भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 581

[ विष्णुपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः ५५९


तब अन्धकने अपनी उस सेनाको कुचली गयी देख उस समय रोषपूर्वक महान् सिंहनाद करके इस प्रकार कहा—॥२२॥ आह्वये तं वनं यस्य युद्धार्थमुपतिष्ठतु। किं त्वयाचल युद्धेन हताः स च्छद्मना रणे॥ २३॥ 'अचल ! तेरे साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ ? तूने रणभूमिमें दैत्योंको छलसे मारा है। अब मैं उस पुरुषको ललकारता हूँ, जिसका यह वन है। वह युद्धके लिये मेरे सामने उपस्थित हो' ॥ २३ ॥

एवमुक्ते त्वन्धकेन वृषभेण महेश्वरः। सम्प्राप्तः शूलमुद्यम्य देवोऽन्धकजिघांसया ॥ २४॥ अन्धकासुरके ऐसा कहनेपर उसे मार डालनेकी इच्छासे भगवान् महेश्वरदेव त्रिशूल उठाये अपने वृषभके द्वारा वहाँ आ पहुँचे ॥ २४ ॥

प्रमथानां गणैर्धीमान् वृतो वै बहुलोचनः। तथा भूतगणैश्चैव धीमान् भूतगणेश्वरः ॥ २५ ॥ भूतगणोंके स्वामी बुद्धिमान् भगवान् त्रिलोचन प्रमथगणों तथा भूतसमूहोंसे घिरे हुए थे ॥ २५ ॥

प्रचकम्पे ततः कृत्स्नं त्रैलोक्यं रुषिते हरे। सिन्धवश्च प्रतिस्रोतमूहुः प्रज्वलितोदकाः ॥ २६ ॥ भगवान् शङ्करके रुष्ट होनेपर सारी त्रिलोकी काँप उठी। नदियाँ अपने प्रवाहके विपरीत उद्गमस्थानकी ओर बहने लगीं । उनका जल खौल उठा ॥ २६ ॥

जग्मुर्दिशोऽग्निदाहाश्च सर्वे ते हरतेजसा। युयुधुश्च ग्रहाः सर्वे विपरीता जनाधिप ॥ २७॥ जनेश्वर ! महादेवजीके तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंमें अग्निदाह फैल गये और समस्त ग्रह विपरीत होकर परस्पर जूझने लगे।२७।

चेलुश्च गिरयस्तत्र काले कुरुकुलोद्वह। प्रववर्षार्थ पर्जन्यः सधूमाङ्गारवृष्टयः ॥ २८ ॥ कुरुकुलधुरंधर वीर ! उस समय सारे पर्वत हिलने लगे और उनके ऊपर मेघ धूमयुक्त अङ्गारोंकी वर्षा करनेलगे।२८।

उष्णाभाश्चन्द्रमाश्चासीत् सूर्यः शीतप्रभस्तथा । न ब्रह्म विविदुस्तत्र मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ २९ ॥ चन्द्रमाकी शीतल किरणें गरम हो गयीं। सूर्यकी प्रभा ठंडी पड़ गयी। ब्रह्मवादी मुनियोंका सारा ब्रह्मज्ञान भूल गया ॥ २९ ॥

वडवाः सुपुवुर्गाश्च गावोऽश्वानपि चानघ। पेतुर्रुक्षाश्च मेदिन्यामछिन्ना भस्मसात्कृताः ॥ ३० ॥ निष्पाप नरेश्वर ! घोड़ियोंके पेटसे गायके बछड़े पैदा होने लगे और गौएँ घोड़ोंको जन्म देने लगीं । पृथ्वीपर बिना काटे ही बहुत-से वृक्ष भस्म होकर गिर पड़े ॥ ३० ॥

बाधन्ते वृषभा गाश्च गावश्चारुरुहुर्वृषान् । राक्षसा यातुधानाश्च पिशाचाश्चापि सर्वशः ॥ ३१ ॥ साँड़ गौओंको सताने लगे। गौएँ भी साँड़ोंपर चढ़ जाती थीं । राक्षस, यातुधान और पिशाच—ये सब-के-सब ( प्राणियोंको कष्ट देने लगे ) ॥ ३१ ॥

विपरीतं जगद् दृष्ट्वा महादेवस्तथागतम्। मुमोच भगवान्छूलं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३२ ॥ संसारकी इस प्रकार विपरीत अवस्था देख भगवान् शङ्करने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अपना त्रिशूल छोड़ा॥

तत् पपात हरोत्सृष्टमन्धकोरसि दुर्द्धरम्। भस्मसाच्चाकरोद् रौद्रमन्धकं साधुकण्टकम् ॥ ३३ ॥ भगवान् शङ्करका छोड़ा हुआ वह दुःसह अस्त्र अन्धकासुरकी छातीपर गिरा। उसने साधुओंके लिये कण्टकरूप भयंकर अन्धकासुरको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३३ ॥

ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः। शंकरं तुष्टुवुश्चैव जगच्छत्रौ निबर्हिते ॥ ३४ ॥ तदनन्तर समस्त देवगण और तपोधन मुनि जगत्के शत्रु अन्धकासुरके मारे जानेपर भगवान् शङ्करकी स्तुति करने लगे ॥ ३४ ॥

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात ह । त्रैलोक्यं निर्वृतं चासीन्नरेन्द्र विगतज्वरम् ॥ ३५ ॥ नरेन्द्र ! देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और तीनों लोकोंके प्राणियोंने निश्चिन्त होकर संतोषकी साँस ली ॥ ३५ ॥

प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । जेपुश्च ब्राह्मणा वेदान्निजपुश्च क्रतुभिस्तदा ॥ ३६ ॥ उस समय देवगन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं। ब्राह्मणलोग वेदोंका जप, स्वाध्याय तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करने लगे ॥ ३६ ॥

ग्रहाः प्रकृतिमापेदुरूहर्नद्यो यथा पुरा। न जज्वल जले वह्निराशाः सर्वाः प्रसेदिरे ॥ ३७ ॥ ग्रह स्वाभाविक स्थितिमे आ गये। नदियाँ पहलेके समान बहने लगीं । जलमें आगका जलना बंद हो गया और सारी दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं ॥ ३७॥

मन्दरः पर्वतश्रेष्ठः पुनरेव रराज ह। श्रिया परमया जुष्टः सर्वतेजःसमुच्छ्रयात् ॥ ३८ ॥ पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल अपने सम्पूर्ण तेजकी वृद्धि होनेके कारण परम शोभासे सम्पन्न हो पुनः पूर्ववत् प्रकाशित होने लगा ॥ ३८ ॥

रेमे सोमश्च भगवान् पारिजातवने हरः।

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