवशत्रुर्दुरानदः ॥ ३६ ॥

'पूर्वकालमें इस दुर्जय देवद्रोही महान् असुरने उत्तरकुरुमें जाकर एक लाख वर्षोंतक तपस्या की थी ॥ ३६ ॥

अथैनं छन्दयामास वरेण भगवान् हरः ।
स वव्रे त्रीणि रूपाणि न वध्यानि सुरासुरैः ॥ ३७ ॥

'तब भगवान् शिवने इसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी। उस समय इसने महादेवजीसे तीन रूप माँगे, जो देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य हों ॥ ३७ ॥

तमुवाच महादेवे भगवान् वृषभध्वजः ।
मम वा ब्राह्मणानां वा विष्णोर्वाप्रियमचरन् ॥ ३८ ॥
भविष्यसि हरेर्वध्यो न त्वन्यस्य महासुर ।
ब्रह्मण्योऽहं च विष्णुश्च विप्राणां परमा गतिः ॥ ३९ ॥

'तब महान् देव भगवान् वृषभध्वजने इससे कहा—महान् असुर ! यदि तुम मेरा, ब्राह्मणोंका अथवा भगवान् विष्णुका अप्रिय करोगे तो श्रीहरिके हाथसे मारे जाओगे, दूसरे किसीके द्वारा नहीं; क्योंकि मैं और विष्णु दोनों ब्राह्मणोंके हितैषी हैं। उनके परम आश्रय हैं ॥ ३८-३९ ॥

स एष सर्वशस्त्राणामवध्यः पाण्डुनन्दन ।
त्रिदेहोऽतिप्रमाथी च वरमत्तश्च दानवः ॥ ४० ॥

'पाण्डुनन्दन ! वही यह तीन शरीर धारण करनेवाला अत्यन्त प्रमथनशील दानव है, जो वरदान पाकर मदमत्त हो उठा है। यह सम्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य है ॥ ४० ॥

भानुमत्यापहरणे देहोऽस्यैको हतो मया ।
अवध्यं षट्पुरं देहमिदमस्य दुरात्मनः ॥ ४१ ॥

'भानुमतीके अपहरणके समय मैंने इसके एक शरीरको नष्ट कर दिया था। यह अवध्य षट्पुर इस दुरात्माका दूसरा शरीर है ॥ ४१ ॥

दितिं शुश्रूषति ह्येको देहोऽस्य तपसान्वितः ।
अन्यस्तु देहो घोरोऽस्य येनावसति षट्पुरम् ॥ ४२ ॥

'तथा इसका एक तपस्वी शरीर दिति देवीकी सेवामें

[विष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ५५१

संलग्न रहता है। जिससे यह षट्पुरमें निवास करता है, वह इसका घोर शरीर दूसरा ही है ॥ ४२ ॥

एतत् तु सर्वमाख्यातं निकुम्भचरितं मया ।
त्वरयास्य वधे वीर कथा पश्चाद् भविष्यति ॥ ४३ ॥
'वीर ! यह सब निकुम्भका चरित्र मैंने कह सुनाया। अब तुम इसके वधके लिये जल्दी करो। यह कथा पीछे होती रहेगी' ॥ ४३ ॥

तयोः कथयतोरेवं कृष्णयोरसुरस्तदा ।
गुहां षट्पुरसंज्ञां तां विवेश रणदुर्जयः ॥ ४४ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि वह रणदुर्जय असुर उस षट्पुर नामवाली गुफामें जा घुसा ॥

अन्विष्य तस्य भगवान् विवेश मधुसूदनः ।
तां षट्पुरगुहां घोरां दुर्धर्षो कुरुनन्दन ॥ ४५ ॥
कुरुनन्दन ! उसके जानेके मार्गका अनुसंधान करके भगवान् मधुसूदन भी उस घोर, दुर्जय षट्पुर नामवाली गुफामें घुस गये ॥ ४५ ॥

चन्द्रसूर्यप्रभाहीनां ज्वलन्तीं स्वेन तेजसा ।
सुखदुःखोष्णशीतानि प्रयच्छन्तीं यथेप्सितम् ॥ ४६ ॥
वहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश नहीं था। वह गुफा अपने ही तेजसे प्रकाशित होती और वहाँके निवासियोंको सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी आदि प्रदान करती थी ॥ ४६ ॥

तत्र प्रविश्य भगवानपश्यत जनाधिपान् ।
युयुधे सह घोरेण निकुम्भेन जनाधिप ॥ ४७ ॥
नरेश्वर ! उस गुफामें प्रवेश करके भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भद्वारा बंदी बनाये गये यादवनरेशोंको देखा; फिर वे उस घोर असुर निकुम्भके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४७ ॥

कृष्णस्यानुप्रविष्टास्तु बलाद्या यादवास्तदा ।
प्रविष्टाश्च तथा सर्वे पाण्डवास्ते महात्मनः ॥ ४८ ॥
समेतास्तु प्रविष्टास्ते कृष्णस्यानुमतेन वै।
महात्मा श्रीकृष्णकी अनुमतिसे बलराम आदि समस्त यादववीर भी उस समय उनके पीछे-पीछे उस गुफामें जा घुसे तथा समस्त पाण्डव भी एक साथ ही उसमें घुस आये॥४८॥

युयुधे स तु कृष्णेन रौक्मिणेयः प्रचोदितः ।
आनयद् यादवान् सर्वान् यानयं बद्धवान् पुरा ॥ ४९ ॥
निकुम्भ तो श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगा। इधर श्रीकृष्णकी आज्ञासे रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उन सब यादवोंको छुड़ा लाये, जिन्हें निकुम्भने पहले बंदी बना लिया था ॥

ते मुक्ता रौक्मिणेयेन प्राप्ता यत्र जनार्दनः ।
प्रहृष्टमनसः सर्वे निकुम्भवधकाङ्क्षिणः ॥ ५० ॥
प्रद्युम्नद्वारा छुड़ाये गये वे समस्त वीर प्रसन्नचित्त हो निकुम्भका वध करनेकी इच्छासे उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे थे ॥ ५० ॥

