विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 575, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः [ ५५३
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम्।
व्याधितो मुच्यते रोगी बद्धश्चाप्यथ बन्धनात् ॥ ७६ ॥
( इसके श्रवण अथवा पठनसे ) पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन मिलता है। रोगी रोगसे और बंदी बन्धनसे छुटकारा पाता है ॥ ७६ ॥
इदं पुंसवनं प्रोक्तं गर्भाधानं च भारत।
श्राद्धेषु पठितं सम्यगक्षय्यकरणं स्मृतम् ॥ ७७ ॥
भारत ! यह प्रसंग पुंसवन और गर्भाधानमें सहायक कहा गया है ( अर्थात् इसके श्रवणसे पत्नीके गर्भाधान होता और उस गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है)। यदि श्राद्धोंमें इसका सम्यक्रूपसे पाठ किया जाय तो यह उसके फलको अक्षय बनानेवाला माना गया है ॥ ७७ ॥
इदममरवरस्य भारते
प्रथितबलस्य जयं महात्मनः।
सततमिह हि यः पठेन्नरः
सुगतिमितो व्रजते गतज्वरः ॥ ७८ ॥
भारतमें जिनका बल विख्यात है तथा जो देवताओंसे भी श्रेष्ठ हैं, उन महात्मा श्रीकृष्णकी इस विजयगाथाका जो मनुष्य यहाँ सदा पाठ करता है, वह रोग-शोकसे मुक्त हो यहाँसे परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥
मणिकनकविचित्रपाणिपादो
निरतिशयार्कगुणोऽरिहादिनाथः ।
चतुरुदधिशयश्चतुर्विधात्मा
जयति जगत्पुरुषः सहस्रनामा ॥ ७९ ॥
मणि तथा सुवर्णके आभूषण धारण करनेसे जिनके हाथ-पैरोंकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें सूर्यके तेज आदि गुण उनसे भी बहुत अधिक मात्रामें विद्यमान हैं, जो शत्रुओंके नाशक तथा सबके आदिरक्षक हैं, चारों समुद्र जिनके शयनागार हैं तथा जो वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंके रूपमें विद्यमान हैं, वे जगत्के अन्तर्यामी पुरुष सहस्रों नामोंवाले श्रीकृष्ण नित्य विजयशील हैं।
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधके प्रसंगमे पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
षडशीतितमोऽध्यायः
अन्धकासुरकी उत्पत्ति और अनाचार, उसके वधके लिये ऋषियोंका विचार, नारदजीका मन्दार-पुष्पोंकी माला धारण करके अन्धकके यहाँ जाना और उससे मन्दारवनके महत्त्व बताना
जनमेजय उवाच
श्रुतोऽयं षट्पुरवधो रम्यो मुनिवरोत्तम ।
पुरोक्तमन्धकवधं वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**मुनिवरोंमें उत्तम वैशम्पायनजी ! षट्पुरवधका यह रमणीय प्रसंग मैंने सुन लिया। अब पहले जिसकी चर्चा हुई थी, उस अन्धक-वधका वृत्तान्त मुझे बताइये ॥ १ ॥
भानुमत्याश्च हरणं निकुम्भस्य वधं तथा ।
प्रब्रूहि वदतां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! भानुमतीके हरणका तथा उस अवसरपर किये गये निकुम्भ-वधका प्रसंग भी सुनाइये; क्योंकि वह सब सुननेके लिये मेरे मनमे बड़ा कौतूहल है ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
दितिर्हतेषु पुत्रेषु विष्णुना प्रभविष्णुना ।
तपसाऽऽराधयामास मारीचं कश्यपं पुरा ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! पहलेकी बात है, प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा जब सभी पुत्र मारे गये, तब देवी दितिने तपस्याके द्वारा मरीचिनन्दन कश्यपजीकी आराधना की ॥ ३ ॥
तपसा कालयुक्तेन तथा शुश्रूषया मुनेः।
आनुकूल्येन च तथा माधुर्येण च भारत ॥ ४ ॥
परितुष्टः कश्यपस्तु तामुवाच तपोधनः ।
भरतनन्दन ! उनकी समयोचित तपस्या, सेवा, अनुकूल बर्ताव तथा माधुर्यसे तपोधन कश्यपजी बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले—॥ ४½ ॥
परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे वरं वरय सुव्रते ॥ ५ ॥
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली कल्याणी ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो’ ॥ ५ ॥
दितिरुवाच
हतपुत्रास्मि भगवन् देवैर्धर्मभृतां वर ।
अवध्यं पुत्रमिच्छामि देवैरमितविक्रमम् ॥ ६ ॥
**दिति बोली—**भगवन् ! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ! देवताओंने मेरे सभी पुत्रोंको मार डाला है; अतः मै एक ऐसा अमित पराक्रमी पुत्र चाहती हूँ, जो देवताओंके लिये अवध्य हो ॥ ६॥
कश्यप उवाच
अवध्यस्ते सुतो देवि दाक्षायणि भवेदिति ।
देवानां संशयो नात्र कश्चित् कमललोचने ॥ ७ ॥