विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५५८ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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या कोलाहल करता-सा जान पड़ता था। पवित्र स्थानोंपर बैठनेवाले हंस वहाँ इधर-उधर उड़ते-फिरते थे; जिनसे सारा पर्वत व्याप्त प्रतीत होता था॥ ६॥
महाबलैश्च महिषैश्चरद्भिर्दैत्यनाशनैः।
चन्द्रांशुविमलैः सिंहैर्भूषितं हेमसंचयम्॥ ७॥
वहाँ दैत्योंका विनाश करनेमें समर्थ महाबली भैंसे विचरण करते थे। चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कान्तिवाले सिंह उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। वह समस्त शैल सुवर्णकी राशिरूप था॥ ७॥
मृगराजसमाकीर्णं मृगवृन्दनिषेवितम्।
स मन्दरं गिरिं प्राह रूपिणं बलदर्पितः॥ ८॥
वहाँ बहुत-से मृगराज (सिंह) सब ओर बिखरे हुए थे। झुंड-के-झुंड मृग उस पर्वतका सेवन करते थे। वह मन्दरपर्वत देवतारूपमें मूर्तिमान् होकर अन्धकासुरके सामने प्रकट हुआ। उसे देखकर बलके घमंडमें भरे हुए अन्धकासुरने कहा—॥ ८॥
वेत्सि त्वं हि यथावध्यो वरदानादहं पितुः।
मम चैव वशे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ९॥
प्रतियोद्धुं न मां कश्चिदिच्छत्यपि गिरे भयात्।
पारिजातवनं चास्ति तव सानौ महागिरे।
सर्वकामप्रदैः पुष्पैर्भूषितं रत्नमुत्तमम्॥ १०॥
'महागिरे! यह तो तुम जानते ही होगे कि मैं किस प्रकार अपने पिताके वरदानसे सबके लिये अवध्य हूँ। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी इस समय मेरे वशमें है। कोई भी भयके कारण मुझसे युद्ध करना नहीं चाहता। मुझे पता लगा है कि तुम्हारे शिखरपर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले पुष्पोंसे विभूषित एक पारिजात वन है, जो यहाँका उत्तम रत्न है॥ ९-१०॥
तदाचक्ष्वोपभोक्ष्यामि तद् वनं तव सानुजम्।
किं करिष्यसि क्रुद्धस्त्वं मनो हि त्वरते मम॥ ११॥
त्रातारं नानु पश्यामि मया खल्वर्दितस्य ते।
इत्युक्तो मन्दरस्तेन तत्रैवान्तरधीयत॥ १२॥
'वह कहाँ है, उसे बताओ! मैं तुम्हारे शिखरपर उत्पन्न हुए उस वनका उपभोग करूँगा। मेरा मन उसमें जानेके लिये उतावला हो उठा है। तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे? मुझे ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता, जो मेरे द्वारा पीड़ित होनेपर तुम्हारी निश्चित रूपसे रक्षा कर सके।' उसके ऐसा कहनेपर मन्दराचलका वह अधिष्ठाता देव वहीं अन्तर्धान हो गया॥ ११-१२॥
ततोऽन्धकोऽतिरुषितो वरदानेन दर्पितः।
मुमोच नादं सुमहदिदं वचनमब्रवीत्॥ १३॥
मया वै त्वं याच्यमानो यस्मान्न बहु मन्यसे।
अहं चूर्णीकरोमि त्वां बलं पर्वत पश्य मे॥ १४॥
तब वरदानसे घमंडमें भरा हुआ अन्धक अत्यन्त रुष्ट हो बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा और इस प्रकार बोला— 'अरे पर्वत! मेरे याचना करनेपर भी जो तू मुझे अधिक सम्मान नहीं दे रहा है, इससे कुपित होकर मैं तुझे अभी चूर्ण किये देता हूँ। देख ले मेरा बल'॥ १३-१४॥
एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गमुत्पाट्य बहुयोजनम्।
निष्पिपेप गिरेस्तस्य शृङ्गेष्वन्यत्र वीर्यवान्॥ १५॥
सह तैरासुरैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितः।
ऐसा कहकर वरदानसे दर्पमें भरे हुए उस पराक्रमी दैत्यने उन सब असुरोंके साथ मन्दराचलके एक शिखरको, जो अनेक योजन विस्तृत था, उखाड़ लिया और उसे उसी पर्वतके दूसरे शिखरोंपर पटककर पीस डाला॥ १५ १/२॥
तं प्रच्छन्ननदीजालं मन्यमानं महागिरिम्॥ १६॥
विदित्वा भगवान् रुद्रश्चकारानुग्रहं गिरेः।
उस महान् पर्वतने अपनी नदियोंके समुदायको भी छिपा लिया। उसकी परिस्थितिको समझकर भगवान् रुद्रने उस पर्वतपर अनुग्रह किया॥ १६ १/२॥
सविशेषतरं वीर मत्तद्विपमृगायुतम्॥ १७॥
नदीजालैर्बहुतरैराचितं चित्रकाननम्।
नभश्च्युतैः पुरा यद्वत् तद्वदेव विराजते॥ १८॥
वीर! भगवान्के अनुग्रहसे पारिजात आदि विशेषतर वनोंसे युक्त, मतवाले हाथियों और मृगोंसे सम्पन्न तथा आकाशसे गिरे हुए बहुसंख्यक नदीसमूहोंसे व्याप्त वह विचित्र काननोंवाला पर्वत जैसा पहले था, उसी रूपमें प्रकाशित होने लगा॥ १७-१८॥
अथ देवप्रभावेण शृङ्गाण्युत्पादितानि तु।
क्षिप्तानि चासुरानेव घ्नन्ति घोराणि भारत॥ १९॥
भरतनन्दन! उन महादेवजीके प्रभावसे असुरोंद्वारा उखाड़कर फेंके गये उसके घोर शिखर उन असुरोंको ही मार डालते थे॥
क्षिप्त्वा ये प्रपलायन्ते शृङ्गाणि तु महासुराः।
शृङ्गैस्तैस्तैः स्म वध्यन्ति पर्वतस्य जनाधिप॥ २०॥
जनेश्वर! जो महान् असुर मन्दराचलके शिखरोंको फेंककर भागते थे, वे उन्हीं शिखरोंद्वारा मारे जाते थे॥ २०॥
ये स्वस्थास्त्वसुरास्तत्र तिष्ठन्ति गिरिसानुषु।
शृङ्गैस्ते न स्म वध्यन्ते मन्दरस्य महागिरेः॥ २१॥
जो असुर वहाँ पर्वत-शिखरोंपर स्वस्थ-भावसे खड़े थे, वे महागिरि मन्दरके उन शिखरोंद्वारा नहीं मारे जाते थे॥ २१॥
ततोऽन्धकस्तदा दृष्ट्वा सेनां तां मर्दितां तथा।
कुपितः सुमहानादं नर्दित्वैवं तदाब्रवीत्॥ २२॥