राजानो वीर मुञ्चेति पुनः कामं यथाम्ब्रुवन् ।
सुमोच चाथ तान् वीरो रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ ५१ ॥
तब वे राजा जो प्रद्युम्नद्वारा कैद किये गये थे, उन कामस्वरूप प्रद्युम्नसे बार-बार कहने लगे—'वीर ! हमें मुक्त कर दो।' तब प्रतापी वीर रुक्मिणीकुमारने उन सबको छोड़ दिया ॥ ५१ ॥

अधोमुखमुखाः सर्वे बद्धमौना नराधिपाः ।
लज्जयाऽभिप्लुता वीरास्तस्थुर्नष्टश्रियस्तदा ॥ ५२ ॥
वे समस्त वीर नरेश अपना मुँह नीचे किये चुपचाप खड़े थे। उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। वे उस समय लज्जामें डूबे हुए थे ॥ ५२ ॥

निकुम्भमपि गोविन्दः प्रयतन्तं जयं प्रति ।
योधयामास भगवान् घोरमात्मरिपुं हरिः ॥ ५३ ॥
पापहारी भगवान् गोविन्द विजयके लिये प्रयत्न करने-वाले अपने घोर शत्रु निकुम्भके साथ युद्ध कर रहे थे ॥५३॥

परिघेनाहतः कृष्णो निकुम्भेन भृशं विभो ।
गदया चापि कृष्णेन निकुम्भस्ताडितो भृशम् ॥ ५४ ॥
प्रभो ! निकुम्भने परिघद्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर बड़े जोरका आघात किया तथा श्रीकृष्णने भी गदाद्वारा निकुम्भ-को बारंबार गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५४ ॥

तावुभौ मोहमापन्नौ सुप्रहारहतौ तदा ।
ततः प्रव्यथितान् दृष्ट्वा पाण्डवांश्चाथ यादवान् ॥ ५५ ॥
जेपुर्मुनिगणास्तत्र कृष्णस्य हितकाम्यया ।
तुष्टुवुश्च महात्मानं वेदप्रोक्तैस्तथा स्तवैः ॥ ५६ ॥
तब एक दूसरेके द्वारा अच्छी तरह किये गये प्रहारोंसे आहत होकर वे दोनों ही मूच्छित हो गये। इससे पाण्डवों और यादवोंको अत्यन्त व्यथित हुआ देख वहाँ खड़े हुए मुनिगण श्रीकृष्णके हितकी कामनासे 'जप' करने लगे तथा उन्होंने वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा परमात्मा श्रीकृष्णका स्तवन किया ॥

ततः प्रत्यागतप्राणो भगवान् केशवस्तदा ।
दानवश्च पुनर्वीरावुद्यतौ समरं प्रति ॥ ५७ ॥
तब भगवान् केशव सजग हो उठे, मानो उनमें पुनः प्राण लौट आये हों। तदनन्तर वह दानव भी होशमें आ गया। फिर वे दोनों वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥ ५७ ॥

वृषभाविव नर्दन्तौ गजाविव च भारत ।
शालावृकाविव क्रुद्धौ प्रहरन्तौ रणोत्कटौ ॥ ५८ ॥
भारत ! वे दोनों रणोन्मत्त वीर साँड़ोंके समान हुँकड़ते, हाथियोंके समान चिग्घाड़ते और भेड़ियोंके समान दहाड़ते हुए क्रोधपूर्वक परस्पर प्रहार करने लगे ॥ ५८ ॥

५५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अथ कृष्णं तदोवाच नृप वागशरीरिणी।
चक्रेण शमयस्वैनं देवब्राह्मणकण्टकम् ॥ ५९ ॥
नरेश्वर ! उस समय आकाशवाणीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'जनार्दन ! यह देवताओं और ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है। तुम अपने चक्रद्वारा इसको नष्ट कर दो' ॥

इति होवाच भगवान् देवो बिल्वोदकेश्वरः।
धर्मं यशश्च विपुलं प्राप्नुहि त्वं महाबल ॥ ६० ॥
यह बात स्वयं भगवान् विल्वोदकेश्वरदेवने कही थी। फिर उन्होंने इस प्रकार कहा—'महाबली श्रीकृष्ण ! तुम ( इस दैत्यको मारकर ) महान् धर्म और विशाल यश प्राप्त करो' ॥ ६० ॥

तथेत्युक्त्वा नमस्कृत्य लोकनाथः सतां गतिः।
सुदर्शनं मुमोचाथ चक्रं दैत्यकुलान्तकम् ॥ ६१ ॥
तब 'जो आज्ञा' कहकर सत्पुरुषोंके आश्रयदाता जगदीश्वर श्रीकृष्णने भगवान् विल्वोदकेश्वरको नमस्कार किया और दैत्यकुलका विनाश करनेवाले सुदर्शन चक्रको निकुम्भपर छोड़ दिया ॥ ६१ ॥

तन्निकुम्भस्य चिच्छेद शिरः प्रवरकुण्डलम्।
नारायणभुजोत्सृष्टं सूर्यमण्डलवर्चसम् ॥ ६२ ॥
श्रीकृष्णके हाथसे छूटे हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी चक्रने उत्तम कुण्डलोंसे अलंकृत निकुम्भका मस्तक काट डाला ॥

उत्पपात शिरस्तस्य भूमौ ज्वलितकुण्डलम्।
मेघमत्तो गिरेः शृङ्गान्मयूर इव भूतले ॥ ६३ ॥
कान्तिमान् कुण्डलोंसे अलंकृत उसका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेघके दर्शनसे उन्मत्त हुआ कोई मोर पर्वतके शिखरसे धरतीपर आ गिरा हो ॥ ६३ ॥

निकुम्भे निहते तस्मिन् देवो बिल्वोदकेश्वरः।
तुतोष च नरव्याघ्र जगत्त्रासकरे विभुः ॥ ६४ ॥
नरव्याघ्र ! जगत्को त्रास देनेवाले उस निकुम्भके मारे जानेपर सर्वव्यापी देव विल्वोदकेश्वर बहुत संतुष्ट हुए ॥६४॥

