विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कितनी ही मृगनयनी नारियाँ श्रीहरिके कण्ठमें अपनी बाँहें डालकर कहने लगीं—‘वीर ! मुझे हृदयसे लगा लो, अपनी भुजाओंमें कस लो; अन्यथा मैं जलमें गिरी जाती हूँ’ ॥ २६ ॥
काश्चित् काष्ठमयैस्तैरुः प्लवैः सर्वाङ्गशोभनाः ।
क्रौञ्चवर्हिणनागानामाकारसदृशैः स्त्रियः ॥ २७ ॥
कितनी ही सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्रियाँ क्रौञ्च, मोर तथा नागोंके आकारमें बनी हुई काठकी नौकाओंद्वारा जलपर तैरने लगीं ॥ २७ ॥
मकराकृतिभिश्चान्या मीनाभैरपि चापराः ।
बहुरूपाकृतिधरैः पुप्लवुश्चापराः स्त्रियः ॥ २८ ॥
स्तनकुम्भैस्तथा तेरुः कुम्भैरिव तथापराः ।
समुद्रसलिले रम्ये हर्षयन्त्यो जनार्दनम् ॥ २९ ॥
दूसरी-दूसरी स्त्रियाँ मगर, मत्स्य तथा अन्यान्य विविध प्राणियोंकी आकृति धारण करनेवाली नौकाओंद्वारा तैरने लगीं । कितनी ही रानियाँ समुद्रके रमणीय जलमें श्रीकृष्णको हर्ष प्रदान करती हुई घटोंके समान अपने स्तनकुम्भोंद्वारा तैर रही थीं ॥ २८-२९ ॥
रराम सह रुक्मिण्या जले तस्मिन् मुदा युतः ।
येनैव कार्ययोगेन रमतेऽमरसत्तमः ॥ ३० ॥
तत् तदेव हि ताश्चक्रुर्मुदा नारायणस्त्रियः ।
अमरशिरोमणि श्रीकृष्ण उस जलमें आनन्दपूर्वक महारानी रुक्मिणीके साथ रमण करते थे। वे जिस-जिस कार्य या उपायसे आनन्द मानते, उनकी वे सुन्दरी स्त्रियाँ प्रशंसापूर्वक वही-वही कार्य या उपाय करती थीं ॥ ३०½ ॥
तनुवस्त्रावृतास्तन्व्यो लीलयन्त्यस्तथापराः ।
चिक्रीडुर्वासुदेवस्य जले जलजलोचनाः ॥ ३१ ॥
महीन वस्त्रोंसे ढकी हुई दूसरी तन्वङ्गी एवं कमलनयनी स्त्रियाँ भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करती हुई जलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा करती थीं ॥ ३१ ॥
यस्य यस्यास्तु यो भावस्तां तां तेनैव केशवः ।
अनुप्रविश्य भावज्ञो निनायात्मवशं वशी ॥ ३२ ॥
जिस-जिस रानीके मनमें जो-जो भाव था, सबके भावों-को जानने और मनको वशमें रखनेवाले श्रीकृष्ण उसी-उसी भावसे उस स्त्रीके अन्तरमें प्रवेश करके उसे अपने वशमें कर लेते थे ॥ ३२ ॥
हृषीकेशोऽपि भगवान् हृषीकेशः सनातनः ।
बभूव देशकालेन कान्तावशगतः प्रभुः ॥ ३३ ॥
इन्द्रियोंके प्रेरक और सबके स्वामी होकर भी सनातन भगवान् हृषीकेश देश-कालके अनुसार अपनी प्रेयसी पत्नियोंके वशमें हो गये थे ॥ ३३ ॥
कुलशीलसमोऽस्माकं योग्योऽयमिति मेनिरे ।
वंशरूपेण वर्तन्तमङ्गनास्ता जनार्दनम् ॥ ३४ ॥
वे समस्त वनिताएँ अपने कुलके अनुरूप बर्ताव करने-वाले जनार्दनको ऐसा समझती थीं कि ये कुल और शीलमें समान होनेके कारण हमारे ही योग्य हैं ॥ ३४ ॥
तदा दाक्षिण्ययुक्तं तं सितपूर्वाभिभाषिणम् ।
कृष्णं भार्याश्चकमिरे भक्त्या च बहु मेनिरे ॥ ३५ ॥
मुसकराकर बात करनेवाले तथा औदार्य-गुणसे सम्पन्न उन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णको उस समय उनकी वे पत्नियाँ हृदयसे चाहने लगीं तथा भक्ति एवं अनुरागके कारण उनका बहुत सम्मान करने लगीं ॥ ३५ ॥
पृथग्गोष्ठ्यः कुमाराणां प्रकाशं स्त्रीगणैः सह ।
अलं चक्रुर्जलं वीराः सागरस्य गुणाकराः ॥ ३६ ॥
यादवकुमारोंकी गोष्ठियाँ अलग थीं । वे वीर यादव-कुमार उत्तम गुणोंकी खान थे और प्रकाशरूपसे स्त्रीसमुदायोंके साथ समुद्रके जलकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३६ ॥
गीतनृत्यविधिज्ञानां तासां स्त्रीणां जनेश्वर ।
तेजसाप्याहृतानां ते दाक्षिण्यात् तस्थिरे वशे ॥ ३७ ॥
जनेश्वर ! वे स्त्रियाँ गीत और नृत्यकी क्रियाको जानने-वाली थीं तथा उन कुमारोंके तेजसे स्वयं ही उनकी ओर आकृष्ट हुई थीं तो भी वे कुमार उदारताके कारण उनके वशमें स्थित थे ॥ ३७ ॥
शृण्वन्तश्चारुगीतानि तथा खभिनयान्यपि ।
तूर्याण्युत्तमनारीणां मुमुहुर्यदुपूङ्गवाः ॥ ३८ ॥
उन उत्तम नारियोंके मनोहर गीत और वाद्य सुनते तथा उनके सुन्दर अभिनय देखते हुए वे यदुपुङ्गववीर उनपर लट्टू हो रहे थे ॥ ३८ ॥
पञ्चचूडां ततः कृष्णः कौवेर्यश्च वराप्सराः ।
माहेन्द्रीश्चानयामास विश्वरूपेण हेतुना ॥ ३९ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णने विश्वरूप होनेके कारण स्वयं ही प्रेरणा देकर पञ्चचूड़ा नामवाली अप्सराको तथा कुबेरभवन