भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 577

[विष्णुपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः ५५५

देवानामप्याययन्ते तु ये यज्ञैस्तपसा तथा।
तेषां चकार विघ्नं स दुष्टात्मा देवकण्टकः॥ २४॥
देवताओंके लिये कण्टकरूप वह दुष्टात्मा दैत्य जो लोग यज्ञ और तपस्याद्वारा देवताओंको पुष्ट करते थे, उनके उस अनुष्ठानमें विघ्न डाल देता था॥ २४॥

नेजुर्यज्ञैस्त्रयो वर्णास्तेपुश्च न तपांस्यपि।
अन्धकस्य भयाद् राजन् यज्ञविघ्नानि कुर्वतः॥ २५॥
राजन्! तीनों वर्णोंके लोग यज्ञोंमें विघ्न डालनेवाले अन्धकासुरके भयसे न तो यज्ञ कर पाते थे और न तपस्या ही॥

तस्येच्छया वाति वायुरादित्यश्च तप्त्युत।
चन्द्रमा वा सनक्षत्रो दृश्यते नैव वा पुनः॥ २६॥
वायु उसकी इच्छाके अनुसार चलती थी। सूर्य भी उसकी रुचिके अनुसार ही तपते थे तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उसकी इच्छासे ही दीखते अथवा नहीं दीखते थे॥

न व्रजन्ति विमानानि विहायसि भयात् प्रभो।
अन्धकस्यातिघोरस्य बलदृप्तस्य दुर्मतेः॥ २७॥
प्रभो! बलके घमंडमें भरे हुए खोटी बुद्धिवाले अत्यन्त घोर अन्धकासुरके भयसे आकाशमें विमान नहीं चलने पाते थे॥ २७॥

निरोङ्कारवषट्कारं जगद् वीर तथाभवत्।
अन्धकस्यातिघोरस्य भयात् कुरुकुलोद्वह ॥ २८॥
कुरुकुल-धुरन्धर वीर! अत्यन्त भयानक अन्धकासुरके भयसे सारा जगत् ॐकार और वषट्कारकी ध्वनिसे शून्य हो गया॥ २८॥

कुरूंस्तथोत्तरान् पापो द्रावयामास भारत।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च जम्बूद्वीपांस्तथैव च ॥ २९॥
भारत! वह पापी उत्तरकुरु, भद्राश्व, केतुमाल तथा जम्बूद्वीपके अन्य प्रदेशोंपर भी धावा बोला करता था ॥२९॥

मानयन्ति च तं देवा दानवांश्च दुरासदाः।
भूतानि च तथान्यानि समर्थान्यपि सर्वथा ॥ ३०॥
दुर्जय देवता और दानव भी उसका सम्मान करते थे तथा अन्यान्य भूत सर्वथा समर्थ होनेपर भी उसका आदर करते थे ॥ ३०॥

ऋषयो वध्यमानास्तु समेता ब्रह्मवादिनः।
अचिन्तयन्नन्धकस्य वधं धर्मभृतां वर ॥ ३१॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! उसके द्वारा मारे और सताये जानेवाले ब्रह्मवादी ऋषि एकत्र हो अन्धकासुरके वधका उपाय सोचने लगे॥ ३१॥

तेषां बृहस्पतिर्मध्ये धीमानिदमथाब्रवीत्।
नास्य रुद्रादृते मृत्युर्विद्यते च कथंचन ॥ ३२॥

तथा वरे दीयमाने कश्यपेनापि शब्दितः।
नाहं रुद्रात् परित्रातुं शक्त इत्येव धीमतः॥ ३३॥
उन ऋषियोंमें बुद्धिमान् बृहस्पति भी थे। उन्होंने इस प्रकार कहा—'इस असुरकी मृत्यु रुद्रदेवके सिवा दूसरेके हाथसे किसी तरह नहीं हो सकती। दितिको वर देते समय महर्षि कश्यपने भी यह बात कह दी थी। मैं भगवान् रुद्रसे इसकी रक्षा नहीं कर सकता। यही बुद्धिमान् कश्यपजीका वचन है॥ ३२-३३॥

तमुपायं चिन्तयामः शर्वो येन सनातनः।
जानीयात् सर्वभूतानि पीड्यमानानि शङ्करः॥ ३४॥
'अतः हमलोग उस उपायपर विचार करें, जिससे दुष्टोंका संहार करनेवाले सनातन देव भगवान् शङ्करको यह पता लग जाय कि अन्धकासुरके अत्याचारसे समस्त प्राणी पीडित हो रहे हैं॥ ३४॥

विदितार्थो हि भगवानवश्यं जगतः प्रभुः।
अश्रुप्रमार्जनं देवः करिष्यति सतां गतिः॥ ३५॥
'भगवान् रुद्रदेव इस जगत्के स्वामी और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। जब उन्हें इस बातका पता चल जायगा, तब वे अवश्य सबके आँसू पोंछेंगे (अन्धकासुरको मारकर जगत्का दुःख दूर कर देंगे)॥ ३५॥

व्रतं हि देवदेवस्य भवस्य जगतो गुरोः।
सन्तोऽसद्भ्यो रक्षितव्या ब्राह्मणास्तु विशेषतः॥३६॥
'उन देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् शिवका यह व्रत है कि दुष्टोंसे साधु पुरुषोंकी, विशेषतः ब्राह्मणोंकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये॥ ३६॥

ते वयं नारदं सर्वे प्रयामो शरणं द्विजम्।
उपायं वेत्स्यते तत्र वयस्यो हि भवस्य सः॥ ३७॥
'अतः हम सब लोग नारद बाबाकी शरणमें चलें। वे ही इसका उपाय जानते होंगे; क्योंकि वे भगवान् शङ्करके मित्र हैं'॥ ३७॥

बृहस्पतिवचः श्रुत्वा सर्वेऽप्यथ तपोधनाः।
तावद् ददृशुराकाशे प्राप्तं देवर्षिसत्तमम् ॥ ३८॥
बृहस्पतिकी बात सुनकर उन सभी तपोधनोंने जब आकाशमे दृष्टि डाली तो देखा देवर्षिशिरोमणि नारद स्वयं आ पहुँचे हैं॥ ३८॥

पूजयित्वा यथान्याय सत्कृत्य विधिवन्मुनिम्।
देवर्षे भगवन् साधो कैलासं व्रज सत्वरम्॥ ३९॥
विज्ञाप्तुमर्हसे देवमन्धकस्य वधे हरम्।
उन्होंने नारद मुनिका यथोचित रीतिसे पूजन और विधिवत् सत्कार करके कहा—'देवर्षे! भगवन्! साधो! आप शीघ्र कैलास पर्वतको चले जाइये और अन्धकासुरका वध

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