पपात पुष्पवृष्टिश्च शक्रसृष्टा नभस्तलात्।
देवदुन्दुभयश्चैव प्रणेदुररिनाशने ॥ ६५ ॥
आकाशसे इन्द्रकी बरसायी हुई फूलोंकी वृष्टि होने लगी। उस देवशत्रुका नाश हो जानेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं ॥ ६५ ॥

ननन्द च जगत् कृत्स्नं मुनयश्च विशेषतः।
दैत्यकन्याश्च भगवान् यदुभ्यः शतशो ददौ ॥ ६६ ॥
सम्पूर्ण जगत् आनन्दमग्न हो गया। ऋषि-मुनियोंको विशेष प्रसन्नता हुई ! भगवान् श्रीकृष्णने यादववीरोंको सैकड़ों दैत्य-कन्याएँ दे दीं ॥ ६६ ॥

क्षत्रियाणां च भगवान् सान्त्वयित्वा पुनःपुनः।
रत्नानि च विचित्राणि वासांसि प्रवराणि च ॥ ६७ ॥
अन्य क्षत्रिय राजाओंको भी बारंबार सान्त्वना देकर भगवान्ने विचित्र रत्न और श्रेष्ठ वस्त्र प्रदान किये ॥ ६७ ॥

रथानां वाजिमुक्तानां षट् सहस्राणि केशवः।
अददात् पाण्डवेभ्यश्च प्रीतात्मा गदपूर्वजः ॥ ६८ ॥
गदके बड़े भाई श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंको छः हजार अश्वयुक्त रथ भेंट किये ॥ ६८ ॥

तदेव चाथ प्रवरं षट्पुरं पुरवर्धनः।
द्विजाय ब्रह्मदत्ताय ददौ तार्क्ष्यवरध्वजः ॥ ६९ ॥
नगरकी वृद्धि करनेवाले भगवान् गरुड़ध्वजने वह षट्पुर नामक श्रेष्ठ नगर ब्रह्मदत्त नामक ब्राह्मणको दे दिया ॥

सत्रे समाप्ते च तदा शङ्खचक्रगदाधरः।
विसर्जयित्वा तत् क्षत्रं पाण्डवांश्च महाबलः ॥ ७० ॥
बिल्वोदकेश्वरस्याथ समाजमकरोत् प्रभुः।
मांससूपसमाकीर्णं बह्वन्नं व्यञ्जनाकुलम् ॥ ७१ ॥
यज्ञ समाप्त होनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबली भगवान् श्रीकृष्णने उन क्षत्रियों और पाण्डवोंको विदा करके श्रीबिल्वोदकेश्वरके लिये एक सामूहिक उत्सव किया, जिसमें फलोंके गूदे, दाल तथा अन्यान्य व्यंजनोंसे युक्त बहुत-सा अन्न लोगोंको खिलाया गया ॥ ७०-७१ ॥

नियुद्धकुशलान् मल्लान् देवो मल्लप्रियस्तदा।
योधयित्वा ददौ भूरि वित्तं वस्त्राणि चात्मवान् ॥७२॥
अपने मनको वशमें रखनेवाले मल्लप्रिय भगवान् श्रीकृष्णने युद्धकुशल मल्लोंको लड़वाकर उन्हें बहुत-सा धन और वस्त्र दिये ॥ ७२ ॥

मातापितृभ्यां सहितो यदुभिश्च महाबलः।
अभिवाद्य ब्रह्मदत्तं ययौ द्वारवतीं पुरीम् ॥ ७३ ॥
तदनन्तर महाबली श्रीकृष्ण अपने माता-पिता तथा अन्य यादवोंके साथ ब्रह्मदत्तको प्रणाम करके द्वारकापुरीको चले गये ॥ ७३ ॥

स विवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्।
पुष्पचित्रपथां वीरो वन्द्यमानो नरैः पथि ॥ ७४ ॥
मार्गमें दूसरे लोगोंका प्रणाम स्वीकार करते हुए वीर श्रीकृष्णने हृष्ट पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई तथा पुष्पोंके बिछाये जानेसे विचित्र पथवाली रमणीय पुरी द्वारकामे प्रवेश किया ॥

इमं यः षट्पुरवधं विजयं चक्रपाणिनः।
शृणुयाद् वा पठेद् वापि युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥ ७५ ॥
जो चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णके इस षट्पुर-वधरूप विजयसूचक चरित्रको सुनता अथवा पढ़ता है, वह युद्धमें विजय पाता है ॥ ७५ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः [ ५५३

अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम्।
व्याधितो मुच्यते रोगी बद्धश्चाप्यथ बन्धनात् ॥ ७६ ॥

( इसके श्रवण अथवा पठनसे ) पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन मिलता है। रोगी रोगसे और बंदी बन्धनसे छुटकारा पाता है ॥ ७६ ॥

इदं पुंसवनं प्रोक्तं गर्भाधानं च भारत।
श्राद्धेषु पठितं सम्यगक्षय्यकरणं स्मृतम् ॥ ७७ ॥

भारत ! यह प्रसंग पुंसवन और गर्भाधानमें सहायक कहा गया है ( अर्थात् इसके श्रवणसे पत्नीके गर्भाधान होता और उस गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है)। यदि श्राद्धोंमें इसका सम्यक्रूपसे पाठ किया जाय तो यह उसके फलको अक्षय बनानेवाला माना गया है ॥ ७७ ॥

इदममरवरस्य भारते
प्रथितबलस्य जयं महात्मनः।
सततमिह हि यः पठेन्नरः
सुगतिमितो व्रजते गतज्वरः ॥ ७८ ॥

भारतमें जिनका बल विख्यात है तथा जो देवताओंसे भी श्रेष्ठ हैं, उन महात्मा श्रीकृष्णकी इस विजयगाथाका जो मनुष्य यहाँ सदा पाठ करता है, वह रोग-शोकसे मुक्त हो यहाँसे परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥

