विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ ५५७
स्त्रीरत्नमणिरत्नानि यानि चान्यानि चाप्यथ ।
काङ्क्षितानि फलन्ति स्म ते द्रुमा हरवल्लभाः ॥ ५६ ॥
'वे सभी वृक्ष भगवान् शङ्करके प्रिय हैं और स्त्रीरत्न, मणिरत्न तथा अन्य जो-जो अभिलषित पदार्थ हैं, उन सबको वे फलरूपसे प्रस्तुत करते हैं ॥ ५६ ॥
न तत्र सूर्यः सोमोऽथ तपत्यतुलविक्रम ।
स्वयंप्रभं तरुवनं तद् भो दुःखविवर्जितम् ॥ ५७ ॥
'अतुल पराक्रमी दैत्य ! वहाँ मन्दारवनमें न तो सूर्य तपते हैं और न चन्द्रमा ही प्रकाश करते हैं । मन्दार-वृक्षोंसे भरा हुआ वह वन स्वयं अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है । वहाँ दुःख-शोकका प्रवेश नहीं है ॥ ५७ ॥
तत्र गन्धान् स्रवन्त्यन्ये नीराण्यन्ये महाद्रुमाः ।
वासांसि विविधान्यन्ये सुगन्धीनि महाबल ॥ ५८ ॥
'महाबली अन्धक ! वहाँ कुछ वृक्ष ऐसे हैं, जो उत्तम सुगन्ध उत्पन्न करते हैं, दूसरे विशाल वृक्ष जल प्रकट करते हैं तथा अन्य वृक्ष नाना प्रकारके सुगन्धित वस्त्र प्रदान करते हैं ॥ ५८ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यं तथैव च ।
तरुभ्यः स्रवते तेभ्यो विविधं मनसेप्सितम् ॥ ५९ ॥
'इतना ही नहीं, उन वृक्षोंसे भाँति-भाँतिके मनोवाञ्छित भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥
पिपासा वा क्षुभुक्षा वा ग्लानिर्निद्रापि वानघ ।
न मन्दारवने वीर भवतीत्युपधार्यताम् ॥ ६० ॥
'निष्पाप वीर ! तुम यह समझ लो कि उस मन्दारवनमें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा चिन्ता भी नहीं फटकने पाती है ६०
न ते वर्णयितुं शक्या गुणा वर्षशतैरपि ।
गुणा ये तत्र वर्द्धन्ते स्वर्गाद् बहुगुणोत्तराः ॥ ६१ ॥
अतीव हि जयेल्लोकान् समहेन्द्रान् न संशयः ।
एकाहमपि यस्तत्र वसेच्च दितिजोत्तम ॥ ६२ ॥
'वहाँ स्वर्गसे कई गुने उत्तम जो गुण दिनोंदिन बढ़ते हैं, उनका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता । दैत्यप्रवर ! जो वहाँ एक दिन भी निवास कर लेगा, वह महेन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकोंपर अतिशय विजय प्राप्त कर लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६१-६२ ॥
स्वर्गस्यापि हि तत् स्वर्गं सुखानाम्पि तत् सुखम् ।
बभूव जगतः सर्वमिति मे धीयते मनः ॥ ६३ ॥
'वह स्वर्गका भी स्वर्ग और समस्त सुखोंका भी सुख है। मेरे मनका तो ऐसा विश्वास है कि वही सम्पूर्ण जगत्का सर्वस्व-सार है' ॥ ६३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
मन्दराचलपर गये हुए अन्धकासुरका महादेवजीद्वारा वध
वैशम्पायन उवाच
अन्धको नारदवचः श्रुत्वा तत्त्वेन भारत ।
मन्दरं पर्वत गन्तुं मनो दध्रे महासुरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत ! नारदजीकी बातको ठीकसे सुनकर महान् असुर अन्धकने मन्दराचलपर जानेका विचार किया ॥ १ ॥
सोऽसुरान् सुमहातेजाः समानीय महाबलः ।
जगाम मन्दरं क्रुद्धो महादेवालयं तदा ॥ २ ॥
वह महातेजस्वी, महाबली दैत्य बहुत से असुरोंको एकत्र करके कुपित हो उस समय महादेवजीके निवासस्थान मन्दरपर्वतपर गया ॥ २ ॥
तं महाभ्रप्रतिच्छन्नं महौषधिसमाकुलम् ।
नानासिद्धसमाकीर्णं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३ ॥
वह पर्वत बड़े-बड़े मेघोंसे आच्छादित, महौषधियोंसे सम्पन्न, नाना प्रकारके सिद्धोंसे भरा हुआ और महर्षियोंके समुदायसे सेवित था ॥ ३ ॥
चन्दनागुरुवृक्षाढ्यं सरलद्रुमसंकुलम् ।
किन्नरोद्गीतरम्यं च बहुनागकुलाकुलम् ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर चन्दन और अगुरुके वृक्ष शोभा पाते थे । सरल (चीड़) के वृक्ष सर्वत्र फैले हुए थे । किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये जानेवाले मधुर गीतोंमें उसकी रमणीयता बढ़ गयी थी । वह बहुत-से नागकुलो (हाथियों अथवा सर्पों) से व्याप्त था ॥ ४ ॥
वातोद्धूतैर्वनैः फुल्लैर्नृत्यन्तमिव च क्वचित् ।
प्रसूतैर्धातुभिश्चित्रैर्विलेपितमिव च क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं वायुके वेगसे कम्पित हुए प्रफुल्ल काननोंद्वारा वह नृत्य करता-सा जान पड़ता था । कहीं पिघलकर बहे हुए विचित्र धातुओंके कारण वह चन्दन आदिसे चर्चित हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५ ॥
पक्षिखनैः सुमधुरैर्नदन्तमिव च क्वचित् ।
हंसैः शुचिपदैः कीर्णे सम्पतद्भिरितस्ततः ॥ ६ ॥
कहीं पक्षियोंके अत्यन्त मधुर शब्दोंसे वह पर्वत गरजता