विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५५४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कश्यपजीने कहा—देवि! दाक्षायणि! कमललोचने! तुम्हारा पुत्र देवताओंके लिये अवध्य होगा, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७ ॥
देवदेवमृते रुद्रं तस्य न प्रभवाम्यहम्।
आत्मा ततस्ते पुत्रेण रक्षितव्यो हि सर्वथा ॥ ८ ॥
किंतु देवाधिदेव रुद्रको छोड़कर (उनके सिवा दूसरा कोई देवता उसे नहीं मार सकेगा), क्योंकि उनपर मेरा प्रभुत्व नहीं चल सकता। अतः तुम्हारे पुत्रको सर्वथा उनसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ८ ॥
अन्वालभत तां देवीं कश्यपः सत्यवागतः।
अङ्गुल्योदरदेशे तु सा पुत्रं सुषुवे ततः ॥ ९ ॥
ऐसा कहकर सत्यवादी कश्यपजीने अपनी अङ्गुलिसे देवी दितिके उदरका स्पर्श किया; इससे उन्होंने एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ९ ॥
सहस्रबाहुं कौरव्य सहस्रशिरसं तथा।
द्विसहस्रेक्षणं चैव तावच्चरणमेव च ॥ १० ॥
कुरुनन्दन! उसके एक हजार भुजाएँ, उतने ही मस्तक, दो सहस्र नेत्र तथा उतने ही चरण थे ॥ १० ॥
स व्रजत्यन्धवद् यस्मादनन्धोऽपि हि भारत।
तमन्धकोऽयं नाम्नेति प्रोचुस्तत्र निवासिनः ॥ ११ ॥
भारत! वह अन्धा नहीं था तो भी अन्धेके समान चलता था; अतः वहाँके निवासी उसे अन्धक नामसे पुकारने लगे ॥ ११ ॥
अवध्योऽस्मीति लोकान् स सर्वान् बाधति भारत।
हरत्यपि च रत्नानि सर्वाण्यात्मबलाश्रयात् ॥ १२ ॥
भरतनन्दन! मैं अवध्य हूँ, ऐसा समझकर वह सब लोगोंको सताने लगा। अपने बलके भरोसे वह (सब जगहसे) सभी रत्नोंको हर लाता था ॥ १२ ॥
वासयत्यात्मवीर्येण निगृह्याप्सरसां गणान्।
स वेश्मन्यूर्जितोऽत्यर्थं सर्वलोकभयंकरः ॥ १३ ॥
समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह दैत्य अत्यन्त शक्तिशाली होनेके कारण अपने बलसे अप्सराओंको पकड़कर अपने घरमें रखता था ॥ १३ ॥
परदारापहरणं पररत्नविलोपनम्।
चकार सततं मोहादन्धकः पापनिश्चयः ॥ १४ ॥
पापपूर्ण विचार रखनेवाले अन्धकने मोहवश परस्त्रियोंके अपहरण करने और पराये धनको लूट लानेका धंधा सदाके लिये अपना लिया ॥ १४ ॥
त्रैलोक्यविजयं कर्तुमुद्यतः स तु भारत।
सहायैरसुरैः सार्धं बहुभिः सर्वदर्पिभिः ॥ १५ ॥
भारत! एक बार अन्धक सबका तिरस्कार करनेवाले बहुत-से सहायक असुरोंके साथ तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेको उद्यत हुआ ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् शक्रः कश्यपं पितरं ब्रवीत्।
अन्धकेनेदमरब्धमीदृशं मुनिसत्तम ॥ १६ ॥
वह समाचार सुनकर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा---'मुनिश्रेष्ठ! अन्धकासुरने ऐसा कार्य आरम्भ किया है ॥ १६ ॥
आज्ञापय विभो कार्यमस्माकं समनन्तरम्।
यवीयसः कथं नाम सोढव्यं स्यान्मुने मया ॥ १७ ॥
'प्रभो! हम लोगोंका क्या कर्तव्य है, उसके लिये आज्ञा दीजिये। मुने! छोटे भाईका यह दुराचार मुझसे कैसे सहा जायगा ? ॥ १७ ॥
इष्टपुत्रे प्रहर्तव्यं कथं नाम मया विभो।
इहात्रभवती कुर्यान्मन्युं मयि हते सुते ॥ १८ ॥
'प्रभो! यह मौसीजीका प्रिय पुत्र है। इसपर मैं कैसे प्रहार कर सकता हूँ? अपने पुत्रके मेरे द्वारा मारे जानेपर पूजनीया मौसी यहाँ मुझपर क्रोध करेंगी' ॥ १८ ॥
देवेन्द्रवचनं श्रुत्वा कश्यपोऽथाब्रवीन्मुनिः।
वारयिष्यामि देवेन्द्र सर्वथा भद्रमस्तु ते ॥ १९ ॥
देवराजकी यह बात सुनकर कश्यप मुनिने कहा—'देवेन्द्र! मैं अन्धकको सर्वथा रोक दूँगा। तुम्हारा कल्याण हो'॥
अन्धकं वारयामास दित्या सह तु कश्यपः।
त्रैलोक्यविजयाद् वीरं कृच्छ्रात्कृच्छ्रेण भारत ॥ २० ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर कश्यपजीने दितिके साथ जाकर वीर अन्धकको बड़ी कठिनाईसे त्रिभुवनविजयके उद्योगसे रोका ॥ २० ॥
वारितोऽपि स दुष्टात्मा बाधत्येव दिवौकसः।
तैस्तैरुपायैर्दुष्टात्मा प्रमथ्य च तथामरान् ॥ २१ ॥
उनके मना करनेपर भी वह दुष्टात्मा उन-उन उपायोंसे स्वर्गवासी देवताओंको मथकर सताता ही रहा ॥ २१ ॥
बभञ्ज कानने वृक्षानुद्यानानि च दुर्मतिः।
उच्चैःश्रवःसुतानश्वान् बलादप्यानयद् दिवः ॥ २२ ॥
उस दुर्बुद्धिने नन्दनवनके वृक्षों और उद्यानोंको उजाड़ डाला। उच्चैःश्रवाके वंशज अश्वोंको वह स्वर्गसे बलपूर्वक हाँक लाया ॥ २२ ॥
नागान् दिशागजसुतान् दिव्यान्पि च भारत।
बलाद्धरति देवानां पश्यतां वरदर्पितः ॥ २३ ॥
भारत! वरके घमंडमें भरा हुआ वह दैत्य देवताओंके देखते-देखते दिग्गजकी संतानभूत दिव्य हाथियोंको बलपूर्वक हर लाता था ॥ २३ ॥