मणिकनकविचित्रपाणिपादो
निरतिशयार्कगुणोऽरिहादिनाथः ।
चतुरुदधिशयश्चतुर्विधात्मा
जयति जगत्पुरुषः सहस्रनामा ॥ ७९ ॥

मणि तथा सुवर्णके आभूषण धारण करनेसे जिनके हाथ-पैरोंकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें सूर्यके तेज आदि गुण उनसे भी बहुत अधिक मात्रामें विद्यमान हैं, जो शत्रुओंके नाशक तथा सबके आदिरक्षक हैं, चारों समुद्र जिनके शयनागार हैं तथा जो वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंके रूपमें विद्यमान हैं, वे जगत्के अन्तर्यामी पुरुष सहस्रों नामोंवाले श्रीकृष्ण नित्य विजयशील हैं।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधके प्रसंगमे पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥


षडशीतितमोऽध्यायः

अन्धकासुरकी उत्पत्ति और अनाचार, उसके वधके लिये ऋषियोंका विचार, नारदजीका मन्दार-पुष्पोंकी माला धारण करके अन्धकके यहाँ जाना और उससे मन्दारवनके महत्त्व बताना

जनमेजय उवाच
श्रुतोऽयं षट्पुरवधो रम्यो मुनिवरोत्तम ।
पुरोक्तमन्धकवधं वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥

**जनमेजयने कहा—**मुनिवरोंमें उत्तम वैशम्पायनजी ! षट्पुरवधका यह रमणीय प्रसंग मैंने सुन लिया। अब पहले जिसकी चर्चा हुई थी, उस अन्धक-वधका वृत्तान्त मुझे बताइये ॥ १ ॥

भानुमत्याश्च हरणं निकुम्भस्य वधं तथा ।
प्रब्रूहि वदतां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! भानुमतीके हरणका तथा उस अवसरपर किये गये निकुम्भ-वधका प्रसंग भी सुनाइये; क्योंकि वह सब सुननेके लिये मेरे मनमे बड़ा कौतूहल है ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
दितिर्हतेषु पुत्रेषु विष्णुना प्रभविष्णुना ।
तपसाऽऽराधयामास मारीचं कश्यपं पुरा ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! पहलेकी बात है, प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा जब सभी पुत्र मारे गये, तब देवी दितिने तपस्याके द्वारा मरीचिनन्दन कश्यपजीकी आराधना की ॥ ३ ॥

तपसा कालयुक्तेन तथा शुश्रूषया मुनेः।
आनुकूल्येन च तथा माधुर्येण च भारत ॥ ४ ॥
परितुष्टः कश्यपस्तु तामुवाच तपोधनः ।

भरतनन्दन ! उनकी समयोचित तपस्या, सेवा, अनुकूल बर्ताव तथा माधुर्यसे तपोधन कश्यपजी बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले—॥ ४½ ॥

परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे वरं वरय सुव्रते ॥ ५ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली कल्याणी ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो’ ॥ ५ ॥

दितिरुवाच
हतपुत्रास्मि भगवन् देवैर्धर्मभृतां वर ।
अवध्यं पुत्रमिच्छामि देवैरमितविक्रमम् ॥ ६ ॥

**दिति बोली—**भगवन् ! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ! देवताओंने मेरे सभी पुत्रोंको मार डाला है; अतः मै एक ऐसा अमित पराक्रमी पुत्र चाहती हूँ, जो देवताओंके लिये अवध्य हो ॥ ६॥

कश्यप उवाच
अवध्यस्ते सुतो देवि दाक्षायणि भवेदिति ।
देवानां संशयो नात्र कश्चित् कमललोचने ॥ ७ ॥

५५४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

कश्यपजीने कहा—देवि! दाक्षायणि! कमललोचने! तुम्हारा पुत्र देवताओंके लिये अवध्य होगा, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७ ॥

देवदेवमृते रुद्रं तस्य न प्रभवाम्यहम्।
आत्मा ततस्ते पुत्रेण रक्षितव्यो हि सर्वथा ॥ ८ ॥

किंतु देवाधिदेव रुद्रको छोड़कर (उनके सिवा दूसरा कोई देवता उसे नहीं मार सकेगा), क्योंकि उनपर मेरा प्रभुत्व नहीं चल सकता। अतः तुम्हारे पुत्रको सर्वथा उनसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ८ ॥

अन्वालभत तां देवीं कश्यपः सत्यवागतः।
अङ्गुल्योदरदेशे तु सा पुत्रं सुषुवे ततः ॥ ९ ॥

ऐसा कहकर सत्यवादी कश्यपजीने अपनी अङ्गुलिसे देवी दितिके उदरका स्पर्श किया; इससे उन्होंने एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ९ ॥

सहस्रबाहुं कौरव्य सहस्रशिरसं तथा।
द्विसहस्रेक्षणं चैव तावच्चरणमेव च ॥ १० ॥

कुरुनन्दन! उसके एक हजार भुजाएँ, उतने ही मस्तक, दो सहस्र नेत्र तथा उतने ही चरण थे ॥ १० ॥

स व्रजत्यन्धवद् यस्मादनन्धोऽपि हि भारत।
तमन्धकोऽयं नाम्नेति प्रोचुस्तत्र निवासिनः ॥ ११ ॥

भारत! वह अन्धा नहीं था तो भी अन्धेके समान चलता था; अतः वहाँके निवासी उसे अन्धक नामसे पुकारने लगे ॥ ११ ॥

अवध्योऽस्मीति लोकान् स सर्वान् बाधति भारत।
हरत्यपि च रत्नानि सर्वाण्यात्मबलाश्रयात् ॥ १२ ॥

भरतनन्दन! मैं अवध्य हूँ, ऐसा समझकर वह सब लोगोंको सताने लगा। अपने बलके भरोसे वह (सब जगहसे) सभी रत्नोंको हर लाता था ॥ १२ ॥

वासयत्यात्मवीर्येण निगृह्याप्सरसां गणान्।
स वेश्मन्यूर्जितोऽत्यर्थं सर्वलोकभयंकरः ॥ १३ ॥

समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह दैत्य अत्यन्त शक्तिशाली होनेके कारण अपने बलसे अप्सराओंको पकड़कर अपने घरमें रखता था ॥ १३ ॥

परदारापहरणं पररत्नविलोपनम्।
चकार सततं मोहादन्धकः पापनिश्चयः ॥ १४ ॥

पापपूर्ण विचार रखनेवाले अन्धकने मोहवश परस्त्रियोंके अपहरण करने और पराये धनको लूट लानेका धंधा सदाके लिये अपना लिया ॥ १४ ॥

त्रैलोक्यविजयं कर्तुमुद्यतः स तु भारत।
सहायैरसुरैः सार्धं बहुभिः सर्वदर्पिभिः ॥ १५ ॥

भारत! एक बार अन्धक सबका तिरस्कार करनेवाले बहुत-से सहायक असुरोंके साथ तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेको उद्यत हुआ ॥ १५ ॥

तच्छ्रुत्वा भगवान् शक्रः कश्यपं पितरं ब्रवीत्।
अन्धकेनेदमरब्धमीदृशं मुनिसत्तम ॥ १६ ॥

वह समाचार सुनकर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा---'मुनिश्रेष्ठ! अन्धकासुरने ऐसा कार्य आरम्भ किया है ॥ १६ ॥

आज्ञापय विभो कार्यमस्माकं समनन्तरम्।
यवीयसः कथं नाम सोढव्यं स्यान्मुने मया ॥ १७ ॥

'प्रभो! हम लोगोंका क्या कर्तव्य है, उसके लिये आज्ञा दीजिये। मुने! छोटे भाईका यह दुराचार मुझसे कैसे सहा जायगा ? ॥ १७ ॥

इष्टपुत्रे प्रहर्तव्यं कथं नाम मया विभो।
इहात्रभवती कुर्यान्मन्युं मयि हते सुते ॥ १८ ॥

'प्रभो! यह मौसीजीका प्रिय पुत्र है। इसपर मैं कैसे प्रहार कर सकता हूँ? अपने पुत्रके मेरे द्वारा मारे जानेपर पूजनीया मौसी यहाँ मुझपर क्रोध करेंगी' ॥ १८ ॥

देवेन्द्रवचनं श्रुत्वा कश्यपोऽथाब्रवीन्मुनिः।
वारयिष्यामि देवेन्द्र सर्वथा भद्रमस्तु ते ॥ १९ ॥

देवराजकी यह बात सुनकर कश्यप मुनिने कहा—'देवेन्द्र! मैं अन्धकको सर्वथा रोक दूँगा। तुम्हारा कल्याण हो'॥

अन्धकं वारयामास दित्या सह तु कश्यपः।
त्रैलोक्यविजयाद् वीरं कृच्छ्रात्कृच्छ्रेण भारत ॥ २० ॥

भरतनन्दन! तदनन्तर कश्यपजीने दितिके साथ जाकर वीर अन्धकको बड़ी कठिनाईसे त्रिभुवनविजयके उद्योगसे रोका ॥ २० ॥

वारितोऽपि स दुष्टात्मा बाधत्येव दिवौकसः।
तैस्तैरुपायैर्दुष्टात्मा प्रमथ्य च तथामरान् ॥ २१ ॥

उनके मना करनेपर भी वह दुष्टात्मा उन-उन उपायोंसे स्वर्गवासी देवताओंको मथकर सताता ही रहा ॥ २१ ॥

बभञ्ज कानने वृक्षानुद्यानानि च दुर्मतिः।
उच्चैःश्रवःसुतानश्वान् बलादप्यानयद् दिवः ॥ २२ ॥

उस दुर्बुद्धिने नन्दनवनके वृक्षों और उद्यानोंको उजाड़ डाला। उच्चैःश्रवाके वंशज अश्वोंको वह स्वर्गसे बलपूर्वक हाँक लाया ॥ २२ ॥

नागान् दिशागजसुतान् दिव्यान्पि च भारत।
बलाद्धरति देवानां पश्यतां वरदर्पितः ॥ २३ ॥

भारत! वरके घमंडमें भरा हुआ वह दैत्य देवताओंके देखते-देखते दिग्गजकी संतानभूत दिव्य हाथियोंको बलपूर्वक हर लाता था ॥ २३ ॥

[विष्णुपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः ५५५

देवानामप्याययन्ते तु ये यज्ञैस्तपसा तथा।
तेषां चकार विघ्नं स दुष्टात्मा देवकण्टकः॥ २४॥
देवताओंके लिये कण्टकरूप वह दुष्टात्मा दैत्य जो लोग यज्ञ और तपस्याद्वारा देवताओंको पुष्ट करते थे, उनके उस अनुष्ठानमें विघ्न डाल देता था॥ २४॥

नेजुर्यज्ञैस्त्रयो वर्णास्तेपुश्च न तपांस्यपि।
अन्धकस्य भयाद् राजन् यज्ञविघ्नानि कुर्वतः॥ २५॥
राजन्! तीनों वर्णोंके लोग यज्ञोंमें विघ्न डालनेवाले अन्धकासुरके भयसे न तो यज्ञ कर पाते थे और न तपस्या ही॥

तस्येच्छया वाति वायुरादित्यश्च तप्त्युत।
चन्द्रमा वा सनक्षत्रो दृश्यते नैव वा पुनः॥ २६॥
वायु उसकी इच्छाके अनुसार चलती थी। सूर्य भी उसकी रुचिके अनुसार ही तपते थे तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उसकी इच्छासे ही दीखते अथवा नहीं दीखते थे॥

न व्रजन्ति विमानानि विहायसि भयात् प्रभो।
अन्धकस्यातिघोरस्य बलदृप्तस्य दुर्मतेः॥ २७॥
प्रभो! बलके घमंडमें भरे हुए खोटी बुद्धिवाले अत्यन्त घोर अन्धकासुरके भयसे आकाशमें विमान नहीं चलने पाते थे॥ २७॥

