भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 578
५५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेके लिये भगवान् शङ्करको आवश्यक सूचना दीजिये। आप ही इस कार्यके योग्य हैं' ॥ ३९३ ॥
त्राणार्थं नारदं प्रोचुस्तांस्तथेति स चोक्तवान् ॥ ४० ॥
ऋषिष्वथ प्रयातेषु तत्कार्यं नारदो मुनिः।
विचार्य मनसा विद्वानिति कार्यं स दृष्टवान् ॥ ४१ ॥

उन ऋषियोंने नारदजीसे कहा—'आप जगत्‌की रक्षाके लिये प्रयत्नशील हों।' तब नारद मुनिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। ऋषियोंके चले जानेपर उन विद्वान् मुनिने उस कार्यके विषयमें मन ही मन विचार करके यह देख और समझ लिया कि इस विषयमें अपनेको क्या करना है ? ॥ ४०-४१ ॥

स देवदेवं भगवान् द्रष्टुं मुनिरथाययौ।
मन्दारवनमध्यस्थो यत्र नित्यो वृषध्वजः ॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् भगवान् नारद मुनि देवाधिदेव महादेवजीका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ नित्य भगवान् वृषध्वज मन्दारवनमे विराजमान होते हैं ॥ ४२ ॥

स तत्र रजनीमेकामुषित्वा मुनिसत्तमः।
मन्दाराणां वने रम्ये दयितः शूलपाणिनः ॥ ४३ ॥
आजगाम पुनः स्वर्गे लब्ध्वानुज्ञां वृषध्वजात्।

भगवान् शूलपाणिके प्रिय-सखा मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ मन्दारोंके उस रमणीय वनमें एक रात रहकर भगवान् शिवसे आज्ञा ले पुनः स्वर्गलोकको लौट आये ॥ ४३३ ॥

मन्दारपुष्पैः सुकृतां मालामाबध्य भारत ॥ ४४ ॥
ग्रथितां सविशेषां तां सर्वगन्धोत्तमोत्तमाम्।

भरतनन्दन ! उन्होंने अपने गलेमें मन्दार-पुष्पोंद्वारा अच्छी तरह बनायी गयी और विशेष कलाके साथ गूँथी गयी माला धारण कर रक्खी थी, जिसकी सुगन्ध सभी श्रेष्ठ सुगन्धोंसे परम उत्तम थी ॥ ४४३ ॥

संतानमाल्यदामाथ तैरेव कुसुमैः कृतम् ॥ ४५ ॥
तच्च कण्ठे समासन्य महागन्धं नराधिप।
आययावन्धको यत्र दुरात्मा बलदर्पितः ॥ ४६ ॥

नरेश्वर ! उन्होंने संतान-मालाकी लड़ियाँ भी गलेमें डाल रक्खी थीं, जो उन्हीं संतान-कुसुमोंमे बनी हुई थीं। उससे भी बड़ी सुगन्ध फैल रही थी। उन मालाओंको धारण करके वे उस स्थानपर आये, जहाँ बलके घमण्डमें भरा हुआ दुरात्मा अन्धकासुर रहता था ॥ ४५-४६ ॥

अन्धकस्त्वथ तं दृष्ट्वा गन्धमाघ्राय चोत्तमम्।
संतानकानां स्रङ्मालां महागन्धां महामुने।
कुत्रायं पुष्पजातिर्वा कमनीया तपोधन ॥ ४७ ॥

अन्धकासुरने नारदजीको देखकर उस उत्तम सुगन्धका अनुभव करके महान् गन्धसे भरी हुई संतान-पुष्पोंकी माला-पर भी दृष्टि डाली और पूछा—'महामुने ! तपोधन ! यह कमनीय पुष्पोंकी जाति कहाँ उपलब्ध होती है ? ॥ ४७ ॥

गन्धान् वर्णानिष्टमांस्तान् हि भोः पुण्यति मुहुर्मुहुः।
स्वर्गे संतानकुसुमान्यतिवर्तति सर्वथा ॥ ४८ ॥

'अजी ! यह तो बारंबार अपने सुन्दर वर्णों और मनोहर गन्धोंकी पुष्टि कर रही है। स्वर्गमें जो संतानपुष्प उपलब्ध होते हैं, उनसे तो ये पुष्प सर्वथा बढ़-चढ़कर हैं ॥ ४८ ॥

कः प्रभुरस्तस्य वृक्षस्य शक्यं चाऽऽनयितुं मुने।
आचक्ष्व यद्यनुग्राह्या वयं ते देवतातिथे ॥ ४९ ॥

'मुने ! देवताओंके अतिथि नारद ! उस वृक्षका स्वामी कौन है ? क्या यह पुष्प वहाँसे लाया जा सकता है ? यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँतो आप मुझे इसका पता बताइये' ४९

तमुवाच मुनिश्रेष्ठः प्रहसन्निव भारत।
आदाय दक्षिणे हस्ते महत्तस्तपसो निधिः ॥ ५० ॥

भरतनन्दन ! तब महान् तपकी निधि मुनिश्रेष्ठ नारदने अन्धकासुरका दाहिना हाथ पकड़कर हँसते हुए-से कहा-।५०।

मन्दरे पर्वतश्रेष्ठे धीर कामगमं वनम्।
तत्र चैवंविधं पुष्पं भोः सृष्टिः शूलपाणिनः ॥ ५१ ॥

'वीर ! पर्वतप्रवर मन्दराचलपर एक इच्छानुसार चलनेवाला वन है। उसीमें इस तरहके फूल हैं। अजी ! वह वन साक्षात् शूलपाणि भगवान् शङ्करकी सृष्टि है ॥ ५१ ॥

न तु तत्र वनं कश्चिदृच्छन्देन महात्मनः।
प्रवेष्टुं लभते तद्धि रक्षन्ति प्रवरोत्तमाः ॥ ५२ ॥

'वहाँ उस वनमें महात्मा शिवजीकी इच्छाके बिना कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि उनके श्रेष्ठ पार्षद उसकी रक्षा करते हैं ॥ ५२ ॥

नानाप्रहरणा घोरा नानावेशा दुरासदाः।
अवध्याः सर्वभूतानां महादेवाभिरक्षिताः ॥ ५३ ॥

'वे नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये रहते हैं। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर है तथा उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। महादेवजीसे सुरक्षित होनेके कारण वे सभी प्राणियोंके लिये अवध्य हैं ॥ ५३ ॥

नित्यं प्रक्रीडते तत्र सोमः सप्रवरो हरः।
मन्दारद्रुमखण्डेषु सर्वात्मा सर्वभावनः ॥ ५४ ॥

'वहाँ मन्दार-वृक्षोंके बगीचोंमें उमासहित सर्वात्मा सर्वभावन महादेवजी नित्य क्रीड़ा करते और अपने पार्षदोंके साथ रहते हैं ॥ ५४ ॥

तपोविशेषैराराध्य हरं त्रिभुवनेश्वरम्।
शक्यं मन्दारपुष्पाणि प्राप्तुं कश्यपवंशज ॥ ५५ ॥

'कश्यपकुमार ! विशेष तपस्याके द्वारा तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवकी आराधना करके ही ये मन्दारपुष्प प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ ५५ ॥