विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सुप्रचारान् सुरान् कृत्वा शक्रादीन् धर्मतः प्रभुः ॥ ३९ ॥
सबके प्रभु उमासहित भगवान् शङ्कर इन्द्र आदि देवताओंको धर्मतः सर्वत्र घूमने-फिरने योग्य बनाकर पारिजात-वनमें विहार करने लगे ॥ ३९ ॥ .
इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
अष्टाशीतितमोऽध्यायः
पिण्डारकतीर्थके अन्तर्गत समुद्रमें श्रीकृष्ण तथा अन्य यादवोंका जलविहार
जनमेजय उवाच
श्रुतेऽन्धकवधः श्राव्यः श्रुतोऽयं खलु भो मया।
शान्तिस्त्रयाणां लोकानां कृता देवेन धीमता ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**मुने ! अन्धकवधका प्रसंग अवश्य सुनने योग्य है। मैंने उसे अच्छी तरह सुना है। अन्धकासुर-का वध करके बुद्धिमान् महादेवजीने तीनों लोकोंमें शान्ति फैला दी ॥ १ ॥
निकुम्भस्य हतं देहं द्वितीयं चक्रपाणिना ।
यदर्थं च यथा चैव तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भके दूसरे शरीरका किस लिये और किस प्रकार वध किया था। आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रद्दधानस्य राजेन्द्र वक्तव्यं भवतोऽनघ।
चरितं लोकनाथस्य हरेरमिततेजसः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**निष्पाप राजेन्द्र ! तुम श्रद्धालु हो; इसलिये तुमसे अमित तेजस्वी जगन्नाथ श्रीहरिके चरित्रका वर्णन करना उचित है ॥ ३ ॥
द्वारवत्यां निवस्तो विष्णोरतुलतेजसः ।
समुद्रयात्रा सम्प्राप्ता तीर्थे पिण्डारके नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! एक समयकी बात है, द्वारकामें रहते समय अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णको पिण्डारकतीर्थमें समुद्रयात्राका अवसर प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
उग्रसेनो नरपतिर्वसुदेवश्च भारत ।
निक्षिप्तौ नगराध्यक्षौ शेषाः सर्वे विनिर्गताः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन ! राजा उग्रसेन तथा वसुदेव—इन दोनोंको नगरका अध्यक्ष बनाकर द्वारकापुरीमें ही छोड़ दिया गया। शेष सब लोग यात्राके लिये निकले ॥ ५ ॥
पृथग्बलः पृथग्धीमाँल्लोकनाथो जनार्दनः ।
गोष्ठ्यः पृथक्कुमाराणां नृदेवामिततेजसाम् ॥ ६ ॥
नरदेव ! बलरामजी अपने परिवारके साथ अलग थे, सम्पूर्ण जगत्के स्वामी बुद्धिमान् भगवान् जनार्दनका दल अलग था तथा अमित तेजस्वी कुमारोंकी मण्डलियाँ भी अलग-अलग थीं ॥ ६ ॥
गणिकानां सहस्राणि निःसृतानि नराधिप ।
कुमारैः सह वार्ष्णेयै रूपवद्भिः स्वलंकृतैः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न वृष्णिवंशी कुमारोंके साथ सहस्रों गणिकाएँ भी यात्रा-के लिये निकलीं ॥ ७ ॥
दैत्याधिवासं निर्जित्य यदुभिर्दृढविक्रमैः ।
वेश्या निवेशिता वीर द्वारवत्यां सहस्रशः ॥ ८ ॥
वीर ! सुदृढ़ पराक्रमी यादव वीरोंने दैत्योंके निवास-स्थान समुद्रको जीतकर वहाँ द्वारकापुरीमें सहस्रों वेश्याओंको बसा दिया था ॥ ८ ॥
सामान्यास्ताः कुमाराणां क्रीडानार्यो महात्मनाम् ।
इच्छाभोग्या गुणैरेव राजन्या वेषयोषितः ॥ ९ ॥
विविध वेश धारण करनेवाली वे युवतियाँ महामनस्वी यादवकुमारोंके लिये सामान्य क्रीड़ानारियाँ थीं। वे अपने गुणोंद्वारा सभी कुमारोंकी इच्छाके अनुसार उनके उपभोगमें आनेवाली थीं। राजकुमारोंकी उपभोग्या होनेके कारण वे राजन्या कहलाती थीं ॥ ९ ॥
स्थितिरेषा हि भैमानां कृता कृष्णेन धीमता ।
स्त्रीनिमित्तं भवेद् वैरं मा यदूनामिति प्रभो ॥ १० ॥
प्रभो ! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने भीमवंशी यादवोंके लिये ऐसी व्यवस्था कर दी थी, जिससे यादवोंमें स्त्रीके कारण परस्पर वैर न हो ॥ १० ॥
रेवत्या चैकया सार्धं बलो रेमेऽनुकूलया ।
चक्रवाकानुरागेण यदुश्रेष्ठः प्रतापवान् ॥ ११ ॥
प्रतापी यदुश्रेष्ठ बलरामजी सदा अपने अनुकूल रहने-वाली एकमात्र रेवती देवीके साथ चकवा-चकवीके समान परस्पर अनुरागपूर्वक रमण करते थे ॥ ११ ॥
कादम्बरीपानकलो भूषितो वनमालया।
चिक्रीड सागरजले रेवत्या सहितो बलः ॥ १२ ॥
वे कादम्बरी (मधु) का पान करके मस्त रहते थे। वनमालासे विभूषित हुए बलराम वहाँ रेवतीके साथ समुद्र-जलमें क्रीडा करने लगे ॥ १२ ॥