निरोङ्कारवषट्कारं जगद् वीर तथाभवत्।
अन्धकस्यातिघोरस्य भयात् कुरुकुलोद्वह ॥ २८॥
कुरुकुल-धुरन्धर वीर! अत्यन्त भयानक अन्धकासुरके भयसे सारा जगत् ॐकार और वषट्कारकी ध्वनिसे शून्य हो गया॥ २८॥

कुरूंस्तथोत्तरान् पापो द्रावयामास भारत।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च जम्बूद्वीपांस्तथैव च ॥ २९॥
भारत! वह पापी उत्तरकुरु, भद्राश्व, केतुमाल तथा जम्बूद्वीपके अन्य प्रदेशोंपर भी धावा बोला करता था ॥२९॥

मानयन्ति च तं देवा दानवांश्च दुरासदाः।
भूतानि च तथान्यानि समर्थान्यपि सर्वथा ॥ ३०॥
दुर्जय देवता और दानव भी उसका सम्मान करते थे तथा अन्यान्य भूत सर्वथा समर्थ होनेपर भी उसका आदर करते थे ॥ ३०॥

ऋषयो वध्यमानास्तु समेता ब्रह्मवादिनः।
अचिन्तयन्नन्धकस्य वधं धर्मभृतां वर ॥ ३१॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! उसके द्वारा मारे और सताये जानेवाले ब्रह्मवादी ऋषि एकत्र हो अन्धकासुरके वधका उपाय सोचने लगे॥ ३१॥

तेषां बृहस्पतिर्मध्ये धीमानिदमथाब्रवीत्।
नास्य रुद्रादृते मृत्युर्विद्यते च कथंचन ॥ ३२॥

तथा वरे दीयमाने कश्यपेनापि शब्दितः।
नाहं रुद्रात् परित्रातुं शक्त इत्येव धीमतः॥ ३३॥
उन ऋषियोंमें बुद्धिमान् बृहस्पति भी थे। उन्होंने इस प्रकार कहा—'इस असुरकी मृत्यु रुद्रदेवके सिवा दूसरेके हाथसे किसी तरह नहीं हो सकती। दितिको वर देते समय महर्षि कश्यपने भी यह बात कह दी थी। मैं भगवान् रुद्रसे इसकी रक्षा नहीं कर सकता। यही बुद्धिमान् कश्यपजीका वचन है॥ ३२-३३॥

तमुपायं चिन्तयामः शर्वो येन सनातनः।
जानीयात् सर्वभूतानि पीड्यमानानि शङ्करः॥ ३४॥
'अतः हमलोग उस उपायपर विचार करें, जिससे दुष्टोंका संहार करनेवाले सनातन देव भगवान् शङ्करको यह पता लग जाय कि अन्धकासुरके अत्याचारसे समस्त प्राणी पीडित हो रहे हैं॥ ३४॥

विदितार्थो हि भगवानवश्यं जगतः प्रभुः।
अश्रुप्रमार्जनं देवः करिष्यति सतां गतिः॥ ३५॥
'भगवान् रुद्रदेव इस जगत्के स्वामी और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। जब उन्हें इस बातका पता चल जायगा, तब वे अवश्य सबके आँसू पोंछेंगे (अन्धकासुरको मारकर जगत्का दुःख दूर कर देंगे)॥ ३५॥

व्रतं हि देवदेवस्य भवस्य जगतो गुरोः।
सन्तोऽसद्भ्यो रक्षितव्या ब्राह्मणास्तु विशेषतः॥३६॥
'उन देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् शिवका यह व्रत है कि दुष्टोंसे साधु पुरुषोंकी, विशेषतः ब्राह्मणोंकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये॥ ३६॥

ते वयं नारदं सर्वे प्रयामो शरणं द्विजम्।
उपायं वेत्स्यते तत्र वयस्यो हि भवस्य सः॥ ३७॥
'अतः हम सब लोग नारद बाबाकी शरणमें चलें। वे ही इसका उपाय जानते होंगे; क्योंकि वे भगवान् शङ्करके मित्र हैं'॥ ३७॥

बृहस्पतिवचः श्रुत्वा सर्वेऽप्यथ तपोधनाः।
तावद् ददृशुराकाशे प्राप्तं देवर्षिसत्तमम् ॥ ३८॥
बृहस्पतिकी बात सुनकर उन सभी तपोधनोंने जब आकाशमे दृष्टि डाली तो देखा देवर्षिशिरोमणि नारद स्वयं आ पहुँचे हैं॥ ३८॥

पूजयित्वा यथान्याय सत्कृत्य विधिवन्मुनिम्।
देवर्षे भगवन् साधो कैलासं व्रज सत्वरम्॥ ३९॥
विज्ञाप्तुमर्हसे देवमन्धकस्य वधे हरम्।
उन्होंने नारद मुनिका यथोचित रीतिसे पूजन और विधिवत् सत्कार करके कहा—'देवर्षे! भगवन्! साधो! आप शीघ्र कैलास पर्वतको चले जाइये और अन्धकासुरका वध

५५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेके लिये भगवान् शङ्करको आवश्यक सूचना दीजिये। आप ही इस कार्यके योग्य हैं' ॥ ३९३ ॥
त्राणार्थं नारदं प्रोचुस्तांस्तथेति स चोक्तवान् ॥ ४० ॥
ऋषिष्वथ प्रयातेषु तत्कार्यं नारदो मुनिः।
विचार्य मनसा विद्वानिति कार्यं स दृष्टवान् ॥ ४१ ॥

उन ऋषियोंने नारदजीसे कहा—'आप जगत्‌की रक्षाके लिये प्रयत्नशील हों।' तब नारद मुनिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। ऋषियोंके चले जानेपर उन विद्वान् मुनिने उस कार्यके विषयमें मन ही मन विचार करके यह देख और समझ लिया कि इस विषयमें अपनेको क्या करना है ? ॥ ४०-४१ ॥

स देवदेवं भगवान् द्रष्टुं मुनिरथाययौ।
मन्दारवनमध्यस्थो यत्र नित्यो वृषध्वजः ॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् भगवान् नारद मुनि देवाधिदेव महादेवजीका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ नित्य भगवान् वृषध्वज मन्दारवनमे विराजमान होते हैं ॥ ४२ ॥

