विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५६१
षोडश स्त्रीसहस्राणि जले जलजलोचनः।
रमयामास गोविन्दो विश्वरूपेण सर्वदृक् ॥ १३ ॥
सबके द्रष्टा कमलनयन गोविन्द सर्वरूपसे अर्थात् जितनी स्त्रियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके जलमें अपनी सोलह हजार स्त्रियोंको रमाते थे ॥ १३ ॥
अहमिष्टा मया सार्द्धं जले वसति केशवः।
इति ता मेनिरे सर्वा रात्रौ नारायणश्रियः ॥ १४ ॥
उस रातमें नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी वे सारी रानियाँ यही मानती थीं कि मैं ही इन्हें अधिक प्रिय हूँ; अतः केशव मेरे ही साथ जलमें विहार कर रहे हैं ॥ १४ ॥
सर्वाः सुरतचिह्नाङ्ग्यः सर्वाः सुरततर्पिताः।
मानमूहुश्च ताः सर्वा गोविन्दे बहुमानजम् ॥ १५ ॥
सभीके अङ्गोंमें सुरतके चिह्न थे। सभी सुरत-सुखका अनुभव करके तृप्त हो गयी थीं; अतः वे सब-की-सब गोविन्दके प्रति बहुमानजनित सम्मानका भाव धारण करती थीं ॥ १५ ॥
अहमिष्टाहमिष्टेति स्निग्धे परिजने तदा।
नारायणश्रियः सर्वा मुदा श्लाघाञ्चक्रिरे शुभाः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णकी वे सभी सुन्दरी रानियाँ अपने स्नेही परिजनोंके समीप प्रसन्नतापूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करती हुई कहती थीं कि मैं ही अपने प्राणनाथको अधिक प्रिय हूँ। मैं ही उन्हें अधिक प्यारी हूँ ॥ १६ ॥
करजद्विजचिह्नानि कुचाधरगतानि ताः।
दृष्ट्वा दृष्ट्वा जहृषिरे दर्पणे कमलेक्षणाः ॥ १७ ॥
वे कमलनयनी सुन्दरियाँ दर्पणमें अपने कुचोंपर श्रीकृष्णके नखक्षत और अधरोंपर दन्तक्षतके चिह्न देख-देखकर हर्षमें भर जाती थीं ॥ १७ ॥
गोत्रमुद्दिश्य कृष्णस्य जगिरे कृष्णयोषितः।
पिबन्त्य इव कृष्णस्य नयनैर्वदनाम्बुजम् ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णकी वे सुन्दरी पत्नियाँ उनके नाम ले-लेकर गीत गातीं और अपने नेत्रपुटोंसे उनके मुखारविन्दका रस पान करती थीं ॥ १८ ॥
कृष्णार्पितमनोदृष्टयः कान्ता नारायणश्रियः।
मनोहरतरा राजन्नभवन्नेकनिश्चयाः ॥ १९ ॥
राजन्! उनके मन और नेत्र श्रीकृष्णमें ही लगे रहते थे। नारायणकी वे कमनीय भार्याएँ अत्यन्त मनोहारिणी और एक निश्चयपर अटल रहनेवाली थीं ॥ १९ ॥
एकार्पितमनोदृष्टयो नेर्ष्या ताश्चक्रिरेऽङ्गनाः।
नारायणेन देवेन तर्प्यमाणमनोरथाः ॥ २० ॥
नारायणदेव उनके सारे मनोरथ पूर्ण करके उन्हें तृप्त रखते थे; अतः वे अङ्गनाएँ एकको ही अपना हृदय और दृष्टि अर्पित करके भी आपसमें कभी ईर्ष्या नहीं करती थीं ॥ २० ॥
शिरांसि गर्वितान्यूहुः सर्वा निरवशेषतः।
वाल्लभ्यं केशवमयं वहन्त्यश्चारुदर्शनाः ॥ २१ ॥
वे सारी-की-सारी मनोहर दृष्टिवाली (अथवा मनोहर दिखायी देनेवाली) सुन्दरियाँ केशवकी वल्लभा होनेका अथवा केशवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त करनेका सौभाग्य वहन करती हुई अपने सिरको बड़े गर्वसे ऊँचा किये रहती थीं ॥ २१ ॥
ताभिस्तु सह चिक्रीड सर्वाभिर्हरिरात्मवान्।
विश्वरूपेण विधिना समुद्रे विमले जले ॥ २२ ॥
अपने मनको वशमें रखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण समुद्रके निर्मल जलमें पूर्वोक्त विश्वरूप विधिसे उन सबके साथ क्रीड़ा करते थे ॥ २२ ॥
उवाह सर्वगन्धाढ्यं स्वच्छं वारि महोदधिः।
तोयं विलवणं मृष्टं वासुदेवस्य शासनात् ॥ २३ ॥
भगवान् वासुदेवके शासनसे उस समय महासागर समस्त सुगन्धोंसे युक्त, स्वच्छ, लवणरहित और शुद्ध स्वादिष्ट जल धारण करता था ॥ २३ ॥
गुल्फदघ्नं जानुदघ्नमूरूदघ्नमथापि वा।
नार्यस्ताः स्तनदघ्नं वा जलं समभिकाङ्क्षितम् ॥ २४ ॥
सिषिचुः केशवं पत्न्यो धारा इव महोदधिम्।
सिषेच ताश्च गोविन्दो मेघः फुल्ललता इव ॥ २५ ॥
समुद्रका वह जल कहीं घुट्टीभर था तो कहीं घुटनोंतक, कहीं जाँघोंतक था तो कहीं स्तनोंतक। उन नारियोंको इतना ही जल अभीष्ट था। श्रीकृष्णकी वे रानियाँ उनपर सब ओरसे जल उलीचने लगीं, जैसे नदियोंकी अनेक धाराएँ महासागरको सींचती हैं। भगवान् गोविन्द भी उनपर जल छिड़कने लगे, मानो मेघ खिली हुई लताओंपर जल बरसा रहा हो ॥ २४-२५ ॥
अवलम्ब्य पराः कण्ठे हरिं हरिणलोचनाः।
उपगूहस्व मां वीर पतामीत्यब्रुवन् स्त्रियः ॥ २६ ॥