स तत्र रजनीमेकामुषित्वा मुनिसत्तमः।
मन्दाराणां वने रम्ये दयितः शूलपाणिनः ॥ ४३ ॥
आजगाम पुनः स्वर्गे लब्ध्वानुज्ञां वृषध्वजात्।

भगवान् शूलपाणिके प्रिय-सखा मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ मन्दारोंके उस रमणीय वनमें एक रात रहकर भगवान् शिवसे आज्ञा ले पुनः स्वर्गलोकको लौट आये ॥ ४३३ ॥

मन्दारपुष्पैः सुकृतां मालामाबध्य भारत ॥ ४४ ॥
ग्रथितां सविशेषां तां सर्वगन्धोत्तमोत्तमाम्।

भरतनन्दन ! उन्होंने अपने गलेमें मन्दार-पुष्पोंद्वारा अच्छी तरह बनायी गयी और विशेष कलाके साथ गूँथी गयी माला धारण कर रक्खी थी, जिसकी सुगन्ध सभी श्रेष्ठ सुगन्धोंसे परम उत्तम थी ॥ ४४३ ॥

संतानमाल्यदामाथ तैरेव कुसुमैः कृतम् ॥ ४५ ॥
तच्च कण्ठे समासन्य महागन्धं नराधिप।
आययावन्धको यत्र दुरात्मा बलदर्पितः ॥ ४६ ॥

नरेश्वर ! उन्होंने संतान-मालाकी लड़ियाँ भी गलेमें डाल रक्खी थीं, जो उन्हीं संतान-कुसुमोंमे बनी हुई थीं। उससे भी बड़ी सुगन्ध फैल रही थी। उन मालाओंको धारण करके वे उस स्थानपर आये, जहाँ बलके घमण्डमें भरा हुआ दुरात्मा अन्धकासुर रहता था ॥ ४५-४६ ॥

अन्धकस्त्वथ तं दृष्ट्वा गन्धमाघ्राय चोत्तमम्।
संतानकानां स्रङ्मालां महागन्धां महामुने।
कुत्रायं पुष्पजातिर्वा कमनीया तपोधन ॥ ४७ ॥

अन्धकासुरने नारदजीको देखकर उस उत्तम सुगन्धका अनुभव करके महान् गन्धसे भरी हुई संतान-पुष्पोंकी माला-पर भी दृष्टि डाली और पूछा—'महामुने ! तपोधन ! यह कमनीय पुष्पोंकी जाति कहाँ उपलब्ध होती है ? ॥ ४७ ॥

गन्धान् वर्णानिष्टमांस्तान् हि भोः पुण्यति मुहुर्मुहुः।
स्वर्गे संतानकुसुमान्यतिवर्तति सर्वथा ॥ ४८ ॥

'अजी ! यह तो बारंबार अपने सुन्दर वर्णों और मनोहर गन्धोंकी पुष्टि कर रही है। स्वर्गमें जो संतानपुष्प उपलब्ध होते हैं, उनसे तो ये पुष्प सर्वथा बढ़-चढ़कर हैं ॥ ४८ ॥

कः प्रभुरस्तस्य वृक्षस्य शक्यं चाऽऽनयितुं मुने।
आचक्ष्व यद्यनुग्राह्या वयं ते देवतातिथे ॥ ४९ ॥

'मुने ! देवताओंके अतिथि नारद ! उस वृक्षका स्वामी कौन है ? क्या यह पुष्प वहाँसे लाया जा सकता है ? यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँतो आप मुझे इसका पता बताइये' ४९

तमुवाच मुनिश्रेष्ठः प्रहसन्निव भारत।
आदाय दक्षिणे हस्ते महत्तस्तपसो निधिः ॥ ५० ॥

भरतनन्दन ! तब महान् तपकी निधि मुनिश्रेष्ठ नारदने अन्धकासुरका दाहिना हाथ पकड़कर हँसते हुए-से कहा-।५०।

मन्दरे पर्वतश्रेष्ठे धीर कामगमं वनम्।
तत्र चैवंविधं पुष्पं भोः सृष्टिः शूलपाणिनः ॥ ५१ ॥

'वीर ! पर्वतप्रवर मन्दराचलपर एक इच्छानुसार चलनेवाला वन है। उसीमें इस तरहके फूल हैं। अजी ! वह वन साक्षात् शूलपाणि भगवान् शङ्करकी सृष्टि है ॥ ५१ ॥

न तु तत्र वनं कश्चिदृच्छन्देन महात्मनः।
प्रवेष्टुं लभते तद्धि रक्षन्ति प्रवरोत्तमाः ॥ ५२ ॥

'वहाँ उस वनमें महात्मा शिवजीकी इच्छाके बिना कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि उनके श्रेष्ठ पार्षद उसकी रक्षा करते हैं ॥ ५२ ॥

नानाप्रहरणा घोरा नानावेशा दुरासदाः।
अवध्याः सर्वभूतानां महादेवाभिरक्षिताः ॥ ५३ ॥

'वे नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये रहते हैं। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर है तथा उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। महादेवजीसे सुरक्षित होनेके कारण वे सभी प्राणियोंके लिये अवध्य हैं ॥ ५३ ॥

नित्यं प्रक्रीडते तत्र सोमः सप्रवरो हरः।
मन्दारद्रुमखण्डेषु सर्वात्मा सर्वभावनः ॥ ५४ ॥

'वहाँ मन्दार-वृक्षोंके बगीचोंमें उमासहित सर्वात्मा सर्वभावन महादेवजी नित्य क्रीड़ा करते और अपने पार्षदोंके साथ रहते हैं ॥ ५४ ॥

तपोविशेषैराराध्य हरं त्रिभुवनेश्वरम्।
शक्यं मन्दारपुष्पाणि प्राप्तुं कश्यपवंशज ॥ ५५ ॥

'कश्यपकुमार ! विशेष तपस्याके द्वारा तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवकी आराधना करके ही ये मन्दारपुष्प प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ ५५ ॥

विष्णुपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ ५५७


स्त्रीरत्नमणिरत्नानि यानि चान्यानि चाप्यथ ।
काङ्क्षितानि फलन्ति स्म ते द्रुमा हरवल्लभाः ॥ ५६ ॥

'वे सभी वृक्ष भगवान् शङ्करके प्रिय हैं और स्त्रीरत्न, मणिरत्न तथा अन्य जो-जो अभिलषित पदार्थ हैं, उन सबको वे फलरूपसे प्रस्तुत करते हैं ॥ ५६ ॥

न तत्र सूर्यः सोमोऽथ तपत्यतुलविक्रम ।
स्वयंप्रभं तरुवनं तद् भो दुःखविवर्जितम् ॥ ५७ ॥

'अतुल पराक्रमी दैत्य ! वहाँ मन्दारवनमें न तो सूर्य तपते हैं और न चन्द्रमा ही प्रकाश करते हैं । मन्दार-वृक्षोंसे भरा हुआ वह वन स्वयं अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है । वहाँ दुःख-शोकका प्रवेश नहीं है ॥ ५७ ॥

तत्र गन्धान् स्रवन्त्यन्ये नीराण्यन्ये महाद्रुमाः ।
वासांसि विविधान्यन्ये सुगन्धीनि महाबल ॥ ५८ ॥

'महाबली अन्धक ! वहाँ कुछ वृक्ष ऐसे हैं, जो उत्तम सुगन्ध उत्पन्न करते हैं, दूसरे विशाल वृक्ष जल प्रकट करते हैं तथा अन्य वृक्ष नाना प्रकारके सुगन्धित वस्त्र प्रदान करते हैं ॥ ५८ ॥

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यं तथैव च ।
तरुभ्यः स्रवते तेभ्यो विविधं मनसेप्सितम् ॥ ५९ ॥

'इतना ही नहीं, उन वृक्षोंसे भाँति-भाँतिके मनोवाञ्छित भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥

पिपासा वा क्षुभुक्षा वा ग्लानिर्निद्रापि वानघ ।
न मन्दारवने वीर भवतीत्युपधार्यताम् ॥ ६० ॥

'निष्पाप वीर ! तुम यह समझ लो कि उस मन्दारवनमें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा चिन्ता भी नहीं फटकने पाती है ६०

न ते वर्णयितुं शक्या गुणा वर्षशतैरपि ।
गुणा ये तत्र वर्द्धन्ते स्वर्गाद् बहुगुणोत्तराः ॥ ६१ ॥
अतीव हि जयेल्लोकान् समहेन्द्रान् न संशयः ।
एकाहमपि यस्तत्र वसेच्च दितिजोत्तम ॥ ६२ ॥

'वहाँ स्वर्गसे कई गुने उत्तम जो गुण दिनोंदिन बढ़ते हैं, उनका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता । दैत्यप्रवर ! जो वहाँ एक दिन भी निवास कर लेगा, वह महेन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकोंपर अतिशय विजय प्राप्त कर लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६१-६२ ॥

स्वर्गस्यापि हि तत् स्वर्गं सुखानाम्पि तत् सुखम् ।
बभूव जगतः सर्वमिति मे धीयते मनः ॥ ६३ ॥

'वह स्वर्गका भी स्वर्ग और समस्त सुखोंका भी सुख है। मेरे मनका तो ऐसा विश्वास है कि वही सम्पूर्ण जगत्का सर्वस्व-सार है' ॥ ६३ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥


सप्ताशीतितमोऽध्यायः

मन्दराचलपर गये हुए अन्धकासुरका महादेवजीद्वारा वध

वैशम्पायन उवाच

अन्धको नारदवचः श्रुत्वा तत्त्वेन भारत ।
मन्दरं पर्वत गन्तुं मनो दध्रे महासुरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत ! नारदजीकी बातको ठीकसे सुनकर महान् असुर अन्धकने मन्दराचलपर जानेका विचार किया ॥ १ ॥

सोऽसुरान् सुमहातेजाः समानीय महाबलः ।
जगाम मन्दरं क्रुद्धो महादेवालयं तदा ॥ २ ॥
वह महातेजस्वी, महाबली दैत्य बहुत से असुरोंको एकत्र करके कुपित हो उस समय महादेवजीके निवासस्थान मन्दरपर्वतपर गया ॥ २ ॥

तं महाभ्रप्रतिच्छन्नं महौषधिसमाकुलम् ।
नानासिद्धसमाकीर्णं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३ ॥
वह पर्वत बड़े-बड़े मेघोंसे आच्छादित, महौषधियोंसे सम्पन्न, नाना प्रकारके सिद्धोंसे भरा हुआ और महर्षियोंके समुदायसे सेवित था ॥ ३ ॥

चन्दनागुरुवृक्षाढ्यं सरलद्रुमसंकुलम् ।
किन्नरोद्गीतरम्यं च बहुनागकुलाकुलम् ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर चन्दन और अगुरुके वृक्ष शोभा पाते थे । सरल (चीड़) के वृक्ष सर्वत्र फैले हुए थे । किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये जानेवाले मधुर गीतोंमें उसकी रमणीयता बढ़ गयी थी । वह बहुत-से नागकुलो (हाथियों अथवा सर्पों) से व्याप्त था ॥ ४ ॥

वातोद्धूतैर्वनैः फुल्लैर्नृत्यन्तमिव च क्वचित् ।
प्रसूतैर्धातुभिश्चित्रैर्विलेपितमिव च क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं वायुके वेगसे कम्पित हुए प्रफुल्ल काननोंद्वारा वह नृत्य करता-सा जान पड़ता था । कहीं पिघलकर बहे हुए विचित्र धातुओंके कारण वह चन्दन आदिसे चर्चित हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५ ॥

पक्षिखनैः सुमधुरैर्नदन्तमिव च क्वचित् ।
हंसैः शुचिपदैः कीर्णे सम्पतद्भिरितस्ततः ॥ ६ ॥
कहीं पक्षियोंके अत्यन्त मधुर शब्दोंसे वह पर्वत गरजता